Friday, March 20, 2026
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खेती बाड़ी-कलम स्याही: सैन्य कैंप को लेकर क्यों सुर्खियों मे हैं किशनगंज!

सरकार के इस योजना का उद्देश्य सीमावर्ती इलाके में सुरक्षा मजबूती और सैन्य ढांचा विकसित करना है। हालांकि स्थानीय स्तर पर इस प्रस्ताव को भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

बिहार के किशनगंज जिला में प्रस्तावित सैनिक कैंप इन दिनों सबसे अधिक सुर्खियों में है। दरअसल किशनगंज जिला के कोचाधामन और बहादुरगंज में सैनिक कैंप के लिए जमीन अधिग्रहण का विरोध होने लगा है। विरोध अब पटना से दिल्ली तक पहुंच गया है। किशनगंज जिले के कोचाधामन अंचल के सतभीट्टा और कन्हैयाबाड़ी मौजा तथा बहादुरगंज अंचल के शकोर और नटवापाड़ा मौजा में भारतीय सेना के सैनिक स्टेशन निर्माण के लिए करीब 250 एकड़ जमीन चिन्हित की गई है।

सरकार के इस योजना का उद्देश्य सीमावर्ती इलाके में सुरक्षा मजबूती और सैन्य ढांचा विकसित करना है। लेकिन स्थानीय स्तर पर इस प्रस्ताव को भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीणों के साथ-साथ क्षेत्र के जनप्रतिनिधि भी जमीन अधिग्रहण के खिलाफ खुलकर सामने आ गए हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस क्षेत्र में सैकड़ों परिवार वर्षों से रह रहे हैं। यहां ईदगाह, मस्जिद और कब्रिस्तान जैसे धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं, जिनका स्थानांतरण असंभव और भावनात्मक रूप से संवेदनशील मुद्दा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि यदि इस जमीन को अधिग्रहण कर लिया गया, तो बड़ी संख्या में परिवार बेघर हो जाएंगे और उनकी आस्था से जुड़े स्थलों को भी खतरा उत्पन्न हो जाएगा।

लोकसभा में शून्य काल के दौरान कांग्रेस के सांसद मोहम्मद जावेद ने भी सरकार से सैन्य कैंप को किशनगंज में कहीं और दूसरी जमीन पर बनाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि जो जमीन अभी लिया जा रहा है, वो किसानों की है और घनी आबादी वाला इलाका है। सांसद ने कहा कि सरकार कैंप को घनी आबादी से दूर बनाए ताकि किसी को दिक्कत ना हो।

पटना में भी इसको लेकर औवेसी की पार्टी एआईएमआईएम के पांचों विधायक काफी सक्रिय हैं और स्थानीय स्तर पर भी इस मु्ददे पर राजनीति गर्म कर रहे हैं। एआईएमआईएम विधायक तौसिफ आलम ने इस मुद्दे पर पिछले दिनों बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी मुलाकात की थी।

कांग्रेस ने कुछ दिन पहले अपने ऑफिशियल ट्विटर हैंडल से ट्विट किया था – “कोचाधामन, बहादुरगंज और किशनगंज में सैनिक कैंप बनाने के लिए जमीन अधिग्रहण हो रहा है।

इसके चलते गरीब किसानों से उनकी जमीन ली जा रही है, जहां घनी आबादी भी है।“

वहीं एआईएमआईएम के विधायक सरबर आलम और तौसीफ आलम ने किशनगंज के जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर अधिग्रहण का विरोध दर्ज कराया है। विधायकों का कहना है कि चिन्हित जमीन पर ईदगाह, मस्जिद, कब्रिस्तान के अलावा सैकड़ों परिवारों की घनी बस्तियां हैं। दोनों विधायकों ने कहा कि वे सेना का सम्मान करते हैं, लेकिन जिस जमीन को चिन्हित किया गया है, वह पूरी तरह आबादी और धार्मिक स्थलों से भरी है। ऐसे में जरूरी है कि सरकार किसी वैकल्पिक स्थान की तलाश करे। यदि यहां का जमीन का अधिग्रहण हुआ तो सैकड़ों परिवार बेघर हो जाएंगे। हमारी ईदगाह, मस्जिद और कब्रिस्तान खतरे में पड़ जाएगा।

उन्होंने जिला प्रशासन से मांग की है कि अधिग्रहण प्रक्रिया रोकते हुए नए सिरे से ऐसी जमीन चुनी जाए, जहां स्टेशन निर्माण में किसी प्रकार की सामाजिक या धार्मिक बाधा न उत्पन्न हो। विधायक और ग्रामीणों की अपील है कि सरकार विकास और सुरक्षा दोनों को ध्यान में रखते हुए न्यायपूर्ण समाधान निकाले।

गौरतलब है कि भारत ने एक बड़े रणनीतिक कदम के तहत बांग्लादेश के साथ लगने वाली अपनी पूर्वी सीमा पर तीन नए सैन्य अड्डे स्थापित किए हैं। इन फारवर्ड बेस पर राफेल, ब्रह्मोस के साथ अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम तैनात किए जा रहे हैं।

भारत ने अपनी पूर्वी सीमा पर अब तक की सबसे बड़ी सैन्य तैनाती शुरू कर दी है। सिलिगुड़ी कॉरिडोर, यानी 22 किलोमीटर चौड़ा वह क्षेत्र जिसे चिकन नेक कहते हैं, जिसके जरिए उत्तर-पूर्वी भारत के सात राज्य देश की मुख्य भूमि से जुड़े हैं, अब पूरी तरह अभेद्य किला बनने जा रहा है। इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में तीन नए मिलिट्री स्टेशन स्थापित किए जा रहे हैं, जो नई दिल्ली की सैन्य रणनीति में मूलभूत बदलाव का संकेत देते हैं।

असम के धुबरी के पास लाचित बोरफुकन मिलिट्री स्टेशन स्थापित किया जा रहा है। वहीं बिहार के किशनगंज और पश्चिम बंगाल के चोपड़ा में फॉरवर्ड बेस बनाए जा रहे हैं। चोपड़ा फारवर्ड बेस बांग्लादेश सीमा से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

ये सिर्फ सैन्य अड्डे नहीं, रैपिड डिप्लॉयमेंट फोर्स, पैरा स्पेशल फोर्सेज, इंटेलिजेंस यूनिट और हाई-टेक सर्विलांस उपकरणों से लैस स्ट्रैटेजिक नोड हैं, जो किसी भी विपरीत परिस्थिति में ‘सिलिगुड़ी कॉरिडोर’ की सुरक्षा सनिश्चित करेंगे।

नए सैन्य स्टेशन पूरे सिलिगुड़ी कॉरिडोर को फुल सिक्योरिटी कवर देते हैं। चोपड़ा स्टेशन की लोकेशन ऐसी है कि यहां से बांग्लादेश के अंदर तक निगरानी की जा सकती है। भारत ने इस क्षेत्र में पहले ही राफेल फाइटर जेट्स, ब्रह्मोस मिसाइलें और S-400 एयर डिफेंस सिस्टम तैनात कर दिए हैं। यानी खतरे की किसी भी स्थिति में भारतीय सेना मिनटों में जवाब देने की क्षमता रखती है।

इन सबके बीच सिलीगुड़ी में बहु-स्तरीय सुरक्षा लागू की गई है। जमीनी निगरानी, एयर डिफेंस (एस-400), राफेल फाइटर जेट्स, ब्रह्मोस मिसाइलें, ड्रोन और सैटेलाइट मॉनिटरिंग से सुरक्षा मजबूत हो चुका है। बिश्नुपुर, किशनगंज और चोपड़ा में नई गैरिसन तैनात हैं।

गौरतलब है कि भारत ने अपने पूर्वी मोर्चे पर रक्षा ढांचे को तेज़ी से मजबूत करते हुए सिलीगुड़ी कॉरिडोर के आसपास तीन नई फॉरवर्ड सैन्य बेस बनाने की प्रक्रिया तेज की है। दरअसल यह वही संवेदनशील गलियारा है, जिसे “चिकन नेक” भी कहा जाता है और जो मात्र 22 किलोमीटर चौड़ा है। यह गलियारा देश के सात पूर्वोत्तर राज्यों को मेनलैंड भारत से जोड़ता है। अब इसी कॉरिडोर की सुरक्षा को लेकर वर्षों से रणनीतिक चिंता बनी हुई थी।

इन सब खबरों के बीच बांग्लादेश सिलीगुड़ी कॉरिडोर से सटे अपने लालमोनिरहाट एयरबेस को फिर से शुरू करने जा रहा है। ब्रिटिश काल में बना यह एयरबेस लंबे समय से वीरान पड़ा था। बांग्लादेश सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमां ने 16 अक्तूबर को ही 1931 में बने इस पुराने एयरबेस का दौरा किया था। यहां लड़ाकू विमान रखने के लिए विशाल हैंगर बनवाया जा रहा है। एयरबेस शुरू करने के पीछे चीन का हाथ होने के आसार हैं। मोहम्मद यूनुस ने मार्च में चीन का दौरा किया था और बीजिंग में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की थी।

गिरीन्द्र नाथ झा
गिरीन्द्र नाथ झा
गिरीन्द्र नाथ झा ने पत्रकारिता की पढ़ाई वाईएमसीए, दिल्ली से की. उसके पहले वे दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक कर चुके थे. आप CSDS के फेलोशिप प्रोग्राम के हिस्सा रह चुके हैं. पत्रकारिता के बाद करीब एक दशक तक विभिन्न टेलीविजन चैनलों और अखबारों में काम किया. पूर्णकालिक लेखन और जड़ों की ओर लौटने की जिद उनको वापस उनके गांव चनका ले आयी. वहां रह कर खेतीबाड़ी के साथ लेखन भी करते हैं. राजकमल प्रकाशन से उनकी लघु प्रेम कथाओं की किताब भी आ चुकी है.
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2 COMMENTS

  1. Ye jaruri hai sanya besh banana kyuki aj siliguri corridor pr khatra hai eise jagaho ko bachchane ki jarurat hai kisanganj me ye jagah sena ke liye thik bataya gya hai in logo ko swauim khali kar dena chahiye sena hamari suraksha ke liye hi to rahega iska virodh desh ka birodh mana jayega

  2. चूंकि जमीन भारतीय सेना को चाहिए थी तो वहां के निवासियों का कर्तव्य बनता है स्वेच्छा से पूरी जमीन दे दें। आजतक कभी सुना नहीं कि सेना को जमीन देने का विरोध किया जाता है। हां मुवावजा भी देना चाहिए क्योंकि अपनी जमीन छोड़ कर जाना पड़ता है। लेकिन ये विरोध इसीलिए कर रहे हैं क्योंकि ये मुस्लिम हैं भारतीय नहीं। इनको भी समझ में आ गया है कि यहां सेना का कैंप बन गया तो जो सिलिगुड़ी कारीडोर काटने की बात ये लोग करते हैं बांग्लादेश से मिलकर कौम के नाम पर, उस पर लगाम लग जाएगी। इसीलिए सारा विरोध कर रहे हैं जिसमें इनके नेता भी शामिल हैं। मैं तो 1990 से उस क्षेत्र को देख रहा हूं और ये बात कई सैन्यकर्मियों और अधिकारियों से अनऔफिसियली बात कर चुका हूं। ये जरूर होना चाहिए कि हमारा एक बड़ा सैन्य बेस वहां पर मौजूद हो।

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