ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की अमेरिका-इजराइल के संयुक्त हवाई हमले में मौत के बाद पश्चिम एशिया में हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। इस घटना के विरोध और बदले की भावना के प्रतीक के रूप में ईरान के पवित्र शहर कोम (Qom) स्थित जामकरान मस्जिद के गुंबद पर लाल “प्रतिशोध का झंडा” फहरा दिया गया है। शिया परंपरा में लाल झंडा ‘अन्याय के खिलाफ न्याय’ और ‘शहादत के बदले’ का प्रतीक माना जाता है।
खामेनेई की मौत के बाद ईरान के भविष्य को लेकर मचे घमासान के बीच एक तीन सदस्यीय अस्थायी नेतृत्व परिषद का गठन किया गया है। सरकारी मीडिया के अनुसार, 66 वर्षीय वरिष्ठ मौलवी अलीरेजा अराफी को परिषद के न्यायविद सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया है। वे राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और मुख्य न्यायाधीश गुलामहुसैन मोहसेनी एजेई के साथ मिलकर इस परिषद का हिस्सा होंगे। यह परिषद तब तक सर्वोच्च नेता के कर्तव्यों का पालन करेगी जब तक ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ एक स्थायी उत्तराधिकारी का चयन नहीं कर लेती।
खामेनेई की मौत की खबर पर दुनिया दो हिस्सों में बंटी नजर आ रही है। एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे ईरान के लिए अपना देश वापस पाने का सबसे बड़ा मौका बताया है और इजराइली पीएम नेतन्याहू ने ईरानियों से इस शासन को उखाड़ फेंकने की अपील की है, वहीं दूसरी ओर तेहरान, इस्फहान और जंजन में लाखों लोग सड़कों पर मातम मना रहे हैं। इराक के बगदाद में भी भारी भीड़ उमड़ी है, जबकि पाकिस्तान के कराची में अमेरिकी दूतावास के बाहर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़पें हुई हैं, जिनमें कुछ लोगों के हताहत होने की खबर है।
भारत में भी इस घटना का गहरा असर देखा जा रहा है। दिल्ली में ईरान कल्चरल हाउस के बाहर बड़ी संख्या में लोग शोक व्यक्त करने जुटे, वहीं जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर, बडगाम, बांदीपोरा और रामबन में शिया समुदाय ने विरोध मार्च निकाला।
प्रदर्शनकारियों ने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन किया और काले झंडे लहराते हुए पारंपरिक ‘नौहा’ पढ़कर अपना दुख और आक्रोश व्यक्त किया। वहीं, उत्तर प्रदेश के लखनऊ और कर्नाटक के बेंगलुरु में भी खामेनेई की मौत के विरोध में सड़कों पर शिया समुदाय उतरा और अपना गुस्सा जाहिर किया।

