Monday, April 13, 2026
Homeसाइंस-टेकफ्रांस Microsoft Windows का इस्तेमाल बंद क्यों करने जा रहा है?

फ्रांस Microsoft Windows का इस्तेमाल बंद क्यों करने जा रहा है?

फ्रांस में माइक्रोसॉफ्ट विंडोज को को धीरे-धीरे हटाकर उसकी जगह Linux आधारित सिस्टम अपनाने की योजना है। फ्रांस के अधिकारी ‘टेक संप्रभुता’ की दिशा में एक बड़ा कदम बता रहे है।

पेरिस: फ्रांस हाल के वर्षों में तकनीकी बदलाव की अपनी सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक पर सक्रियता से काम कर रहा है। इसका मुख्य रूप से उद्देश्य अमेरिकी डिजिटल सिस्टम पर निर्भरता कम करना और महत्वपूर्ण तकनीकी ढांचे पर अपने नियंत्रण को मजबूत करना है। इस बदलाव के केंद्र में एक अहम कदम सरकारी संस्थानों में इस्तेमाल हो रहे Microsoft Windows को धीरे-धीरे हटाकर उसकी जगह Linux आधारित सिस्टम अपनाने की योजना है।

Linux एक ओपन-सोर्स ऑपरेटिंग सिस्टम है जिसे मुफ्त में डाउनलोड और इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी ओर माइग्रेशन की शुरुआत फ्रांस सरकार की डिजिटल एजेंसी Interministerial Directorate for Digital Affairs (DINUM) से होगी। यह लगभग 250 लोगों की एक एजेंसी है, जो फ्रांसीसी सरकार की आईटी नीति की देखरेख का काम करती है। संभावना है कि अगले कुछ महीनों में अन्य सरकारी मंत्रालय और एजेंसियां ​​भी इसी तरह की अपनी माइग्रेशन योजनाएं तैयार करेंगी।

इसे फ्रांस के अधिकारी ‘टेक संप्रभुता’ (Tech Sovereignty) की दिशा में एक बड़ा कदम बता रहे है। वैसे, बदलाव की ये पहल केवल ऑपरेटिंग सिस्टम तक सीमित नहीं है। फ्रांस अपने पूरे डिजिटल ढांचे को नए सिरे से तैयार करने में जुटा है। इसमें संचार उपकरण, डेटा स्टोरेज, साइबर सुरक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र तक शामिल हैं।

वैसे, इस योजना को पूरा होने में समय लगेगा। इन बदलाव को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना है, लेकिन इसका असर अभी से पूरे यूरोप और अन्य क्षेत्रों में दिखाई देने लगा हैं। कई यूरोपीय देश अब विदेशी तकनीकी कंपनियों पर अपनी निर्भरता को लेकर पुनर्विचार कर रहे हैं और अपने डिजिटल ढांचे को अधिक आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कदम उठा रहे हैं।

डिजिटल संप्रुभता की ओर कैसे बढ़ रहा फ्रांस

फ्रांसीसी सरकार ने Linux पर पूरी तरह से स्विच करने के लिए कोई विशेष समयसीमा के बारे में जानकारी नहीं दी। वैसे, फ्रांस और इस समय पूरे यूरोप में अमेरिका स्थित प्रौद्योगिकी कंपनियों पर अत्यधिक निर्भरता को लेकर चिंता तेज हो रही है। फिलहाल बहुत बड़े पैमाने महत्वपूर्ण डिजिटल प्रणालियाँ विदेशी प्रदाताओं पर निर्भर हैं। इसमें भी ज्यादातर अमेरिकी हैं।

कुछ महीने पहले ही फ्रांसीसी सरकार ने घोषणा की थी कि वह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के लिए ‘माइक्रोसॉफ्ट टीम्स’ का उपयोग बंद कर देगी और इसके बजाय फ्रांसीसी विजियो (visio) का इस्तेमाल करेगी, जो ओपन-सोर्स एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड वीडियो मीटिंग टूल जित्सी पर आधारित है। इसके अलावा, फ्रांसीसी सरकार ने कहा है कि वह इस वर्ष के अंत तक अपने स्वास्थ्य डेटा प्लेटफॉर्म को एक नए विश्वसनीय प्लेटफॉर्म पर स्थानांतरित करने की भी योजना बना रही है।

फ्रांस सरकार का ये कदम पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी के बाद अमेरिका और उसके पुराने यूरोपीय सहयोगियों में बढ़ते मतभेद के बीच सामने आ रहे हैं।

फ्रांस चूकी यूरोपीय संघ (ईयू) का एक प्रमुख सदस्य देश है। ऐसे में उसके उठाए कदमों का प्रभाव संघ के अन्य देशों पर भी पड़ सकता है। इसके अलावा दुनिया की अन्य सरकारें भी इस पर बारीकी से नजर रख रही हैं। पिछले साल भारत सरकार ने भी स्वदेशी यानी देश में तैयार टेक प्लेटफॉर्म को बढ़ावा देने और अमेरिकी सेवा प्रदाताओं पर निर्भरता कम करने के प्रयासों को नए सिरे से शुरू किया था।

भारत इस डिजिटल संप्रभुता अभियान में कहा है?

पिछले साल भारत सरकार द्वारा आत्मनिर्भरता के लिए किए गए प्रयास अमेरिका द्वारा भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए भारी व्यापार शुल्क के बीच आए थे। कई भारतीय मंत्रियों और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से मैपमाईइंडिया (MapmyIndia) और जोहो (Zoho) जैसी कंपनियों द्वारा विकसित प्रोडक्ट को लेकर जोरशोर से बातें की थी। नतीजा ये हुआ कि मैपल्स (Mappls) को गूगल मैप्स के प्रतिद्वंद्वी के रूप में आगे बढ़ाया गया, जबकि जोहो के इंस्टेंट मैसेजिंग ऐप Arattai को मेटा के व्हाट्सएप के मुकाबले पेश किया गया।

हालांकि, Arattai की लोकप्रियता बहुत जल्द ही फीकी पड़ गई। शुरुआती डाउनलोड में उछाल के बाद से भारत में इसके ऐप स्टोर रैंकिंग में भारी गिरावट देखी गई। लेकिन जोहो के अन्य प्रोडक्ट को अपनाने की सरकारी प्रक्रिया अभी भी जारी है।

संसद में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 1 अप्रैल, 2026 को लोकसभा को बताया था कि 16.68 लाख से अधिक सरकारी ईमेल आईडी और अकाउंट को जोहो द्वारा संचालित क्लाउड-आधारित प्लेटफॉर्म पर स्थानांतरित किया जा चुका है, जिस पर अब तक कुल 180.10 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं।

जोहो मेल में माइग्रेशन की निगरानी राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) द्वारा की जा रही है, जिसने एक बीडिंग प्रक्रिया के बाद सरकारी यूजरों को क्लाउड-आधारित ईमेल के लिए चेन्नई स्थित वैश्विक एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर फर्म को मास्टर सिस्टम इंटीग्रेटर के रूप में चुना है।

विनीत कुमार
विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments

राकेश मूथा फेस बुक पर Rakesh Kamla Mutha on कहानीः गैंगरीन