फिल्मों की पाइरेसी का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। विजय की आगामी फिल्म ‘जना नायकन’ के लीक ने एक बार सवाल खड़े कर दिए हैं कि तमाम तकनीकी सुरक्षा, कानून और अदालती कार्रवाइयों के बावजूद इसपर पर रोक क्यों नहीं लग पाई है। ताजा मामले में तमिलनाडु की साइबर पुलिस ने 6 लोगों को गिरफ्तार किया है और 300 से अधिक अवैध लिंक पर कार्रवाई शुरू कर दी गई है। यह कोई आकस्मिक लीक नहीं थी। इसमें 21 व्यक्तियों के नाम सामने आए हैं, जिन पर एक कथित पायरेसी नेटवर्क में शामिल होने का आरोप है। सवाल यही है कि पाइरेसी को लेकर सख्त कानून के बावजूद यह नेक्सस कैसे फल-फूल रहा है और इस पर लगाम लगाना क्यों संभव नहीं हो पा रहा है?
अतीत में झांके तो पाइरेसी का खेल कोई नया नहीं है। इसकी जड़ें 1970-80 के दशक तक जाती हैं। यह वीएचएस और हैंडहेल्ड कैमरों का दौर था। इस दौर में पाइरेसी बहुत ही बुनियादी स्तर पर थी। ‘पाइरेट्स’ सिनेमाघरों में भारी-भरकम हैंडहेल्ड कैमरे ले जाते थे और चोरी-छिपे फिल्म रिकॉर्ड करते थे। रिकॉर्ड की गई फिल्मों को वीएचएस टेप पर कॉपी कर मोहल्लों और छोटी वीडियो लाइब्रेरी के जरिए किराए पर वितरित किया जाता था। हालांकि इसकी क्वालिटी बेहद खराब होती थी और बैकग्राउंड में दर्शकों का शोर सुनाई देता था। 90 का दौर जब आया तो पाइरेसी का रूप बदलने लगा।
90 के दशक में पाइरेसी ने जोर पकड़ा
90 के दशक में इंटरनेट के शुरुआती कदम और वीसीडी (VCD) प्लेयर के आने से पाइरेसी में तेजी आई। फिल्मों को रिकॉर्ड कर सीडी और डीवीडी में कन्वर्ट किया जाने लगा। इसी दौरान फिल्म स्टूडियो रिव्यू के लिए ‘स्क्रीनिंग डीवीडी’ जारी करते थे, जो लीक होकर बाजार में पहुंच जाती थीं। 90 के दशक के अंत तक इंटरनेट ने ‘फाइल शेयरिंग’ की शुरुआत की, जिससे पाइरेसी का दायरा फिजिकल से डिजिटल होने लगा। 2000-2010 का दशक तो पाइरेसी के लिए गोल्डन पीरियड जैसा रहा। ब्रॉडबैंड इंटरनेट और हाई-स्पीड डेटा ने पाइरेसी को एक वैश्विक नेक्सस बना दिया।
इसने फाइल शेयरिंग को पूरी तरह बदल दिया। अब फिल्म किसी एक सर्वर पर नहीं, बल्कि दुनिया भर के हजारों कंप्यूटर्स के ‘टुकड़ों’ में मौजूद होती थी। डीवीडी और ब्लू-रे डिस्क को ‘रिप’ (Rip) करके उनकी हाई-क्वालिटी फाइल बनाना आसान हो गया। तमिलरॉकर्स (TamilRockers) जैसी साइट्स इसी दौर में अपनी जड़ें मजबूत करने लगीं।
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आज पाइरेसी के लिए किसी वेबसाइट की भी जरूरत नहीं रही। अब यह पूरी तरह प्लेटफॉर्म-आधारित और एन्क्रिप्टेड हो चुकी है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स (Netflix, Prime) से सीधे हाई-डेफिनिशन सिग्नल को इंटरसेप्ट कर फाइल चोरी की जाती है। टेलीग्राम आज पाइरेसी का सबसे बड़ा हब है। इसके क्लाउड स्टोरेज और बॉट्स के कारण कंटेंट को डिलीट करना लगभग नामुमकिन है। आधुनिक पाइरेट्स अब उन ‘कंटेंट डिलीवरी नेटवर्क’ (सीडीएन) में ही सेंध लगा देते हैं जिनका उपयोग वैध कंपनियां करती हैं, जिससे वे ओरिजिनल क्वालिटी का कंटेंट अपने अवैध पोर्टल पर ‘स्ट्रीम’ कर पाते हैं।
पाइरेसी का साम्राज्य कितना बड़ा, इसके इकॉनमी को समझें
पाइरेसी अब महज कुछ वेब-लिंक्स या छिटपुट चोरी तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने एक विशाल और संगठित समानांतर अर्थव्यवस्था का रूप ले लिया है। 2024 की ‘द रॉब रिपोर्ट’ के आंकड़े इस खतरे की भयावहता की पुष्टि करते हैं, जिसके अनुसार 2023 में पाइरेसी की इकॉनमी 22,400 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है।
इसमें थिएटर फिल्मों का हिस्सा 13,700 करोड़ और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स का हिस्सा 8,700 करोड़ रुपये रहा। दिलचस्प बात यह है कि यह आकार मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर के कई स्थापित सेगमेंट्स के बराबर पहुंच चुका है। इसका असर केवल कंपनियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सरकारी खजाने पर भी पड़ता है। रिपोर्ट बताती है कि पाइरेसी के कारण सरकार को हर साल करीब 4,300 करोड़ से ज्यादा का जीएसटी नुकसान होता है।
कौन देख रहा है पाइरेटेड कंटेंट, पाइरेसी क्यों बढ़ रही है?
इस पूरे परिदृश्य में सबसे अहम सवाल यह है कि आखिर उपभोक्ता पाइरेटेड कंटेंट की ओर क्यों जा रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि देश में करीब 51% मीडिया यूजर्स किसी न किसी रूप में पाइरेटेड कंटेंट देखते हैं यानी देश में औसतन हर दूसरा व्यक्ति पाइरेसी को चुन रहा है। और इसमें स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म सबसे बड़ा स्रोत (63%) हैं।
इसकी एक बड़ी वजह है सब्सक्रिप्शन का बढ़ता बोझ। ईवाई और इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया यानी आईएएमएआई के अनुसार अलग-अलग ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के लिए अलग-अलग भुगतान करना पड़ता है, जो कई यूजर्स के लिए महंगा साबित होता है। इसके अलावा, कई बार पसंद का कंटेंट एक ही प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध नहीं होता, जिससे लोग अवैध विकल्पों की ओर मुड़ते हैं।
एक और अहम कारण है विज्ञापनों से बचने की प्रवृत्ति। फ्री लीगल प्लेटफॉर्म्स पर लगातार विज्ञापन देखने के बजाय यूजर्स सीधे टॉरेंट या टेलीग्राम जैसे माध्यम चुन लेते हैं। भाषा का भी इसमें बड़ा रोल है। हिंदी कंटेंट की पाइरेसी सबसे ज्यादा होती है, इसके बाद अंग्रेजी और फिर दक्षिण भारतीय भाषाओं का नंबर आता है, जो देश में कंटेंट खपत के पैटर्न को भी दर्शाता है।

पाइरेसी का स्वरूप अब पहले जैसा नहीं रहा। यह डीवीडी या टॉरेंट तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी तरह डिजिटल और रियल-टाइम नेटवर्क में बदल चुका है। आज करीब 63% पाइरेसी अवैध स्ट्रीमिंग वेबसाइट्स के जरिए होती है, जहां यूजर बिना डाउनलोड किए सीधे कंटेंट देख सकता है। 19–34 उम्र के लोग सबसे ज्यादा यानी करीब 76% पाइरेसी को कंज्यूम करते हैं। औसतन लोग हर हफ्ते 9 घंटे पाइरेटेड कंटेंट देखते हैं। इसमें मैसेजिंग प्लेटफॉर्म खासकर टेलीग्राम पाइरेसी का बड़ा केंद्र बन चुके हैं। यहां बड़ी फाइल्स आसानी से शेयर होती हैं और हजारों चैनलों के जरिए फिल्मों और वेब सीरीज के लिंक तेजी से फैलते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, टेलीग्राम पर शेयर की जाने वाली हर 10 में से लगभग 3 फाइलें पाइरेटेड होती हैं।
पाइरेसी का नेटवर्क इतना विस्तार ले चुका है कि यह वर्चुअल इंडस्ट्री बन चुकी है। इस नेटवर्क का आर्थिक पक्ष भी उतना ही मजबूत है। पाइरेटेड वेबसाइट्स और चैनल चलाने वाले लोग विज्ञापनों, पॉप-अप्स और ट्रैफिक के जरिए हर महीने अच्छी-खासी कमाई कर लेते हैं। कई मामलों में यह कमाई 1 लाख या उससे अधिक तक पहुंच जाती है, जो इसे लो रिस्क, हाई प्रॉफिट बिजनेस मॉडल बना देती है। यही वजह है कि सख्त कानून और कार्रवाई के बावजूद यह कारोबार लगातार फैलता जा रहा है।
पाइरेसी नेक्सस को पकड़ना क्योंं सबसे बड़ी चुनौती?
अर्न्स्ट एंड यंग’ (EY) और ‘फिक्की’ (FICCI) की रिपोर्ट के अनुसार, पाइरेसी के कारण भारतीय फिल्म उद्योग को हर साल लगभग 20,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान होता है। पाइरेसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती टेक्नोलॉजी ही है। वीपीएन, मिरर साइट्स और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म्स के जरिए पाइरेसी करने वाले आसानी से बच निकलते हैं।
जैसे ही सरकार एक वेबसाइट (जैसे तमिलरॉकर्स या मूवीरूल्ज को ब्लॉक करती है, उसके दर्जनों ‘मिरर डोमेन’ (जैसे डॉट कॉम से डॉट ओआरजी या डॉट नेट) सक्रिय हो जाते हैं। पाइरेसी करने वाली वेबसाइट्स के सर्वर अक्सर उन देशों में होते हैं जहां भारत के कानून लागू नहीं होते। अपराधियों को ट्रैक करना और उन्हें प्रत्यर्पित करना लगभग असंभव हो जाता है।
ऐसा नहीं है कि पाइरेसी के प्रति राज्य प्रशासन या तंत्र उदासीन रहता है। द रॉब रिपोर्ट के अनुसार, केरल एंटी-पायरेसी सेल ने सख्त कार्रवाई करते हुए 1000 से अधिक ऐसे यूजर्स को ट्रैक किया था, जिन्होंने फिल्म “बैचलर्स पार्टी” को अनधिकृत प्लेटफॉर्म से डाउनलोड किया था। वहीं, 2015 में फिल्म बाहुबली के लीक होने के बाद तेलंगाना सरकार ने पाइरेसी पर अंकुश लगाने के लिए विशेष इंटलेक्चुएल प्रॉपर्टी क्राइम यूनिट (TIPCU) का गठन किया।
इसी दिशा में महाराष्ट्र ने 2017 में महाराष्ट्र इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी क्राइम यूनिट (MIPCU) की स्थापना की। MIPCU ने 2021 में TopTV नाम की सब्सक्रिप्शन-आधारित पाइरेटेड वेबसाइट के कथित संस्थापक तक पहुंच बनाई थी। आगे चलकर 2023 में की गई जांच में फिल्म जवान और Red Chillies Entertainment के कंटेंट की पाइरेसी में शामिल लोगों की भी पहचान की गई। इसी तरह ब्राजील में 404 वेबसाइट और सर्वर पर छापे मारे गए, जो अवैध कॉपीराइटेड कंटेंट स्ट्रीम कर रहे थे। मिस्र में 54 पाइरेटेड डोमेन, मोबाइल फोन, आईटी उपकरण और नकदी जब्त की गई।
पाइरेसी से जुड़े कानून क्या है?
पायरेसी को रोकने के लिए मुख्य कानून सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 है, जिसमें 4 अगस्त, 2023 को राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद बड़े संशोधन किए गए। यह संशोधन अधिनियम अगस्त 2023 से ही प्रभावी है। इस कानून की धारा 6AA और 6AB के तहत किसी भी फिल्म की अनधिकृत रिकॉर्डिंग और प्रदर्शन को अपराध माना गया है। न्यूनतम 3 महीने से लेकर 3 साल तक की कैद। न्यूनतम 3 लाख रुपये, जिसे फिल्म की कुल उत्पादन लागत के 5% तक बढ़ाया जा सकता है।
इसके अलावा, सिनेमाघरों में बिना अनुमति फिल्म की रिकॉर्डिंग यानी कैमकोर्डिंग को स्पष्ट रूप से अपराध घोषित किया गया है। कानून के तहत किसी भी फिल्म का उपयोग या वितरण कॉपीराइट धारक की अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता। सरकार को यह अधिकार भी दिया गया है कि वह ऐसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से पाइरेटेड कंटेंट हटवा सके, जो नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं।
इस कानूनी ढांचे को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 का भी समर्थन मिलता है, जो डिजिटल अपराधों से निपटने का आधार प्रदान करता है। इस कानून के तहत कंप्यूटर सिस्टम में अनधिकृत प्रवेश, डेटा चोरी, या किसी प्रकार की छेड़छाड़ को अपराध माना गया है। धारा 43 के तहत ऐसे मामलों में भारी जुर्माना लगाया जा सकता है, जबकि धारा 66 के तहत 3 साल तक की जेल और आर्थिक दंड का प्रावधान है।
पाइरेसी के खिलाफ एक और महत्वपूर्ण कानूनी हथियार ‘जॉन डो ऑर्डर्स’ के रूप में सामने आया है। ये अदालत के ऐसे आदेश होते हैं, जो अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ जारी किए जाते हैं, खासकर तब जब यह स्पष्ट हो कि वे कॉपीराइट का उल्लंघन कर रहे हैं, लेकिन उनकी पहचान नहीं हो पाई है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बढ़ती पाइरेसी के बीच ये आदेश काफी प्रभावी साबित हुए हैं। इनके जरिए अदालतें इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को निर्देश देती हैं कि वे पाइरेटेड वेबसाइट्स या लिंक को ब्लॉक करें, जिससे अवैध कंटेंट तक पहुंच सीमित हो सके।
हालांकि, जॉन डो ऑर्डर्स को लेकर कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं। कई बार पूरी वेबसाइट ब्लॉक करने से वैध कंटेंट भी प्रभावित हो जाता है, जिसे ओवर-ब्लॉकिंग कहा जाता है। इसी वजह से अदालतें अब अधिक सटीक और सीमित दायरे में आदेश देने की दिशा में काम कर रही हैं, ताकि केवल अवैध कंटेंट को ही रोका जा सके।
व्यावहारिक स्तर पर भी इन उपायों के प्रभाव देखने को मिले हैं। अदालतों ने डायनामिक इंजंक्शन जैसे प्रावधान लागू किए हैं, जिनके तहत बार-बार नए डोमेन बनाकर पाइरेसी करने वाली वेबसाइट्स को तुरंत ब्लॉक किया जा सकता है। इससे कानून लागू करने वाली एजेंसियों को तेजी से कार्रवाई करने में मदद मिलती है।
सख्त कानून के बावजूद पाइरेसी पर लगाम क्यों नहीं लग पा रहा?
आखिर में सवाल यही आता है कि राज्य की साइबर तंत्र और सख्त कानून के बावजूद पाइरेसी पर नकेल कसने के लिए कारगर साबित क्यों नहीं हो रहे। इसको लेकर इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स, जिनमें पीवीआर-आईनॉक्स के सीईओ कमल ज्ञानचंदानी और अभिषेक जोशी जैसे दिग्गजों का मानना है कि केवल कानून बना देने भर से पाइरेसी को पूरी तरह नहीं रोका जा सकता। इसके लिए एक बहुआयामी और कड़े दृष्टिकोण की जरूरत है।
विशेषज्ञों के अनुसार, सबसे पहले कानून को सख्ती से लागू करना होगा ताकि दोषियों को त्वरित सजा मिल सके। साथ ही, पाइरेसी से जुड़ी शिकायतों के निपटारे के लिए एक ‘सिंगल-विंडो सेल’ या केंद्रीय टास्क फोर्स का गठन किया जाना चाहिए, जो तकनीकी स्तर पर निगरानी रख सके।
तकनीकी सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में प्रीमियम कंटेंट के लिए ‘वॉटरमार्किंग’ और ‘वाइट बॉक्स क्रिप्टोग्राफी’ जैसे आधुनिक टूल्स का उपयोग अनिवार्य हो गया है, जिससे लीक के स्रोत का आसानी से पता लगाया जा सके। इसके अलावा, जन जागरूकता भी एक बड़ा हथियार है; दर्शकों को यह समझाना जरूरी है कि पाइरेसी न केवल राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाती है, बल्कि उनके निजी डेटा के लिए भी एक गंभीर सुरक्षा खतरा है। आखिर में ये भी कि कंटेंट के मूल्य निर्धारण पर भी ध्यान देना होगा। अगर कंटेंट अधिक किफायती और आसानी से उपलब्ध होगा, तो लोग स्वाभाविक रूप से अवैध रास्तों की ओर कम मुड़ेंगे।

