Wednesday, April 8, 2026
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अमेरिका को क्यों नष्ट करने पड़े अपने ही हाई टेक विमान?

अमेरिकी मीडिया ने बताया है कि बचाव दल को निकालने के लिए भेजे गए दो ट्रांसपोर्ट विमान ईरान के भीतर एक दूरदराज के अस्थायी बेस से उड़ान नहीं भर सके। बाद में इन्हें दुश्मन के हाथ लगने से रोकने के लिए नष्ट कर दिया गया। इसके बाद स्पेशल फोर्सेज तीन अतिरिक्त विमानों के साथ वहां पहुंचीं और क्रू को सुरक्षित बाहर निकाला।

अमेरिका ने अपने लड़ाकू विमान के लापता पायलट को ईरान के दुर्गम इलाकों से एक जटिल और जोखिम भरे बचाव अभियान में ढूंढ निकाला है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी देते हुए कहा कि हमने उसे खोज निकाला है। हालांकि इसकी कीमत अमेरिका को अपने ही करोड़ों डॉलर के अत्याधुनिक विमानों को बम से उड़ाकर चुकानी पड़ी।

जिस विमान का पायलट था वह अमेरिकी F-15E स्ट्राइक ईगल था। उसका एक क्रू मेंबर सुरक्षित निकाल लिया गया था, लेकिन दूसरा जो एक वरिष्ठ अधिकार था, वहीं फंसा रहा गया। पहाड़ों और पथरीले इलाके के बीच, वह करीब 24 घंटे तक छिपकर अपनी मौजूदगी बचाए हुए था, जबकि उसकी तलाश में ईरानी बल लगातार इलाके की घेराबंदी कर रहे थे।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अमेरिका ने बड़े पैमाने पर रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। इसमें विशेष बलों के सैकड़ों जवान, कई लड़ाकू विमान और खुफिया एजेंसियां शामिल थीं। रिपोर्टों के अनुसार, रेस्क्यू टीम ने ईरानी सेना को चकमा देने के लिए एक अहम रणनीति अपनाई। अमेरिकी विमानों ने इलाके में ईरानी काफिलों को निशाना बनाया ताकि रेस्क्यू टीम को समय मिल सके। वहीं एक झूठी खबर भी फैलाई गई कि अमेरिका ने दूसरे पायलट को ढूंढ लिया है। खुफिया एजेंसी सीआईए ने इसमें अहम रोल अदा किया।

सीआईए ही थी जिसने लापता पायलट की लोकेशन को ट्रैक किया जो ईरान के दुर्गम पहाड़ों की दरार में खुद को छिपाए हुआ था। खुद की सुरक्षा के लिए उसके पास सिर्फ एक हैंडगन था और बचाव दल को अपनी लोकेशन देने के लिए बीकन सिग्नल ऑन करने का विकल्प। लेकिन उसने बीकन का बहुत कम किया क्योंकि इसका सिग्नल ईरान के हाथ लग सकता था।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस ऑपरेशन को साहस और कौशल का असाधारण प्रदर्शन बताया। उन्होंने कहा कि घायल अधिकारी को “दुर्गम पहाड़ी इलाके” से सुरक्षित बाहर निकाला गया, जबकि दूसरे क्रू मेंबर को कुछ ही घंटों के भीतर बचा लिया गया।

इस अभियान में अमेरिका को भारी कीमत चुकानी पड़ी

हालांकि, ऑपरेशन के दौरान हालात तब अचानक जटिल हो गए जब रेस्क्यू के लिए भेजे गए विशेष ऑपरेशन ट्रांसपोर्ट विमान- बचाव दल को निकालने के लिए भेजे गए दो ट्रांसपोर्ट विमान (संभावित तौर पर MC-130J कमांडो II) ईरान के भीतर एक दूरदराज के अस्थायी एयरस्ट्रिप पर उतरे, लेकिन कनीकी खराबी या ढीली रेतीली जमीन में फंसने के कारण बेकार हो गए।

अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये विमान वहां से दोबारा उड़ान नहीं भर सके। इसी बीच ईरानी बलों के तेजी से करीब पहुंचने की खबरें मिलने लगीं, जिससे स्थिति और ज्यादा गंभीर हो गई। ऐसे में अमेरिकी कमांडरों के सामने तुरंत फैसला लेने की नौबत आ गई। समय की कमी और बढ़ते खतरे को देखते हुए उन्होंने इन विमानों को वहीं नष्ट करने का आदेश दे दिया।

एसोसिएटेड प्रेस के हवाले से एक क्षेत्रीय खुफिया अधिकारी ने बताया कि अमेरिकी सैनिकों ने पीछे छूटे विमानों को विस्फोट से उड़ा दिया, ताकि वे दुश्मन के हाथ न लग सकें। इसके बाद स्पेशल फोर्सेज अतिरिक्त विमानों के जरिए वहां पहुंचीं और रेस्क्यू मिशन को पूरा करते हुए क्रू को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।

घटना के बाद ईरानी सरकारी मीडिया ने जले हुए विमानों के मलबे की तस्वीरें और वीडियो जारी किए। बीबीसी वेरिफाई से पुष्टि किए गए विजुअल्स में मध्य ईरान के इस्फहान के पास पहाड़ी इलाके में धुआं उठते मलबे को देखा गया। यह विमान 100 मिलियन डॉलर से ज्यादा कीमत का होता है और खासतौर पर दुश्मन इलाके में गुप्त सैन्य अभियानों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। मलबे में छोटे हेलीकॉप्टर जैसे MH-6 लिटिल बर्ड्स के हिस्से भी दिखाई दिए, जिन्हें ऐसे मिशनों में सपोर्ट के लिए तैनात किया जाता है।

वहीं, ईरान ने दावा किया है कि अमेरिका का यह अभियान विफल रहा। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया कि इस ऑपरेशन के दौरान अमेरिका के दो C-130 सैन्य ट्रांसपोर्ट विमान और दो ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर नष्ट कर दिए गए। ईरानी संयुक्त सैन्य कमान ने कहा कि अमेरिका ने “राष्ट्रपति ट्रंप की किरकिरी से बचने के लिए अपने ही विमानों को बम से उड़ा दिया।”

अमेरिका दुश्मन क्षेत्र में पहले भी अपने विमान कर चुका है नष्ट

सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक, यह कदम किसी हार का संकेत नहीं, बल्कि एक तय रणनीति का हिस्सा होता है। ऐसे ऑपरेशनों में विमानों में लगे अत्याधुनिक संचार, नेविगेशन और विशेष ऑपरेशन सिस्टम बेहद गोपनीय होते हैं। अगर ये दुश्मन के हाथ लग जाएं तो न सिर्फ तकनीकी राज खुल सकते हैं, बल्कि भविष्य के सैन्य अभियानों पर भी खतरा बढ़ सकता है।

इसी वजह से अमेरिकी सेना और अन्य देश डिनायल प्रोटोकॉल का पालन करते हैं, जिसके तहत ऐसी स्थिति में फंसे सैन्य उपकरणों को नष्ट कर दिया जाता है। इससे पहले ओसामा बिन लादेन के खिलाफ एबटाबाद ऑपरेशन के दौरान भी अमेरिका ने अपने एक स्टेल्थ हेलीकॉप्टर को नष्ट कर दिया था।

दरअसल ओसामा बिन लादेन को पकड़ने के लिए किए गए ‘ऑपरेशन नेपच्यून स्पीयर’ के दौरान, अमेरिकी नेवी सील्स का एक स्टील्थ ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर तकनीकी खराबी के कारण लादेन के परिसर की दीवार से टकराकर क्रैश हो गया था। चूंकि यह हेलीकॉप्टर अत्यधिक गुप्त ‘स्टील्थ’ तकनीक (राडार से बचने वाली तकनीक) से लैस था, इसलिए अमेरिकी सैनिकों ने वहां से निकलने से पहले उसे विस्फोटकों से उड़ा दिया। अमेरिका नहीं चाहता था कि उसकी अत्याधुनिक स्टील्थ तकनीक पाकिस्तान या उसके माध्यम से चीन के हाथों में लगे और वे उसकी ‘रिवर्स इंजीनियरिंग’ कर सकें।

अनिल शर्मा
अनिल शर्माhttp://bolebharat.in
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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