Friday, March 20, 2026
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कथा-अकथा: यह किसका लहू है, कौन मरा?

पश्चिम एशिया की उथल-पुथल, ईरान पर हमले, जवाबी कार्रवाइयाँ, महाशक्तियों का हस्तक्षेप और भीतर उठती स्त्री-आवाज़ें, इन सबके बीच यह लेख युद्ध को केवल सामरिक घटना की तरह नहीं, बल्कि एक नैतिक और मानवीय परीक्षा की तरह पढ़ता है।
यह किसी एक पक्ष का आख्यान नहीं, बल्कि उस महागाथा की पड़ताल है जिसमें राष्ट्र, सत्ता, विचारधाराएँ और सबसे अधिक मनुष्य की व्यथा है।

यदि इसे महागाथा की तरह देखें तो यह कुरुक्षेत्र का आधुनिक संस्करण है, जहाँ रथों की जगह ड्रोन हैं, और शंखनाद की जगह कुछ प्रेस कॉन्फ़्रेंस और ढेर सारे न्यूज चैनल हैं। ट्रंप और ख़ामनेई इस कथा के मुख्य पात्र हैं, पर यह कथा उनसे बड़ी है और इसके अतिरिक्त भी। एक ओर अमेरिका फ़र्स्ट की प्रतिज्ञा, दूसरी ओर इस्लामी गणतंत्र की गरिमा का सवाल एक ओर आर्थिक शक्ति का कवच, दूसरी ओर वैचारिक आस्था की ढाल। परंतु अंततः धुएँ से घिरा आकाश किसी राष्ट्र का नहीं होता। राख में बदलती इमारतों की ईंटें किसी विचारधारा की नहीं होतीं।

इतिहास कभी केवल तिथियों का अनुक्रम भर नहीं होता। वह मनुष्यता की परीक्षा-पुस्तिका भी होता है। ईरान के वर्तमान संकट में बाहरी हमले, जवाबी सैन्य कार्रवाई, आंतरिक असहमति और स्त्री-आंदोलन सब एक साथ उपस्थित हैं। यह मुद्दा केवल सामरिक संतुलन का नहीं, बल्कि नैतिक संरचना का भी है। यहाँ युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि नैतिक तर्कों के भीतर भी लड़ा जा रहा है।

इतिहास की धूल जब बैठती है, तब अक्सर वह रक्त से सनी होती है। युद्ध केवल भौगोलिक राजनीति का प्रसंग नहीं होता। वह सभ्यताओं की स्मृति, सत्ता की महत्वाकांक्षा और मनुष्यता की परीक्षा का क्षण भी होता है। आज पश्चिम एशिया की भूमि, विशेषतः ईरान फिर से उस अग्नि-वृत्त में है जहाँ आकाश में उड़ते ड्रोन और धरती पर गिरते बम सैन्य उपकरणों की सीमा से बहर निकाल कर तथाकथित विचारधाराओं के प्रतीक बन गए हैं।

यह संघर्ष कभी प्रत्यक्ष, कभी परोक्ष, कभी प्रतिबंधों में, कभी मिसाइलों में और कभी भाषणों में घटित होता है। इसे कुछ लोग डोनाल्ड ट्रंप बनाम अली ख़ामनेई के रूप में देख रहे हैं। लेकिन वस्तुतः यह व्यक्तियों का द्वंद्व नहीं, दो राजनीतिक-सांस्कृतिक दृष्टियों का टकराव है। टकराव के इस दृश्य को देखते हुये दिनकर की रश्मिरथी की ये पंक्तियां जैसे प्रश्नचिन्ह बनकर सामने आ खड़ी होती हैं-

“अनगढ पत्थर से लड़ो, लड़ो किटकिटा नखों से, दांतों से
या लड़ो रीछ के रोमगुच्छ पूरित वज्रीकृत हाथों से
या चढ विमान पर गर्म मुट्ठियों से गोलों की वृष्टि करो
यह तो साधन के भेद किंतु भावों में भेद नया क्या है?
झड़ गयी पूंछ , रोमांत झड़े, पशुता का झड़ना बाकी है।
बाहर-बाहर तन संवर चुका, मन अभी संवरना बाकी है। ”

इजराएल और यूनाइटेड स्टेट्स के साथ का तनाव आज ईरान को एक व्यापक शक्ति-संघर्ष में ले आया है।
रणनीतिक दृष्टि से इज़राइल ईरान की सैन्य क्षमताओं को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है। अमेरिका क्षेत्रीय संतुलन और परमाणु प्रसार-नियंत्रण की दलील देता है जबकि ईरान इन कार्रवाइयों को संप्रभुता पर आक्रमण और क्षेत्रीय प्रभुत्व की रणनीति के रूप में देखता है। अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, किसी भी संप्रभु राष्ट्र पर पूर्व-निरोधात्मक हमला विवादास्पद है और वैध भी नहीं। क्योंकि जब मिसाइलें गिरती हैं, वे सामान्य जन और राजनीतिकों में भेद नहीं करतीं। वे बच्चें, बूढे, जवान के बीच फर्क नहीं करतीं। वे घरों, घरों, स्कूलों और दफ्तरों और मंत्रालयों में से किसी विशेष को नहीं चुनतीं। वे स्मृतियों पर गिरती हैं। जीवन पर गिरती हैं और बच जाता है जो वो सिर्फ राख होता है।

इस पूरे परिदृश्य में भारत की स्थिति को एक वाक्य में बाँधना कठिन है। वह हितों का संरक्षक भी है, नैतिक दावों का संवाहक भी और बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था का समर्थक भी। पश्चिम एशिया की हर हलचल भारत के बंदरगाहों, बाज़ारों और घरों तक पहुँचती है। इसलिए उसकी भूमिका स्वाभाविक रूप से तटस्थ, लेकिन सक्रिय पड़ोसी की सी है, जिसका लक्ष्य किसी पक्ष की जीत नहीं, बल्कि क्षेत्र की स्थिरता है। भारत न तो रणभूमि का रथी है, न दर्शकदीर्घा का मौन श्रोता। वह एक सेतु है, जिसे लहरें दोनों ओर से थपेड़े देती हैं, पर जो टूटना नहीं चाहता। अगर ध्यान से हम देखें तो पश्चिम एशिया की इस जटिल शतरंज में भारत की चालें सधी हुई हैं। वह किसी एक खेमे का स्थायी सैनिक नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय विश्व में संतुलन का साधे रखना चाहता है। पर भावनात्मकता और मानवता जिसे बार-बार कोंचती रहती है कि क्या बिगाड़ के डर से, ईमान की बात नहीं कहोगे?

युद्ध के प्रत्येक चरण में स्त्री की भूमिका बहुस्तरीय रही है। स्त्री प्रश्न राजनीतिक विमर्श की परिधि नहीं, केंद्र है। युद्ध-गाथाओं में वीरों का वर्णन होता है, किंतु स्त्रियाँ अक्सर हाशिए पर रहती हैं, जबकि युद्ध का सबसे स्थायी घाव उन्हीं के हिस्से आता है। ईरान के भीतर स्त्री-अधिकार आंदोलनों ने पिछले वर्षों में साहसिक प्रतिरोध दर्ज किया है। हिजाब, स्वतंत्रता, शिक्षा और अभिव्यक्ति के प्रश्न अब सामाजिक नहीं, राजनीतिक बन चुके हैं। युद्ध और प्रतिबंधों के बीच स्त्रियाँ दोहरी मार झेलती हैं,आर्थिक संकट से बढ़ती घरेलू हिंसा। दवाइयों और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी। राजनीतिक असहमति पर दमन। पश्चिमी विमर्श ईरानी स्त्री को केवल पीड़िता के रूप में प्रस्तुत करता है, जो एक प्रकार का सरलीकरण है। वह केवल दमन की नहीं, प्रतिरोध की भी कथा है।

युद्ध का यह विडंबनापूर्ण सत्य है कि पुरुष सत्ता-निर्णय लेती हैं, किंतु स्त्रियाँ सामाजिक विघटन की कीमत चुकाती हैं। महाकाव्य का अंतिम श्लोक अक्सर युद्ध के बाद लिखा जाता है। पर आधुनिक विश्व में युद्ध का कोई अंतिम श्लोक नहीं, केवल विराम-चिह्न हैं। ईरान की स्त्रियाँ उस विराम-चिह्न की तरह है, जो बताती है कि कथा अभी समाप्त नहीं हुई है। जब मिसाइलें शांत होंगी, तब प्रश्न फिर उठेंगे- हमने सुरक्षा चुनी या स्वतंत्रता, हमने राष्ट्र बचाया या नागरिकता? और इतिहास निश्चित ही यह उत्तर देगा की जिस समाज ने स्त्री को पूर्ण नागरिक माना, वही अंततः स्थायी शांति के निकट पहुँचेगा।

यह संघर्ष शक्ति-संतुलन का खेल है। यह मनुष्य की अनंत महत्वाकांक्षा और भय का परिणाम है। सत्य शायद इन दोनों के बीच है। युद्ध की इस कथा में कोई पूर्ण नायक नहीं, कोई पूर्ण खलनायक नहीं। केवल मनुष्य हैं। अपने-अपने भय, विश्वास और महत्वाकांक्षाओं के साथ। और इतिहास, जो हर युग में पूछता है- क्या शक्ति की यह होड़ कभी शांति की भाषा सीखेगी’ और जबतक सीखेगी तब तक क्या कुछ विनष्ट हो चुका होगा? और सहेजने को क्या बचेगा?

और अंत में, युद्ध की तमाम विभीषिकाओं के बीच कुछ उदास से शब्द…

रात लंबी है

पर इतिहास ने देखा है
हर लंबी रात के बाद
एक भोर आती है,
जो केवल सूर्य से नहीं,
स्मृति से जन्म लेती है

ईरान की स्त्री
राख पर खड़ी है,
पर राख से अंकुर भी फूटते हैं

वह कहती है-
मैं प्रतीक नहीं,
नागरिक हूँ।
बचाने के नाम पर
मुझे बाँधो मत
अनुशासित करने के नाम पर
मुझे मिटाओ मत

जब अग्नि थकेगी,
जब सेनाएँ लौटेंगी,
जब रणनीति के काग़ज़ धूल खाएँगे
तब वही स्त्री
भविष्य की पहली पंक्ति लिखेगी

और उस पंक्ति में लिखा होगा-
न राष्ट्र की विजय,
न शत्रु की पराजय,
बल्कि एक साधारण वाक्य-

जीवन, भय से बड़ा है
मृत्यु से भी बड़ा
और हर संताप से बड़ा।

कविता
कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
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