“आपकी शानदार शुभकामनाओं के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं आभारी हूँ।”
बिहार के मनोनीत राज्यपाल, लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन ने कुछ इस तरह अपनी प्रतिक्रिया दी। उम्मीद है कि वे 13 मार्च को पटना स्थित ‘लोक भवन’ (राजभवन) में अपना कार्यभार संभालेंगे।
वे वर्दी में एक सच्चे ‘लोक सेवक’ साबित होंगे। लेफ्टिनेंट जनरल अपनी वर्दी की कठोरता और मानवीय संवेदनाओं के अनूठे मेल के कारण ‘पीपल्स कमांडर’ (जनता के कमांडर) के रूप में लोकप्रिय हैं।
कश्मीर केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलाधिपति (चांसलर) रह चुके जनरल हसनैन, कश्मीर के रणक्षेत्र से सीधे लोक भवन पहुँचेंगे। उन्होंने उरी और बारामूला में कमांडर के रूप में सेवा दी है और उनकी अंतिम पोस्टिंग श्रीनगर के बादामी बाग छावनी में थी, जहाँ उन्होंने संघर्ष क्षेत्र की सबसे संवेदनशील ’15वीं कोर’ का नेतृत्व किया था।
एक सैन्य वर्दी से संवैधानिक पद तक का यह पूर्ण परिवर्तन, बिहार जैसे राजनीतिक रूप से अस्थिर राज्य में होने जा रहा है। जनरल हसनैन संयुक्त राष्ट्र के तहत मोजाम्बिक और रवांडा में भारतीय शांति सेना (IPKF) के कमांडर भी रह चुके हैं।
जनरल हसनैन ने श्री लंका में ऑपरेशन पवन का नेतृत्व किया था और इसके पहले पंजाब में 1990-91 में उग्रवाद के खिलाफ अभियान का नेतृत्व किया था।
कश्मीर में, उन्होंने घाटी के आम कश्मीरियों का विश्वास जीता क्योंकि उन्होंने छावनी की सुरक्षा दीवारों को लांघकर घाटी के खेतों और बाजारों तक अपनी पहुँच बनाई।
वर्दी में रहते हुए भी वे छात्रों, किसानों और दुकानदारों से मिलते थे, उनकी बातें सुनते थे और उनकी समस्याओं का समाधान करते थे। उन्होंने नौकरशाही के पुराने ढर्रे को त्याग कर मौके पर ही निर्देश जारी करने की कार्यशैली अपनाई।
कश्मीर घाटी में सेना और आम जनों के बीच विश्वास बढ़ाने के लिए उन्होने कश्मीर प्रीमियर लीग की शुरूआत की थी उसवक्त जब 2011 में सुरक्षा बलों पर पत्थर और रोड़े फेंके जाते थे।
उन्होंने सुरक्षा बलों को देवता नहीं जनता के मित्र के रूप मे प्रस्तुत किया तथा सेना के जवानों को यह भी सिखाया कि कश्मीर में नागरिकों को दोस्त बनाए ,उन्हें शिक्षा भी देना चाहिए।
जनरल ने एक सैन्य कमांडर की पारंपरिक छवि से आगे बढ़कर उन कश्मीरियों तक अपनी पहुँच बनाई, जिन्हें सुरक्षा बलों से शिकायतें थीं। उनके कार्यों ने सशस्त्र बलों जैसी संस्था को एक मानवीय चेहरा दिया।
जनरल का यह मानना था कि केवल सैन्य अभियानों से कश्मीर जैसे संघर्ष क्षेत्रों में उग्रवाद को नियंत्रित नहीं किया जा सकता, बल्कि लोगों का विश्वास जीतना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने ‘मानवीय हृदय केंद्रित दृष्टिकोण’ (Human heart centric approach) में विश्वास रखा और उसे व्यवहार में उतारा। इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा, जिससे घाटी में उग्रवाद में कमी आई और तुलनात्मक शांति बहाल हुई।
लेफ्टिनेंट जनरल अता हसनैन के रूप में बिहार के लोक भवन को एक ऐसा राज्यपाल मिल रहा है जो सेना कमांडर से विद्वान बने हैं और वर्तमान में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के सदस्य भी हैं। अपने पिता महदी हसनैन की तरह, मनोनीत राज्यपाल ने भी अपने सैन्य करियर की शुरुआत गढ़वाल राइफल्स से की थी।
यह पहली बार है कि बिहार में एक सैन्य अधिकारी को राज्यपाल बनाया गया है।

