आजकल सुरक्षा बलों के लिए पीपुल-फ्रेंडली आचरण की बात कही जा रही है, लेकिन बड़े-बड़े अधिकारियों ने भी जो अनुभव किया है कि यह लगभग असंभव है।
गुजरात में रविन्द्र नाथ भट्टाचार्य आरक्षी उप महानिरीक्षक थे। गर्मियों में वे अपने घर कलकत्ता गए थे। एक दिन दोपहर में घर में ही सो रहे थे। उनकी माता जी ने जगाया और कहा कि उनके पिता दो घंटे से लाल बाजार थाना गए हैं। पुलिस ने पड़ोस के एक लड़के को पकड़ लिया है।
डीआईजी साहेब थाने गए। तब देखा कि उनके पिता वहीं बैठे हैं। उन्होंने सामने कुर्सी पर बैठे पुलिस अधिकारी से पूछा, “बड़ा बाबू कहां है?” कोई जवाब नहीं मिला। तब उन्हें अपना परिचय देना पड़ा और बताया कि वहां के ज्वाइंट सीपी उनके बैचमेट हैं। तब उस अधिकारी ने सैल्यूट किया। इस बीच उनके पिता निकल गए। डीआईजी ने बताया कि पिता जी को भी बुला लिया जाए। डीआईजी और थाना प्रभारी बाहर निकले। थानेदार ने संतरी को आदेश दिया, “बुजुर्ग को भीतर चैंबर में ले आओ।” तब संतरी ने डीआईजी के सामने उनके पिता, जो विधानसभा से रिटायर्ड अधिकारी थे, की गर्दन पकड़ कर कहा, “ए बूढ़ा, कहां भाग रहा है, साहेब खोज रहे हैं।”
यह आत्मवृत्ति डीआईजी ने अपने राजकोट प्रवास के दौरान साप्ताहिक पुलिस सभा में बताई।
बिहार में पूर्व आरक्षी अधीक्षक, जो डीजीपी रहे, ने भी अपनी कथा सुनाई। वे उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। उन्हें टेलीग्राम से परिवार से सूचना मिली कि उनके ग्रामीण परिवेश में रहने वाले पिता को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। वे ग्राम में दो समूहों में हुए विवाद को सुलझाने गए थे। एसपी साहेब गांव गए और थानेदार से मिले। उन्हें बताया गया, “जब दो समूहों में झगड़ा चरम पर था, क्षेत्र के डीएसपी कंट्रोल करने आए थे। आपके पिता ने डीएसपी साहेब को बताया कि उनका बेटा एसपी है। तब डीएसपी साहेब गरम हो गए और कहा, ‘साला एसपी का बाप बनता है, इसे भी बंद करो।'”
उत्तर प्रदेश के एक डीजीपी, एससी दीक्षित, ने सुझाव दिया कि हर थाना भवन के अंदर प्याऊ की व्यवस्था की जाए। गर्मी में परेशान नागरिक पानी पीकर आशीर्वाद देंगे। वहीं उपस्थित विक्रम सिंह, जो स्वयं पुलिस प्रमुख बने, ने नकार दिया और कहा, “पुलिस वाले पानी पिलाकर क्या-क्या खिलाएंगे? कोई पानी नहीं पीने आएगा थाने का।”
अब कोविड काल की कहानी। विशाखापट्टनम में एक युवा सरकारी डॉक्टर अपने यूनिफॉर्म में दोपहर अस्पताल से घर जा रहा था। पुलिस, जो पेट्रोलिंग कर रही थी और कड़े निर्देशों का पालन कर रही थी, ने पकड़कर जीप में बिठाया और थाने ले गई। कोविड प्रोटोकॉल के उल्लंघन का आरोप था। उसकी माता जब थाने आईं, तब उसके साथ बदतमीजी की गई।
अगले सुबह अखबारों में खबर छपी। अमरावती स्थित हैदराबाद उच्च न्यायालय में न्यायाधीश राकेश कुमार ने स्वतः संज्ञान लिया और पुलिस आयुक्त को नोटिस जारी कर आदेश दिया कि संबंधित थानेदार को न्यायालय में उपस्थित किया जाए। लेकिन आदेश का अनुपालन नहीं हुआ। तब मुख्य सचिव और डीजीपी के खिलाफ अवमानना का केस दर्ज हुआ। मामला केंद्रीय सीबीआई को दिया गया। छह लोग गिरफ्तार हुए। थानेदार सस्पेंड भी हुआ।
और अब कश्मीर की कहानी। बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे मोहम्मद शफी कुरैशी अवकाश प्राप्त करने के बाद श्रीनगर में संत नगर अपने घर रहने गए। पहले ही दिन श्रीनगर एयरपोर्ट से घर जाने के रास्ते में उनकी एंबेसडर कार को जिप्सी सवार एक सैन्य अधिकारी ने रोका और अच्छी-खासी गालियां दीं। उनके ड्राइवर की गलती थी, जिप्सी को पास नहीं दे रहा था। कुरैशी ने मुझे बताया, “मेरी पत्नी ने जरूर कटाक्ष किया, कहां गई तुम्हारी लाट साहिबयत, गाली सुनते रहे।”
कुरैशी को अपनी इज्जत बचाने के लिए हाईवे पर खुद अपना परिचय देना पड़ा। अनंतनाग और श्रीनगर के बीच हाईवे पर उनकी गाड़ी का टायर पंचर हो गया था। वे बाहर निकलकर सड़क पर खड़े थे। सीआरपीएफ वाले पेट्रोलिंग कर रहे थे। उनके पास आकर आक्रामक आवाज में कहा, “भीतर रहें।” पूर्व राज्यपाल ने उस ऑफिसर का नेम प्लेट देखा और कहा, “आप मंदसौर या नीमच से हैं? मध्य प्रदेश में मोहम्मद शफी कुरैशी राज्यपाल होते थे।” जब पटवा सरनेम वाले ऑफिसर ने बताया कि वह मंदसौर का है और पूछा कुरैशी को कैसे जानते हैं, उन्होंने कहा, “मैं ही वहां राज्यपाल था।”

