नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के लिए भारत में निमंत्रण मिला है। इस बोर्ड ऑफ पीस का मकसद गाजा में शांति प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से लागू करना है। हालांकि, दिलचस्प ये है कि इस बोर्ड ऑफ पीस की घोषणा और अब दुनिया के कई देशों के दिए जा रहे निमंत्रण के बीच ऐसा लगता है कि पिछले करीब चार महीनों में बोर्ड के रोल और इसमें शामिल शर्तों को बदला गया है।
ऐसे में भारत सहित दूसरे देशों को भी इसे स्वीकार करने या इसमें शामिल होने से पहले कुछ मुश्किल सवालों का सामना करना पड़ेगा। बोर्ड ऑफ पीस इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसे संयुक्त राष्ट्र के समकक्ष जैसी किसी दूसरी संस्था की तरह भी प्रचारित करने की खबरें आ रही हैं। इसके बारे में अभी समय के साथ कई और जानकारियां सामने आएंगी, फिलहाल अभी तक जो बाते पता चली हैं, आइए उसके बारे में जानते हैं।
बोर्ड ऑफ पीस क्या है?
पिछले साल यानी 2025 के सितंबर में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा में शांति के लिए 20 सूत्रीय योजना पेश की था। इसके तहत गाजा को एक ‘अस्थायी ट्रांजिशनस गवर्नमेंट’ के अंतर्गत रखा जाना था। यह सबकुछ शासन एक फिलिस्तीनी टेक्नोक्रेटिक एडमिनिस्ट्रेशन के तहत जो क्षेत्र में रोजमर्रा के कामकाज और संचालन की जिम्मेदारी संभालती। इसके अमेरिका के नेतृत्व वाले ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के समर्थन से काम करने की बात कही गई थी।
दूसरे शब्दों में फिलिस्तीनी टेक्नोक्रेटिक एडमिनिस्ट्रेशन की देखरेख एक नई अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को करनी थी, जिसकी अध्यक्षता ट्रंप करेंगे। उस समय भी कई लोगों ने ऐसे सवाल उठाए थे कि इससे असल में अमेरिकी राष्ट्रपति गाजा के इंचार्ज बन जाएंगे। बहरहाल, शांति योजना और उस समय सोचे गए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी मिल गई थी।
स्थायी सदस्य बनने के लिए देने होंगे 9000 करोड़ रुपये!
पिछले साल संयुक्त राष्ट्री की मंजूरी के बाद बोर्ड ऑफ पीस का ‘चार्टर’, जिसे अब इसमें शामिल होने के लिए बुलाए गए नेताओं को भेजा गया है, वह बदला हुआ और ज्यादा महत्वाकांक्षी भूमिका दिखाता नजर आता है। गौर करने वाली बात ये है कि इसकी अध्यक्षता खुद ट्रंप करेंगे, न कि अमेरिकी राष्ट्रपति।
दुनिया भर के कई देशों को इस बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के लिए निमंत्रण भेजे गए हैं। इसमें हंगरी से लेकर अल्बानिया, ग्रीस, कनाडा, तुर्की, साइप्रस, मिस्र, जॉर्डन, पैराग्वे और अर्जेंटीना को पत्र मिले हैं। पाकिस्तान ने कहा कि उसे भारत को निमंत्रण मिलने की खबर आने से पहले ही निमंत्रण मिल गया था।
वैसे, कहानी इतनी भर नहीं है। इसमें ये भी है कि जो देश इसे स्वीकार करेंगे, उन्हें तीन वर्षों का कार्यकाल मिलेगा। लेकिन यदि वे सदस्यता के पहले ही वर्ष में 1 अरब डॉलर (9000 करोड़ रुपये) नकद भुगतान कर देते हैं, तो उस स्थिति में वे स्थायी सदस्य बन जाएंगे।
ट्रंप का बोर्ड ऑफ पीस और कई सवाल
पिछले साल यानी नवंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा मंजूर बोर्ड ऑफ पीस का मूल मकसद 2027 के आखिर तक काम करना था। उसमें न तो तीन साल की सदस्यता और न ही स्थायी सदस्यता की कोई बात थी। साथ ही ये भी तय था कि इसे केवल गाजा में काम करना है।
हालांकि, भारत को भेजे गए और अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर द्वारा एक्स पर पोस्ट किए गए निमंत्रण पत्र में कहा गया है कि बोर्ड ऑफ पीस ‘अब तक का सबसे प्रभावशाली और महत्वपूर्ण बोर्ड’ एक नए ‘अंतर्राष्ट्रीय संगठन और ट्रांजिशनल गवर्निंग एडमिनिस्ट्रेशन’ के रूप में स्थापित किया जाएगा। इसमें ये भी कहा गया है कि यह कोशिश केवल ‘मध्य पूर्व में शांति को मजबूत करने’ के लिए नहीं है, बल्कि ‘वैश्विक संघर्ष को सुलझाने के लिए एक साहसिक नए दृष्टिकोण पर आगे बढ़ने’ के लिए भी है।
टाइम्स ऑफ इजराइल इस जारी चार्टर के पूरे टेक्स्ट को प्रकाशित किया है, जिससे पता चलता है कि इसमें 13 आर्टिकल हैं, जिसमें सदस्यता, योगदान, विवाद समाधान वगैरह का विवरण है, जो लगभग संयुक्त राष्ट्र जैसा ही है। यही नहीं, चार्टर में गाजा का जिक्र तक नहीं है, लेकिन ‘एक ज्यादा चुस्त और प्रभावी अंतर्राष्ट्रीय शांति-निर्माण निकाय की जरूरत’ पर जोर देता है।
ट्रंप बने रहेंगे चेयरमैन
बोर्ड के चेयरमैन को लेकर जो बातें चार्टर में हैं, वे और भी हैरान करने वाली हैं। चार्टर में लिखा है, ‘डोनाल्ड जे. ट्रंप पीस बोर्ड के पहले चेयरमैन के तौर पर काम करेंगे, और वह अलग से संयुक्त राज्य अमेरिका के पहले प्रतिनिधि के तौर पर भी काम करेंगे।’ साथ ही, चेयरमैन को तभी हटाया जा सकता है जब वह खुद इस्तीफा दे या उनके द्वारा नियुक्त किए गए लोगों से भरे एग्जीक्यूटिव बोर्ड द्वारा सर्वसम्मति से उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाए। ऐसी स्थिति में उनके द्वारा नामित उत्तराधिकारी पद संभालेगा।
सदस्यता पाने के लिए किसी देश को बोर्ड ऑफ पीस के चार्टर को लेकर सहमति देनी होगी। इसलिए, सीधे शब्दों में कहें तो निमंत्रण स्वीकार करने का मतलब होगा कि एक संप्रभु देश ऐसे संगठन का सदस्य बन जाएगा जिसके चेयरमैन ट्रंप तब भी रहेंगे जब वह अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं होंगे।
इस बोर्ड ऑफ पीस के एग्जीक्यूटिव बोर्ड के संस्थापक सदस्य में जिनके नाम शामिल हैं, उसमें अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो, मध्य पूर्व के लिए अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, ट्रंप के दामाद और बिजनेसमैन जेरेड कुशनर, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, अमेरिकी बिजनेसमैन मार्क रोवन, वर्ल्ड बैंक ग्रुप के प्रेसिडेंट अजय बंगा और अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट गैब्रियल के नाम शामिल हैं।
फिलहाल, अब तक करीब 60 देशों को इसका न्योता भेजा गया है। इसमें से अभी तक केवल हंगरी ने ही पक्के तौर पर इस निमंत्रण को स्वीकार करने का ऐलान किया है।

