Friday, March 20, 2026
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थार की कहानियां: राजस्थान में तेज होती ‘ओरण’ बचाने की मुहिम…आखिर क्यों शुरू हुआ ये आंदोलन?

हाल ही में तनोटराय माता मंदिर से जयपुर विधानसभा तक 750 किलोमीटर की “ओरण बचाओ पदयात्रा” पर्यावरण प्रेमी सुमेर सिंह सांवता और भोपाल सिंह झलोड़ा के नेतृत्व में निकाली जा रही है। विधानसभा में भी यह मुद्दा उठाया गया है।

‘अरे भाई ! यह ओरण वाला मामला क्या है ?’
‘पता नहीं सर, पर सोशल मीडिया इसकी चर्चा से भरा पड़ा है।’
‘जैसलमेर बाड़मेर वालो से पता तो करो, आखिर ओरण क्या होती है ? क्यों हो रहा है आंदोलन ?’
जयपुर के सिविल लाइंस स्थित अपने ऑफिस में बैठे दो रिपोर्टर आपस में यह बात कर रहे हैं।
फोन जैसलमेर ऑफिस में लगाया जाता है, वहां के वरिष्ठ रिपोर्टर से यही सारे प्रश्न किए जाते हैं और विस्तृत रिपोर्ट भेजने का निर्देश दिया जाता है।
कुछ दिन में सारी जानकारी जुटा कर खबर जयपुर मेल की जाती है। जो इस प्रकार है।

ओरण क्या है ?

ओरण का अर्थ संरक्षित भूमि से है। ऐसी भूमि या जमीन जो चारागाह के लिए छोड़ रखी है, जिस पर ना कोई घर बना सकता है और ना ही जुताई कर सकता है। यह भूमि वक्त सेटलमेंट देवी-देवताओं के नाम से छोड़ दी गई थी। इस भूमि का उपयोग पशु-पक्षियों के चारागाह के तौर पर ही होता है। सरल शब्दों में कहे तो इस भूमि का उपयोग मानवीय आवश्यकता कि पूर्ति के लिए नहीं किया जाता है। इस भूमि मे खेती करना या घर बनाना तो दूर की बात है, यहाँ से चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी तक नहीं ली जाती है। ओरण भूमि के वनों को पूरी तरह से सुरक्षित रखने के लिए ग्रामीण किसी भी झाड़ी या पेड़ की अनावश्यक पत्ती तक नहीं तोड़ते है और ना ही यहां विचरण करने वाले पशु-पक्षियों का शिकार किया जाता है।

ओरण भूमि देवी-देवताओं को समर्पित किए जाने का एक उदेश्य लोगों में श्रद्धा और भय का मिश्रित भाव उत्पन्न करना रहा होगा जिससे कि लोग इस संरक्षित वन क्षेत्र को किसी प्रकार क्षति न पहुंचाएं। इस भाव को मजबूती देने के लिए इस भूमि में एक छोटा सा मंदिर या थान बना दिया जाता था। इसके कारण अधिकांश गांवों में फैली ओरण भूमि को उन्हीं देवता कि भूमि के नाम से संबोधित किया जाता। उदाहरण के तौर पर जैसलमेर जिले में तनोटराय माता, देगराय माता, तेमड़ेराय माता,भादरियाराय माता आदि के मंदिरों की हजारों बीघा जमीन ओरण हेतु संरक्षित है।

बाड़मेर में वीरातरा माता, नागाणाराय माता आदि मंदिरों के आस पास भी सैंकड़ों बीघा जमीन ओरण हेतु रखी हुई है। यहाँ सैकड़ों वर्ष पुराने जाल,खेजड़ी, बेर और केर जैसे पेड़ पौधे और वनस्पति उगी हुई हैं तथा गोडावण (Great Indian Bustard), चिंकारा और नीलगाय जैसे वन्यजीव निर्भय होकर यहाँ विचरण करते हैं।

साथ ही यह ओरण जैव विविधता का हॉटस्पॉट हैं, जहाँ पानी के स्रोत और वनस्पतियां मरुस्थलीय क्षेत्र में जीवन को सहारा देते हैं। ओरण में ही छोटे बड़े तालाब, नाडी और सैकड़ों वर्ष पुरानी बेरिया मौजूद हैं जिनसे अकाल के वक्त भी जल की कमी नहीं होती है।

इसका सारा प्रबंधन स्थानीय ग्रामीण समुदाय ही करता है। आंकड़े कहते है कि राजस्थान के लगभग 25,000 ओरण करीब 6 लाख हेक्टेयर भूमि पर फैले हैं। ये ग्रामीण अर्थव्यवस्था, विशेषकर पशुपालन के लिए चरागाह के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

मानवीय क्षति के कारण रेगिस्तानीकरण से लड़ने में ओरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे भूजल को रिचार्ज करते है और मिट्टी के कटाव को कम करके जल संरक्षण में महत्ती भूमिका अदा करते हैं। तथा पशुओं के लिए चारा और औषधीय फसलें प्रदान करके स्थानीय ग्रामीण समुदायों को परिवार की तरह संबल प्रदान करते हैं।

आंदोलन क्यों हो रहा है ?

इसका मुख्य कारण है कि ओरण और गौचर के लिए भूमि पारंपरिक रूप से मौखिक तौर पर ही मंदिरों के आसपास के क्षेत्र में छोड़ दी गई थी। अधिकांश स्थानों पर यह राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हो पाई। लोगों को जरूरत भी नहीं लगी कभी कागज़ी कार्यवाही की। एक विश्वास था कि पीढ़ियों से ही यह ओरण ही है तो इसमें कोई क्यों छेड़छाड़ करेगा ?

वर्तमान में बाड़मेर, जैसलमेर और बीकानेर क्षेत्र में सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाए बड़े स्तर पर आ रही है। भारत में इतना विशाल रिक्त भूभाग शायद ही कहीं और हो। इसलिए सारी सोलर कंपनियां यहीं आ रही हैं।

सरकार भी चाहती है कि ऊर्जा के क्षेत्र में भारत आत्मनिर्भर हो जाए। साथ ही ग्रीन एनर्जी को लेकर भी सरकार का बड़ा आग्रह है। पिछले कुछ वर्षों खातेदारी जमीन के साथ ही सरकारी जमीनों पर भी सोलर पार्क विकसित हुए हैं।

अब चूंकि ओरण और गौचर राजस्व रिकॉर्ड में सामान्य सरकारी भूमि के रूप में दर्ज हैं जिन्हें सरकार किसी भी कंपनी को आवंटित कर सकती है। अतः अभी आंदोलन इसी बात को लेकर है कि जो ओरण क्षेत्र है उसे राजस्व रिकॉर्ड में भी ओरण के रूप में दर्ज किया जाए। ऐसा होने पर सरकार इन्हें किसी कंपनी आदि को आवंटित नहीं कर सकती। फिर ये भूमि संरक्षित वन क्षेत्र में आ जाएगी।

हाल ही में राजस्थान सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद ओरण भूमि को ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ (Deemed Forest) के रूप में वर्गीकृत करने की प्रक्रिया शुरू की है। पर आंदोलन करने वालों का कहना है कि यह प्रक्रिया काफी धीमी है और इसमें वर्षो लग जाएंगे तब तक सारी ओरण निजी कंपनियों को दे दी जाएगी, जिससे थार के पारिस्थितिकी पर बहुत बुरा असर पड़ेगा।

ओरण बचाओ पदयात्रा

इसको लेकर हाल ही में तनोटराय माता मंदिर से जयपुर विधानसभा तक 750 किलोमीटर की “ओरण बचाओ पदयात्रा” पर्यावरण प्रेमी सुमेर सिंह सांवता और भोपाल सिंह झलोड़ा के नेतृत्व में निकाली जा रही है। इस यात्रा को अपार जन समर्थन मिल रहा है। विधानसभा में भी यह मुद्दा उठाया गया है। साथ ही पोकरण और जैसलमेर में विशाल प्रदर्शन भी हुए है। जिसमें जनप्रतिनिधि,संत, आमजन बड़ी संख्या में शामिल हुए। सबका एक स्वर में यही कहना था कि ओरण हमारे जीवन का मूल आधार है, यह बचेंगे तो हम भी जिंदा रहेंगे, अन्यथा हमें पलायन करना पड़ेगा। सदियों से सिर कटाकर भी इस जमीन को गुलाम नहीं होने दिया, अब ये जमीन चली जाएगी। हम, हमारा पशुधन और सैकड़ों वर्ष पुराने पेड़ पौधे सब समाप्त हो जाएंगे।

आंदोलनकर्ताओ ने मुख्यमंत्री के नाम एक ज्ञापन दिया है जिसमें सोलर कंपनियों को ओरण-गोचर भूमि पर किए गए आवंटन रद्द करने, जिले की समस्त 20 लाख बीघा ओरण भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में ओरण के रूप में ही दर्ज करने और पारंपरिक जल स्रोतों और कुओं के आसपास के क्षेत्र को संरक्षित क्षेत्र घोषित करवाने की मांगें शामिल हैं।

पूरी खबर पढ़कर जयपुर ऑफिस में बैठे रिपोर्टर्स के माथे पर भी चिंता की लकीरें उभर आती है। आपस में बात करते है कि ‘ यह तो बड़ा गंभीर मामला है, हमे इसे प्रमुखता से छापना चाहिए जिससे सरकार तक यह बात और वजन के साथ पहुंचे।’

(यह लेखर के अपने विचार हैं)

महेंद्र सिंह तारातरा
महेंद्र सिंह तारातरा
सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र लेखक। भाषा, इतिहास और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन को लेकर सक्रिय।
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1 COMMENT

  1. बहुत अच्छी जानकारी बहुत बढ़िया लिखते हो हुक्म मेरी भी रुचि है पर साहित्य नहीं हे हुक्म कुछ बुक्स के नाम बताए तो मै ला सकू हुक्म

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