Friday, March 20, 2026
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खेती बाड़ी- कलम स्याहीः क्या सिंगूर फिर से खबरों में आने वाला है ?

पश्चिम बंगाल की सियासत में सिंगूर बीते कई वर्षों में अहम स्थान रखता है। इस इलाके ने प्रदेश की सियासत बदल दी है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में सिंगूर एक ऐसा नाम है जिसने बीते दो दशकों के दौरान सूबे की राजनीति का रंग ही बदल दिया है। यह इलाका राजनीतिक बदलाव का प्रतीक है। इसी एक नाम ने ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल का चेहरा बनाने का काम किया है।

जैसा कि हम सभी को पता है कि टाटा मोटर्स की नैनो कार फैक्ट्री के खिलाफ हुए भूमि आंदोलन ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह से उलट दिया था और 2011 में इसी आंदोलन ने सत्ता परिवर्तन की नींव रखी। टाटा के सिंगूर से चले जाने के 18 साल बाद आज हालात पर स्थानीय लोग आत्ममंथन कर रहे हैं। यहां के एख पूर्व विधायक का कहना है कि ममता दीदी ने सिंगूर को भुला दिया है। हालांकि राजनीति में कुछ भुलाया नहीं जाता है, वक्त का पहिया घूमता है और देखिए न उसी सिंगूर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली प्रस्तावित है। भारतीय जनता पार्टी के नेता मंगल पांडे ने हाल ही प्रस्तावित रैली के जगहों का मुयाना भी किया था।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 18 जनवरी को सिंगूर के सिंगर भेरी मौजा में होने वाली निर्धारित रैली से पहले राज्य में राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। यह मौजा उसी भूखंड का हिस्सा है, जिसे कभी कार फैक्टरी के लिए आरक्षित किया गया था।

केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता सुकांत मजूमदार ने बुधवार को कहा कि सिंगूर बंगाल के “औद्योगिकीकरण के खोए हुए अवसर” का प्रतीक है।
सिंगूर में 18 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली होने वाली है। गौरतलब है कि सिंगूर में कभी टाटा की फैक्ट्री लगने वाली थी लेकिन विरोध के चलते फैक्ट्री नहीं लगी और गुजरात चली गई। इस बार भाजपा ने मोदी की रैली टीएमसी के दबदबे वाले इलाके में करने की ठानी है।

सिंगूर पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में वही जगह है, जहाँ टाटा मोटर्स ने अपनी महत्वाकांक्षी नैनो परियोजना का संयंत्र लगाने का फ़ैसला किया था। लेकिन तृणमूल कांग्रेस और ख़ासकर ममता बनर्जी के विरोध के कारण टाटा को आख़िरकार यहाँ से इस परियोजना को समेटना पड़ा था।

जिस ममता बनर्जी के भारी विरोध और आंदोलन के कारण टाटा को यहाँ से अपनी लखटकिया नैनो परियोजना को समेटकर गुजरात के साणंद जाना पड़ा था, वही ममता बंगाल की सत्ता में हैं।

सिंगूर और नंदीग्राम में ज़मीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलनों ने ही ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में पहुंचने का रास्ता साफ़ किया था। सिंगूर आंदोलन राज्य के सरकारी स्कूलों में आठवीं क्लास की इतिहास की किताब का हिस्सा बन चुका है।

34 वर्षों के वाममोर्चा के शासन में परिवर्तन का श्रेय अगर किसी एक घटना को दिया जाये, तो वह सिंगूर ही है। सिंगूर आंदोलन के बीच से उठी परिवर्तन की हवा ने राज्य की सत्ता में लगभग अपराजेय बन गये मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) नीत वाममोर्चा गठबंधन को 2011 में जड़ से उखाड़ कर उड़ा दिया था तब से लेकर हाल तक वाम मोर्चा को नेतृत्व दे रही माकपा और उसके सहयोगी दल बंगाल की सियासत में लगातार कमजोर ही होते गये हैं।

हुगली लोकसभा क्षेत्र में सात विधानसभा क्षेत्रों में से एक है सिंगूर। तत्कालीन वाममोर्चा सरकार ने टाटा मोटर्स की नैनो कार परियोजना के लिए सिंगूर में ही जमीन अधिग्रहण करना शुरू किया था। टाटा मोटर्स के लिए 997 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया था। हालांकि सिंगूर की जमीन बेहद उपजाऊ होने के चलते कुछ किसान जमीन देने के प्रति अनिच्छुक थे। इसी मुद्दे पर वहां एक आंदोलन छिड़ गया, जिसका नेतृत्व तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने किया था। इसमें उनका साथ बंगाल के नागरिक समाज के कई विशिष्ट व्यक्तियों के अलावा देश भर के पर्यावरणविदों ने भी दिया था।

सिंगूर में जमीन अधिग्रहण के विरोध पर उतारू ममता बनर्जी को प्रशासन ने वहां जाने से रोक दिया था। इसके बाद हाथों में संविधान की किताब लिये ममता बनर्जी विधानसभा पहुंच गयी थीं और फिर विधानसभा में जबरदस्त तोड़फोड़ की घटना हो गयी। जमीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के तहत ममता बनर्जी ने तब 26 दिनों का लगातार अनशन कर देशभर के लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा था। बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, ने टाटा से बात कर नैनो कार परियोजना को अपने राज्य में मंगा लिया। जो कारखाना सिंगूर में लगना था, गुजरात के साणंद में लग गया।

2026 में एक बार फिर सिंगूर देश भर के लोगों की जुबान पर आने वाला है। इसकी शुरुआत हो चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 18 जनवरी को प्रस्तावित सिंगूर दौरे से पहले सभा स्थल को लेकर विवाद भी खड़ा हो गया है। स्थानीय मीडियाके अनुसार जिस जमीन पर प्रधानमंत्री मोदी की सभा प्रस्तावित है, उसे जबरन लेने का आरोप लगाया गया है। इसे लेकर स्थानीय किसानों व जमीन मालिकों में भारी असंतोष देखा जा रहा है। स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार, गुरुवार तक कुल 26 लोगों ने अपनी जमीन सभा के लिए देने से साफ इनकार कर दिया है। इनमें छह लोगों ने बुधवार और 20 लोगों ने गुरुवार को बीडीओ और स्थानीय थानेदार को लिखित रूप में आपत्ति दर्ज करायी है।

इस मुद्दे पर गुरुवार शाम सिंगूर में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज्य के कृषि विपणन विभाग के मंत्री बेचाराम मन्ना ने आरोप लगाया कि किसानों की सहमति के बिना जमीन लेने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि सिंगूर तृणमूल कांग्रेस और सिंगूर कृषि जमीन रक्षा कमेटी की ओर से इस कदम का कड़ा विरोध किया जा रहा है।

हालांकि जो होगा वह हम सबके सामने होगा लेकिन इतना तो तय है कि सिंगूर में प्रधानमंत्री की रैली का प्रतीकात्मक महत्व है, क्योंकि यह वही भूमि है, जिसने 34 साल से सत्ता में रहे वाम मोर्चा को राज्य से बाहर किया और ममता बनर्जी को सत्ता की चाबी दी थी। अब देखना है कि इस विधानसभा चुनाव बंगाल की सत्ता वाली चाभी किसके पास जाती है।

गिरीन्द्र नाथ झा
गिरीन्द्र नाथ झा
गिरीन्द्र नाथ झा ने पत्रकारिता की पढ़ाई वाईएमसीए, दिल्ली से की. उसके पहले वे दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक कर चुके थे. आप CSDS के फेलोशिप प्रोग्राम के हिस्सा रह चुके हैं. पत्रकारिता के बाद करीब एक दशक तक विभिन्न टेलीविजन चैनलों और अखबारों में काम किया. पूर्णकालिक लेखन और जड़ों की ओर लौटने की जिद उनको वापस उनके गांव चनका ले आयी. वहां रह कर खेतीबाड़ी के साथ लेखन भी करते हैं. राजकमल प्रकाशन से उनकी लघु प्रेम कथाओं की किताब भी आ चुकी है.
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