Friday, March 20, 2026
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खेती बाड़ी-कलम स्याहीः बंगाल की चुनावी डायरी

वर्ष 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव को अब महज 3 महीने बचे हैं। पार्टी एक बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य का सामना कर रही है, जहां अस्मिता की राजनीति अधिक तीखी हो चुकी है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ मुकाबला और भी कड़ा होता जा रहा है।

बंगाल में अप्रैल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भारतीय जनता पार्टी अपनी तैयारी में जुट गई है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तीन दिन के बंगाल दौरे पर थे और उन्होंने पार्टी की कोर कमेटी की बैठक भी की। वहीं राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी पूरी तरह से चुनावी तैयारी में जुट गईं हैं।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह अपने पश्चिम बंगाल प्रवास के दौरान भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष से बात की। दिलीप घोष फिर से पूरी तरह से एक्टिव हो गए हैं और पार्टी के लिए चुनाव प्रचार की कमान संभालने वाले हैं। दिलीप घोष 6 जनवरी को एक रैली कर सकते हैं। वहीं उसके बाद 16 जनवरी को भी एक जनसभा को संबोधित कर सकते हैं।

गौरतलब है कि दिलीप घोष 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे। हालांकि उस चुनाव में हार के बाद वह पहले की तरह एक्टिव नहीं दिखे। अब दिलीप घोष 6 जनवरी को बैरकपुर में एक रैली कर सकते हैं। एक हफ्ते बाद वह सामिक भट्टाचार्य के साथ दुर्गापुर में एक और रैली कर सकते हैं। सूत्रों ने बताया कि दिलीप घोष 13 जनवरी को उत्तरी बंगाल में बीजेपी के गढ़ कूचबिहार में भी एक रैली करने वाले हैं।

इन सबके बीच पश्चिम बंगाल में 15 साल से शासन कर रही तृणमूल कांग्रेस अपनी स्थापना के 28वें वर्ष और एक नये चुनावी चक्र में प्रवेश कर चुकी है।

ममता बनर्जी की पार्टी एक ओर अपनी वैचारिक स्थिति को नये सिरे से गढ़ रही है, तो दूसरी ओर वह बंगाली ‘अस्मिता’ को ‘बंगाली हिंदू पहचान’ की अधिक स्पष्ट अभिव्यक्ति के साथ जोड़ रही है। इसका उद्देश्य यह है कि वह अपने पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक को असहज किये बिना हिंदू समर्थन को मजबूत कर सके। इसका एक और मकसद है भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तुष्टीकरण के विमर्श का मुकाबला करना।

गौरतलब है कि कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने 1 जनवरी 1998 को वाम मोर्चा के जमे-जमाये शासन को चुनौती देने के उद्देश्य से तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। वर्ष 2011 में ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे के इर्द-गिर्द जमीनी स्तर पर हुए व्यापक जन आंदोलन के दम पर टीएमसी सत्ता में आयी थी।

वर्ष 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव को अब महज 3 महीने बचे हैं। पार्टी एक बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य का सामना कर रही है, जहां अस्मिता की राजनीति अधिक तीखी हो चुकी है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ मुकाबला और भी कड़ा होता जा रहा है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति में भी यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिख रहा है। उन्होंने दक्षिण बंगाल के दीघा में 213 फुट ऊंचे जगन्नाथ मंदिर, कोलकाता में दुर्गा मंदिर और सांस्कृतिक परिसर (दुर्गा आंगन) और सिलीगुड़ी में महाकाल मंदिर जैसी कई मंदिर परियोजनाओं के उद्घाटन या निर्माण की घोषणा की है।

ममता बनर्जी के आक्रमक रूख के समानांतर पश्चिम बंगाल के चुनावी रण में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कमान संभाल ली है। अपने तीन दिवसीय दौरे में शाह ने भाजपा कार्यकर्ताओं को राज्य की 294 में से दो-तिहाई सीटें जीतने का बड़ा टारगेट दिया है। इसके लिए उन्होंने घुसपैठ से लेकर सोनार बांग्ला तक 5 ऐसे मंत्र दिए हैं, जो बीजेपी की चुनावी रणनीति के प्रमुख स्तंभ होंगे।

भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह ने बंगाल चुनाव के लिए जिस प्रचार अभियान की नींव रखी है, वह पांच मुख्य मुद्दों पर टिकी है। अमित शाह ने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जब वे वोटरों के बीच जाएं, तो इन्हीं पांच बातों को प्रमुखता से रखें।
1. घुसपैठियों की समस्या
2. वंदे मातरम
3. जय श्री राम
4. सोनार बांग्ला का निर्माण
5. बंगाल की विरासत को दोबारा स्थापित करना
ये वो शब्द और मुद्दे हैं जो आने वाले दिनों में हर भाजपा कार्यकर्ता की जुबान पर होंगे और हर चुनावी जनसभा में गूंजेंगे। गृह मंत्री का मानना है कि यही वो भावनात्मक और जमीनी मुद्दे हैं जो बंगाल की जनता को बीजेपी के पक्ष में एकजुट करेंगे।

इन सब ग्राउंड की कहानियों के बीच पश्चिम बंगाल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर सबको चौंका दिया।
प्रधानमंत्री संग मुलाकात में अधीर रंजन चौधरी ने विभिन्न राज्यों, विशेषकर बीजेपी शासित राज्यों में काम कर रहे बंगाली भाषी प्रवासी मजदूरों के खिलाफ कथित हिंसा और हमलों का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। अधीर चौधरी ने प्रधानमंत्री से इन घटनाओं का संज्ञान लेने और मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की। अधीर रंजन चौधरी की यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है, जब पश्चिम बंगाल में आगामी चुनावों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं। इस वजह से इस बैठक ने राजनीतिक हलकों में अटकलों को भी जन्म दे दिया है।

अधीर चौधरी मुर्शिदाबाद जिले से आने वाले एक प्रभावशाली जमीनी नेता माने जाते हैं और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कट्टर आलोचक रहे हैं। इस मामले में उनका रुख बीजेपी से मेल खाता नजर आता है, जिससे राजनीतिक चर्चाएं और तेज हो गई हैं। अधीर चौधरी ने लंबे समय तक पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के लिए मजबूत आधार बनाए रखा। उन्होंने बेरहामपुर लोकसभा सीट से लगातार पांच बार जीत दर्ज की थी, जबकि राज्य में कांग्रेस संगठन धीरे-धीरे कमजोर होता चला गया। हालांकि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार यूसुफ पठान के हाथों हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद अधीर चौधरी की पहचान एक मजबूत जमीनी नेता के रूप में बनी हुई है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति आने वाले दिनों में करवटें लेती दिखेगी। इन सबके बीच तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ अपनी रणनीति को धार देते हुए नया चुनावी नारा गढ़ दिया है!

टीएमसी का नया नारा है- “जोतोई कोरो हमला, आबार जीतबे बांग्ला’

(जितने भी हमले कर लो, बंगाल फिर जीतेगा)

अब देखना है कि इसके जवाब में अमित शाह कौन सा नारा अपनी पार्टी को देते हैं।

बंगाल में अप्रैल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भारतीय जनता पार्टी अपनी तैयारी में जुट गई है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तीन दिन के बंगाल दौरे पर थे और उन्होंने पार्टी की कोर कमेटी की बैठक भी की। वहीं राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी पूरी तरह से चुनावी तैयारी में जुट गईं हैं।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह अपने पश्चिम बंगाल प्रवास के दौरान भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष से बात की। दिलीप घोष फिर से पूरी तरह से एक्टिव हो गए हैं और पार्टी के लिए चुनाव प्रचार की कमान संभालने वाले हैं। दिलीप घोष 6 जनवरी को एक रैली कर सकते हैं। वहीं उसके बाद 16 जनवरी को भी एक जनसभा को संबोधित कर सकते हैं।

गौरतलब है कि दिलीप घोष 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे। हालांकि उस चुनाव में हार के बाद वह पहले की तरह एक्टिव नहीं दिखे। अब दिलीप घोष 6 जनवरी को बैरकपुर में एक रैली कर सकते हैं। एक हफ्ते बाद वह सामिक भट्टाचार्य के साथ दुर्गापुर में एक और रैली कर सकते हैं। सूत्रों ने बताया कि दिलीप घोष 13 जनवरी को उत्तरी बंगाल में बीजेपी के गढ़ कूचबिहार में भी एक रैली करने वाले हैं।

इन सबके बीच पश्चिम बंगाल में 15 साल से शासन कर रही तृणमूल कांग्रेस अपनी स्थापना के 28वें वर्ष और एक नये चुनावी चक्र में प्रवेश कर चुकी है।

ममता बनर्जी की पार्टी एक ओर अपनी वैचारिक स्थिति को नये सिरे से गढ़ रही है, तो दूसरी ओर वह बंगाली ‘अस्मिता’ को ‘बंगाली हिंदू पहचान’ की अधिक स्पष्ट अभिव्यक्ति के साथ जोड़ रही है। इसका उद्देश्य यह है कि वह अपने पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक को असहज किये बिना हिंदू समर्थन को मजबूत कर सके। इसका एक और मकसद है भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तुष्टीकरण के विमर्श का मुकाबला करना।

गौरतलब है कि कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने 1 जनवरी 1998 को वाम मोर्चा के जमे-जमाये शासन को चुनौती देने के उद्देश्य से तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। वर्ष 2011 में ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे के इर्द-गिर्द जमीनी स्तर पर हुए व्यापक जन आंदोलन के दम पर टीएमसी सत्ता में आयी थी।

वर्ष 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव को अब महज 3 महीने बचे हैं। पार्टी एक बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य का सामना कर रही है, जहां अस्मिता की राजनीति अधिक तीखी हो चुकी है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ मुकाबला और भी कड़ा होता जा रहा है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति में भी यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिख रहा है। उन्होंने दक्षिण बंगाल के दीघा में 213 फुट ऊंचे जगन्नाथ मंदिर, कोलकाता में दुर्गा मंदिर और सांस्कृतिक परिसर (दुर्गा आंगन) और सिलीगुड़ी में महाकाल मंदिर जैसी कई मंदिर परियोजनाओं के उद्घाटन या निर्माण की घोषणा की है।

ममता बनर्जी के आक्रमक रूख के समानांतर पश्चिम बंगाल के चुनावी रण में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कमान संभाल ली है। अपने तीन दिवसीय दौरे में शाह ने भाजपा कार्यकर्ताओं को राज्य की 294 में से दो-तिहाई सीटें जीतने का बड़ा टारगेट दिया है। इसके लिए उन्होंने घुसपैठ से लेकर सोनार बांग्ला तक 5 ऐसे मंत्र दिए हैं, जो बीजेपी की चुनावी रणनीति के प्रमुख स्तंभ होंगे।

भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह ने बंगाल चुनाव के लिए जिस प्रचार अभियान की नींव रखी है, वह पांच मुख्य मुद्दों पर टिकी है। अमित शाह ने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जब वे वोटरों के बीच जाएं, तो इन्हीं पांच बातों को प्रमुखता से रखें।
1. घुसपैठियों की समस्या
2. वंदे मातरम
3. जय श्री राम
4. सोनार बांग्ला का निर्माण
5. बंगाल की विरासत को दोबारा स्थापित करना
ये वो शब्द और मुद्दे हैं जो आने वाले दिनों में हर भाजपा कार्यकर्ता की जुबान पर होंगे और हर चुनावी जनसभा में गूंजेंगे। गृह मंत्री का मानना है कि यही वो भावनात्मक और जमीनी मुद्दे हैं जो बंगाल की जनता को बीजेपी के पक्ष में एकजुट करेंगे।

इन सब ग्राउंड की कहानियों के बीच पश्चिम बंगाल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर सबको चौंका दिया।
प्रधानमंत्री संग मुलाकात में अधीर रंजन चौधरी ने विभिन्न राज्यों, विशेषकर बीजेपी शासित राज्यों में काम कर रहे बंगाली भाषी प्रवासी मजदूरों के खिलाफ कथित हिंसा और हमलों का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। अधीर चौधरी ने प्रधानमंत्री से इन घटनाओं का संज्ञान लेने और मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की। अधीर रंजन चौधरी की यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है, जब पश्चिम बंगाल में आगामी चुनावों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं। इस वजह से इस बैठक ने राजनीतिक हलकों में अटकलों को भी जन्म दे दिया है।

अधीर चौधरी मुर्शिदाबाद जिले से आने वाले एक प्रभावशाली जमीनी नेता माने जाते हैं और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कट्टर आलोचक रहे हैं। इस मामले में उनका रुख बीजेपी से मेल खाता नजर आता है, जिससे राजनीतिक चर्चाएं और तेज हो गई हैं। अधीर चौधरी ने लंबे समय तक पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के लिए मजबूत आधार बनाए रखा। उन्होंने बेरहामपुर लोकसभा सीट से लगातार पांच बार जीत दर्ज की थी, जबकि राज्य में कांग्रेस संगठन धीरे-धीरे कमजोर होता चला गया। हालांकि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार यूसुफ पठान के हाथों हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद अधीर चौधरी की पहचान एक मजबूत जमीनी नेता के रूप में बनी हुई है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति आने वाले दिनों में करवटें लेती दिखेगी। इन सबके बीच तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ अपनी रणनीति को धार देते हुए नया चुनावी नारा गढ़ दिया है!

टीएमसी का नया नारा है- “जोतोई कोरो हमला, आबार जीतबे बांग्ला’

(जितने भी हमले कर लो, बंगाल फिर जीतेगा)

अब देखना है कि इसके जवाब में अमित शाह कौन सा नारा अपनी पार्टी को देते हैं।

गिरीन्द्र नाथ झा
गिरीन्द्र नाथ झा
गिरीन्द्र नाथ झा ने पत्रकारिता की पढ़ाई वाईएमसीए, दिल्ली से की. उसके पहले वे दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक कर चुके थे. आप CSDS के फेलोशिप प्रोग्राम के हिस्सा रह चुके हैं. पत्रकारिता के बाद करीब एक दशक तक विभिन्न टेलीविजन चैनलों और अखबारों में काम किया. पूर्णकालिक लेखन और जड़ों की ओर लौटने की जिद उनको वापस उनके गांव चनका ले आयी. वहां रह कर खेतीबाड़ी के साथ लेखन भी करते हैं. राजकमल प्रकाशन से उनकी लघु प्रेम कथाओं की किताब भी आ चुकी है.
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