मार्च- अप्रैल के महीने में पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनाव होंगे। इसके लिए चुनाव आयोग से लेकर तमाम राजनीतिक दलों ने तैयारियां तेज कर दी हैं। इस बीच गुरुवार को पश्चिम बंगाल सरकार ने विधानसभा में अपना बजट पेश किया। चुनावी साल का यह लोक-लुभावन बजट कई मायनों में महत्वपूर्ण है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की आधिकारिक घोषणा से पहले ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ‘बजट बाण’ चलाकर राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी को बैकफुट पर धकेलने की कोशिश की है। हालांकि भाजपा भी कोई कसर छोड़ नहीं रही है। गुरुवार को राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में बंगाल को निशाने पर रखने की भरपूर कोशिश की।
इन सबके बावजूद ममता बनर्जी का बजट बाण भाजपा को परेशान करता दिख रहा है। ‘लक्ष्मी भंडार’ की राशि बढ़ाने और बेरोजगारों के लिए ‘बांग्लार युवा-साथी’ जैसी योजनाओं के जरिए ममता ने अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के लिए एक अभेद्य किला तैयार करने की कोशिश की है।
गौरतलब है कि वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों के ठीक पहले ममता बनर्जी ने ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना की घोषणा की थी। विधानसभा चुनाव जीतने के बाद ही उन्होंने महिलाओं के खाते में 500 रुपए भेजने शुरू कर दिये थे। फिर 2024 में लोकसभा चुनाव में इस राशि को बढ़ाकर 1000 रुपए कर दिया। अब 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले इसमें फिर 500 रुपए की वृद्धि की गयी है। फिलहाल राज्य की 2 करोड़ 21 लाख महिलाओं को योजना का लाभ मिल रहा है। 20.62 लाख नये आवेदन स्वीकार किये गये हैं। इसके बाद अब योजना की लाभुकों की संख्या बढ़कर 2.42 करोड़ हो जायेगी।
ममता सरकार की ओर से बजट में कई बड़े ऐलान किए गए। अगर आप बजट को ध्यान से पढ़ेंगे, तो पता चलता है कि इसको विशेष रूप से आगामी चुनाव को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस राज्य में वही फार्मुला आजमाने की कोशिश कर रही है, जो भाजपा ने बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में अपनाया था।
ममता सरकार ने आशा कार्यकर्ताओं के मानदेय में 1,000 रुपये की वृद्धि की है। इसके अलावा युवाओं को साधने के लिए बांग्ला युवा साथी नाम की एक नई योजना की घोषणा की, जिसके अंतर्गत 21-40 वर्ष की आयु के बेरोजगार युवाओं को नौकरी मिलने तक या अधिकतम पांच वर्षों तक 1500 रुपये प्राप्त होंगे। राज्य के वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने कहा कि इस साल विधानसभा चुनाव के बाद अगर हम सत्ता में वापस आते हैं, तो यह योजना इस साल 15 अगस्त से शुरू की जाएगी। 21 से 40 वर्ष की आयु वर्ग के माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण युवाओं को 1,500 रुपये का मासिक भत्ता दिया जाएगा।
बयान से स्पष्ट है कि युवाओं को लुभाने की कोशिश की गई है। बंगाल में चुनाव अगले दो महीने में होने हैं और राज्य सरकार इस योजना को तब लागू करेगी, जब उसकी सत्ता में वापसी होगी।
जैसा कि हम सब जानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी लगातार बंगाल में कमल खिलाने की कोशिश में है लेकिन ममता बनर्जी के सामने भाजपा की कोशिशें फीकी पर जाती है।
फिलहाल भाजपा के पास विधानसभा में कुल 77 विधायक हैं। साल 2021 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सबसे शानदार प्रदर्शन किया था। हालांकि, प्रधानमंत्री मोदी पिछले एक साल में बंगाल में कई बड़े परियोजनाओं का उद्धाटन कर चुके हैं। उन्होंने हर एक रैली में यह भी कहा है कि बंगाल की ममता सरकार केंद्र की परियोजनाओं को प्रदेश में लागू नहीं कर रही हैं। भाजपा की सरकार बनते ही इन योजनाओं को लागू किया जाएगा।
बजट की इन कहानियों के बीच कांग्रेस पार्टी ने पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। कांग्रेस ने गुरुवार को आधिकारिक तौर पर घोषणा की कि वह इस वर्ष होने वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में राज्य की सभी 294 विधानसभा सीटों पर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ेगी, और सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे या तृणमूल कांग्रेस के साथ किसी भी प्रकार की सीट-साझाकरण व्यवस्था नहीं करेगी।
कांग्रेस के महासचिव और पश्चिम बंगाल के प्रभारी गुलाम अहमद मीर ने कहा, “पश्चिम बंगाल में गठबंधन या सीट बंटवारे की व्यवस्थाओं को लेकर हमारे पिछले अनुभवों ने राज्य में जमीनी स्तर के पार्टी कार्यकर्ताओं को काफी हद तक कमजोर कर दिया था। राज्य कांग्रेस नेताओं समेत सभी से चर्चा के बाद यह निर्णय लिया गया है कि कांग्रेस पश्चिम बंगाल की सभी 294 विधानसभा सीटों पर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ेगी। इसे ध्यान में रखते हुए चुनाव की तैयारियां शुरू की जाएंगी।”
कांग्रेस के इस कदम पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने कहा है कि वह पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के खिलाफ सभी ताकतों को एकजुट करना चाहती है। माकपा के प्रदेश सचिव मोहम्मद सलीम ने कहा कि उन्होंने अलग-अलग दलों के साथ इसके लिए बातचीत शुरू कर दी है।
वहीं पश्चिम बंगाल के पड़ोसी राज्य बिहार के कुछ नेताओं ने भी बंगाल चुनाव पर नजर रखने की शुरुआत कर दी है। बिहार विधानसभा चुनाव में फतह के बाद भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ जनता दल यूनाइटेड और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) की नजर पश्चिम बंगाल पर है। एनडीए के सहयोगी दलों के अलावे कई विपक्षी पार्टी भी बंगाल में हाथ आजमाना चाहती है। इन सियासी दलों का फोकस सीमावर्ती इलाकों पर होगा।
नीतीश कुमार की जदयू और चिराग पासवान की एलजेपीआर सीमावर्ती इलाकों पर फोकस कर रही है। इन पार्टियों की रणनीति मुख्य रूप से मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, मुर्शिदाबाद और बीरभूम जैसे जिलों पर केंद्रित है। इन इलाकों में बिहार से गए प्रवासी मतदाताओं, खासकर पासवान, कुशवाहा, यादव और अति पिछड़ा समाज की अच्छी-खासी दखल है।

