कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की सरगर्मी राज्य में तेज हो चुकी है। पिछली बार की तरह इस बार भी राज्य में मुख्य तौर पर मुकाबला ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है। भाजपा एक बार फिर उम्मीद के इस घोड़े पर सवार है कि अबकी बार वो राज्य में बाजी मारने में कामयाब होगी। हालांकि पिछले 15 साल से राज्य में सत्ता में बरकरार ममता बनर्जी से पार पाना आसान नहीं है।
भाजपा को भी यह पता है, लेकिन उसे यह भी पता है कि बंगाल की जनता समय-समय पर ‘सरप्राइज एलिमेंट’ तैयार रखती है। इतिहास भी इसका गवाह है, कि बंगाल की जनता ने जिसे भी सत्ता के शिखर बैठाया, उसे खूब मौका दिया और जब उतारा तो ऐसे कि जैसे वह कभी था ही नहीं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति आज जहां खड़ी है, वह एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन की कहानी कहती है। राज्य की मौजूदा राजनीति में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का दबदबा स्पष्ट दिखाई देता है, जबकि भाजपा पिछले एक दशक में तेजी से उभरकर मुख्य विपक्ष की भूमिका में आ चुकी है। 2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने लगभग 48 प्रतिशत वोट हासिल करते हुए 215 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा करीब 38 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 77 सीटों तक पहुंच गई। इससे उलट बंगाल की राजनीति की कभी धुरी रहा सीपीए के नेतृत्व वाला लेफ्ट फ्रंट महज 7-8 प्रतिशत वोट शेयर तक सिमट गया। आलम ये कि उसे एक सीट भी नसीब नहीं हुई।
पश्चिम बंगाल की सत्ता में 34 साल और फिर बदलाव
यही बंगाल कभी देश में वामपंथ की सबसे मजबूत जमीन माना जाता था। 1977 से 2011 तक लगातार 34 वर्षों तक लेफ्ट फ्रंट की सरकार रही। 2011 के विधानसभा चुनाव में लेफ्ट फ्रंट का वोट शेयर करीब 40 प्रतिशत रहा था लेकिन उसकी सीटें घटकर 62 रह गईं। दूसरी ओर ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस गठबंधन ने लगभग 48 प्रतिशत वोट हासिल कर 226 सीटें जीत लीं। यह केवल ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन नहीं था बल्कि बंगाल की राजनीति में बदलाव का संकेत भी था।
कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सिंगूर और नंदीग्राम के भूमि अधिग्रहण विवादों ने लेफ्ट की किसान समर्थक छवि को गहरा झटका दिया। जिस पार्टी ने दशकों तक किसानों, श्रमिकों की राजनीति की, उसी पर उद्योगों के लिए जमीन छीनने का आरोप लगा। इससे ग्रामीण आधार में दरार शुरू हुई। ममता बनर्जी लोगों की इस नाराजगी को भांपने में कामयाब रहीं, और लेफ्ट को कुर्सी से बेदखल करने में कामयाब हुईं।
बंगाल में भाजपा का उभार
2011 में सत्ता जाने के बाद लेफ्ट जरूर विपक्ष की भूमिका में रही, लेकिन 2016 का चुनाव उसके लिए और बड़ी चुनौती लेकर आया। इस बार लेफ्ट ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया ताकि तृणमूल कांग्रेस को चुनौती दी जा सके। चुनाव में CPI(M) को लगभग 19.75 प्रतिशत वोट मिले और वह 26 सीटों तक सिमट गई, जबकि पूरे लेफ्ट फ्रंट का कुल वोट शेयर लगभग 25 प्रतिशत के आसपास रहा। उसी चुनाव में भाजपा ने लगभग 10 प्रतिशत वोट हासिल करते हुए राज्य में अपनी बढ़ती मौजूदगी का संकेत दे दिया।
यही वह समय था जब बंगाल की राजनीति में भाजपा का दखल नजर आने लगा। विश्लेषक मानते हैं कि लेफ्ट और कांग्रेस का पारंपरिक एंटी-तृणमूल वोट भाजपा की ओर खिसकने लगा। इसके बाद 2021 का चुनाव आया। लेफ्ट के लिए यह चुनाव राज्य में उसकी गिरावट की पराकाष्ठा साबित हुआ। CPI(M) का वोट शेयर घटकर लगभग 5 प्रतिशत से भी रह गया।
20 सालों में तेजी से गिरा लेफ्ट
अगर लेफ्ट के गिरावट को दो दशकों के ट्रेंड में देखें तो तस्वीर स्पष्ट हो जाती है। 2006 में लेफ्ट फ्रंट करीब 50 प्रतिशत वोट के साथ सत्ता में था, 2011 में यह लगभग 41 प्रतिशत पर आया, 2016 में करीब 26 प्रतिशत और 2021 में CPI(M) का वोट शेयर पांच प्रतिशत से भी नीचे चला गया। यह किसी भी लंबे समय तक शासन करने वाली पार्टी के लिए असाधारण गिरावट मानी जा सकती है।
बात केवल विधानसभा चुनाव की नहीं है, लोकसभा चुनावों में भी यही ट्रेंड दिखाई देता है। 2009 में लेफ्ट का वोट शेयर पश्चिम बंगाल में 40 प्रतिशत से ऊपर था, लेकिन 2014 में यह करीब 30 प्रतिशत और 2019 में घटकर लगभग 8 प्रतिशत के आसपास रह गया। यह सीधा संकेत है कि देश के कई राज्यों की तरह बंगाल में भी लेफ्ट के जनाधार में व्यापक कमी आती चली गई है।
बंगाल में लेफ्ट कैसे हुआ कमजोर?
इस गिरावट के पीछे कई कारण गिनाए जा सकते हैं। सिंदूर और नंदीग्राम का जिक्र आता ही है। इसके अलावा लेफ्ट की ताकत उसका कैडर नेटवर्क था, जो पंचायतों, यूनियनों और छात्र संगठनों के जरिए चलता था। लेकिन सत्ता से बाहर होने के बाद इस नेटवर्क में ढीलापन आने लगा।
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दूसरा बड़ा कारण नेतृत्व का संकट भी है। ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य जैसे नेताओं के बाद राज्य स्तर पर वैसी स्वीकार्यता वाला चेहरा सामने नहीं आ पाया। इसके विपरीत ममता बनर्जी ने खुद को एक मजबूत जमीनी नेता के रूप में स्थापित किया और भाजपा ने भी आक्रामक नेतृत्व और संसाधनों के जरिए अपनी जगह बनाई।
एक वजह ये भी रही कि तीन दशकों से अधिक समय तक सत्ता में रहने के कारण पार्टी के कई सदस्यों ने कम्युनिस्टों के जमीनी स्तर पर अपने आंदोलन और सोच को स्थापित करने के लिए संघर्ष का अनुभव नहीं किया। परिणामस्वरूप, लेफ्ट की विचारधारा में अच्छी तरह से रमे लोग भी, जमीनी स्तर पर संघर्ष करने के कौशल के मामले में कमजोर रहे। इसका फायदा ममता बनर्जी और बाद में भाजपा ने उठाया।
लेफ्ट के लिए दिक्कत ये भी रही कि बदले दौर और नई राजनीतिक ध्रुवीकरण की स्थिति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की रणनीति वह तय नहीं कर पाया। जहां तृणमूल ने क्षेत्रीय पहचान पर जोर दिया, वहीं भाजपा ने राष्ट्रीय मुद्दों और पहचान की राजनीति को आगे बढ़ाया। लेफ्ट इन दोनों के बीच अपनी स्पष्ट राजनीतिक लाइन स्थापित करने में संघर्ष करता रहा।
युवा नेताओं की अनदेखी!
हाल में पिछले ही महीने सीपीएम के युवा तेजतर्रा नेता प्रतिकुर रहमान का पार्टी को छोड़ना चर्चा में रहा। उन्होंने 21 फरवरी को तृणमूल कांग्रेस की सदस्यता ले ली। छात्र राजनीति से उभरे (स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया के राज्य अध्यक्ष और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में कार्य कर चुके) रहमान सीपीएम की राज्य समिति के सदस्य थे। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य नेतृत्व उनके काम की अनदेखी करते रहे हैं और उनकी शिकायतों को नहीं सुना जाता है।
हालात ऐसे बने कि जो प्रतिकुर 2024 के लोकसभा चुनावों में डायमंड हार्बर से तृणमूल महासचिव अभिषेक बनर्जी के खिलाफ सीपीएम के उम्मीदवार थे, उन्होंने ही उन्हें तृणमूल में शामिल किया। जाहिर है यदि वामपंथी दलों के युवा नेताओं को सीपीएम में अपनी जगह बनाना इतना मुश्किल हो रहा है, और ऐसे ही यदि आंतरिक बातचीत कम होती रही, तो पार्टी के लिए राह मुश्किल है।
पश्चिम बंगाल में लेफ्ट का पतन भारतीय राजनीति के सबसे बड़े सत्ता परिवर्तनों में से एक उदाहरण है। कुल मिलाकर जिस राजनीतिक धारा ने तीन दशकों से अधिक समय तक राज्य की सत्ता को नियंत्रित किया, वह आज चुनावी परिदृश्य में लगभग अप्रासंगिक हो गई है।
एक समय जहां मुकाबला कांग्रेस और लेफ्ट के बीच होता था, फिर लेफ्ट और तृणमूल के बीच हुआ, वहीं अब मुख्य मुकाबला तृणमूल और भाजपा के बीच सिमट चुका है।
यह बदलाव लोकतंत्र की उस सच्चाई को भी सामने लाता है कि कोई भी राजनीतिक शक्ति स्थायी नहीं होती। आज बंगाल में लेफ्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल चुनाव जीतने का नहीं बल्कि अपने राजनीतिक अस्तित्व को फिर से परिभाषित करने का है। और जो परिस्थितियां दिख रही हैं, उससे लगता नहीं कि लेफ्ट को फिलहाल इसमें कोई कामयाब मिलेगी।

