Friday, March 20, 2026
Homeविचार-विमर्शखेती बाड़ी-कलम स्याही: 'स्विंग सीटों' का खेल- क्या यहीं तय होगी बंगाल...

खेती बाड़ी-कलम स्याही: ‘स्विंग सीटों’ का खेल- क्या यहीं तय होगी बंगाल की सत्ता?

ममता बनर्जी अगर अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को फिर से जीत दिलाती हैं, तो वह पश्चिम बंगाल की पहली ऐसी मुख्यमंत्री बन सकती हैं, जिन्होंने लगातार चार बार विधानसभा चुनाव जीतकर इतिहास बनाया हो।

पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस, एक बार फिर ममता बनर्जी के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है। ममता बनर्जी साल 2011 से राज्य की मुख्यमंत्री हैं।

अगर ममता बनर्जी अपनी पार्टी को फिर से जीत दिलाती हैं, तो वह पश्चिम बंगाल की पहली ऐसी मुख्यमंत्री बन सकती हैं, जिसने लगातार चार बार विधानसभा चुनाव जीतकर इतिहास बनाया हो। ऐसी जीत उन्हें देश के राजनीतिक इतिहास में सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाली महिला नेताओं में से एक बना देगी।

उधर, दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी है, जो इस बार करो या मरो की तर्ज पर चुनावी मैदान में है। बंगाल में कमल खिलाने के लिए भाजपा राजानीति के हर उस दांव को खेलने में जुटी है, जिसे राजानीति में जायज माना जाता है।

2026 का यह चुनाव कई मायनों में ममता बनर्जी के लिए अब तक की सबसे कठिन राजनीतिक परीक्षा भी साबित हो सकता है।

ममता बनर्जी एक नहीं लगातार तीन बार राज्य की मुख्यमंत्री चुनी गईं और अब जब पश्चिम बंगाल एक बार फिर विधानसभा चुनाव की दहलीज़ पर खड़ा है, ममता बनर्जी चौथी बार तृणमूल कांग्रेस का चेहरा बनकर चुनावी मैदान में उतर चुकी हैं। ऐसे में ममता अगर अपनी पार्टी को फिर से जीत दिलाती हैं, तो वह पश्चिम बंगाल की पहली ऐसी मुख्यमंत्री बन सकती हैं, जिन्होंने लगातार चार बार विधानसभा चुनाव जीतकर इतिहास बनाया हो लेकिन क्या इतिहास रचना उनके लिए इतना आसान होगा?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस अपनी मजबूत जमीन बचाने की कोशिश में है तो वहीं भारतीय जनता पार्टी उन कमजोर कड़ियों को तलाश रही है, जहां सेंध लगाई जा सके।

बंगाल की किन सीटों पर होगा ‘खेला’?

आगामी चुनाव में असली मुकाबला उन सीटों पर है जो न ममता का स्थायी गढ़ है और न ही भारतीय जनता पार्टी का। इन स्थायी गढ़ की कहानी को समझने के लिए आपको कोलकाता प्रेसीडेंसी क्षेत्र और उत्तर बंगाल के सीटों को समझना होगा। मसलन कोलकाता प्रेसीडेंसी इलाकों में तृणमूल की पकड़ मजबूत है, लेकिन उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी और मालदा में उसकी स्थिति नाजुक है।

ग्राउंड को देखने के बाद आप यह कह सकते हैं कि दक्षिण बंगाल के मुकाबले उत्तर बंगाल, विशेषकर जलपाईगुड़ी और मालदा में तृणमूल की स्थिति काफी नाजुक नजर आती है। उदाहरण के लिए जलपाईगुड़ी में तृणमूल के पास केवल एक ‘बेहद मजबूत’ सीट है, जबकि अधिकांश सीटों पर वह ‘कमजोर’ या ‘बेहद कमजोर’ स्थिति में है। इसी तरह मालदा जिले की स्थिति तो और भी खराब है, जहां तृणमूल 49 सीटों में से 28 सीटों पर ‘कमजोर’ श्रेणी में है जो भाजपा के लिए एक बड़ा मौका हो सकता है।

साल 2021 के चुनावों में जलपाईगुड़ी की 79% और मालदा की 82% सीटों पर मतदाताओं ने अपना मत बदल दिया था जो इन क्षेत्रों की अस्थिरता को दिखाता है।

उधर, पूरे पश्चिम बंगाल में 2021 के पिछले चुनाव के दौरान 130 सीटों पर सत्ता परिवर्तन हुआ था, यानी वहां मतदाताओं ने पुरानी पार्टी को छोड़कर दूसरी पार्टी पर भरोसा जताया था। इस बार मेदिनीपुर क्षेत्र असली रणक्षेत्र बनकर उभरा है, जहां 2021 में स्थिर रहने वाली सीटों और दल-बदल होने वाली सीटों के बीच मुकाबला लगभग बराबर है।

कुल मिलाकर आंकड़ों से स्पष्ट है कि जहां तृणमूल का प्रभाव कुछ खास क्षेत्रों में केंद्रित है। वहीं, बीजेपी को उन ‘स्विंग’ क्षेत्रों पर ध्यान देना होगा, जहां मतदाता किसी एक दल के साथ बंधे नहीं हैं।

भवानीपुर सीट पर भी सभी की नजर

वहीं पश्चिम बंगाल में भवानीपुर विधानसभा सीट सबसे अधिक सुर्खियों में रहने वाला है। भवानीपुर में चुनावी हलचल तेज है और यहां की लड़ाई सिर्फ एक सीट की नहीं, बल्कि कोलकाता की बदलती पहचान पर है। जहां तक नाम का सवाल है, भवानीपुर का अलग आध्यात्मिक इतिहास है। भवानीपुर को देवी भवानी का क्षेत्र माना जाता है और इसकी पहचान पवित्र कालीघाट मंदिर के ऐतिहासिक प्रवेश द्वार के रूप में भी रही है। हालांकि, यह इलाका एक शांत बाहरी बस्ती से अब पॉश इलाके के रूप में तब्दील हो चुका है। भवानीपुर की सामाजिक संरचना बहुत जटिल मानी जाती है।

तृणमूल कांग्रेस की बूथ स्तर की मशीनरी काफी मजबूत और सक्रिय दिखती है, जबकि भाजपा की उम्मीद शहरी मध्य वर्ग की नाराजगी पर टिकी है। पार्टी को इस नाराजगी के सहारे चुनावी समीकरण बदलने की उम्मीद है।

इस इलाके में पारंपरिक बंगाली परिवारों के मोहल्ले हैं, जहां राजनीतिक बहस आम बात है। गुजराती और मारवाड़ी समुदाय इस इलाके की अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार माने जाते हैं। भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र में सिख और मुस्लिम समुदाय के साथ ही बिहार के लोगों की आबादी भी अच्छी तादाद में है। भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र में करीब 70 फीसदी गैर बंगाली आबादी है। साल 1984 में अपने सियासी सफर की शुरुआत के बाद से ही ममता बनर्जी भवानीपुर को अपने मजबूत गढ़ के रूप में देखती रही हैं।

बंगाल चुनाव में पीके की भी चर्चा!

वहीं पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में हर किसी की नजर चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर पर भी टिकी हुई है। साल 2021 में ममता बनर्जी की जीत के ‘चाणक्य’ रहे पीके क्या इस बार भी टीएमसी के लिए फील्डिंग करेंगे? या फिर अपनी नई पार्टी जन सुराज के साथ बिहार तक ही सीमित रहेंगे?  यह सवाल बंगाल में खूब पूछा जा रहा है।

कभी पीके की कंपनी रही आईपैक, जो बंगाल में 2021 के चुनाव के बाद 2026 के चुनाव में भी टीएमसी के लिए रणनीति बना रही है, लेकिन उस टीम में अब पीके नहीं हैं। ऐसे में यह देखना होगा कि बिन पीके के ममता की पार्टी किस तरह की ग्राउंड रणनीति बनाने जा रही है।

दूसरी ओर यदि बंगाल के मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों की कहानी की बात है तो 2026 के चुनाव के लिए ममता ने अपनी फील्डिंग सजा ली है। उन्हें पता है कि 294 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 148 सीटें चाहिए। इनमें से करीब 75 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी इतनी ज्यादा है कि वहां बीजेपी का जीतना नामुमकिन जैसा है। ऐसे में ममता का गणित सीधा है- 75 सीटें मुस्लिम वोटरों के दम पर ‘पक्की’ करो, और बाकी की 75 सीटें महिला वोटरों और ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं के जरिए हासिल कर लो। ममता के सामने कहीं हुमायूं कबीर और ओवैसी जैसे छुटपुट चैलेंज आ सकते हैं, लेकिन, उनका फिलहाल खास असर नहीं दिखता।

यह भी पढ़ें- ममता बनर्जी के लिए भबानीपुर ‘चक्रव्यूह’ तो नहीं बनने जा रहा? कौन-कौन से फैक्टर बढ़ाएंगे दीदी की चुनौती

गिरीन्द्र नाथ झा
गिरीन्द्र नाथ झा
गिरीन्द्र नाथ झा ने पत्रकारिता की पढ़ाई वाईएमसीए, दिल्ली से की. उसके पहले वे दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक कर चुके थे. आप CSDS के फेलोशिप प्रोग्राम के हिस्सा रह चुके हैं. पत्रकारिता के बाद करीब एक दशक तक विभिन्न टेलीविजन चैनलों और अखबारों में काम किया. पूर्णकालिक लेखन और जड़ों की ओर लौटने की जिद उनको वापस उनके गांव चनका ले आयी. वहां रह कर खेतीबाड़ी के साथ लेखन भी करते हैं. राजकमल प्रकाशन से उनकी लघु प्रेम कथाओं की किताब भी आ चुकी है.
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments