चाहे एक अधूरी कविता हो, आधा लिखा ख़त हो या आधी बनी इमारत हो, दिल को उस तरह छूती है जैसे पूर्णता कभी नहीं छू पाती। मुझे यह बात सबसे पहले तब समझ आई जब मैंने बार्सिलोना की साग्रादा फ़ामिलिया इमारत को देखा। वास्तुकार एंटोनी गौड़ी का वह सपना जो 1882 में शुरू हुआ और 1926 में उनकी मृत्यु के साथ अधूरा रह गया लेकिन आज भी दुनिया की सबसे मनमोहक इमारतों में गिना जाता है।
तभी मन में सवाल उठा: क्या भारत में भी ऐसी इमारतें हैं, जिनका अधूरापन ही उनकी सबसे बड़ी कहानी हो? और जब मैंने तलाश शुरू की, तो पूरा भारत अधूरे सपनों का एक शांत संग्रहालय-सा लगा। आइए, उसी संग्रहालय के गलियारों में चलते हैं।
1. भोजेश्वर मंदिर: राजा भोज का अधूरा सपना
नर्मदा के किनारे बसा भोजपुर, राजा भोज की प्राचीन महत्वाकांक्षा का प्रमाण है। उन्होंने यहाँ सौ मंदिरों का निर्माण शुरू कराया था, जिनमें भोजेश्वर मंदिर सबसे विशाल और अनोखा था। यह मंदिर पूरा तो नहीं हो पाया। राजनैतिक परिस्थिति, निर्माण के दौरान आई कठिनाइयों और संभवतः नर्मदा की बाढ़ के कारण इस मन्दिर के कार्य को बीच में ही रोक दिया।
मंदिर के भीतर स्थित शिवलिंग लगभग साढ़े पाँच मीटर ऊँचा है और दुनिया के सबसे ऊँचे एकाश्म शिवलिंगों में गिना जाता है। दीवारें आज भी अधूरी तराशी हुई दिखाई देती हैं, जैसे किसी कारीगर दल ने काम बीच में रोककर बस चंद मिनटों के लिए विश्राम लिया हो और फिर कभी लौट न सके हों। भोजेश्वर मंदिर का अधूरापन ही उसकी सबसे बड़ी रहस्यमयी पहचान बन चुका है।
2. अलाई मीनार: ख़्वाहिश जो आसमान छू न सकी
दिल्ली की महरौली के कुतुब परिसर में खड़ी अलाई मीनार, अलाउद्दीन खिलजी के असाधारण ख्वाबों की अधूरी निशानी है। उनका सपना था कि वे कुतुबमीनार से दोगुनी ऊँची मीनार बनाएँगे, ताकि दुनिया दिल्ली सल्तनत की शक्ति को महसूस कर सके।
निर्माण शुरू हुआ और विशाल गोलाकार नींव बिछाई गई। पहली मंज़िल का ढांचा भी पूरा हुआ। लेकिन 1316 में खिलजी की मृत्यु हो गई और नए शासकों की रुचि इस परियोजना में नहीं रही। प्रशासनिक बदलावों और राजनीतिक अस्थिरता ने निर्माण को हमेशा के लिए रोक दिया।
आज अलाई मीनार एक विशाल पत्थरीला ढांचा बनकर खड़ी है जो न अधूरी लगती है, न पूरी। बस इतनी कि देखने वाला सोच में पड़ जाए कि कैसे कुछ महत्वाकांक्षाएँ बहुत ऊंची होती हैं हाथ बढ़ाकर छूने के लिए।
3. चंडीगढ़ का अधूरा ‘गवर्नर हाउस’: कॉर्बुज़िए का अनलिखा अध्याय
1950 के दशक में चंडीगढ़ भारत की आधुनिक पहचान का प्रतीक बनने लगा। ली कॉर्बुज़िए ने यहाँ की प्रशासनिक इमारतों को इस तरह डिजाइन किया कि वे आधुनिक लोकतंत्र की आत्मा को दर्शाएँ। हाई कोर्ट, विधानसभा भवन और सचिवालय,ये तीनों इमारतें उसी आधुनिक दृष्टि के अनुसार बनीं।
लेकिन इनमें एक चौथी महत्वपूर्ण कड़ी थी गवर्नर हाउस, जो कभी बन नहीं पाया। राजनीतिक मतभेद, प्रशासनिक असहमति और बजट संबंधी समस्याओं ने इस इमारत को काग़ज़ से आगे बढ़ने ही नहीं दिया।
आज भी कैपिटल कॉम्प्लेक्स में जिस जगह यह बनना था, वहाँ एक खालीपन है। ब्लू प्रिंट्स में तो इसका नक्शा मौजूद है मगर ज़मीन पर इसकी हस्ती नदारद रही। हवा उस खाली जगह से गुज़रती है तो लगता है जैसे कोई अदृश्य इमारत अब भी खड़ी हो, जिसे केवल कल्पना ही देख सकती है।
4. बारह क़मान, बीजापुर: महराबें जो आसमान को छूने से पहले रुक गईं
बीजापुर में अली आदिल शाह द्वितीय ने अपने पिता की याद में एक भव्य स्मारक बनाने की सोची। योजना थी कि बारह महराबों का एक विशाल मंडप बने और उसके केंद्र में एक भव्य गुम्बद उठे जो दूर-दूर तक दिखाई दे।
निर्माण शुरू हुआ लेकिन किन कारणों से यह रुक गया,यह आज भी इतिहास का रहस्य है। हो सकता है कि राजनीतिक परिस्थितियाँ बदल गई हों या संसाधनों की कमी आ गई हो। पर जो भी कारण रहा हो, परिणाम सिर्फ एक: बारह विशाल, हवा में गूँजती, अधूरी महराबें।
इन क़मानों के नीचे खड़े होकर महसूस होता है कि हवा की आवाज़ बदल गई है। जैसे हर महराब अपने अंदर एक बंद गीत छिपाए हो।
5. सतखंडा, लखनऊ: नवाबी सपना जो चौथी मंज़िल पर ठहर गया
लखनऊ की पुरानी गलियों में खड़ा सतखंडा एक अनोखी, चार-मंज़िली, लाल-सुनहरी ईंटों की इमारत है जिसे देखकर लगता है जैसे यह कभी आसमान छूने के लिए बनी हो। नवाब मोहम्मद अली शाह चाहते थे कि इसकी सात मंज़िलें हों, जिनसे पूरा लखनऊ देखा जा सके।
निर्माण शुरू हुआ और चार मंज़िलों तक पहुँच भी गया। लेकिन नवाब की बीमारी, आर्थिक संकट और दरबार के अंदर उठे मतभेदों ने काम रोक दिया। सात मंज़िलों वाला टॉवर अंततः सिर्फ चार मंज़िलों तक ही सीमित रहा।
आज सतखंडा ऐसे खड़ा है जैसे आसमान की ओर बढ़ती सीढ़ी का आधा हिस्सा हो जहाँ से आगे का रास्ता कल्पना बनकर हवा में घुल जाता है।
6. कोणार्क सूर्य मंदिर: सूरज के रथ का रुका हुआ पहिया
ओडिशा का कोणार्क सूर्य मंदिर दुनिया की सबसे अद्भुत स्थापत्य रचनाओं में से गिना जाता है। राजा नरसिंहदेव प्रथम ने इसे सूर्यदेव के रथ के रूप में बनवाया था जिसे 24 पत्थर के पहिये और 7 पत्थर के घोड़े खींचते हुए दिखते हैं।
मंदिर का निर्माण पूर्ण नहीं हो पाया। कुछ हिस्से शुरू से ही अधूरे रह गए और समुद्री हवा, समय की मार व संघर्षों ने भी कई हिस्सों को नष्ट कर दिया। मुख्य गर्भगृह, जिसमें सूर्यदेव की प्रतिमा स्थापित होनी थी, समय के साथ पूरी तरह ढह गया।
पर जो बचा है, वह भी इतना भव्य है कि कल्पना को झकझोर देता है कि अगर यह पूरा बनता, तो कैसा होता।
अधूरेपन में भी धड़कती विरासत
इन अधूरी संरचनाओं को देखते हुए यह समझ आता है कि पूर्णता ही सब कुछ नहीं होती। कभी-कभी अधूरा रह जाना ही किसी चीज़ को यादगार बना देता है। भोजेश्वर मंदिर की अधूरी दीवारें, अलाई मीनार का रुका हुआ सिरा, सतखंडा की आधी बनी मंज़िलें, बारह क़मान की अनुगूँज और कोणार्क की टूटती चमक; ये सब बताते हैं कि सपने कभी-कभी समय से हार जाते हैं, लेकिन इतिहास से जीत जाते हैं।
अधूरी इमारतें हमें याद दिलाती हैं कि विरासत सिर्फ वह नहीं होती जो बनकर खड़ी हो जाए, विरासत वह भी होती है जो आधी बनकर भी अपने अंदर पूरा युग समेट ले। और शायद इसीलिए, अधूरा कभी-कभी पूरा होता है।

