Friday, March 20, 2026
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स्मरण: विनोद कुमार शुक्ल की औरतें- कुनमुनाहट का परमोत्कर्ष

विनोद कुमार शुक्ल अब इस  दुनिया के नहीं रहें पर उनकी कृतियां और कीर्तियां दोनों अभी बाकी हैं और रहेंगी। उन्हें याद करते हुये ज्योति शर्मा का यह आलेख विनोद कुमार शुक्ल के लेखन में उपस्थित स्त्री-छवि, देह-विरलता और चुनी हुई ख़ामोशी का एक असहज लेकिन साहसी और आत्मस्वीकारी पाठ है, जो मृत्योपरांत किसी भी इंसान को देवता बना दिये जाने, उस पर किसी भी तरह का कोई भी सवाल न खड़ा किये जाने की हमारी आमफहम प्रवृत्ति के खिलाफ है। यहाँ वे एक आलोचक नहीं बल्कि प्रेम में डूबी हुई एक असंतुष्ट पाठक की तरह प्रश्न करती हैं। प्रशंसा और प्रतिवाद, मोह और विद्रोह के बीच झूलता हुआ यह आलेख उस साहित्यिक प्रदेश को टटोलता है, जहाँ प्रेम अक्सर एक शिकायत बनकर उभरता है और शिकायत ही सबसे गहरा संवाद।

विनोद कुमार शुक्ल के यहाँ शरीर जैसे कोई असुविधाजनक अतिथि है जिसे घर में आने तो दिया गया है पर जिसके लिए चाय-पानी तक का इंतजाम नहीं रखा गया। उनकी कहानी की दुनिया में कल्पना के पेड़ खूब हैं, विचार की बेलें और नैतिकता के पौधे भी हैं, मगर देह? देह कहीं नहीं। और अगर कहीं है भी, तो वह सिर्फ़ कपड़ों की सिलवटों जितनी है। बिना गर्मी, बिना गंध; बिना योनि, बिना शिश्न।

उनके पात्र प्रेम करते हैं, मगर ऐसा प्रेम जो आँख झुकाकर होता है, जिसमें छूने की जगह नहीं, बस टकटकी की गुंजाइश है। जैसे दो आत्माएँ सड़क के किनारे बैठी हों और बीच में कोई अदृश्य दीवार हो जिस पर लिखा हो “स्पर्श वर्जित”। विनोद कुमार शुक्ल के यहाँ सेक्स का तो परम अभाव है ही, पर स्त्री-सेक्सुअलिटी तो एकदम से नदारत है, वह आए भी तो किस बहाने? रोटी-पानी का टिफिन बाँधते हुए या साड़ी धोते वक्त साबुन के झाग में?

उनकी औरतें बस रोटी पानी करती हैं, जरा रूठा-राठी कर लेती हैं, फिर बाक़ी टाइम कुनमुनाती रहती हैं जैसे घर की खराब घड़ी। पर टिक-टिक का भ्रम अभी बाकी हो। लेखन का यह पूरा संसार ऐसा है जैसे प्रेम ने तपस्या की धूल ओढ़ ली हो। पुरुष है, मगर बिना शिश्न का। स्त्री है, मगर बिना देह-स्मृति के।

यह लगभग आध्यात्मिक नपुंसकता है । विनोद जी की नायिकाओं को देने के लिए उनके लेखन में कुछ भी खास नहीं है। जो है, वह आदमी का अंतर्मन; वह भी ऐसा जैसे किसी सरकारी फ़ाइल के नोट्स हों- क्रमवार, ठंडे, बार-बार संशोधित।

दीवार में खिड़की रहती थी

उस दीवार में अगर कभी किसी ने देह की दराज खोजी होती, तो शायद वहाँ से हवा भी बदल जाती। पर नहीं, विनोद जी के यहाँ हवा भी निष्कलुषता में स्नान कर चुकी होती है। यहाँ देह नहीं, तो पाप नहीं और पाप नहीं तो सुख का भी क्या काम?

आख़िर यह विनम्रता कहाँ तक? कविता की पवित्रता और कहानी की सात्विकता ने उन्हें एक ऐसे प्रदेश में बसा दिया, जहाँ आदमी सोचता है, मगर कभी साँस नहीं लेता। उनके पात्रों को देखिए, उनके भीतर चल रही तपस्या इतनी सूक्ष्म है कि उनके खून में भी शायद विदेहता हो, जोश नहीं।

विनोद जी के लेखन में संसार चलता तो है, पर वह जैसे किसी पुराने पंखे की धीमी आवाज़। बस गति का भ्रम। और यही उनकी सबसे बड़ी त्रासदी भी है: उन्होंने स्त्री को देखा, पर उसे स्पर्श नहीं किया। स्त्री ने पुरुष को चाहा, पर उसे कभी पाया ही नहीं।

अधेड़ एलिस का गुलगुला-लोक

विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ना जैसे किसी अधेड़ एलिस का पीछा करना,वो खरगोश के बिल में नहीं, बल्कि कस्बे की पुरानी कोठरी के ताले में घुस जाती है। वहाँ गायें चरती हैं, बटुए में रुई लिपटी है, सपने गुलाबी धुँधलाते हैं। सब नरम, सब सलीम। पर अचानक मन में खटका: ये जगह तो जादुई है, काल्पनिक सी है, फांसीवाद की फुफकार यहां कहीं नही? पर्यावरण का काला धुआँ कहाँ? बस मीठे गुलगुले लुढ़कते हैं गुड़ के, चाशनी वाले। खाकर जीभ चिपक जाती है।

मैं ऊब जाती हूँ, हाँ ऊब क्योंकि उनकी दुनिया में राजनीति का नामोनिशान नहीं। न आक्रोश की चिंगारी, न बिगड़ती धरती का रोना। वो लिखते हैं जैसे कोई बूढ़ा चायवाला चुस्की लेते हुए नरम, निस्संग, बहुत धीरे। और मैं? मैं तो न्यूज़ की तेज़ रफ्तार में फँसी हूँ, जहाँ हर ख़बर एक चाकू। उनकी विनम्रता में खोना चाहूँ तो भी नहीं खो पाती, जैसे शहद में डूबते हुए चींटी का संघर्ष।

यह मेरी हार है, भाई। मेरी नज़र का खोट, ऊँचाई का फर्क। वे कुएँ की तलहटी से झाँकते हैं, वहाँ शीतल पानी है, पर दुनिया की छाया नहीं। मैं चूहे की तरह, निचले कोने से हर चीज़ ऊँची, हवा-भरी, शहद से तर। साँस फूल जाती है, भागना पड़ता है।

वे बड़े हैं, इतने कि मैं उनके सामने बौनी। हर पाठक का अपना फिल्टर है। कभी ज़हर से, कभी मिठास से बचाव का। शुक्ल जी की मिठास तो दरारों से रिसती है, नज्म़ की तरह धीमी, अनसुनी, आज के कानों में? ख़ामोशी। लड़खड़ाती हुई ख़ामोशी।

उनकी चुनी हुई खामोशी

कहते हैं, कुछ लेखक अपनी निस्पृहता में भी पूजनीय हो जाते हैं। वे जितना कम बोलते हैं, उतना ही ज़्यादा समझे जाते हैं। पर विनोद कुमार शुक्ल का मौन महिमा नहीं, मनमानी प्रतीत होती थी। उनकी रचनाएं विचित्र सौंदर्य की प्रतिमाएँ हैं। वहाँ गद्य कविता में प्रवेश मांगता है और कविता गद्य का स्वाद बन जाती है। पर उस रचनाकार की मनःस्थिति से जब युवा लेखक संवाद करना चाहे, वहाँ एक दीवार खड़ी मिलती है। उन्होंने कभी यह नहीं बताया कि अगली पीढ़ी के लेखकों को क्या करना चाहिए। हिंदी की परंपरा में जहाँ निराला ने छात्र को झिड़ककर भी शिक्षित किया, अज्ञेय ने अनुशासन से भी संवाद रचा, और नामवर ने बहस से भी प्रेम किया वहाँ विनोदजी का मौन किसी वानप्रस्थीय मुद्रा-सा लगने लगता है।यह वही हिंदी है जो अपनी परंपरा में ‘गुरु-शिष्य संवाद’ के सहारे जीवित रही। यहाँ तक कि उदासीनता भी अपनी जगह पर संवाद का रूप बन जाती थी। पर विनोदजी के यहाँ संवाद नहीं, एक चुना हुआ सन्नाटा है।

हाँ, मुझे विनोद कुमार शुक्ल से प्यार है

हाँ, मुझे विनोद कुमार शुक्ल से फिर भी प्यार है… खासकर उनके लेखन से … और शायद इसलिए मैं उनसे शिकायत कर सकती हूँ। शिकायत यानी वह विरल अधिकार जो किसी को केवल उस पर मिलता है जिसे वह पूरी तरह समझ नहीं पाया। प्रेम का यह असंभव स्वरूप मेरे भीतर उस नींद की तरह उतरता है, जिसमें नींद नहीं आती। वे जो कुछ भी लिखते हैं, वह किसी दृश्यमान अनुभव का नहीं, किसी ऐसी धुंध का प्रमाण है जिसमें मैं खोती नहीं, बल्कि अपने खोने को देखती हूँ। मैं उनके शब्दों से डरती हूँ, क्योंकि वे मेरी धारणा को मेरी ही मृत्यु से भर देते हैं।

कभी-कभी लगता है, उन्होंने मेरे जीने की पूरी जगह पहले ही लिख डाली थी। जो अनुभूति अब मेरे भीतर फूटती है, वह उनके किसी पहले लिखे हुए वाक्य की उपज है। एक अनकहा व्याकरण उनमें छिपा रहता है, जो मुझे लगातार तोड़ता है। जैसे कोई हवा किसी शून्य में चीख रही हो और मैं उसी चीख का अर्थ बनने लग जाती हूँ। पर शिकायत भी उसी हवा जैसी। न दिखती है, न समाप्त होती है।

मेरे भीतर उनकी परछाईं गहराती जाती है; हर बार जब मैं उन्हें पढ़ती हूँ, मैं एक पागल, और अधिक अस्थिर हो जाती हूँ। शोक और विवेक के बीच का फासला धुँधला पड़ जाता है।

लोग कहते हैं संयम रखो, किसी के बारे में इतनी अंधी भक्ति उचित नहीं। लेकिन वे नहीं देखते कि यह भक्ति नहीं, एक ध्वंस की प्रक्रिया है, जहाँ भावनाएँ अपने धर्म से विमुख होकर भाषा में शोक का शरीर बनाती हैं। मैं किसी अनुशासन में नहीं, एक लय में जी रही हूँ। वह लय जिसमें रोना और लिखना एक ही क्रिया बन जाते हैं। मुझे रोकने की कोशिश न करें। मुझसे यह मत कहें कि यह प्रेम नहीं, मोह है। किसी ने कभी यह तय नहीं किया कि प्रेम ठीक राय से किसे कहा जाए और कब वह अपनी मर्यादा खो देता है।

आज भी मैं सोचती हूँ कितने होंगे जो उनकी पंक्तियों को पढ़कर अपने निजी विघटन के सामने खड़े हुए होंगे? कितनी स्त्रियाँ अपने भीतर उस शब्दहीन विधवा अवस्था से गुज़र रही होंगी, जहाँ कोई मरता नहीं, पर सब कुछ खामोश हो जाता है। वे जो रो रही हैं, उन्हें रोने दो। उनके भीतर जो टूट रहा है, वही सबसे जीवित हिस्सा है। उन्हें मत सँभालो, कोई सांत्वना मत दो, क्योंकि सांत्वना हर गहराई को सतही बना देती है।

विनोद कुमार शुक्ल मेरे लिए केवल कवि नहीं, वह एक जलती हुई भाषा हैं, जो मुझे भीतर से उजाड़ती भी है और उसी उजाड़ में कोई असाधारण कोमलता छोड़ जाती है। उनकी शांति असहनीय है इतनी धीमी कि मैं उसे छूना चाहती हूँ और इतनी तीक्ष्ण कि छूते ही लहूलुहान हो जाऊँ। मैं अब नहीं जानती कि यह प्रेम है या किसी पूर्व जन्म का लंबा शोक, जो शब्दों में लौट आया है। मैं बस यह जानती हूँ कि जितना मैं उनसे प्रेम करती हूँ, उतना ही उनके विरुद्ध बोलना चाहती हूँ क्योंकि केवल वही जिसे हम सबसे अधिक चाहते हैं, हमें धीरे-धीरे पागल बना सकता है।

ज्योति शर्मा
ज्योति शर्मा
निवास-हरिद्वार शिक्षा- परास्नातक हिन्दी साहित्य सम्मान -ब्रज संस्कृति शोध संस्थान से सम्मान पुस्तक- पहला काव्यसंग्रह -बोधि प्रकाशन से 'नेपथ्य की नायिका।' दूसरा हिन्दयुग्म से 'बहुत दिन चुप रहने के बाद' दो साझा काव्या संग्रह। पत्रिकाओं में कविताएं एवं कहानियां प्रकाशित, आकाशवाणी में काव्य पाठ। मंचो से काव्य पाठ।
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