Friday, March 20, 2026
Homeकला-संस्कृतिविनोद कुमार शुक्ल... अनगिन से निकल कर एक तारा था

विनोद कुमार शुक्ल… अनगिन से निकल कर एक तारा था

हिंदी साहित्य के शोरगुल और सत्ता-संरचनाओं से दूर, विनोद कुमार शुक्ल एक ऐसे रचनाकार थे जिनकी चमक किसी संस्थागत रोशनी की मोहताज नहीं रही। साधारण जीवन, असाधारण भाषा और विनम्र किन्तु गहरे प्रतिरोध से भरी उनकी रचनाएँ बताती हैं कि कविता, कहानी और उपन्यास, तीनों में उनकी एक ही संवेदनशील आत्मा निरंतर काम कर रही थी। यह लेख उसी विरल लेखक की उस यात्रा को रेखांकित करता है जो अनगिन के बीच से निकला एक तारा था, जिसकी रोशनी देर से पहचानी गई, पर दूर तक गई।

“…कविताएँ लिख रहा हूँ, कहानियाँ लिख रहा हूँ, उपन्यास लिख रहा हूँ – आपने मुझमें इतना विश्वास भर दिया है कि गलत नहीं लिखूँगा, अच्छे-से-अच्छा लिखूँगा।…”

– मुक्तिबोध को लिखे एक पत्र ( 07.03.1964) में विनोद कुमार शुक्ल

1

विनोद कुमार शुक्ल किसी पत्रिका के प्रतापी सम्पादक नहीं थे। जमा देने वाले या उखाड़ डालने वाले आलोचक भी नहीं। पुरस्कार देने दिलाने वालों में भी उनका नाम नहीं आता। उन्हें साहित्य अकादमी भी देर से ही मिला, यानी उस समय जब अस्सी के दशक वालों का क्रम शुरु हो गया था। वजीफ़े या विदेश यात्रा के गणित भी उनके ज़रिए साधे नहीं जा सकते थे। आज किसी वेबपोर्टल का कोई अपस्टार्ट अकड़फूं सम्पादक जितनी फ़तवेबाज़ दादागिरी अफोर्ड कर सकता है, वे उस  आक्रामक अहम्मन्यता से परे अपने संसार को अपनी ईजाद की हुई भाषा में बरतते रहे।

विनोद कुमार शुक्ल कवि थे। कहानियाँ लिखते थे। उपन्यास लिखते थे। बच्चों के लिए लिखते थे। बस।

वे हिन्दी के पॉवर स्ट्रक्चर में कहीं फिट नहीं थे।

एक कस्बाई नगर में रिहाइश। एक सामान्य मध्यवित्त जीवन। जैसा इस आर्थिक स्थिति वाला कोई व्यक्ति बनवा पाता है, वैसा मकान। कोई दबदबा नहीं। कोई बड़ा पद नहीं। वह सब, कुछ भी नहीं जो हिन्दी के प्रभु वर्ग में पाया जाता है।

विनोद जी को मुक्तिबोध ने पहचाना और रेखांकित किया था। ज्ञानरंजन और नरेश सक्सेना उनके साथी रहे। किन्तु यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी में प्रतिष्ठापित करने का, उनकी मौलिकता और महत्त्व को सबसे पहले रेखांकित करने का सर्वाधिक श्रेय अशोक वाजपेयी को है। उनकी किताबों के प्रकाशन और नामकरण ( वह आदमी चला गया गरम कोट पहन कर विचार की तरह ) तक में अशोक जी की भूमिका है। यहाँ यह ध्यान रखने योग्य है कि विनोद जी की कविताएं प्रायः शीर्षकहीन रही हैं। कई बार वे पहली पंक्ति को ही शीर्षक बना देते हैं।

साहित्यिक सम्बन्धों में हनीमून और तलाक (और कभी कभी फिर से हनीमून ) कब, किस तरह हो जाएंगे; कुछ कहा नहीं जा सकता। साथ साथ शुरुआत करने वालों में तो यह और ज़्यादा होता है। क्या ताज्जुब कि विनोद जी के साथ भी ऐसा ही हुआ हो। जब एक प्रतिद्वंद्वी जगह उन्हें अधिक महत्त्व मिलने लगा तो किसी और जगह उन्हें निशाने पर आना ही था। उस निशाने पर वे आज भी हैं। मरणोपरांत भी। उन्होंने एक बार मुझसे कहा था कि ‘पूर्वग्रह’ में उनकी कविता छपने के बाद उनके घर गालियों भरी चिट्ठियां आ जाती थीं। इस सबका तुर्श जवाब देने की बजाय उन्होंने अपनी ऊर्जा लगातार लिखने में लगाई और वह लिखना ही उनका माकूल और सटीक उत्तर हुआ।

बहरहाल, जब विनोद जी चर्चा के केंद्र में आए, तो उस परिधि में पहले से मौजूद कुछ नाम किंचित मन्द हुए। इस धूम के बरअक्स अपनी वर्द्धमान निष्प्रभता से जूझते रहने में उनके अनेक समकालीन साहित्यिक जीवन ख़र्च हुए। यह सब रागद्वेष हिन्दी की आंतरिक राजनीतिक हलचलों का हिस्सा है जिससे पाठकों को कोई लेना देना नहीं होता।

जिस समय विनोद जी हिन्दी के परिदृश्य में प्रवेश कर रहे थे, उस समय अकविता अपने कुछ चौंकाऊ और लाउड मुहावरे के साथ ध्यान खींचने के प्रयास में थी। विनोद जी इस चपेट में नहीं आए। उन्होंने प्रचलित रेटोरिक से अलग निरलंकृत, सामान्य शब्दों में रचे वाक्यों में अपनी कल्पनाप्रवणता के निवेश से एक अलग ही रास्ता चुना जिसने उनका निजी हस्ताक्षर अर्जित किया। सत्तर के शुरुआती सालों में पहचान सीरीज़ के तहत अशोक वाजपेयी के सम्पादन में उनकी इक्कीस कविताओं की एक पुस्तिका ‘लगभग जयहिंद’ का प्रकाशन हुआ था जिसकी जीर्ण हो चली एक प्रति अब भी मेरे पास है। इन कविताओं ने दृश्य में जिस तरह की हलचल मचाई वह दिलचस्प है। विनोद जी ने अपनी सराहना और आलोचना दोनों को शुरु से उकसाया जिसका सिलसिला अब तक चल रहा है। इसी तरह ‘पूर्वग्रह’ ने उनकी कहानियों का एक संग्रह ‘पेड़ पर कमरा’ भी 1985 में प्रकाशित किया था। तब भी, मुझे लगता है, विनोद कुमार शुक्ल इतने और ऐसे विनोद कुमार शुक्ल न हुए होते यदि उन्होंने उपन्यास न लिखे होते जिनकी वजह से उन्हें नये पाठक मिले और मिलते रहेंगे।

विनोद कुमार शुक्ल ने अपने मध्यवर्गीय संसार को, उसकी तमाम मन्डेन तफ़सीलों और सीमाओं और सुख दुख को व्यक्त करने के लिए एक सर्वथा निजी भाषा खोजी या कहें, बनाई थी जिसे बारहा लांछित करने की कोशिशें हुईं लेकिन अंततः उसका जादू कायम रहा। प्रतिरोध के बहुत प्रदर्शनवादी और शहीदाना या आक्रामक मुहावरों से अलग उन्होंने उसे सुतीक्ष्ण किन्तु संयत संकेतों में रखा और मनुष्य की आत्यंतिक सकारात्मकता में अपना भरोसा बनाए रखा। उन्होंने बताया था कि एक बार उन्होंने एक ग़रीब स्त्री को देखा जिसे किसी ने बिल्कुल काले पड़ चुके केले दे दिए थे। विनोद जी ने कहा कि वह स्त्री उन्हें पा कर इतनी ख़ुश थी कि मुझे लगा इस सुख को भी लिखा जाना चाहिए। गौर से देखें तो घटाटोप के साथ ही उसमें अलक्षित क्षीणतम आलोक को देख पाने की उनकी यही अलामत बहुत सी हाहाकारी क्रांतिकारिता और प्रदर्शनप्रिय परदुःखकातरता पर भारी रही है। एफआईआर नुमा सामाजिक यथार्थवादी आख्यानों के अभ्यस्त आलोचना के सिद्ध साधकों को उनमें अनेक अभाव दिखने ही थे, लेकिन सच यह है कि विनोद जी ने अपने निजी मुहावरे में जिन अदेखी, अबूझी सच्चाइयों को सामने रखा है, वैसा उनसे पहले किसी अन्य लेखक से उस तरह सम्भव नहीं हुआ। ‘नौकर की कमीज़’ में ऐसे बेशुमार वाक्य  दर वाक्य हैं जो अपनी धार में, अपने खरेपन में  सीधे भीतर उतर जाते हैं :

• एकदम से गर्दन काटने कोई नहीं आता। पीढ़ियों से गर्दन धीरे धीरे कटती है। इसलिए ख़ास तकलीफ़ नहीं होती और ग़रीबी पैदाइशी रहती है। गर्दन को हिलगाए हुए सब लोग अपना काम ज़ारी रखते हैं – यानी गर्दन कटवाने का काम।

• हमारा महीना चिन्दी चिन्दी करके तीस दिन होता है।

• किसी दुःख के परिणाम से कोई ज़हर नहीं खा सकता। यह तो षड्यंत्र होता है। आदमी को बुरी तरह हराने  के बाद ज़हर का विकल्प सुझाया जाता है।

• खा लेने के बाद भी डर के कारण उसे फलों के स्वाद के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और न ही उसका पेट भरता था।

• शादी के लिए जवानी उम्र से नहीं, नौकरी से मिलती है।

• अच्छा व्यवहार और सहायता के लिए तत्पर होना, यानी, आदमी को उस रेंज पर लाना है जहाँ से उस पर अचूक निशाना लगाया जा सके।

जो आलोचक उनमें एक ‘सुसंगत कथासूत्र’ खोजते रह गए, वे जाने या अनजाने उस सुसंगत आख्याता स्वर को दरगुज़र कर गए जिसने पारम्परिक कथा संरचना, भाषा और उसकी स्वयंतुष्ट शैली को अपनी शान्त, विनम्र और नवाचारी कहन से एक  गैरइरादतन धक्का-सा दिया था।

‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ में जो प्रतिसंसार खिड़की से बाहर खुलता है वह उनके आलोचकों को और कष्ट में डालता है। इस उपन्यास की अपूर्व काव्यात्मकता, रोज़मर्रा की  तमाम औसत तफ़सीलों के बीच सादे से लगने वाले वाक्य का अचानक अर्थदीप्त हो उठना हमें ठिठकने पर मजबूर कर देता है। हम कुछ चौंक कर उसके पास जाते हैं और उसके भीतर कविता की कस्तूरी मिलती है। यह भाषा का तिलिस्म नहीं, उसकी रीचार्जिंग है। यहाँ विनोद कुमार शुक्ल दृश्य में उस छूटे हुए को लिखने की भाषा का आविष्कार करते हैं जिसके हमसे अब तक छूटे रहने का पता उन्हें पढ़ कर ही चलता है। एकदम सतह पर ही ‘समय और समाज की हलचल’ बरामद कर लेने वाली बेकली  के लिए उनसे यह झुंझलाहट स्वाभाविक ही है। आखिर उनसे पहले कब हमने हाथी के निकल जाने के बाद हाथी की छूटी हुई जगह देखी थी ?

• बस इस तरह रवाना हुई जैसे सोनसी को छीन कर ले गई।

• याद किया हुआ जो दुनिया में है, उससे अधिक भूला हुआ दुनिया में था।

• चाय पी कर रघुवर ने बूढ़ी अम्मा को सोनसी कब आएगी की तरह देखा। दो एक दिन में आ जाएगी की तरह जवाब में बूढ़ी अम्मा ने रघुवर की तरफ़ देखा।

और जिनका जायका बहुत प्रत्यक्ष किस्म के यौन प्रसंगों को पढ़ते हुए मस्तरामनुमा बन गया है , उनके लिए रघुवर-सोनसी का यह ऐन्द्रिक प्रसंग अलक्षित किए जाने के योग्य ही है :

• रघुवर कुछ बोलते थे पर सोनसी उनको कल्पवृक्ष की तरह सुन रही थी। … वह बार-बार फूल के खिलने और फल के पकने को सुन रही थी। सुनने का मेला लगा था। अपने शरीर के अन्दर उसने वृक्ष की जड़ को सुना। आखिर में उसने वृक्ष के बीज को सुना।

‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ पर विष्णु खरे ने बहुत रम कर लिखा है। विनोद जी ने बताया था कि जब विष्णु जी ने यह उपन्यास पढ़ा तो उन्होंने फ़ोन पर विनोद जी से देर तक तारीफ़ की। वह ज़माना सस्ते कॉल्स का नहीं था। विनोद जी को तारीफ़ तो अच्छी लग रही थी लेकिन यह विचार भी परेशान कर रहा था कि विष्णु जी को यह बातचीत कितनी खर्चीली पड़ेगी।

2

वैसे तो विनोद जी की कृति ‘नौकर की कमीज़’ पर मणि कौल ने फ़िल्म बनाई, पत्रिकाओं ने उन पर केंद्रित विशेषांक निकाले, संस्थाओं ने रायपुर जा कर उन पर विशेष कार्यक्रम संयोजित किए, लेकिन नयी पीढ़ी उनसे  उनके सोशल मीडिया पर चर्चित होने के कारण जुड़ी। सोशल मीडिया के ज़माने में विनोद जी की कई कविताएं , ख़ास तौर पर, ‘हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था’ आदि के पोस्टर बने, उनके पाठ किए गए। युवाओं में लोकप्रिय मानव कौल जैसे अभिनेता-लेखक उनके प्रशंसक रहे और उन पर डॉक्यूमेंट्री बनाई। इसी समय रॉयल्टी विवाद वाला वीडियो आया जिसने लेखकों-पाठकों के बीच उन्हें लेकर बहस की  वजह दी। फिर, हिन्द युग्म की तीस लाख की अभूतपूर्व रॉयल्टी ने हिन्दी में नयी खलबली और बेचैनी पैदा की। इससे पहले, विनोद जी को पेन नाबोकोव जैसा इंटरनेशनल अवार्ड मिला जिसने उन्हें विश्वसाहित्य के मानचित्र पर स्थापित कर दिया। ज्ञानपीठ भी उन्हें मिलना ही था। बस, नोबेल ही रह गया। इन अवार्ड्स ने उनके प्रति नयी पीढी में उत्सुकता जगाई और उनकी किताबें बहुत पढ़ी गईं। इसमें उनकी किताबों के नये आकल्पन के साथ फिर से छपने और नये सिरे से बाज़ार में उपलब्ध होने का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। उनके जाने के बाद सोशल मीडिया पर पोस्ट्स की जो बाढ़ आई है, वह किसी ऐसे लेखक के लिए अकल्पनीय है जो प्रचलित अर्थ में ‘लोकप्रिय’ नहीं है बल्कि पाठकों से उनकी अर्हता-विस्तार की कठिन मांग करता है। लेखक ही नहीं, सामान्य पाठकों ने भी उनके प्रति अपने स्नेह और सम्मान को व्यक्त किया है। इस दौरान रायपुर जाने वाले लेखक-पाठक उनसे मिलने भी जाते रहे और उन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर लगाते भी रहे। कहा जा सकता है कि महत्त्वपूर्ण सम्मानों और कतिपय घटनाओं ने विनोद कुमार शुक्ल को सोशल मीडिया पर चर्चा और उत्सुकता का केन्द्र बनाये रखा जो किसी भी गम्भीर साहित्यकार के लिए एक दुर्लभ प्रसंग है। पॉवर स्ट्रक्चर का हिस्सा न होते हुए भी इस तरह विनोद कुमार शुक्ल प्रासंगिक रहे। जीवन के अंतिम पर्व में उन्हें मिलने वाले यश और धन दोनों में बहुत बढ़त हुई। यदि कहा जाए कि इस तरह के वे अकेले हिन्दी साहित्यकार हैं तो ग़लत नहीं होगा। अपने दाय और प्राप्य, दोनों दृष्टियों से विनोद कुमार शुक्ल अपवाद हैं, नियम नहीं और वे यही हो भी सकते हैं।

3

एक बड़ा लेखक खुद को बहुत तरीकों से पढ़ने का अवकाश रचता है। वह अपनी उत्तरजीविता के लिए सिर्फ़ अपने प्रशंसक पाठकों पर ही निर्भर नहीं करता, अपने आलोचकों को भी काम पर लगाए रखता है। वे जल्द ही शेष हो जाते हैं जो देवमूर्ति की तरह स्थापित कर दिए जाते हैं। वही रह जाते हैं जिन्हें प्रश्नांकित किया जा सकता है, जिनसे बहस हो सकती है, जिन्हें नयी तरह से पढ़ा जा सकता है। यह भी कि अंततः कटघरे और ब्रान्डिंग को व्यर्थ और हताश करते हुए स्वार्जित मौलिकता अपने सामर्थ्य से किस तरह सम्मान और स्नेह अर्जित करती है।

वे अपने निम्नमध्यवर्गीय परिवेश में, अपने छत्तीसगढ़ में, अपनी ज़मीन में धँसे हुए रचनाकार हैं। वे एक पैदल वाक्य को पंख दे सकते हैं।  वे गृहस्थी के दैनिक भाव और अभाव को अपने भाषिक स्पर्श से वहाँ ले जा सकते हैं जहां से उनका मर्म एक नये आलोक में प्रगट होता है।

विनोद कुमार शुक्ल की कृतियों में अंतर्भुक्त आमन्त्रण भाव उनका होना  हमारे लिए हमेशा बचाये रखेगा।

एक चिड़िया भी
सामने से
उड़कर जाती है
अकेला छूट जाता हूँ।
चूंकि मैं आत्महत्या नहीं कर रहा हूँ
मैं
दुनिया को नहीं छोड़ रहा हूँ।

————————–समाप्त——————-

आशुतोष दुबे
आशुतोष दुबे
आशुतोष दुबे का जन्म इन्दौर, मध्य प्रदेश में हुआ। उन्होंने पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातक की उपाधि ली है और अंग्रेजी साहित्य में पी-एच.डी. किया है। वे अंग्रेजी के अध्यापक हैं। उनके कविता-संग्रह हैं- 'चोर दरवाज़े से', 'असंभव सारांश', 'यक़ीन की आयतें', 'विदा लेना बाक़ी रहे', 'सिर्फ वसंत नहीं' और 'संयोगवश'। उनकी कविताओं के अनुवाद भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी और जर्मन में भी हुए हैं। अनुवाद और आलोचना में भी उनकी गहरी रुचि है। आशुतोष दुबे को अबतक 'रज़ा पुरस्कार', 'केदार सम्मान', 'सावित्री-मदन डागा सम्मान' 'अखिल भारतीय माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार', 'वागीश्वरी पुरस्कार' और 'स्पंदन कृति सम्मान' से सम्मानित किया गया है।
RELATED ARTICLES

1 COMMENT

  1. विनोद कुमार शुक्ल जी के बारे में इतना कुछ लिखा जिनमें कई ऐसी बातें हैं जो लेखक के अद्भुत व्यक्तित्व की जानकारी देती हैंl हार्दिक बधाई एवं साधुवाद!

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments