नई दिल्ली: संसद में आज सोमवार को लोकसभा में वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य पर एक विशेष चर्चा होगी। ‘वंदे मातरम’ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे चर्चित प्रतीकों में से एक है। सामने आई जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस चर्चा की शुरुआत करेंगे और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इस चर्चा के समापन में अपनी बात रखेंगे। इस चर्चा के लिए भाजपा को लोकसभा में तीन घंटे का समय दिया गया है। कुल चर्चा लगभग दस घंटे की होगी। वहीं, अगले दिन मंगलवार को राज्यसभा में इस पर चर्चा होगी, जिसकी शुरुआत केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह करेंगे।
ये भी गौर करने वाली बात है कि ‘वंदे मातरम’ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे जोशिले गीतों में से एक है, लेकिन साथ ही इसे लेकर कुछ लोगों द्वारा विवाद भी पैदा किया जाता रहा है। भारत की मौजूदा राजनीति में इस पर वाद-विवाद और बढ़ा ही है। एक बंगाली उपन्यास में एक देशभक्तिपूर्ण भजन के रूप में शुरू हुआ यह गीत एक बार फिर उग्र राजनीतिक वाद विवाद, परस्पर विरोधी ऐतिहासिक नैरेटिव और राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़े सवालों का केंद्र बिंदु बना हुआ है।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के लेखन से गीत के जन्म से लेकर राष्ट्रवाद में इसकी भूमिका, 1937 में कांग्रेस द्वारा इसके केवल पहले दो छंदों का आधिकारिक रूप से उपयोग करने के निर्णय तक, और संविधान सभा में इसे राष्ट्रगान के समान ‘सम्मान और दर्जा’ प्राप्त होने की मान्यता तक के इसके सफर में कई पड़ाव रहे हैं।
‘वंदे मातरम’ अभी चर्चा में क्यों है?
दरअसल, पिछले महीने राष्ट्रीय गीत के 150 वर्ष पूरे होने के मौके पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान राजनीतिक पारा तब चढ़ गया जब प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस पर 1937 के फैजाबाद अधिवेशन के दौरान मूल गीत से ”महत्वपूर्ण छंदों को हटाने” का आरोप लगाया और दावा किया कि इस फैसले ने “विभाजन के बीज बोए”।
प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार कांग्रेस का यह कदम राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को टुकड़ों में तोड़ने के समान था। पीएम मोदी ने इसे एक ऐसा कृत्य बताया जिसने एकता को कमजोर किया। पीएम मोदी कहा था, दुर्भाग्य से 1937 में मूल वंदे मातरम गीत से महत्वपूर्ण छंद हटा दिए गए। वंदे मातरम को टूकड़ों में तोड़ा गया। इससे विभाजन के बीच भी बो दिए गए। ऐसा अन्याय क्यों किया गया।’
कांग्रेस ने पीएम मोदी के इस बयान पर तुरंत पलटवार किया। ‘द कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी’ (खंड 66, पृष्ठ 46) का हवाला देते हुए पार्टी ने तर्क दिया कि 1937 का निर्णय विभाजनकारी नहीं था, बल्कि एक कार्यसमिति द्वारा अनुशंसित एक संवेदनशील समायोजन था जिसमें महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद, अबुल कलाम आज़ाद, सरोजिनी नायडू और अन्य प्रतिष्ठित नेता शामिल थे। कांग्रेस कार्य समिति (CWC) ने तब उल्लेख किया कि पहले दो छंद पहले से ही व्यापक रूप से गाए जाने वाले और राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हिस्सा थे, जबकि शेष में कुछ धार्मिक प्रतिबिंब थे जिन पर कुछ नागरिकों ने आपत्ति जताई थी।
कांग्रेस ने इस बात पर भी जोर दिया कि यह निर्णय रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर आधारित था, जिन्होंने स्वयं 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में ‘वंदे मातरम’ गाया था। अपने खंडन में पार्टी ने प्रधानमंत्री मोदी पर बेरोजगारी, असमानता और विदेश नीति की चुनौतियों जैसे वर्तमान मुद्दों से बचते हुए भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत पर हमला करने का आरोप लगाया।
‘वंदे मातरम’ गीत की रचना और लोकप्रियता
अंग्रेजी दैनिक ‘बंदे मातरम’ में 16 अप्रैल 1907 को छपे श्री अरबिंदो के लेख के अनुसार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 के आसपास इस गीत की रचना की थी। मार्च-अप्रैल 1881 में जब बंकिम के उपन्यास ‘आनंदमठ’ का बंगाली पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में धारावाहिक के तौर पर प्रकाशन शुरू हुआ, तब यह और व्यापक रूप से प्रकाशित हुआ।
उपन्यास में आनंदमठ तपस्वी योद्धाओं, सनातनों के एक समूह के इर्द-गिर्द रचा गया है जो मातृभूमि को उत्पीड़न से मुक्त कराने के लिए खुद को समर्पित करते हैं। उनकी भक्ति पूरी तरह से भारत माता के प्रति है, जिसकी कल्पना किसी धार्मिक देवी के रूप में नहीं, बल्कि एक साकार मातृभूमि के रूप में की गई है।
हालाँकि बाद के कई आलोचकों ने तर्क दिया कि गीत में विशेष रूप से बाद के छंदों में- हिंदू देवी दुर्गा को प्रतीक के तौर पर लिया गया है जिस पर सभी समुदाय एक साथ नहीं आ सकते।
बहरहाल, 20वीं सदी के प्रारम्भ तक ‘वंदे मातरम’ भारतीय राष्ट्रवाद के सबसे अधिक प्रभावशाली प्रतीकों में से एक बन गया था। साल 1905 में लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल विभाजन के फैसले के बाद यह गीत एक नारा बन गया। कई विरोध प्रदर्शनों के दौरान इसका इस्तेमाल होने लगा। 1906 में, बारीसाल में 10,000 से अधिक हिंदुओं और मुसलमानों ने एक साथ ‘वंदे मातरम’ का नारा लगाते हुए मार्च किया। यह साबित करता है कि शुरुआत के सालों में इसे लेकर कोई बड़ा विवाद नहीं था।
टैगोर से लेकर बिपिन चंद्र पाल और श्री अरबिंदो ने इसे अपने प्रयासों से और लोकप्रिय बनाया। कुल मिलाकर बंगाल से लेकर बॉम्बे प्रेसीडेंसी तक वंदे मातरम का नारा राष्ट्रवाद का पर्याय बन गया। 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने विदेश में स्टटगार्ट में पहला तिरंगा लहराया जिस पर- वंदे मातरम शब्द लिखे हुए थे।

