Saturday, November 29, 2025
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खबरों से आगे: श्राइन बोर्ड मेडिकल कॉलेज में 50 में से 42 मुस्लिम छात्रों को प्रवेश, एक भी हिंदू लड़की का नाम नहीं होने पर बढ़ा विवाद

श्राइन बोर्ड द्वारा स्थापित नए मेडिकल कॉलेज में कुल 50 सीटों में से 42 मुस्लिम छात्रों को प्रवेश मिलने से अचानक मामला गरमा गया है। लगभग हर कोई बोर्ड की निंदा कर रहा है कि वह 100 प्रतिशत हिंदू दान का उपयोग करके बनाए गए मेडिकल कॉलेज में मुसलमानों को एमबीबीएस की सीटें दे रहा है।

श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड (SMVDSB) त्रिकूट पहाड़ियों स्थित कटरा के पवित्र गुफा मंदिर का संरक्षक है। बोर्ड की कमान लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा के पास है, जबकि रोजमर्रा का प्रशासन एक आईएएस अधिकारी देखते हैं, जिन्हें श्राइन बोर्ड का सीईओ बनाया गया है। बोर्ड पिछले पंद्रह दिनों से चर्चा और विवाद में है, क्योंकि उसने हाल ही में एक नया मेडिकल कॉलेज शुरू किया है।

यहां यह बताना जरूरी है कि वैष्णो देवी की यह गुफा दुनिया भर में पूजनीय है और इसे हिंदू धर्म के सबसे समृद्ध मंदिरों में माना जाता है। प्रशासन की दृष्टि से भी यह सबसे बेहतर मंदिरों में गिना जाता है। यहां चढ़ावे के रूप में भक्त सिर्फ नकद ही नहीं, बल्कि सोना, चांदी और कीमती आभूषण भी चढ़ाते हैं। मौसम अनुकूल रहे तो यहां 365 दिन, 24 घंटे, निरंतर यात्रा चलती रहती है।

हिंदू भक्तों से मिली दान राशि का उपयोग यहां यात्रियों की सुविधा के लिए बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में किया गया है। इसी धन से एक विश्वविद्यालय, बड़ा अस्पताल, नर्सिंग कॉलेज और कई अन्य संस्थान स्थापित किए गए हैं। अस्पताल में सभी धर्मों के लोग इलाज के लिए आते हैं। नर्सिंग कॉलेज में हिंदू छात्रों से ज्यादा मुस्लिम छात्र पढ़ रहे हैं।

पिछले कुछ वर्षों में मुस्लिम छात्रों का दाखिला बढ़ा है। उन्हें न सिर्फ नर्सिंग कॉलेज में प्रवेश मिला, बल्कि श्राइन बोर्ड द्वारा संचालित नारायण अस्पताल में नौकरियां भी मिलीं। कुल मिलाकर, हिंदू भक्तों की दान राशि से तैयार संस्थानों का लाभ गैर-हिंदुओं को मिलता दिखा। इस कारण अंदर ही अंदर नाराजगी बढ़ती रही और आवाजें उठने लगीं कि इन संस्थानों में केवल हिंदू लोगों को ही रोजगार मिलना चाहिए।

नए मेडिकल कॉलेज में कुल 50 में से 42 सीटों पर मुस्लिम छात्रों को एडमिशन देने से मामला अचानक गरमा गया। लोग इस बात की कड़ी आलोचना कर रहे हैं कि पूरी तरह हिंदू दान से बना मेडिकल कॉलेज एमबीबीएस की सीटें मुस्लिम छात्रों को दे रहा है। इसे उन अनाम हिंदू भक्तों का अपमान बताया जा रहा है, जो देवी के प्रति श्रद्धा से अपनी कमाई चढ़ाते हैं।

वैष्णो देवी भवन में पूजा विधि में ‘कन्याओं’ की भूमिका सबसे अहम होती है। सुबह हो या शाम, आरती के दौरान दर्शन करने आई लड़कियों में से कुछ को यादृच्छिक रूप से ‘कन्याक पूजन’ के लिए चुना जाता है। लेकिन नए मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस कोर्स के लिए चुने गए छात्रों में एक भी हिंदू लड़की का नाम नहीं है। इसे एक विडंबना के रूप में देखा जा रहा है।

कुछ हिंदू लड़कियों का चयन हुआ था, लेकिन जब उनके अभिभावकों को पता चला कि 85 प्रतिशत छात्र मुस्लिम हैं, तो उन्होंने अपने बच्चों का नामांकन वापस ले लिया। जम्मू क्षेत्र में 43 में से 29 विधायक जीतने वाली बीजेपी भी इस मुद्दे पर शांत दिख रही है। कुछ औपचारिक बयान जरूर आए हैं, लेकिन अब बदलाव संभव नहीं माना जा रहा। पार्टी के बयान सिर्फ जनता की नाराजगी शांत करने के लिए बताए जा रहे हैं।

असल समस्या क्या है?

असल समस्या यह है कि जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश (यूटी) में 23 प्रतिशत हिंदुओं को ‘बहुसंख्यक’ माना जाता है, जबकि 70 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी को ‘अल्पसंख्यक’ का दर्जा मिलता है। यह परिभाषा 1992 में तय हुई थी और मोदी सरकार के पिछले 11 सालों में इसे बदला नहीं गया। देश के कम से कम आठ राज्यों में हिंदू संख्या के आधार पर अल्पसंख्यक हैं, लेकिन इस कानून की वजह से उन्हें ‘माइनॉरिटी’ का दर्जा नहीं मिलता।

मेडिकल कॉलेज में मुस्लिम छात्रों की भारी संख्या के रूप में यह विवाद सामने आया है, लेकिन इसकी जड़ें केंद्रीय सरकार की नीतियों में मानी जा रही हैं। यह मुद्दा केवल एलजी मनोज सिन्हा के स्तर का नहीं है। मेडिकल कॉलेज शुरू करने के फैसले के बाद वे मुश्किल स्थिति में फंस गए हैं और इससे उपजे विवाद का समाधान उनके हाथ में नहीं है।

अतीत में कई बार ऐसा देखा गया है कि जब कोई मुद्दा हिंदू समुदाय से जुड़ा माना जाता है तो कुछ समय बाद वह खुद ही शांत हो जाता है। इस विवाद का भी यही हश्र हो सकता है। संभव है कि अगले साल ऐसे ही हालात हों और यह बात कोई मुद्दा ही न बने, भले ही मेडिकल कॉलेज में 50 में से 50 मुस्लिम छात्र दाखिला पाएं।

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