देहरादूनः उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गुरुवार (19 मार्च) को मोहम्मद दीपक की सुरक्षा की मांग करने वाली याचिका पर टिप्पणी की है। अदालत ने इसे “जांच को प्रभावित करने” और “जांच एजेंसी पर दबाव डालने” का प्रयास बताया है। इस दौरान अदालत ने यह भी पूछा कि “क्या आप पर किसी ने हाथ उठाए हैं?”
अदालत ने इस मामले में सुनवाई के दौरान कहा कि उनकी सुरक्षा को लेकर आशंकाएं निराधार हैं।
कोटद्वार निवासी द्वारा शिकायत पर मामला दर्ज होने के बाद दीपक और उसके दोस्त विजय रावत द्वारा याचिका दायर की गई थी।
क्या है पूरा मामला?
इसी साल 26 जनवरी को दीपक ने उन लोगों के एक समूह का विरोध किया जो एक 70 वर्षीय मुस्लिम दुकानदार को उसकी दुकान के नाम से “बाबा” शब्द हटाने के लिए परेशान कर रहे थे। इस दौरान जब उनसे उनका नाम पूछा गया तो उन्होंने भीड़ को बताया कि उनका नाम मोहम्मद दीपक है। 31 जनवरी को बजरंग दल के कई सदस्य दीपक का सामना करने के लिए इकट्ठा हुए लेकिन पुलिस ने उन्हें रोक दिया।
इस घटना के बाद दीपक ने उनके जिम के सामने इकट्ठा हुए कुछ लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। दीपक ने आरोप लगाया कि इन लोगों ने अपशब्द कहे और नफरत भरे भाषण दिए। इसके बाद पुलिस ने एक पुलिस अधिकारी की शिकायत के आधार पर अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की।
दीपक ने अपनी याचिका में कहा है कि वीडियो और आरोपियों के विवरण जैसे सबूत होने के बावजूद पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की।
उत्तराखंड हाई कोर्ट ने सुनवाई में क्या कहा?
उनकी याचिका पर गुरुवार को जस्टिस राकेश थपलियाल की एकल पीठ ने सुनवाई की।
अदालत ने कहा कि दीपक के खिलाफ हुई एफआईआर, जिसे वह रद्द कराना चाहते हैं, उसमें वह ‘संदिग्ध आरोपी’ है। अदालत ने कहा कि ” अतिरिक्त राहत की मांग करना उन जांच एजेंसियों पर दबाव बनाने की रणनीति प्रतीत होती है जिन्हें विवादित एफआईआर की जांच का जिम्मा सौंपा गया है। “
अदालत ने इस बात पर गौर किया कि दीपक के पास बीएनएसएस की धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट के पास जाकर उपाय खोजने का विकल्प था। इसके बजाय उसने एक याचिका दायर की जो “अनुचित थी खासकर तब जब याचिका दायर करने वाला व्यक्ति स्वयं एफआईआर में आरोपी है। “
उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस समय इस आधार पर राहत नहीं दी जा सकती। अदालत ने आगे कहा कि “राज्य ने सूचित किया है कि जहां तक उसकी शिकायत का संबंध है, एक एफआईआर दर्ज की गई है। उसकी शिकायत पर दो एफआईआर दर्ज की गई हैं… एफआईआर की प्रतियां रिकॉर्ड में रखी गई हैं। यह याचिका 20 फरवरी को दायर की गई थी। जबकि दोनों एफआईआर बहुत पहले, 8 और 11 फरवरी को दर्ज की गई थीं।”
इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि पुलिस द्वारा उन्हें ऐसी कोई जानकारी नहीं दी गई थी। अदालत ने कहा कि वह एफआईआर जिसे वह रद्द करने की मांग कर रहे हैं। वह दूसरी एफआईआर के समान ही उसी पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई गई थी। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को इसकी जानकारी न होना अस्वीकार्य है।
दीपक की सुरक्षा को नहीं है खतराः हाई कोर्ट
अदालत ने पुलिस सुरक्षा की याचिका और राज्य सरकार के वकील के बयान पर विचार करते हुए कहा कि उन्हें जांच अधिकारियों से टेलीफोन पर निर्देश मिले कि दीपक की सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है।
अदालत ने कहा, “ दो पहलू प्रासंगिक हैं – पहला याचिकाकर्ता की स्थिति संदिग्ध आरोपी की है… इस याचिका में, क्या याचिकाकर्ता पर्याप्त पुलिस सुरक्षा की प्रार्थना कर सकता है जबकि वह जांच के दायरे में है… एक संदिग्ध आरोपी जो जांच के दायरे में है, वह पुलिस सुरक्षा की प्रार्थना कैसे कर सकता है? ऐसी राहत पूरी तरह से अनुचित है, और ऐसा प्रतीत होता है कि यह केवल जांच एजेंसी पर दबाव डालने के लिए है। ”
सुनवाई में उच्च न्यायालय ने आगे कहा कि पुलिस उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम है, क्योंकि उन्हें उस एफआईआर की जांच का कार्य सौंपा गया है जिसमें वह आरोपी है।
अदालत ने यह भी कहा कि यह मार्च है। घटना के बाद एक महीने से अधिक का समय बीत चुका है। ” क्या किसी ने आप पर हाथ उठाया है? इन आशंकाओं का कोई सिर-पैर नहीं है। यह एक बीमारी है। पूरी पुलिस की निगाहें आप पर टिकी हैं, चिंता न करें। “
इस मामले में अगली सुनवाई शुक्रवार (20 मार्च) को होनी है।

