Monday, March 23, 2026
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खबरों से आगे: उझ परियोजना को केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय से मंजूरी, पाकिस्तान की ओर बहने वाले पानी को रोका जा सकेगा

उझ बांध परियोजना को फिर से शुरू करने का मुद्दा तब उठा था जब भारत सरकार ने 23 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया था।

केंद्र सरकार ने 22 फरवरी 2019 को घोषणा की थी कि वह रावी नदी और उसकी सहायक नदी उझ पर तीन परियोजनाएं शुरू करेगी ताकि अतिरिक्त पानी पाकिस्तान की ओर बहने से रोका जा सके। यह घोषणा 14 फरवरी के पुलवामा आत्मघाती हमले के बाद की गई थी, जिसमें केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के 40 जवानों की जान चली गई थी। इन तीन परियोजनाओं में से केवल एक- शाहपुर कंडी परियोजना को पूरा करने का काम शुरू किया गया और उम्मीद है कि जल्द इसका उद्घाटन हो जाएगा।

हालांकि, उसी दिन घोषित दो अन्य परियोजनाएं- उझ बहुउद्देश्यीय परियोजना और रावी-ब्यास लिंक (उझ के नीचे) को अब तक शुरू नहीं किया जा सका है। हालांकि अब केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने उझ बहुउद्देश्यीय परियोजना के निर्माण को मंजूरी दे दी है। एक तकनीकी सलाहकार समिति (TAC) ने कठुआ जिले में इस परियोजना के संशोधित प्रस्ताव को मंजूरी दी है। उझ नदी दरअसल रावी की सबसे बड़ी सहायक नदी है, जो 1960 की सिंधु जल संधि (IWT) के तहत भारत को आवंटित पूर्वी नदियों में शामिल है।

उझ नदी दरअसल पंजाब के पठानकोट जिले में माधोपुर हेडवर्क्स के ऊपर बन रहे शाहपुर कंडी बांध से कई किलोमीटर नीचे रावी में मिलती है। इसलिए शाहपुर कंडी बांध बनने के बाद भी काफी पानी अतिरिक्त रूप में पाकिस्तानी इलाको की ओर बह जाता है। जो अंतरराष्ट्रीय सीमा के दक्षिण-पश्चिम में है। यह परियोजना लंबे समय से लंबित रही है और कई बार शुरू होकर रुक चुकी है।

उझ परियोजना को हरी झंडी, मिलेंगे कई फायदे

कई असफल प्रयासों के बाद 22 फरवरी 2019 को केंद्र सरकार ने फिर घोषणा की कि उझ परियोजना शुरू की जाएगी। लेकिन केवल शाहपुर कंडी परियोजना को आगे बढ़ाया गया और बाकी दो परियोजनाएं छोड़ दी गईं। जम्मू-कश्मीर में कई साल काम कर चुके कुछ इंजीनियरों के अनुसार उझ परियोजना बंद होने का एक बड़ा कारण यह था कि कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स (CCEA) को इसकी लागत और लाभ का अनुपात सही नहीं लगा।

बहरहाल, संशोधित उझ परियोजना से कंडी क्षेत्र सहित कठुआ, हीरानगर, घगवाल, सांबा, रामगढ़ और विजयपुर तहसीलों के उन क्षेत्रों में बड़े बदलाव की उम्मीद है जहां सिंचाई नहीं है। इस परियोजना के तहत उझ जलाशय में लगभग 900 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी संग्रहित किया जाएगा, जिससे पूरे क्षेत्र में भूमिगत जलस्तर भी रिचार्ज होगा। जम्मू के सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग के एक सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता के अनुसार इस जलाशय से निकलने वाली नहरें ऊपर और नीचे दोनों क्षेत्रों में भूजल को बढ़ाने में मदद करेंगी।

इस परियोजना से उस क्षेत्र में सिंचाई बढ़ेगी जहां अभी खेती केवल बारिश पर निर्भर है। इससे बिजली उत्पादन बढ़ेगा और जम्मू-कश्मीर तथा पंजाब दोनों के लिए जल प्रबंधन बेहतर हो सकेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस परियोजना से वह पानी पाकिस्तान जाने से रुकेगा जो अभी इस्तेमाल नहीं हो रहा और जिससे पाकिस्तान के नारोवाल और लाहौर जैसे इलाके सूखने से बचते हैं। अगर यह परियोजना अगले लगभग 10 वर्षों में पूरी हो जाती है, तो इन क्षेत्रों को चुभन महसूस हो सकती है।

पाकिस्तान को होगी बेचैनी

अंतरराष्ट्रीय सीमा के दक्षिण-पश्चिम में पाकिस्तान के क्षेत्रों में उझ परियोजना पूरी होने के बाद पानी की गंभीर कमी हो सकती है। वहीं भारत के क्षेत्रों में एक फसल की जगह साल में तीन फसलें उगाए जा सकेंगे क्योंकि सिंचाई सुविधा उपलब्ध हो जाएगी। ऐसा रावी-तवी सिंचाई नहर परियोजना (RTIC) से जुड़े कुछ इंजीनियरों का मानना है।

उझ बांध परियोजना को फिर से शुरू करने का मुद्दा तब उठा जब भारत सरकार ने 23 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया था। तकनीकी सलाहकार समिति (TAC) ने अपनी हालिया बैठक में परियोजना के संशोधित प्रस्ताव पर चर्चा की और नए लागत-लाभ पहलुओं को ध्यान में रखते हुए मंजूरी दे दी। पाकिस्तान की ओर अतिरिक्त पानी जाने से रोकने का उपाय इस परियोजना को मंजूरी मिलने का एक बड़ा कारण रहा।

शुरुआत में उझ को रॉकफिल बांध के रूप में बनाने की योजना थी, जैसे रावी नदी पर रंजीत सागर बांध है। लेकिन बाद में कुछ डिजाइनों में बदलाव कर RCC (कंक्रीट) बांध का प्रस्ताव दिया गया। इससे लागत काफी बढ़ गई। कुछ अनुमानों के अनुसार कम से कम 40% लागत बढ़ी और एक समय यह परियोजना अव्यावहारिक घोषित कर दी गई। हालांकि अब संशोधित प्रस्ताव में फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि बांध रॉकफिल होगा या कंक्रीट (RCC) से तैयार होगा।

परियोजना से जुड़े इंजीनियरों का कहना है कि RCC बांध की जरूरत नहीं है क्योंकि रॉकफिल बांध भूमिगत जल को रिचार्ज करने में बेहतर होते हैं। साथ ही इसकी लागत भी कम होती है। उन्होंने बताया कि रॉकफिल बांध से पानी का रिसाव ज्यादा होता है जिससे जलस्तर बढ़ता है।

जम्मू-कश्मीर के बाद पंजाब को भी फायदा

प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री और कठुआ-उधमपुर से सांसद डॉ. जितेंद्र सिंह ने TAC के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने फेसबुक और अन्य जगहों पर इसे जुड़ी बातें ‘निर्वाचन क्षेत्र अपडेट’ के रूप में साझा किया। उन्होंने कहा कि यह परियोजना पंजाब और जम्मू-कश्मीर दोनों को कई तरह से लाभ पहुंचाएगी। उन्होंने कहा, ‘यह परियोजना जम्मू-कश्मीर और पंजाब के किसानों को सुनिश्चित सिंचाई देगी, फसल उत्पादकता बढ़ाएगी और उच्च मूल्य वाली खेती को बढ़ावा देगी।’
उन्होंने आगे कहा, ‘उपलब्ध जल संसाधनों का बेहतर उपयोग बर्बादी को कम करेगा और अतिरिक्त पानी को पाकिस्तान जाने से रोकेगा, जो देश के अंदर नदी जल के अधिकतम उपयोग की राष्ट्रीय प्राथमिकता के अनुरूप है।’

इस परियोजना को फिर शुरू करने की मांग करते रहे डॉ. सिंह ने कहा, ‘गृह मंत्रालय और जल संसाधन मंत्रालय के बीच विस्तृत चर्चा के बाद उझ परियोजना के निर्माण पर सहमति बनी है।’

TAC ने इस प्रस्ताव को भी मंजूरी दी है कि जम्मू-कश्मीर की जरूरतें पूरी करने के बाद अतिरिक्त पानी को पाकिस्तान जाने देने के बजाय पंजाब की ओर मोड़ा जाएगा। हालांकि, जम्मू-कश्मीर की मौजूदा नहरों सहित सिंचाई ढांचे को आने वाले समय में काफी मरम्मत और मजबूती देने की जरूरत पड़ सकती है। शाहपुर कंडी परियोजना से जम्मू-कश्मीर को लगभग 1100 क्यूसेक पानी मिलने की उम्मीद है। लेकिन मौजूदा नहरें केवल 400 क्यूसेक पानी ही ले जा सकती हैं, इसलिए उनकी क्षमता भी बढ़ानी होगी।

इस परियोजना के तहत संग्रहित 900 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी में से जम्मू-कश्मीर अभी लगभग 500 MCM ही उपयोग कर पाएगा। बाकी 400 MCM पानी पंजाब को दिया जाएगा। हालांकि पंजाब के साथ यह व्यवस्था स्थायी नहीं होगी क्योंकि पहली प्राथमिकता जम्मू-कश्मीर को दी जाएगी, क्योंकि परियोजना इसी केंद्र शासित प्रदेश में स्थित है।

योजना यह भी है कि उझ जलाशय का पानी रंजीत सागर बांध तक पहुंचाया जाए, जो 600 मेगावाट बिजली पैदा करता है। इसमें से 20% यानी 120 मेगावाट जम्मू-कश्मीर को मिलना था, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ और पंजाब पूरे 600 मेगावाट का उपयोग कर रहा है। इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 11,000 करोड़ रुपये है। विडंबना यह है कि 2008 में राष्ट्रीय परियोजना घोषित होने के बावजूद 18 साल बाद भी यह अटकी हुई है।

इस परियोजना में केंद्रीय जल आयोग (CWC) भी शामिल होगा। इसने पहले इसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार की थी। प्रोजेक्ट से पूर्व में जुड़े एक इंजीनियर के अनुसार DPR तैयार करने के लिए लगभग 18 करोड़ रुपये का भुगतान भी हुआ था। जब नई DPR तैयार हो जाएगी और सभी मंजूरियां मिल जाएंगी, तब इसे केंद्रीय कैबिनेट के पास भेजा जाएगा। इसका मतलब है कि अभी इस परियोजना के शुरू होने में समय लगेगा लेकिन इसे तेजी से शुरू करने की जरूरत है।

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