Friday, March 20, 2026
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कहानीः गैंगरीन

कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी त्रासदियाँ किसी बड़ी दुर्घटना से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं से जन्म लेती हैं। वे इतनी साधारण दिखाई देती हैं कि हम उन्हें अनदेखा कर देते हैं, लेकिन धीरे-धीरे वही अनुभव मन की गहराइयों में उतरकर किसी अदृश्य घाव की तरह फैलने लगते हैं। उजला की कहानी ‘गैंगरीन’ ऐसी ही कहानी है। इसमें हिंसा, असंवेदनशीलता और सामाजिक पाखंड की मामूली सी लगने वाली झलकियाँ एक संवेदनशील बालमन में गहरे धँसती जाती हैं। इस कहानी से अपेक्षाएं इसलिए भी ज्यादा हैं कि ख्यात लेखक अज्ञेय की एक प्रसिद्ध कहानी का नाम भी गैंग्रीन ही है। यह कहानी अगर अपने विषयवस्तु में उसके समानांतर नहीं खड़ी होती तो हमें निराश भी नहीं करती। यह इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।

मेरे दादा बताते थे कि उन के दादा को मगरमच्छ ने काट लिया था। ये तब की बात है जब मगरमच्छ बड़े विशालकाय जीव हुआ करते थे और तालाबों में रहा करते थे। गाँव के बड़े तालाब में बारिशो के दिनों में पानी बढ़ता जाता और जब पानी उतरता तो पीछे दलदल छोड़ जाता। बड़े तालाब के आधे से ज़्यादा किनारे जंगल से लगे थे और बाकी के खेतों की सीमा से। जंगल और खेतों का विभाजक बना तालाब पानी बढ़ने पर संयोजक बन जाता। ऐसे में खेत पीछे हटते और जंगल खेतों की ओर सरक आता। ठीक वैसे ही जैसे सूखा पड़ने पर जंगल पीछे सरकते और इंसान उनका पीछा करता भीतर धसकता जाता। लेकिन इंसान को पीछे हटना नहीं आता, तब तक जब तक कि कोई बड़ी ताकत धक्का ना मार दे। बारिश में तालाब का पानी बढ़ने पर तरह तरह के सरिसर्प, उदबिलाव, मेंढक, मछलियां, सैलामेंडर आदि खेतों की ओर सरक आते। ऐसे ही शायद वो मगमच्छ भी आया होगा जिसने दादाजी के दादाजी को काट लिया था। दलदल के किनारे वाले पेड़ पर के घोंसले से एक चिड़िया का बच्चा गिर गया था। उसे उठाने के लिए वो दलदल के नजदीक गए थे। उसे हथेली में उठा, अपनी धोती से उसकी कीच पोंछने में ऐसे मगन हुए कि पता ही न चला कि कब मगरमछच्च आया दबे पाँव और काट खाया। दादाजी के दादाजी किसी तरह गिरफ्त से छूट तो गए मगर उनके पैर में बड़ा घाव हो गया था। धीरे-धीरे घाव गैंगरीन में बदल गया और दादाजी के दादाजी का पैर काटना पड़ा। दादाजी ने कहा था “घाव होना उतना भयानक नहीं था बेटा, लेकिन उसका गैंगरीन में तब्दील हो जाना खतरनाक हुआ। मगरमछच्च के काटे का इलाज है मगर गैंगरीन का नहीं।” उसके बाद दादाजी के दादाजी घर की दीवार पर छिपकली को भी देखते तो डर के मारे मगरमछच्च मगरमछच्च चिल्लाने लगते। डॉ यही कहते कि दिमाग़ में जमे को उखाड़ फेंकना उनके बस की बात नहीं।

जिस वक्त उनका पैर काटा जा रहा होगा, वो घाव करने वाला बड़ा मगरमच्छ जरूर दूर कहीं धूप में पसरा अधमून्दी आँखों से सुस्ता रहा होगा। ये दादाजी ने नहीं बताया था, बस मेरे दिमाग़ में दो पल के लिए आया था। दिमाग़ में तो ये भी आया था कि क्या उसे पता होगा कि उसकी वजह से एक पैर काटा जा रहा है! उस वक्त मैं स्कूल में पढ़ता था तो ऐसे उलजलूल ख्यालों का आना जाना कोई आश्चर्य की बात भी नहीं थी। आश्चर्य की बात तो ये है कि ये बात मुझे इतने बरसों बाद याद आ रही है! वो भी अपने घर की सुरक्षित बॉलकनी में व्हील चेयर पर पड़े हुए! तो इस आश्चर्य को खोलने के लिए मुझे और आपको फिर से गुजरना होगा पिछले दिनों बीती कुछ घटनाओं से। कोई बड़ी घटनाएँ नहीं। एकदम मामूली, घरेलू सी घटनाएँ। ऐसी जिन पर तवज्जो देने वाला मूर्ख करार दिया जाएगा। कोई बात नहीं, सुनने के बाद जो मर्जी वो कह लीजिएगा या मान लीजिएगा। मगर सुन तो लीजिए। बात ये भी है कि अब मुझे खुद में कोई घटना या कहानी नज़र नहीं आती। इसलिए जब शिजू की छाया मेरे मन पर उतरती है तो मैं उसे बाँचने लगता हूँ। और शिजू के जरिए ही शीना को भी। हाँ, शालू और शॉरेश को भी और इन चारों के मम्मी पापा को भी। चलिए, शुरू से ही शुरू करता हूँ।

सवेरे सूरज मेरे घर के ठीक पीछे से निकलता और जरा ऊपर सरकते ही मेरे घर की छाया सामने वाले घर की बॉलकनी पर पड़ने लगती। संध्या से ठीक पहले ये छायाएँ उलट जाती। अगर सवेरे मैं बॉलकनी में बैठा होऊं तो मेरी छाया भी सामने बॉलकनी तक पहुँच जाती, ठीक वैसे जैसे शाम को शिजू की छाया मेरी बॉलकनी में। अपने अस्सी बरस के जीवन में मैंने साठ बरस तक इंसान बदलते देखे और अब छायाएँ बदलते देख रहा हूँ। छायाएँ जब बदलती हैं तो उनमे घुले मन भी घुल जाते हैं, चुपके से बेआवाज, ये मैंने शिजू से जाना।

हर सवेरे मेरी लोथड़ा देह को ढोती व्हील चेयर को जहाँ टिका दिया जाता है वहाँ से मुझे या तो एक टुकड़ा सड़क नज़र आती है या सामने सड़क पार की उजड़ी बॉलकनी। कभी इस उजाड़ में जूही चमेली बोग्नेबिलिया की लताओं का त्रिवेणी संगम हुआ करता था। नीचे से तीन ठूँठ बॉलकनी तक आते, गुत्थमगुत्था हुए इस कदर हिलेमिले हुए थे कि बोग्नेविलिया के गुलाबी फूलों को अपने गंधहीन होने का पता भी न चलता। जैसे जूही चमेली को अपने रंगहीन होने का। इन तीनों लताओं का संगम आधी से ज्यादा बॉलकनी को ढांपे रखता। बाकी बचे हिस्से में दो कुर्सियां और एक छोटी टेबल रखे रहते। उन दिनों बॉलकनी रंग गंध चीं चीं चर्र चर्र से लकदक रहती थी। तब मेरी आँखें अगल-बगल ऊपर नीचे घूम लिया करती थीं। अब इतनी ऊँची नहीं होती कि आकाश और उड़ान देख सकूँ। मुझे याद है वो दिन जब इन लताओं को गंदगी और चिड़ियाँ के घोंसलों से परेशान होकर कटवाया गया था, शिजू फूट-फूट कर रोई थी, और मैं बेआवाज। अब कोई लता रेलिंग तक नहीं आती। हाँ कभी कभार भूला-भटका कोई पंछी जरूर आ जाता है।

अब इस बॉलकनी में टेबल कुछ बड़ी आ गई है और कुर्सियां थोड़ी ज्यादा। दीवारें वही पुरानी पीली, थोड़ा प्लास्टर झरी। मगर उन दीवारों पर चिपकाए गए पोस्टरों ने, पोस्टरों से झाँकती आँखों ने, वहाँ की हवा में तैरते शब्दों और विचारों ने अब उसे खास बुद्धिजीवी या कहें दार्शनिक बॉलकनी का दर्जा दे दिया है। कितनी अजीब बात है न कि पोस्टरों से झाँकते, अपने समय में नकार दिए गए और पागल तक कहलाए, यहाँ तक कि कुछ तो मौत के घाट उतार दिए गए, पागल लोगों के प्रदेश में घुसने का रास्ता बुद्धिजीवी बॉलकनी से गुजरता है। जहाँ तर्क-वितर्क के इतने समझ भरे पेचो-खम और उठान हैं कि वही असल प्रदेश समझ ली जाती है। मैं अक्सर उन पोस्टरों में बँधे उन आजाद चेहरों पर चस्पा आँखों में झाँका करता। मैं भी तो बीस बरस से अपनी बॉलकनी का, नकार दिया गया पोस्टर ही हूँ। क्या पता कभी पागल भी करार कर दिया जाऊँ! पहले जब मास्टर था तब खुद के बारे में सोचा करता था कि मुझे अब आगे जीवन में क्या करना है, क्या नहीं और कैसे। बच्चों को क्या सिखाना है, क्या नहीं और कैसे। मगर मुझे क्या पता था कि सोचने का जिम्मा ही खत्म हो जाएगा! मस्तिष्क अपनी एक्सपायरी डेट पार कर चुका था मगर मन की एक्सपायरी डेट अभी नहीं आई थी। तो अब मेरा मन घुल जाता है शिजू की तरह ही दिशा बदलती छायाओं में।

शिजू उर्फ़ छुटकी उर्फ़ छिपकली उस घर की सबसे छोटी सदस्य है। उम्र तो अभी तेरह की गिनती भी पूरी नहीं कर पाई है मगर अब वो जल्द से जल्द समझदार हो जाना चाहती है। ना, वैसा समझदार बिल्कुल नहीं जैसा उसके मम्मी पापा दीदी वगैरा हैं, बल्कि वैसा जैसा शॉरेश भाई सा और उनके दोस्त हैं। विस्मय इन दिनों उसकी आँखों का रंगीन वॉटर प्रूफ काजल है और प्रश्न वाचक चिन्ह होठों की सबसे ज्यादा बनी रहने वाली आकृति। जब उसके भाई सा बॉलकनी में अपनी मित्र मंडली के साथ जमे मोटे-मोटे सवाल-जवाब उलझा-सुलझा रहे होते और उससे पाँच साल बड़ी शालूदी मम्मी से भाई सा की मित्र मंडली के लिए भजिए तलवा रही होतीं, तब वो दरवाज़े की ओट ख़डी एक हाथ की तर्जनी गोल होते होठों पर धरे, दूसरे हाथ की तर्जनी से हौले-हौले अपने उलझे बालों की लटें खोल रही होती। ऐसे जैसे शिवजी के केशों की सारी उलझन बस अभी खुलेगी और सारी ज्ञान की गंगा सीधे उसी के मुँह में आ समाएगी। मगर न दरवाज़े के उस तरफ लटें सुलझती न इस तरफ गंगा गिरती। हफ्ते में कम ज़ कम चार या पाँच दिन तो भाई सा की मंडली जमती ही है। शॉरेश दर्शनशास्त्र में पी एच डी कर रहे हैं और दर्शन शास्त्र की ट्यूशन भी लेते हैं। खासे विद्वान् माने जाते हैं। मंडली में जबरदस्त दबदबा है उनका। सो अक्सर जब इन ज्ञान चर्चाओं के अंत में भाई सा की मित्र मंडली किसी एक नतीजे पर अपनी अंगूलियाँ टिका देती, तो ये वही नतीजा हुआ करता जिस पर सबसे पहले भाई सा ने उँगुली रखी होती। अब इसमें उनकी नतीजे से सहमती ज्यादा होती या भाईसा से! पता नहीं। मगर मंडली के तितर-बितर होने के काफ़ी देर बाद तक भी, बल्कि नींद में जाने तक भी शिजू कभी किसी एक नतीजे को हासिल कर लेने में नाकामयाब रही। तब भी अगले दिन दरवाज़े के पीछे वो उतनी ही मुस्तैदी से चिपकी होती।

‘यूँ दरवाज़े के पीछे छिप-छिप कर सुनोगी तो अगले जन्म छिपकली बनोगी।’ एक बार राधा ताई ने उसे दरवाज़े के पीछे चिपके देख कर कहा था। उसके बाद तो उन्होंने उसे छिपकली ही कहना शुरू कर दिया। होने को तो राधा ताई नौकरानी ही थी मगर बरसों से यहीं रहते-रहते वो अनजाने ही घर के किसी बुजुर्ग सदस्य की सी भूमिका में आ गई थीं। राधा ताई की देखा-देखी घर के और लोगों ने भी उसे छिपकली कहना शुरू कर दिया। सिवा पापा और भाई सा के। मगर उसे कभी इस बात पर गुस्सा नहीं आया। बल्कि वो तो मुस्कुरा दी थी। भाई सा की बातें सुनने के लिए उसे छिपकली होना भी मंजूर है। और बुरा क्या है छिपकली में! सीधे सादे घरों में रहने वाली सीधी सादी प्राणी।

शिजू से मात्र दो बरस बड़ी है शीना। शीना को पढ़ाई से कहीं ज़्यादा बैडमिंटन खेलने का शौक है। फ़िल्में देखने का भी है। लड़कों की तरह बाल रखना, लड़कों की तरह कपड़े पहनना, चलना, बतियाना, धपियाना, साईकिल दौड़ाना शीना की आदत में शुमार है। शीना को एक बार जिद चढ़ जाए तो आसानी से नहीं उतरती। शिजू जितनी शांत है शीना उतनी ही गुस्सैल। शिजू  गुजरे वक्त को पकड़ने की फिराक में रहती है तो शीना आगे दौड़ते वक्त को। इन सब आसमानताओं के बावजूद भी शिजू और शीना में समानता ये कि दोनों दिल से एकदम भोली हैं। अपने-अपने भोले दिमागों की परतों में शिजू जहाँ ह्युम कांत बरकले सोकरेट्स के नोट्स बनाती है वहीं शीना अगला मैच जीतने के लिए कौनसे शॉट सीखना जरूरी है, के। शीना के बैडमिंटन शौक को देखते हुए पापा ने उसे शहर की सबसे अच्छी मगर मंहगी एकेडमी में दाखिला दिलवा दिया है। मम्मी ज़रा बिगड़ी, तो पापा ने समझाया कि ‘चार की जगह दो तरह की दाल खा लेंगे, दो साड़ी दो शर्ट कम पहन लेंगे, क्या फर्क पड़ जाएगा! बच्ची के मन से बड़ा कुछ है क्या!” मम्मी एक दो दिन उखड़ी सी रहीं फिर सब भूल गईं। शिजू और शीना से एकदम अलग है शालू। जिसकी जन्मस्थली ही रसोईघर है। वो खाब देखती है एक अदद ऐसे पति का जो दिन भर का थका हारा जब काम से लौटे तो वो छप्पन पकवान परोस कर उसकी थकान उतार दे। जब महीने के अंत में पति खून-पसीने की कमाई उसे थमाए तो वो उसके गले में बाहें डाल दे। यानि तीन बहनें, तीन दिशाएं।

रात में जब छायाओं का खेल खत्म हो जाता और मैं अपने बिस्तर पर पड़ा होता और शिजू अपने, तब भी मुझे पता होता कि जब तक उसे नींद न आएगी वो कल्पना की चरखी पर सूत कातती रहेगी और उसे ब्रह्माण्ड में घूमते पिंड़ों की देह पर लपेटती रहेगी। वो सूत कातती रहती और मैं उन पर अपनी मुस्कान के तारे टिकाता रहता, तब तक जब तक कि अनोखेश्वर से मंगला आरती के घंटों की आवाज़ न आने लगती।

सब कुछ इसी तरह चलता रहता तो कितना अच्छा होता! मगर ट्विस्ट एन्ड टर्न्स तो दुनिया की रीत है और कहानी की भी। फिर दुनिया भी तो एक कहानी ही है। लम्बी कहानी। मैं हँसा। लगता है मुझ पर दार्शनिक बॉलकनी की छाया की परतें गहरी हो रहीं हैं। चलिए चलते हैं एक परत में।

शिजू के भाई सा ने अपनी ट्यूशन की कमाई से और कुछ पापा की मदद से पहली कार खरीदी है। सफ़ेद झक्क मारुती सुजुकी ऑल्टो। ये घर की भी पहली कार है। शिजू के पापा तो अपने बजाज चेतक पर ही सारी जिंदगी महाराणा प्रताप बने सवारी करते रहे। चेतक पर चढ़ने से पहले वे उसकी पीठ को दो तीन बार थपथपाते, गर्दन को सहलाते और फिर धीरे से उचक कर उस पर बैठ जाते। तब वे गर्दन को एक हल्का झटका दे, शिजू को पीछे बैठने का इशारा करते। इसी चेतक पर वे हर शनिवार और बुद्धवार की शाम शिजू को गणित की ट्यूशन तक छोड़ने और लाने का काम करते रहे। शीना ने कई बार पापा से कहा भी कि इसे भी साईकिल दिला दो। लेकिन पापा को शिजू को छोड़ने में आनंद आता रहा और शिजू को पीछे बैठने में।

आज बुद्धवार है। कार घर के पोर्च में लाकर ख़डी की गई है। शिजू बेहद खुश। कार आगमन से ज्यादा, भाई सा की ख़ुशी से खुश। मम्मी ने भाई सा के चौड़े माथे के बीचो-बीच रोली से तिलक कर चावल के दाने चिपकाए। फिर कार के माथे पर भी, जहाँ पहले से गणेश मंदिर के सिंदूर से सातिया बना हुआ है। शिजू ने अपना भाल भी आगे कर दिया। मम्मी ने हँसते हुए उसके भी तिलक लगाया। शाम जब पापा, शिजू को ट्यूशन ले जाने के लिए पोर्च से कार के पीछे खड़ा चेतक निकालने लगे, तभी भाई सा सीढ़ियां उतरते बोले- ‘चल छुटकी आज तुझे मैं छोड़ देता हूँ।’ शिजू की तो जैसे लॉटरी लग गई। भाई सा के बगल वाली सीट पर बैठेगी। रास्ते में भाई सा से खूब बतियाएगी। नहीं नहीं… बतियाना थोड़ी कहते हैं इसे! ज्ञान चर्चा करेगी। आज वो भी अपना पक्ष ज़रा बहुत तो बता कर ही रहेगी। तभी पीछे-पीछे मम्मी भी उतरती चली आईं – ‘चल मैं भी चलती हूँ। पहले अनोखेश्वर दर्शन करेंगे फिर इसे छोड़ आएँगे।’ अभी भाई सा ने कार सड़क पर निकाली ही है कि उनके गोष्ठी वाले एक मित्र सामने से आते दिखे। अब भाई सा ड्राइविंग सीट पर, बगल में मित्र और पीछे शिजू और मम्मी। शिजू मुरझा गई।  फिर ये सोच खिल गई कि भाई सा के साथ पहली बार गाड़ी में बैठ रही है। अनोखेश्वर के दर्शन कर अब गाड़ी मुख्य मार्ग पर दौड़ रही है। इस मार्ग पर भीड़ कम ही होती है। शिजू का मन भाई सा के लिए गदगद हुआ जाता है। अचानक चूँ sss की तेज आवाज़ के साथ ब्रेक लगे और गाड़ी का अगला पहिया बिल्कुल डिवाइडर से सट कर रुक गया। सामने गंदली सी धोती कुर्ता और पगड़ी में एक देहाती घबड़ाया हकबका सा खड़ा दिखा। ‘अबे चू….  दिखाई नहीं देता क्या! ‘ भाई सा ने गुर्राते हुए दरवाजा खोला और पिल पड़े उस बुड्ढे देहाती पर। दूसरी ओर से उनके गोष्ठी मित्र भी उतर चुके हैं। भाई सा ने देहाती को कुर्ते से पकड़ घसीटते हुए डिवाइडर पर पटक दिया है। ‘तुम अनपढ़ गंवार आते ही क्यूँ हो शहर! ‘ देहाती दीनहीन भाव से हाथ जोड़ कह रहा है –  ‘आँख बनवाने आया हूँ हुजूर। गाड़ी का नुकसान हुआ हो तो….। ‘ जबान लड़ाता है, तू देगा पैसे भै……   फ़टी जेब लेकर पैसे की तड़ी देता है।’ आस-पास लोग इकट्ठा होते देख मित्र ने किसी तरह लाल-पीले होते भाई सा को खींच कर कार के भीतर धकेला। भाई सा बड़बड़ा रहे हैं ‘……  में दम है नहीं और आ जाते हैं…. स्साले।’ मित्र शांत रहने को कहते उनका कंधा थपथपा रहे हैं। ये सब कुछ यकायक चंद पलों में यूँ घटा कि पिछली सीट पर बैठे शिजू और मम्मी सकते की सी हालत में बैठे रह गए। कार फिर चल पड़ी। मगर शिजू जब कार से उतरी तो छिपकली की एक परत कार में छूट गई। उसके पैर कांप रहे थे। आँखें और कान अपनी जगह पर होकर भी नहीं थे। कॉपी की संख्याँएँ गड्डमड्ड होती रहीं और वो भरभराई आँखों से मन का गणित संभालती रही। उसने एक दो बार स्कूल बस के ड्राइवर को इन्हीं शब्दों के साथ लड़ते देखा है। उसे पता है कि ये अच्छे शब्द नहीं…  गाली है।  वापसी में पापा लेने आए। चेतक पर बैठे उसकी नजरें हैं तो पापा की पीठ पर मगर देख रहीं हैं कुछ दिन पहले का दृश्य-

पापा का चेतक अपनी सधी टापों से दौड़ रहा है। अचानक तेजी से लगे ब्रेक के कारण चेतक लहराया और संभालने की कोशिश करते-करते भी डिवाइडर पर जाकर टेठा टिक गया। शिजू कस कर पापा को पकड़े बैठी थी वर्ना गिर ही जाती। पापा ने शिजू को धीरे से डिवाइडर पर उतरने को कहा और फिर खुद भी उतर गए। शिजू ने देखा उसी की हमउम्र एक लड़की अपने मटमैले सलवार कुर्ते को झाड़ती पास ही बिखरा अपना झोला, लकड़ी पर बंधे पाँच सात गुब्बारों का गुच्छा और टूटी चप्पल संभालने में लगी है। पापा चेतक स्टेण्ड पर लगा उसकी ओर बढ़े तो लड़की घबरा कर बोली – ‘बाबूजी… वो…  चप्पल उलझ गई थी।’ पापा ने बगैर उसकी बात की ओर ध्यान दिए उससे पूछा – कितने का है एक गुब्बारा?’ लड़की हक़बकाई सी बोली – दो रुपए का।  ‘ला ये हरा और पीला दो दे दे ‘ पापा ने पाँच का नोट उसके हाथ में रखा, दो गुब्बारे लिए और लौट आए। लड़की अब भी हक़बकाई सी पापा को देख रही है और शिजू कह रही है – पर पापा मैं तो अब गुब्बारे से नहीं खेलती। पापा गुब्बारे उसके हाथ में थमाते बोले – कोई बात नहीं, आज खेल लेना।

पापा की पीठ पर टिकी शिजू की आँखों से दो मोती टपके और उसने कस कर पापा को पकड़ लिया। घर आई तो देखा भाई सा की मित्र मंडली जमी हुई है। रसोई से पकोड़ों की महक उठ रही है। किताबें पटक कर दरवाज़े के पीछे कान लगा चिपकी रहने वाली शिजू आज अपने बिस्तर पर औंधी पड़ गई। कुछ ही देर बाद शालू दी की आवाज़ कान में पड़ी – ‘कुछ हुआ है क्या छिपकली?’

अच्छा! तो मम्मी ने इन्हें कुछ भी नहीं बताया! तभी पीछे से मम्मी की आवाज़ आई – ‘अरे कुछ नहीं… बताया था न तुझे कि शॉरेश उस देहाती पर जरा गुस्सा हो गया था… बस इसी से मूड खराब किए होगी। ‘ शिजू ने गर्दन घुमा कर मम्मी की ओर देखा है। उसके माथे का तिलक फैला हुआ है, आँखों का रंगीन वॉटर प्रूफ काजल गालों से लेकर ठुड्डी बल्कि गर्दन तक पुता पड़ा है। कितनी ज़रा सी बात है न ये मम्मी के लिए! मगर शिजू का तो जैसे संसार डोल रहा है। मम्मी उसके नजदीक बैठ गईं हैं। शिजू ने उनकी आँखों में झाँका है। मम्मी ने बड़ी कुशलता से आँखों की महीन परतों पर एक मोटा कड़ा पर्दा डाल लिया है। 

‘कुछ भी तो नहीं हुआ छुटकी… बस निकल गया मुँह से गुस्से में….  । चल जल्दी से हाथ मुँह धोकर आ पकोडे तैयार हैं।’ मम्मी ने उसे छिपकली नहीं छुटकी कहा है, यानि मम्मी के भीतर भी हिला तो जरूर है कुछ।

“पर मम्मी गाली….. “

“क्या गाली गाली लगा रखा है। कहा तो गुस्से में….।”

“गुस्से में मारना भी ठीक है ?”

“बेकार जबानदराजी मत करे छिपकली। ऐसी बातों की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए।” मम्मी का गुस्सा बढ़ रहा है। वे फिर छुटकी से छिपकली पर आ गई हैं लेकिन शिजू के सवाल अभी जारी है।

“पापा को ऐसा गुस्सा क्यूँ नहीं आता!”

“अब बहुत हुआ! चल उठ बाहर चल।”

शिजू की आँखें दीवार पर लगी तस्वीर की ओर घूम गई हैं। धोती कुर्ते में दादाजी हैं।

“दादाजी भी देहाती थे न!”

चटाक की आवाज़ के साथ शिजू के गाल पर मम्मी का हाथ छप गया। वॉटर प्रूफ काजल रंगीन से स्याह होता उसकी पूरी देह में फैल गया। मम्मी दन्दनाती कमरे से बाहर निकल गईं हैं और शालू दी उसके बालों में अंगूलियाँ फिराती उसे समझा रही हैं – ‘छिपकली तू अभी छोटी है इन सब बातों के लिए। ये बड़ों के मसले हैं, मत पड़ा कर इनमें। ये जो तू दरवाज़े के पीछे छिपकली बनी चिपकी रहती है न, इसी ने तेरा दिमाग़ खराब कर दिया है।’

शाम को जब शालू दी के जरिए शीना को घटना की खबर लगी तो वो अपने लहजे में बोल पड़ी “होते तो बॉडम ही हैं ये धोती कुर्ते वाले। मुझे तो ज़रा पसंद नहीं।”

“जबान संभाल कर शीना।” मम्मी गुस्सा हुई और शिजू अचरज से मम्मी को देखती रही।

रात गहराई। सब अपने-अपने ख्वाबों में खो गए। मगर शिजू की छाया गहरी होती गई और मैं उसमेँ घुला होने पर भी कुछ न कर सका, सिवा दुखी होने के। इस घटना के तीन दिन बाद का रविवार –

शिजू चुप-चुप सी रहती है। दरवाज़े के पीछे भी नहीं चिपकती। भाई सा को इस बात का अहसास हो गया है। पकोड़ों की प्लेट लेकर भी तो नहीं आई इन दिनो। वे शिजू के कमरे में गए हैं। शिजू कुर्सी पर बैठी, टेबल पर सिर झुकाए कुछ लिख रही है।

‘छुटकी…।’ भाई सा ने दरवाज़े से पुकारा तो शिजू हड़बड़ा कर ख़डी हो गई। आखिर भाई सा अब भी भाई सा हैं।

भाई सा टेबल के नजदीक आकर खडे हो गए हैं।

‘नाराज है मुझसे?’ शिजू सिर झुकाए ख़डी है। उसने गर्दन ना में हिला दी है। भाई सा ने उसे कंधो से पकड़ कहा –

‘अच्छा बाबा… कान पकड़ कर सॉरी बोलता हूँ….  अब तो मान जा!’ भाई सा ने शिजू की ठुड्डी पकड़ कर उठा दी है। शिजू ने भरभराई आँखों से भाई सा की ओर देखा। भाई सा ने बाहें फैलाई और शिजू लिपट गई भाई सा से। चार दिन का बालमन गुस्सा पल भर में बह गया। शिजू फिर चार दिन पहले वाली शिजू बन गई। छिपकली भी। क्यूँ न बने! बात भी तो कितनी बड़ी है! इतने बड़े भाई सा ने सॉरी बोला है बित्ते भर की शिजू को। मम्मी तक ने चाँटा मार कर सॉरी नहीं बोला, बल्कि उस दिन से अब तक अकड़ी अकड़ी रहतीं हैं। तभी तो भाई सा अलग हैं इन लोगों से। हाँ… वैसे पापा भी खास हैं। वो चुपके से गई, पापा को फाइलों के अम्बार पर झुके देख मुस्कुराई, फिर नईनकोर परत लिए बॉलकनी में आ गई। मुझे देख मुस्कुराई। मैं भी मुस्कुराया, चार दिन बाद।

कहानी में दूसरा ट्विस्ट यहाँ ये आया कि शीना आजकल जिद पर अड़ी है। उसे कोई मगरमछच्च वाले जूते और टी शर्ट चाहिए। एकेडमी तीन दिन के लिए किसी दूसरे शहर में होने वाले मैच दिखाने ले जा रही है, वहीं पहनने के लिए। पापा ने पता किया है उनकी क़ीमत और तब से उनका मुँह लटका हुआ है। मम्मी बड़बड़ा रही है  “और भेजो बड़ी एकेडमी में। अब दो लाकर!” पापा ने शीना को समझाने की और दूसरे नए टी शर्ट जूते दिलाने की भरसक कोशिश की है। शॉरेश से भी बात की है मगर उसने भी गाड़ी खरीद के बाद तँगी की बात कह दी है। लेकिन शीना के दिमाग़ में मगरमच्छर घुस चुका है। उसे कुछ और नहीं सिर्फ और सिर्फ मगरमच्छ ही चाहिए। सब वही पहनेंगे। वो कुछ और पहनेगी तो कितनी भद्द होगी। पापा शीना को समझाते रहे। शीना गुस्सा होती रही और गुस्से में ही चली गई।

आज रविवार है। शिजू की छुट्टी है। आज मम्मी और शालू दी ने चाय के साथ ब्रेड रोल्स बनाए हैं।  मित्र मंडली आज सुबह ही जम गई है। कुछ देर में शीना भी लौट आने वाली है। लड़की गुस्से में गई थी तो आने पर थोड़ी ज़्यादा खातिर कर देंगे। दरवाज़े के पीछे ख़डी शिजू के कान चौकन्ने हैं। अचानक शिजू को बॉलकनी में चीं चीं की तेज आवाज़ सुनाई दी है।  मैं देख रहा हूँ। सुन रहा हूँ। परदे की झिरी से शिजू भी देख रही है। सुन रही है। महीनों बाद बॉलकनी में चिड़िया चहकी है। कोई नएनवेले पर लिए, भूली भटकी चिड़िया है। बॉलकनी के सामने बिजली के तार पर जाकर बैठती है फिर चीं चीं करती सुकरात के सिर के थोड़ा ऊपर दीवाऱ में आधी धंसी कील पर टिक जाती है। नए पंखो से उड़ान की प्रेक्टिस कर रही है शायद। शिजू की ख़ुशी से चमकती दोनों आँखें चिड़िया के लगातार फेरों पर टिकी हैं। एक कान में चीं चीं चीं है तो दूजे में भाई सा की आवाज़।  भाई सा कह रहे हैं –

‘कांत के अनुसार नैतिकता हमारे कार्यों, हमारी भावनाओं या किसी बाहरी कारक के परिणामों से परिभाषित नहीं होती। नैतिकता कर्तव्यों से परिभाषित होती है।’ मंडली के सिर हामी भरते ऊपर नीचे हो रहे हैं। चिड़ियाँ चीचीयाती, तेजी से पँख फरफराती अंदर से बाहर, बाहर से अंदर हो रही है। उस घर की छाया में घुली शिजू की छाया के साथ अब चिड़िया की छाया भी मुझ में घुल रही है। तरल से तरलतर होती छाया।

भाई सा कह रहे हैं –

‘कांत ये भी कहते हैं कि कर्तव्य बताते हैं कि हमें क्या करना चाहिए। अनिवार्यताएं पूरी तरह से लक्ष्यों या रुचियों पर निर्भर है। उदाहरण के लिए’ कहते हुए भाई सा ने कोने में रखा शीना दी का पुराना रैकेट उठा लिया है।’अगर मैं एक अच्छा बास्केटबॉल खिलाडी बनना चाहता हूँ तो मुझे फ्री थ्रो का अभ्यास करना चाहिए।’

चीं चीं चीं चीं चीं…

‘ चुsssप sss स्ससाली sss’

खटाक की तेज आवाज़ और बॉलकनी सन्नाटे में। शिजू का रंगीन वॉटर प्रूफ काजल सुकरात के चेहरे पर जम गया है और होठों की गोल आकृति इतनी चौड़ी हो गई है कि सांस बाहर आना भूल गई है। सुकरात की आँखों के ठीक बीच माथे पर चिड़िया की बीट का तिलक लगा है। दाईं आँख पर छोटे-छोटे पँखों ने चिपक कर उसे ढक दिया है। बाईं आँख से निकल खून के नन्हें छींटे लकीर बनाते सुकरात की दाढ़ी तक चले गए हैं। नन्हीँ चिड़िया फर्श पर रैकेट के बगल में उल्टी पड़ी है निढाल। आवाज़ सुन कर मम्मी ‘क्या हुआ’ पुकारती बाहर आईं हैं। थोड़ी ही देर बाद उनके हाथ में झाड़ू और गत्ते का टुकड़ा है। अब चिड़िया डस्टबिन में है और भाई सा कह रहे हैं ‘हाँ तो मैं कह रहा था कि कांत ….’ मैंने देखा बाकी चार पोस्टरों की चार जोड़ी आँखों में भयानक हताशा, बेबसी और अफ़सोस।

अभी सूरज उगा ही है । छायाओं का खेल शुरू हुआ ही है। मगर अपनी सारी परतों के साथ छिपकली की छाया दरवाज़े के पीछे औंधी पड़ी है और उधड़ी परतों के दर्द से कुलबुलाती देह बिस्तर पर।

मगर बिस्तर पर पड़ी देह की ओर किसी की तवज्जो जाए उससे पहले एक घटना और हो गई।   जिससे सबका ध्यान उसी तरफ मुड़ गया। हुआ ये कि शीना को नौ बजे तक घर पहुँच जाना चाहिए था और अब दस बज़ रहे हैं। पापा ने एकेडमी फोन किया है। पता चला कि घर की गली के नुककड़ पर एक घंटे पहले ही उसे उतारा गया है। घर भर में चिंता का माहौल हुआ कि तब गई कहां लड़की। गुस्से में गई थी तो घबराहट डबल हुई। एक दिशा में मंडली ख़ारिज कर भाई सा और मम्मी गाड़ी में दौड़े तो दूसरी तरफ पापा चेतक पर। बची शालू दी। वे बॉलकनी में फैली प्लेटें उठा रहीं हैं, रसोई समेट रहीं हैं। दरवाज़े के पीछे छिपकली की छाया गिरी पड़ी है और दर्द से कुलबुलाती देह पर शीना की चिंता की परत चढ़ रही है।  दो घंटे की मशक्क्त के बाद ऑल्टो और चेतक मुँह लटकाए लौट आए। सब मौन हैं मुँह लटकाए। पापा फोन पर फोन खुड़का रहे हैं, बाकी सब उन्हें व्यग्रता से देख रहे हैं। मम्मी के सब्र का बाँध टूट रहा है। “आग लगे ऐसी एकेडमी को, ऐसे जूतों कपड़ों को, ऐसे खेल को। जाने कहाँ होगी मेरी बच्ची। उसे कुछ हो गया तो देख लेना…।” अँगुली दिखाती मम्मी का गुस्सा पापा पर फूटा पड़ रहा है। भाई सा फिर निकळ गए हैं। पापा दो पल डाइनिंग चेयर पर टिकते हैं फिर खडे हो डायल घुमाने लगते हैं। शालू दी कुछ सहेलियों के नाम बता रही हैं जहाँ फोन करके पूछा जा सकता है। भाई सा मुँह लटकाए लौट आए हैं। शाम के पाँच बज़ चुके हैं। कुछ समय बाद सूरज डूब जाएगा। चिंता में अब बेचैनी घुलती जा रही है।

“पुलिस को इन्फॉर्म करें क्या!” भाई सा पापा से पूछ रहे हैं। पुलिस सुनते ही मम्मी की रुलाई फूट पड़ी है। शालू दी उनकी कमर सहला रही हैं। पापा से न ‘ना’ कहा जा रहा न ‘हाँ’।

“रुको अभी”

इतना कह वे फिर फोन घुमाने लगे हैं। अब अँधेरा घिरता जा रहा है। घड़ी की सुईयां सात के आगे बढ़ चली हैं। अचानक फोन घनघनाया और सबकी साँसे अटक गई। कोई बुरी खबर न हो।

“हैलो” पापा की आवाज़ टूट रही है।

“मैं सेंट्रल मॉल से बोल रहा हूँ। क्या आप शीना अग्रवाल के घर से बोल रहे हैं?”

“हाँ… हाँ… क्या बात है…. वो ठीक तो है!” पापा की जबान लड़खड़ा रही है। सबका खून जमने की कगार पर पहुँच गया है। 

सामने से बताया जा रहा है कि मॉल बंद होने से पहले जब बाथरूम चैक किए गए तब ये लड़की बाथरूम में बंद मिली। बड़ी मुश्किल से डरा धमका कर बाथरूम खुलाया गया है। कुछ बोल नहीं रही। वो तो बैग पर टैग लगा था जिससे….. “

” आते है… आते हैं…। ” पापा और भाई सा बाहर की ओर भागे हैं। मम्मी भी पीछे पीछे। पापा ने उन्हें हाथ से रोक दिया है।

“रुको यहीं। वो ठीक है। आते हैं लेकर।”

मॉल आधे से ज़्यादा बंद हो चुका है। पहली मंजिल पर बने फेसिलिटी एरिया के बाहर पैसेज में शीना कुर्सी पर पैर ऊँचे किए घुटनों में मुँह छिपाए बैठी है। पापा ने उसकी कमर पर हाथ रखा है.

“शीना… बेटा…।”

शीना ने रो रो कर सूज चुकी आँखें ऊपर उठाई हैं।

” चल उठ घर चल।”

पापा और भाई सा की थोड़ी मशक्क्त के बाद शीना उठ गई है और मरियल कदमों से चल रही है। मॉल की पैसेज से गुजरते हुए अचानक पापा ने देखा कि शीना की गर्दन घूमी है एक शोरूम की ओर। पापा ने उस ओर गर्दन घुमाई और देखा है ग्लो साइन बोर्ड पर छोटा सा मगरमछच्च मुँह फाडे। पापा की नजरें और गर्दन एक साथ झुक गए हैं। उन्हें समझ आ रहा है कि कितनी भद्द उडाई गई होगी, कैसी रुलाई निकली होगी। वे शर्मिंदा हैं अपनी जेब पर। उनकी गर्दन कुछ ज़्यादा झुक गई है। भाई सा का ध्यान इस तरफ नहीं गया है। वे अब तनावमुक्त हैं कि शीना मिल गई है।

हाँ, ठीक इसी वक्त मुझे याद आई थी दादाजी के दादाजी वाली बात। वो भी अपने घर की सुरक्षित बॉलकनी में व्हील चेयर पर पड़े-पड़े।

शीना घर लौट आई। मम्मी उससे लिपट कर रो दीं। सबने खैर मनाई कि बुरी घटना और बुरी होने से बच गई। सूरज की छायाएँ फिर बदलने लगीं। गोष्ठियाँ चलती रहीं। चिड़ियाएँ डस्टबिन ए खाक की जाती रहीं। छिपकली ज्ञान-पिपासा की झरी परतों से दुखी हो अपनी खाल में घुस गई। दूसरी तरफ विशालकाय मगरमच्छ दबे पाँव रेंगते हुए बौना रूप धर दिमाग़ की परत में छिप कर बैठ गया, दलदल के इंतजार में।

मैं सोच रहा था कि छिपकली की खाल भी उतरने लगी तो! या अबकी अगर मगरमच्छ के दाँत और तीखे हुए तो!

बस, मेरे पास यही कुछ घटनाएं थी आपको बताने के लिए। है न बेतालमेल, एकदम मामूली सी घरेलू घटनाएँ! जिन पर तवज्जो देने वाला मूर्ख करार दिया जाएगा। लेकिन मेरी चिंता यही है कि ये मामूली घटनाएँ किसी रोज़ लम्बी कहानी न बन जाए। घाव गैंगरीन में न बदल जाए।

उजला लोहिया
उजला लोहिया
गीत-संगीत और प्रकृति से गहरा लगाव रखने वाली उजला लोहिया राजस्थान के जयपुर शहर से ताल्लुक रखती हैं। समाजशास्त्र, हिंदी स्नातक और संगीत(सितार) में मास्टर्स हैं। कहानी संग्रह 'आँकुरी बाँकुरी' और उपन्यास "नींद और जाग' प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी चर्चित और पुरस्कृत कहानियों में है - 'पीली दीवार वाला नरक', गौरया टोटका, बेंच पर टिकी पीठ' आदि। उपन्यास 'नींद और जाग' विज्ञान और दर्शन के मेल से उपजी कथा है, जिसकी टैग लाइन है- "'नैनोमनोलोजी'- सत्य के द्वार पर फंतासी की दस्तक।" हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में उनकी कहानियों के साथ ही यात्रा वृतांत, ललित निबंध, कविताएं और आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। साथ ही वे गीतकार के रूप में भी काम कर रही हैं। 9414008768
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