Saturday, March 28, 2026
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नई ‘टीवी रेटिंग पॉलिसी 2026’ लागू, किन चीजों पर लगी रोक, किन नियमों को किया गया सख्त?

टीवी रेटिंग पॉलिसी 2026 में अब रेटिंग एजेंसियों के बोर्ड में कम से कम 50 फीसदी स्वतंत्र निदेशक (इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स) होना अनिवार्य किया गया है। ये निदेशक वे होंगे जिनका ब्रॉडकास्टर्स या विज्ञापनदाताओं से कोई संबंध न हो।

भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने देश में टेलीविजन दर्शकों की संख्या मापने के तरीके में आमूल-चूल बदलाव करते हुए नई ‘टीवी रेटिंग पॉलिसी 2026 (TV Ratings Policy 2026)’ पेश की है। यह नया ढांचा एक दशक पुराने 2014 के दिशानिर्देशों का स्थान लेगा। इस नीति का मुख्य उद्देश्य रेटिंग प्रणाली को अधिक पारदर्शी, सटीक और जवाबदेह बनाना है, ताकि विज्ञापन और ब्रॉडकास्टिंग उद्योग को विश्वसनीय डेटा मिल सके।

नई नीति के तहत रेटिंग एजेंसी बनने के लिए न्यूनतम नेटवर्थ की शर्त को 20 करोड़ रुपये से घटाकर 5 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इससे नए खिलाड़ियों की एंट्री आसान होगी और बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। हालांकि, हितों के टकराव को रोकने के लिए नियम कड़े किए गए हैं।

नई पॉलिसी में अब रेटिंग एजेंसियों के बोर्ड में कम से कम 50 फीसदी स्वतंत्र निदेशक (इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स) होना अनिवार्य किया गया है। ये निदेशक वे होंगे जिनका ब्रॉडकास्टर्स या विज्ञापनदाताओं से कोई संबंध न हो। साथ ही एजेंसियों को किसी भी तरह की कंसल्टेंसी सेवाएं देने से भी रोका गया है।

टीवी रेटिंग पॉलिसी 2026: ‘लैंडिंग पेज’ व्यूअरशिप पर रोक, सैंपल साइज बढ़ेगा

नीति का सबसे बड़ा बदलाव ‘लैंडिंग पेज’ से मिलने वाली व्यूअरशिप को रेटिंग से बाहर करना है। अब इस तरह की व्यूअरशिप को केवल मार्केटिंग टूल माना जाएगा और इसे आधिकारिक रेटिंग में शामिल नहीं किया जाएगा।

ब्रॉडकास्टर्स को लैंडिंग पेज पर चैनल की उपलब्धता की जानकारी रेटिंग एजेंसियों को देनी होगी। इससे लंबे समय से चल रहे डेटा हेरफेर और कृत्रिम व्यूअरशिप बढ़ाने के आरोपों पर लगाम लगने की उम्मीद है।

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व्यूअरशिप डेटा की सटीकता बढ़ाने के लिए एजेंसियों को अपने मापन तंत्र का तेजी से विस्तार करना होगा। मौजूदा एजेंसियों को छह महीने के भीतर 80,000 घरों तक पहुंचना होगा, जबकि नए खिलाड़ियों को यह लक्ष्य हासिल करने के लिए 18 महीने का समय दिया गया है। आगे चलकर इसे 1.2 लाख घरों तक बढ़ाया जाएगा।

इसके साथ ही मापन प्रणाली को टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल बनाया गया है, यानी अब डेटा केवल पारंपरिक टीवी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि केबल, डीटीएच, ओटीटी और कनेक्टेड टीवी समेत सभी प्लेटफॉर्म्स पर दर्शकों की आदतों को शामिल किया जाएगा।

नई नीति में पारदर्शिता और डेटा प्राइवेसी पर खास जोर दिया गया है। रेटिंग एजेंसियों को अपनी कार्यप्रणाली सार्वजनिक करनी होगी और अनाम डेटा प्रकाशित करना होगा। साथ ही उन्हें डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 का पालन करना अनिवार्य होगा।

जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ड्यूल-ऑडिट सिस्टम लागू किया गया है, हर तिमाही आंतरिक ऑडिट और साल में एक बार बाहरी ऑडिट होगा। इसके अलावा सरकार समय-समय पर निरीक्षण भी करेगी।

शिकायत निवारण और सख्त दंड

रेटिंग से जुड़ी शिकायतों के निपटारे के लिए नया तंत्र बनाया गया है, जिसमें 10 दिनों के भीतर शिकायत का समाधान अनिवार्य होगा। इसके लिए एक अपीलीय प्राधिकरण भी गठित किया जाएगा।

नियमों के उल्लंघन पर सख्त दंड का प्रावधान है। पहले रेटिंग निलंबन और बार-बार उल्लंघन पर एजेंसी का पंजीकरण रद्द तक किया जा सकता है।

नीति में एक अहम बदलाव यह भी है कि टीवी डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म्स और ओटीटी कंपनियां अब अपने व्यूअरशिप डेटा को अपनी वेबसाइट पर बिना पूर्व पंजीकरण के प्रकाशित कर सकेंगी।

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टीवी घरों का सिर्फ 0.025% सैंपल लिया जाता है

पीआईबी के अनुसार, भारत में इस समय करीब 23 करोड़ टीवी घर हैं, लेकिन दर्शकों के डेटा के लिए महज लगभग 58,000 मीटर का इस्तेमाल होता है। यानी कुल टीवी घरों का सिर्फ 0.025% सैंपल लिया जाता है। इतना छोटा सैंपल देश के अलग-अलग इलाकों और विविध सामाजिक-आर्थिक समूहों की वास्तविक देखने की पसंद को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं कर पाता।

दूसरी बड़ी चुनौती तकनीक से जुड़ी है। मौजूदा मापन प्रणाली स्मार्ट टीवी, ओटीटी प्लेटफॉर्म, स्ट्रीमिंग डिवाइस और मोबाइल ऐप्स पर होने वाली व्यूअरशिप को ठीक से कैप्चर नहीं कर पाती थी, जबकि इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में बदलती दर्शक आदतों और पुराने मापन ढांचे के बीच का यह अंतर रेटिंग की सटीकता को प्रभावित करता है, जिसका असर सीधे ब्रॉडकास्टर्स के राजस्व और ब्रांड्स की विज्ञापन रणनीति पर पड़ता है।

इन्हीं खामियों को देखते हुए, बदलते मीडिया परिदृश्य के अनुरूप टीवी रेटिंग सिस्टम को अधिक व्यापक, सटीक और आधुनिक बनाने की जरूरत महसूस की जा रही थी, ताकि यह आज के मल्टी-स्क्रीन व्यूइंग व्यवहार को सही तरीके से दर्शा सके।

बता दें कि फिलहाल ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) ही देश में टीवी रेटिंग जारी करने वाली एकमात्र एजेंसी है। लिहाजा कनेक्टेड टीवी और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की व्यूअरशिप का समुचित आकलन नहीं हो पाता। पुराने नियमों में सख्त शर्तों के कारण नए खिलाड़ियों के लिए इस क्षेत्र में प्रवेश करना मुश्किल था।

अनिल शर्मा
अनिल शर्माhttp://bolebharat.in
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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