Friday, March 20, 2026
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बहुत कुछ कर सकते हैं ज़िन्दगी में का काम

वरिष्ठ लेखक और चिंतक उदयन वाजपेयी का यह लेख विनोद कुमार शुक्ल की काव्य-प्रतिभा को समझने का एक ऐसा प्रयत्न है, जिसमें आलोचना और संस्मरण एक-दूसरे से गुँथे हुए हैं। स्मृति चित्र और काव्य-भाषा के विश्लेषण को साथ-साथ रखकर विनोदकुमार शुक्ल की रचनात्मक सत्ता तक पहुँचने की यह कोशिश जितनी आत्मीय है उतनी ही बौद्धिक भी। इस लेख का एक सिरा उस मनुष्य से जुड़ा है, जो बातचीत में साहित्यिक जटिलताओं से बचता है और दूसरा सिरा उस कवि से, जो कविता की भाषा को तोड़-मोड़कर नए अर्थ-लोक उद्घाटित करता है।

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बाज़ार के पिछले हिस्से में ‘द इन’ नाम का रेस्तराँ था। फुटपाथ से थोड़ा-सा नीचे उतर कर वह बना था। तेज़ बारिश के दिनों में जब हमारे शहर की सड़कें, हमारे राजनेताओं की मेहरबानी से नदी की तरह बहने लगती थीं, तालाब की तरह भर जाती थीं, उस रेस्तराँ में ज़रूर पानी भर जाता होगा। पर उस दोपहर दिसम्बर की हवा में कँपकँपी थी। झीने-से कोहरे की फ़ीकी नीलिमा दोपहर की उजास पर लिपटी थी। हम दोनों सीढ़ियाँ उतर कर मेज़ के दो ओर लगी कुर्सियों पर बैठ गये। विनोदकुमार शुक्ल अपनी ओर से बहुत नहीं बोलते। दूसरे के बोलने पर प्रतिक्रिया देते हैं। उन पर दूसरे के सामने प्रस्तुत होने का दबाव नहीं है। उस दोपहर मेरी किसी बात पर उन्होंने मुझे देर तक यह बताया था कि कैसे उनके लेखन पर उन्हें कट्टर प्रगतिशील मित्र तरह-तरह की भर्त्सना से भरी चिट्ठियाँ लिखते थे। वे बोलते-बोलते अचानक रुक गये। उतनी देर के लिए ‘द इन’ में उनकी आवाज़ के एकबारगी अनुपस्थित होने से उत्पन्न मौन को चम्मचों और प्लेटों की आवाज़ों ने बुनना शुरू कर दिया। वह सुनाते समय उनकी आँखें क्षण भर को आँसू से ढँक गयीं। ये वे दिन थे जब वे कुछ समय के लिए हमारे शहर भोपाल की निराला सृजन पीठ में आमन्त्रित लेखक थे और अपना तीसरा उपन्यास लिख रहे थे। मैं जानता था कि यह सुलूक सिर्फ़ उन्हीं के साथ नहीं हो रहा था। इसके शिकार कई लेखक हो चुके थे। विचारधारा कैसी भी हो, वामपन्थी या दक्षिणपन्थी, वह लेखक को उसकी अपनी शर्तों पर स्वीकारने में हिचकिचाती है और अगर उसे किसी तरह की शक्ति मिल जाए, वह हिंस्र हो उठती है। उनके मुँह से यह सुनना मेरे लिए आश्चर्यजनक था क्योंकि उनके लेखन को वामपन्थी दिखाने के प्रयास उनके कविता संग्रहों के ब्लर्ब से लेकर कई पत्रिकाओं तक फैले थे। विनोद जी कुछ देर चुप रहे आये, मैं भी। यह मेरी समझ के बाहर था कि उन्हें किस तरह सान्त्वना दूँ। वे उन लेखकों में रहे हैं जिन्हें मैं बहुत कम उम्र से जानता रहा था। उनके लिखने का ढंग मुझे आकर्षित करता था। यह देखना कि वे किस तरह भाषा को तोड़-मरोड़कर दोबारा रच देते थे, मेरे लिए आश्चर्य का विषय था। इन सब कारणों से मैं यह समझ नहीं पा रहा था कि उन्हें किस तरह ढाँढस बँधायी जा सकती है। कुछ देर बाद ही वे सामान्य हो गये। हम दोनों ने ही जानबूझकर उन रास्तों पर चलना छोड़ दिया जिन पर उनके अपमान के क्षण बिखरे थे। पहले हम मुक्तिबोध और श्रीकान्त वर्मा की कविताओं की बातें करते रहे। फिर विनोद जी ही हमारी बात को अशोक वाजपेयी की कविता की ओर ले गये। वे बोले, ‘मैं उनकी कविताएँ सुबह उठकर प्रार्थनाओं की तरह पढ़ता हूँ। उनकी कविताओं में बहुत गहरा पवित्रता-बोध है।’ मुझे यह सुनना सुखकर लगा क्योंकि सामान्यतः कवि अपने समकालीनों की कविताओं को ऐसा सम्मान देने से बचते हैं। सिओरिन ने यूँ ही तो नहीं कहा होगा : समकालीन वह है जिसे आप मारना चाहते हो बिना यह जाने कि कैसे। यह कह चुकने के बाद उन्होंने जब दरवाज़े की ओर देखा, उनके चेहरे का अवसाद सूख चुका था। आँखों में कुछ खिला-सा लग रहा था। उस दोपहर भी विनोद जी हमेशा की तरह साहित्य की बारीकियों और पैंचीदगियों के बारे में बातें नहीं कर रहे थे। उनकी बातों में रोज़मर्रा की व्यवहारिक समस्याओं के विवरण अधिक होते थे। मुझे याद नहीं पड़ता कि उन्होंने कभी किसी लेखक से यह पूछा हो कि वह उन दिनों क्या लिख रहा या लिख रही है। यह बात विनोद जी के सन्दर्भ में कुछ अधिक ही विचित्र इसीलिए जान पड़ती है क्योंकि उनके लिखने के ढंग में पर्याप्त उलझाव हैं। उनका कोई भी पाठक उनकी कविताओं की वक्रोक्तियों को लक्ष्य किये बिना नहीं रह पायेगा। उनकी ये वक्रोक्तियाँ हम उनके उपन्यासों, कहानियों बल्कि उनके साहित्यिक वक्तव्यों में भी लक्ष्य कर सकते हैं। इस सबके बाद भी वे शायद ही कभी लेखन की जटिलताओं के विषय में चर्चा करते हों। इसका एक कारण कुछ अंशों में यह होगा कि उन्हें औरों के लेखन में वैसी दिलचस्पी न हो, जैसे कई दूसरे लेखकों को होती है। मैं सोचता हूँ कि इसका कारण शायद कुछ और भी है : वे लेखन मात्र को एक ऐसा पवित्र कर्म समझते हैं जिसके विषय में हल्के ढंग से बात करने में वह दूषित हो जाता है। मानो वह प्रेम की भावना जैसा कुछ हो जिसे हम जी तो सकते हैं पर जिसके बारे में बात करते ही वह उससे कहीं अधिक छोटा पड़ जाता है, जितना वह है।

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साठ के दशक में विनोद जी के अलावा हिन्दी में तीन ऐसे कवि थे जो उनके हमउम्र थे और अपनी तरह से कविता लिखने के मार्ग ख़ोज रहे थे : कमलेश, जितेन्द्र कुमार और अशोक वाजपेयी। मैं जानबूझकर यहाँ विष्णु खरे का नाम नहीं ले रहा। उनकी अधिकांश कविताएँ विचार केन्द्रित हैं। कविता उपलब्ध विचारों को प्रस्तुत करने की विधा नहीं है। भले ही सारी विचारधाराएँ कविता को वश में रखने के लिए उसे इसी काम में लगाना चाहती हो। विचार से शुरू हुई कविताएँ कैसा भी रूप क्यूँ न धर लें, वे अन्ततः उसी विचार पर जाकर दम तोड़ देते हैं। अगर ऐसी कविताओं के पढ़ने के बाद यह अनुभव हो कि ‘मैंने इसे पढ़ा ही क्यों, यह जो इंगित कर रही है वह पहले से ही ज्ञात था,’ तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है।
लेकिन विनोद जी समेत ऊपर लिखे चारों कवियों की रचनाएँ अपने आस-पास और व्यापक संसार को समझने और उससे चमत्कृत होने के फलस्वरूप लिखी गयी हैं। उनमें से ऐसा एक भी कवि नहीं है जिसकी कविताओं से पाठक के प्रतिकृत होने पर उसमें जिस तरह की संवेदनाएँ और विचार उत्पन्न होंगे उन्हें उन कविताओं से अलग करके कहा जा सके। ये वे कवि हैं जिन्होंने हिन्दी साहित्य में भाषा की शक्तियों को अलग-अलग ढंग से उद्घाटित किया है। कमलेश की ‘विष्णु प्रिया’, जितेन्द्र कुमार की ‘ऐसे भी तो सम्भव है मृत्यु’ और अशोक वाजपेयी की ‘ब्रह्मारण्य’, मेरी दृष्टि में, उत्तर-श्रीकान्त वर्मा कविता में क्लासिक का दर्जा रखती हैं। इन चारों कवियों में कमलेश और जितेन्द्र कुमार की कविताओं की वैसी व्याप्ति नहीं हो सकीं जैसी बाकी दो कवियों की हुई। इसके कारणों में जाने का यहाँ अवकाश नहीं है पर इतना ज़रूर कहा जाना चाहिए कि इन चारों ही कवियों ने आपकी पसन्द का कोई भी हो सकता है पर इतना निश्चित है कि ये चारों कवि ही श्रीकान्त वर्मा के बाद के बेहतरीन कवि हैं। ऐसा किसी भी भाषा के साहित्य में कम होता है कि उसमें एक ही समय में ऐसे चार कवि लिख रहे हों जो एक-दूसरे से नितान्त भिन्न होते हुए भी एक से बढ़कर एक हों।

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हर कवि (वह नहीं जिसे निराला ने निरा वर्सिफ़ायर कहा था) भाषा के विराट में अपनी विशिष्ट खोज के लिए नये रास्ते बनाने को बाध्य होता है। यह इसलिए कि वह कविता लिखता ही इसलिए है क्योंकि वह कुछ विशिष्ट खोज रहा होता है (कवि ही नहीं हर मनुष्य विशिष्ट होता है, कवि अपनी विशिष्टता के प्रति सजगता से अपने पाठकों में भी उनके विशिष्ट होने को प्रकाशित कर देता है!)। चूँकि उसकी खोज विशिष्ट होती है, उसे उसके लिए वैसे ही नये मार्ग रचने की आवश्यकता होती है। पुराने मार्गों पर चलकर वह अपनी खोज में आगे नहीं बढ़ सकता। पुराने मार्ग उसकी खोज को विशिष्ट रहने ही नहीं देते, उसे सामान्य (सम$अन्य) यानी दूसरों की खोज़ों में शामिल कर देते हैं। ऐसे में वह कवि अपनी खोज के लक्ष्य या लक्ष्यों से छिटक कर दूर हो जाता है (अक्सर कवि की खोजों का विन्यास ही उसका लक्ष्य होता है) और अनायास ही कोई ऐसी खोज में पड़ जाता है जो उसका अभीष्ट नहीं था और जो पहले ही सम्पन्न हो चुकी थी। अपनी खोज की ख़ातिर भाषा के विराट में नये मार्गों की रचना-प्रक्रिया में नये काव्य-शिल्पों का जन्म होता है। पर यह याद रखना ज़रूरी है कि इन नये मार्गों पर चलना जोखिम का काम है क्योंकि ऐसा करते हुए कवि को भाषा के साथ ऐसे-ऐसे व्यवहार करने पड़ते हैं जिनसे वह अपरिचित लगने लगती है। वह कुछ समय तक खुद अपने लिए अजनबी हो जाती है। यह सच है कि उसके अन्तस में उसे बरतने के अनन्त सम्भावित मार्ग सोये रहते हैं पर चूँकि इन सम्भावित मार्गों को पहले किसी ने बरता नहीं होता, ये लोक-व्यवहार में नहीं आये होते। जैसे ही कोई कवि (वर्सिफायर नहीं) अपनी कविताओं में इन्हें जाग्रत कर देता है, इन्हें कम-से-कम शुरुआत में लोक-अस्वीकृति का सामना करना पड़ता है। यह अस्वीकृति सहज अस्वीकार से लेकर कविता का मज़ाक बनाने तक कुछ भी हो सकती है। लेकिन जैसे-जैसे इन नये मार्गों का वैभव फैलना शुरू होता है, यह अस्वीकार पहले विस्मय और फिर अपनाव में भावान्तरित हो जाता है।

इस पूरी व्याख्या का अनिवार्य पूरक यह है कि हर कवि भाषा के विराट में नये मार्गों के उद्घाटन के सहारे भाषा में दरारें उत्पन्न करता है। दरअसल कवि भाषा की सम्भावना के बारे में सजग होने से कहीं अधिक उसकी सीमा को पहचानता है। कवि के लिए नये उद्घाटित मार्ग भाषा की नयी सीमा को उजागर करते हैं। हर नये ढंग की कविता उस सीमा का अपनी तरह से अतिक्रमण करती है। दूसरे शब्दों में काव्य-रचना की सारी प्रविधियाँ, सारे अलंकार विधान भाषा में नयी दरारें पैदा करने की युक्तियाँ हैं जिससे कवि वह इंगित (ध्वनित) कर सके जो शब्दों और अर्थों से परे हैं। इसे ही आनन्दवर्धन ने ‘विवक्षा’ कहा है, लिखने की आकांक्षा जो न शब्द पूरी कर पाते हैं न अर्थ पर केवल शब्दों और अर्थों के सहारे ही वहाँ पहुँचा जा सकता है जहाँ वह आकांक्षा कुछ देर को शान्त होती है। कवि भाषा के परे भाषा के सहारे ही जा सकता है। शायद इसीलिए हर कवि भाषा को एक नयी तरह की दरार भेंट करता है। विनोदकुमार शुक्ल की कविता भाषा में किन-किन तरीकों से भाषा में ये दरारें पैदा करती है?

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मतलब कोई जब (आप) एक शॉट ले रहे हैं, उसकी ऐसी ही प्रतिक्रियाएँ होना चाहिए, (उसके) बचपन की-सी। पूरी समझ और पूरा बचपन साथ होना चाहिए। दोनों एक साथ रहना चाहिए, सारी समझ और सारी नासमझी। ये सब साथ रहें, आदमी के। इसमें कोई झगड़ा नहीं होना चाहिए। ऐसा नहीं हो कि समझ नासमझी को खा जाए। या नासमझी ऐसी हो कि आदमी बिल्कुल ही बेवकूफ हो, बुद्धि का विकास ही न हुआ हो।

(पृ.33, अभेद आकाश, मणि कौल से उदयन वाजपेयी की बातचीत)

दिल्ली की बड़ी-सी होटल में देर रात विनोद जी आये। जब वे अपने कमरे में पहुँच गये, उन्होंने फ़ोन करके मुझे बुला लिया। या शायद मैं उन्हें पहले ही मिल गया और हम साथ ही उनके कमरे में पहुँचे। वह कविता समारोह पहले भोपाल में होना था पर श्रीकान्त वर्मा के कारण दिल्ली में भी हुआ। हालाँकि हुआ बहुत ही साधारण। उतनी रात को होटल का रेस्तराँ बन्द हो चुका था, चौका भी। विनोद जी को लम्बी यात्रा के बाद ज़ोर की भूख लगी थी। होटल की तथाकथित भव्यता के आगे उन्होंने हथियार डाल दिये और मेरी ओर इस तरह देखा मानो मैं ऐसी जगहों पर आता-जाता रहा होऊँ। मैं खुद डरा हुआ था। मैंने घबराते हुए फ़ोन लगाया। कोई जवाब नहीं आया। दूसरा फ़ोन, फिर कोई जवाब नहीं। इस बीच मुझे अवसर मिल गया कि मैं मन में अंग्रज़ी के दो-तीन ऐसे वाक्य बना लूँ जिनमें मुझे विनोद जी का खाना माँगना था। पता नहीं क्यों, हम भारतीय बड़े होटलों में जाते ही अंग्रेज़ी के आसरे हो जाते हैं। मानो ये होटलें भारत भूमि पर बनी ही न हों। तीसरी बार में फ़ोन उठ गया। दूसरी ओर बिल्कुल शुष्क आवाज़ में जवाब आया कि खाने को कुछ भी बाक़ी नहीं है। अब तक मेरे मन ने अंग्रेज़ी के वाक्य अपने आप बनाना शुरू कर दिया था। वे बमुश्किल डबलरोटी और टमाटर की बोतलबन्द चटनी भेजने को राज़ी हो गये। इस दौरान विनोद जी चुपचाप बैठे रहे। उस रात मैंने विनोद जी की सरलता में कुछ खास देखा था। इसी तरह तब हुआ जब कुछ बरस बाद हम रायपुर गये। हम यानी शिरीष ढोबले, मदन सोनी और मैं। विनोद जी ने हमें भोजन करने आमन्त्रित किया। हमें पहुँचने में देर हो गयी। हम जब खाने लगे तो देखा कि विनोद जी बिना थाली के ही मेज़ के पास बैठे हैं। हमारे पूछने पर पता चला कि वे भोजन कर चुके हैं। पर हमारे आग्रह पर संकोच में उन्होंने दोबारा खाना खा लिया। यह उनकी सरलता की एक और मिसाल थी। ऐसे और भी कई अवसर आते रहे।

मुझे याद है कि इन तमाम अवसरों पर विनोद जी की लगभग चुप्पी के चारों बैठकर हम आपस में ही बात करते रहते थे। बीच-बीच में वे भी कुछ एकाध वाक्य बोल देते थे। मेरे जीवन में आये, वे अकेले ऐसे लेखक हैं जिनकी बातचीत में मैंने कभी किताब को प्रवेश करते नहीं पाया। मुझे नहीं लगा कि उन्होंने सचेत रूप से कभी अपनी शब्द-सम्पदा को बढ़ाने का प्रयत्न किया हो या अन्यान्य लेखकों के काम में शिल्प-वैविध्य का अध्ययन किया हो। ज़ाहिर है, उन्हें इसकी आवश्यकता अनेक वर्षों तक नहीं थी। आगे चलकर शायद यह उनके लेखन की समस्या बनी। अगर मणि कौल के विचार को अपने शब्दों में कहूँ : उनकी लेखन यात्रा में समझ का पलड़ा धीरे-धीरे ऊपर जाता गया।

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विनोद जी की कविताएँ जब पहली बार हिन्दी साहित्य के परिदृश्य पर आयीं, उनकी भी सहज स्वीकृति नहीं हुई थी। वे तब अटपटी कविताओं के लेखक थे। हिन्दी में भाषा के साथ वैसा व्यवहार पहले कभी नहीं हुआ था जैसा उन्होंने किया था। ठीक वैसे ही जैसे उनके समय के उन तीन अन्य कवियों ने भी किया था जिनका ज़िक्र हम पहले कर आये हैं। हमें उन आलोचकों का आभारी होना चाहिए जिन्होंने विनोद जी की कविताओं को सामान्य पाठकों के लिए ग्राह्य बनाया, जिन्होंने उन विधियों पर ध्यान एकाग्र किया जिनसे विनोद जी की कविताएँ आकार लिया करती थीं। उनके नये भाषिक व्यवहार पर अब तक सबसे सूक्ष्म आलोचना मदन सोनी ने अपनी अद्भुत किताब ‘कविता का व्योम और व्योम की कविता’ में की है। मैं मदन की किताब पर आऊँ, इससे पहले विनोद जी के कुछ अनूठे भाषिक व्यवहार के उदाहरण सामने रखता हूँ :

बहुत कुछ कर सकते हैं ज़िन्दगी में का काम बहुत था

कुछ नहीं कर सके की फुरसत पाकर मैं कमज़ोर और उदास हुआ

(बहुत कुछ कर सकते थे…, सब कुछ होना बचा रहेगा)

दूर से अपना घर देखना चाहिए

मजबूरी में न लौट सकने वाली दूरी से अपना घर

कभी लौट सकेंगे की पूरी आशा में

सात समुन्दर पार चले जाना चाहिए।

(दूर से… सब कुछ होना बचा रहेगा)

कोई नहीं है का अन्तहीन एकान्त है

आसपास कुछ अन्तहीन में भी नहीं कोई

बहुत अन्तहीन में भी नहीं

दूर तक का बाहर

मेरे अन्दर के पहिरावन से कभी ढँका था

चीथड़े होकर अब उतर गया है।

(कोई नहीं है का… अतिरिक्त नहीं)

हम सहज ही लक्ष्य कर सकते हैं कि इन कविताओं को भाषा के जिस तरह के व्यवहार से रूप दिया गया है, वह सीधा सादा तो बिल्कुल ही नहीं है। बल्कि इस तरह अटपटा है कि अगर ध्यान से न पढ़ो तो कविता हाथ से फिसल जाती है। हर कविता इतनी अधिक वक्रता से अपने को रूप देती है कि असंस्कारी पाठक इन्हें पढ़ते हुए थक जा सकता है। कुछ-कुछ वैसे ही जैसे पहाड़ी टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चले हुए थकान होती है। इतनी मेहनत और धीरज की माँग यह कविता करती ही है। हम इन वक्रताओं को विनोद जी की कविताओं की काव्य-भंगिमाएँ कह सकते हैं। पाठकों को इन काव्य-भंगिमाओं से होकर तो गुज़रना ही होगा तभी वे कविता के अन्तस में प्रवेश और भाषा के परे जाने का अवसर पा सकेंगे।

भाष्य और टीका लेखन काव्य-भंगिमाओं को उत्तीर्ण करने की विधियाँ ही हुआ करती हैं। कुछ आधुनिक आलोचनाएँ भी यह काम कर सकी हैं। मदन सोनी की विनोद जी की कविता की आलोचना ऐसा ही उपक्रम है। उन्होंने लिखा है :

यह कारकों और क्रियाओं के बीच एक तरह की छल-लीला है जो विनोदकुमार शुक्ल की कविता के ज़्यादातर वाक्यों में निरन्तर चलती रहती हैं; कहीं कारकों के स्थान परिवर्तन से, कहीं क्रियाओं-कारकों की आँख मिचौली से, कहीं सहायक क्रियाओं के मुख्य क्रिया में बिला जाने से…। इस अर्थ में इन कविताओं का व्याकरण स्थितिशील नहीं, गतिशील व्याकरण है।

क्रियाएँ, वाक्य में किसी काल-खण्ड की प्रतिनिधि हैं जो कर्त्ता और कर्म के बीच अपनी स्थिति से वाक्य को काल के किसी खण्ड में अवस्थित करती हैं। लेकिन विनोदकुमार शुक्ल के वाक्यों में चलने वाली यह छल-लीला क्रिया को उसकी खण्डित काल-प्रातिनिधिकता से विच्छिन्न करती है और क्रिया-जिसकी नियामक मध्यता में वाक्य एक मानकीकृत काल (ऐतिहासिक काल) का उपनिवेश होता है- इस तरह विच्छिन्न होकर वाक्य को उसकी औपनिवेशिक स्थिति से मुक्ति दिलाती है।

(कविता का व्योम और व्योम की कविता, पृष्ठ 97, मदन सोनी)

मदन ने निबन्ध के इस अपेक्षाकृत छोटे-से हिस्से में यह स्पष्ट कर दिया है कि विनोद जी की कविता में व्याकरण से छेड़-छाड़ का स्वरूप क्या है। इससे आगे मदन इन कविताओं में उस प्रक्रिया को भी समझने का प्रयत्न करते हैं जिससे- उनके अनुसार- विनोद जी की कविताओं में शब्द अपनी भेदपरक पहचान के साथ-साथ अपनी तात्विक पहचान भी पा लेते हैं। यह सब करते हुए उनकी कविता कैसे-कैसे टेढ़े-मेड़े रास्तों पर चलकर अपना विधान करती है, अनुमान का नहीं पढ़ने का न्यौता है। पर ऐसा सिर्फ़ विनोद जी ने ही नहीं किया है। अमरीका के मध्य बीसवीं शती के प्रख्यात कवि ई.ई. कमिंग्स की कविताएँ भी गाहे-बगाहे व्याकरण से यह छेड़-छाड़ करती रही हैं : मैं अनन्त का खेल/‘जब’ की चिप्पियों से खेलता हूँ।

कमिंग्स की याद दिलाने का आशय केवल इतना ही है कि व्याकरण से विनोद जी के अलावा भी कुछ कवियों ने कौतुक कर कुछ नयी दृष्टियाँ उद्घाटित की हैं।

पर विनोद जी की कविता के सन्दर्भ में एक प्रश्न, लगभग अस्तित्त्वगत प्रश्न तो उठता ही है : उनकी कविता ने वह रूप क्यों लिया जो रूप उसने लिया है? ऐसे प्रश्न पूछना उस क्रीड़ा का अंश है जिसे हम आलोचना नाम से पुकारते हैं। यह याद रखें कि क्रीड़ा करना कोई ऐसा-वैसा काम नहीं है अगर आपको यह पता हो कि भरत ने नाट्यशास्त्र में नाटक करने को क्रीड़ा करना ही कहा है।

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कवि कर्म की यह विशेषता है कि इसमें कवि की कोई कमी भी कविता के सृजन में अपनी तरह की भूमिका निभाती हैं। यह इसलिए है क्योंकि कवि में ‘विवक्षा’, लिखने की आकांक्षा इतनी अधिक होती है, उसे अपने भीतर की पुकार इतना अधिक अपनी ओर खींचती है कि अपनी कैसी भी तैयारी के साथ वह उस पुकार के इंगित पर भाषा के विराट में प्रविष्ट हो जाती/जाता है। लिखने की इस यात्रा में उसकी कोई न कोई कमी प्रकट होकर रहती है। लेकिन वह कमी उसे कविता को रूप देने से रोक नहीं पाती, भले ही वह कमी उसमें शब्द-सम्पदा की अल्पता की ही क्यों न हो। शब्द सम्पदा की अल्पता से कविता अनिवार्यतः कमज़ोर नहीं होती बल्कि समर्थ कवि के हाथों यह अल्पता उसकी कविता को बिल्कुल अनूठे शिल्प की ओर ले जाती है। मेरा अनुमान है कि विनोदकुमार शुक्ल की कविता ने व्याकरण से छेड़-छाड़ का रास्ता इसलिए अपनाया है क्योंकि विनोद जी की विवक्षा उनकी वोकेबुलरी (शब्द सम्पदा) से कहीं अधिक सशक्त हैं। विवक्षा और वोकेबुलरी के बीच का यह अन्तराल हर कवि में होता है, पर विनोद जी के यहाँ यह कुछ ज़्यादा ही जान पड़ता है। यह उसी तरह है जैसे पण्डित कुमार गन्धर्व के फेफड़ों की सामर्थ्य के कम होने से उनकी गायिकी ने एक विलक्षण रूप लिया था। भला हो विनोद जी की शिक्षा-दीक्षा का कि उन्होंने हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर अध्ययन नहीं किया और न उसमें शोध-प्रबन्ध लिखने का प्रयास ही। इतालवी कथाकार टोमासो लेंडोल्फ़ी ने अपनी एक कहानी में कवि की शब्द-सम्पदा की कमी को उसके काव्य-सामर्थ्य के स्रोत की तरह भी देखा है। कहानी का आख्याता कहता है :

‘अच्छा, मैं तुम्हें बताता हूँ,’ उसने बोलना शुरू किया, ‘कई साल पहले, मैंने उन तत्वों के धीर और सूक्ष्म आसवन में अपना

बहुत समय लगाया है जिनसे किसी कलाकृति (कविता) की रचना होती है। इसके चलते मैं इस स्पष्ट और निर्विवाद निश्चय पर आ पहुँचा हूँ कि अभिव्यक्ति के समृद्ध और वैविध्यपूर्ण साधनों का होना एक कलाकार (कवि) के लिए अनुकूल परिस्थिति होने के अलावा और सब है।… ज़ाहिर है जिस व्यक्ति को किन्हीं वस्तुओं या अनुभूतियों को इंगित करने वाले सही शब्दों का ज्ञान नहीं होता, वह उन शब्दों के अभाव को गोलमोल ढंग यानी बिम्बों के सहारे कहने पर मजबूर होता है। इससे उनकी कला (कविता) कितनी समृद्ध होती होगी, इसका अनुमान तुम खुद लगा सकते हो। इस तरह (लिखने से) जब तकनीकी शब्दों और रूढ़ियों का प्रयोग नहीं होता तो ऐसा क्या बाक़ी रह जाता है जो कलाकृति (कविता) को पैदा होने से रोक सके।

(डायलॉग ऑन द ग्रेटर हारमनीज़, गोगोल्स वाईफ़, टोमासो लेंडोल्फ़ी)

यहाँ जिस जगह लेंडोल्फ़ी ने ‘बिम्ब’ लिखा है, विनोद जी की कविता के सन्दर्भ में वहाँ ‘वक्र वाक्य-विन्यास’ या व्याकरण से छेड़-छाड़ लिखा जा सकता है। यहाँ यह जोड़ देना चाहिए कि ऊपर के विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकालना नादानी होगी कि शब्द-सम्पदा की अल्पता ही बेहतर कविता की गारण्टी है। इसके अपूर्व अपवाद, अगर विनोद जी की ही पीढ़ी से लें तो कमलेश और अशोक वाजपेयी की कविताएँ हैं। ये अकूत शब्द-सम्पदा के कवि हैं इसलिए इनकी कविताएँ विनोद जी और एक-दूसरे से बिल्कुल अलग तरह से लिखीं गयी हैं।

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चार्ली चैप्लिन फ़िल्म के महान अभिनेता और निर्देशक माने जाते हैं। उनकी शैली की नकल भारत के राजकपूर समेत ढेरों अभिनेताओं ने की है। उनकी बदहाल आवारा (ट्रैम्प) की छवि पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। क़रीब तीस-चालीस फ़िल्मों में उन्होंने इस बदहाल आवारा की भूमिका निभायी। इतनी अधिक फ़िल्मों में यही एक भूमिका निभाते जाना, उनका चुनाव नहीं था, उन्हें उससे थकान होने लगी थी। उन जैसे आत्म-सजग अभिनेता को यह समझने में देर नहीं लगी थी कि वे अपने को दोहरा रहे हैं और उन्हें इस भूमिका से बाहर आना चाहिए। लेकिन उनकी बदहाल आवारा की भूमिका इतनी ज़्यादा लोकप्रिय हो चुकी थी और उससे उनकी फ़िल्मों के निर्माता इतना ज़्यादा पैसा कमाते थे कि उन्हें उस भूमिका से बाहर नहीं आने दिया गया। वे मानो अपनी ही व्यवसायिक सफलता के पिंजरे में कैद होकर कई बरसों तक रहे आये। इसके कारण संसार के सिनेमा दर्शक ऐसा बहुत कुछ देख नहीं पाये जो चैप्लिन कर सकते थे। ऐसे महान अभिनेता को ‘मैनेरिज़्म’ (रीतिबद्धता) का शिकार होना पड़ा, यह बीसवीं शती के कला-जगत की बड़ी त्रासदी है। पर ‘मैनेरिज़्म’ में फँस जाने के दूसरे भी कारण हो सकते हैं।

विनोद जी की कविता में भी ‘मैनेरिज़्म’ का प्रवेश बरसों पहले शुरू हो गया था। पहले इस काव्य-व्यवहार के बावजूद उनकी काव्य-ऊर्जा अक्षुण्ण रही आयी या इतनी आहत नहीं हुई कि उसकी छाया कविता के मर्म पर पड़ सकती। पर धीरे-धीरे यह क्षति बढ़ती गयी महसूस होती है। उनकी कविता में ही नहीं, उनके उपन्यासों, कहानियों और यहाँ तक कि उनके साक्षात्कारों और वक्तव्यों में व्याकरण से छेड़-छाड़ की रीति निरन्तर प्रयुक्त होती रही है। ऐसा भाषिक व्यवहार सम्भवतः उनके लिए साहित्य होने की अपरिहार्य शर्त बन गया। मेरा, ग़लत ही सही अनुमान है कि विनोद जी अगर अपनी शब्द-सम्पदा और शिल्प-ज्ञान को विस्तृत करते रहते तो शायद वे कविता लेखन के नये सोपानों को छू सकते थे। नयी शब्द-सम्पदा के साथ वे नये शिल्पों को उद्घाटित करने का जोखिम उठा सकते थे। पर ऐसा हो नहीं सका। पर इससे हिन्दी कविता को दिया गया उनका विलक्षण योगदान कम नहीं हो जाता। यह सब मैंने लिखा ही नहीं होता अगर मुझे विनोद जी जैसे प्रतिभा-सम्पन्न कवि से बहुत अधिक की उम्मीद न रही होती।


उदयन वाजपेयी
उदयन वाजपेयी
वरिष्ठ लेखक और चिंतक
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