Saturday, March 28, 2026
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ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक, 2026 का क्यों हो रहा है विरोध? बिल में क्या नई चीजें जोड़ी गई हैं?

संसद के दोनों सदनों से ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक पास होने के बाद से इसको लेकर बहस भी तेज हो गई है। 2019 के बिल से कितना अलग है?

नई दिल्लीः ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 राज्यसभा में ध्वनि मत से पारित होने के बाद संसद ने बुधवार, 25 मार्च को इस बिल को पारित कर दिया। लेकिन जब से सरकार ये बिल लाई ये इसे लेकर विवाद जारी है। सबसे ज्यादा सवाल इस बात को लेकर उठ रहे हैं कि सरकार कैसे तय कर सकती है कि कोई ट्रांसजेंडर है या नहीं।

ऐसे में आज हम बिल और उसके इर्द-गिर्द हो रही चर्चाओं पर बात करेंगे। जानेंगे कि ट्रांसजेंडर्स की क्या चिंताएं हैं, सरकार का क्या तर्क है और उसे लेकर किस तरह के जरूरी सवाल उठ रहे हैं।

यह बिल केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार द्वारा 13 मार्च को पेश किया गया था। विपक्ष द्वारा विधेयक को एक चयन समिति को भेजने की सर्वसम्मत मांग के बावजूद, सरकार ने इसे बहस के लिए रखा और अंततः दोनों सदनों में इसे पारित करवा लिया।

ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक में क्या प्रावधान हैं?

ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक में चार प्रमुख विषयों में बदलाव प्रस्तावित हैं: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की परिभाषा, पहचान प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया, अपराध और दंड, और राष्ट्रीय परिषद की संरचना।

इस बिल में तर्क दिया गया है कि “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” शब्द की मौजूदा परिभाषा अस्पष्ट है। इसके चलते कथित तौर पर उन “वास्तविक पीड़ित व्यक्तियों” की पहचान करना असंभव हो जाता है, जिन्हें लाभ देने की बात कही जाती है। आगे कहा गया है कि 2019 के अधिनियम का मकसद विभिन्न लैंगिक पहचान वाले व्यक्तियों के हर वर्ग की रक्षा करना नहीं था। वहीं इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि अधिनियम के तहत मिलने वाली सुरक्षा और लाभ “अर्जित विशेषताओं”, “व्यक्तिगत पसंद” या “खुद से तय की गई पहचान” के आधार पर न दिए जाएं।

प्रावधानों में प्रमुख बदलाव क्या हुए हैं?

  1. नई परिभाषा- इस विधेयक ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति की पहचान करने वाली पुरानी परिभाषाओं को प्रतिस्थापित कर दिया है। इससे परिभाषा ज्यादा सीमित हो गई है। इन पहचानों को दो श्रेणियों में बांटा गया है। पहली श्रेणी में ‘इंटरसेक्स’ लोगों को शामिल किया गया है। ‘इंटरसेक्स’ यानी जिनके शारीरिक गुण, जैसे यौन अंग, क्रोमोसोम या हार्मोन, जन्म के वक़्त सामान्य पुरुष या महिला से अलग होते हैं। साथ ही वे लोग भी शामिल हैं, जिनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान किन्नर, हिजड़ा, अरावनी और जोगता जैसी होती है।

दूसरी श्रेणी में वे व्यक्ति या बच्चे शामिल हैं, जिन्हें उनकी मर्जी के खिलाफ जबरन ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर किया गया है।

यह परिभाषा साल 2019 के कानून की तुलना में ट्रांसजेंडर पहचान को सीम‍ित कर देती है। इसमें ‘स्‍व-पहचान’ वाले ट्रांसजेंडर व्‍यक्‍त‍ि शाम‍िल नहीं हैं। यह एक बड़ा बदलाव है, जिसे लेकर सबसे ज्यादा विवाद हो रहा है।

  1. सर्टिफिकेशन के लिए मेडिकल बोर्ड- 2019 के अधिनियम के तहत, एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति पहचान प्रमाण पत्र के लिए जिला मजिस्ट्रेट के पास आवेदन करता था। विधेयक में अब एक चिकित्सा बोर्ड का प्रावधान किया गया है, जिसका नेतृत्व मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) करेंगे। जिला मजिस्ट्रेट को प्रमाण पत्र जारी करने से पहले मुख्य चिकित्सा अधिकारी की सिफारिश की जांच करनी होगी। जिला मजिस्ट्रेट अतिरिक्त चिकित्सा विशेषज्ञों से भी परामर्श ले सकते हैं।
  2. कठोर दंड– विधेयक में ऐसे लोगों को निशाना बनाने के लिए अपराधों का एक नया सेट शामिल किया गया है, जो लोगों को जबरन ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए किडनैप करते हैं और शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाते हैं। फिर उन्हें भीख मांगने या गुलामी के लिए तस्करी करते हैं। सजाएं कड़ी हैं और पीड़ित की उम्र के अनुसार उन्हें डिफाइन किया गया है।

कुछ सजाओं के बारे में जान लेते है। किसी वयस्क का अपहरण करने और उसे गंभीर चोट पहुंचाने पर 10 साल से लेकर आजीवन कारावास और कम से कम 2 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है। अगर पीड़ित बच्चा है, तो सजा अनिवार्य रूप से आजीवन कारावास और कम से कम 5 लाख रुपये का जुर्माना है।

2019 के कानून से क्या बदला?

2019 के अधिनियम का मूल आधार यह परिभाषा थी कि जिस व्यक्ति का लिंग जन्म के समय निर्धारित लिंग से मेल नहीं खाता, वह ट्रांसजेंडर व्यक्ति है। इसमें ट्रांस-पुरुष, ट्रांस-महिला, नॉन-बाइनरी, जेंडरक्वीर व्यक्तियों से लेकर इंटरसेक्स भिन्नताओं वाले और विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले व्यक्तियों तक का व्यापक दायरा शामिल था। इसमें शल्य चिकित्सा या हार्मोनल हस्तक्षेप की जरूरत नहीं थी।

2026 का विधेयक इस मूल अवधारणा से पूरी तरह से अलग हो जाता है और आत्म-पहचान के अधिकार को छीन लेता है। साथ ही आत्मनिर्णय को सक्षम बनाने वाले प्रासंगिक प्रावधान को भी हटा देता है।

इस नई श्रेणी के जुड़ने से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान केवल दो श्रेणियों तक सीमित हो गई है: या तो सामाजिक-सांस्कृतिक-जैविक रूप से जन्मजात, या जबरन थोपी गई। इससे ट्रांसजेंडर समुदाय के एक बड़े हिस्से का निर्माण करने वाले ट्रांस-पुरुष, ट्रांस-महिला और जेंडरक्वीर व्यक्ति बाहर हो जाते हैं।

पहचान प्रमाण पत्र हासिल करने के लिए नई प्रक्रियाओं की शुरुआत -जिसमें बाहरी चिकित्सा सत्यापन भी शामिल है- 2019 के कानून से एक और अहम बदलाव है। हालांकि 2019 के कानून के अनुसार जिला मजिस्ट्रेट की स्वीकृति जरूरत थी। लेकिन स्व-पहचान को परिभाषाओं में शामिल किया गया था। अब एक चिकित्सा बोर्ड जिला मजिस्ट्रेट को सिफारिशें देगा।

ट्रांसजेंडर कम्युनिटी विरोध में क्यों है?

आत्मनिर्णय से संबंधित प्रावधानों को हटाए जाने के कारण पहचान का मिटना, ट्रांसजेंडर समुदाय द्वारा सरकार के खिलाफ उठाए जा रहे सबसे बड़े मुद्दों में से एक है। वहीं, मेडिकल बोर्ड की स्थापना और पहचान प्रमाण पत्रों को मंजूरी देने के लिए एक नए ढांचे को “मेडिकल गेटकीपिंग” करार दिया गया है। मुंबई क्वीर प्राइड ने इस सप्ताह की शुरुआत में एक बयान में कहा कि यह कानून “चिकित्सा जांच” की आड़ में उन्हें (ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को) मिटाने के लिए बनाया गया है।

यह बात भी उठाई जा रही है कि यह बिल सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक NALSA बनाम भारत संघ मामले के फैसले के खिलाफ है। तब सर्वोच्च अदालत ने कहा था,

“लिंग का स्व-निर्धारण व्यक्तिगत स्वायत्तता और आत्म-अभिव्यक्ति का अभिन्न अंग है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे में आता है।”

NALSA फैसले में हिजड़ों और किन्नरों को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी गई थी और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को स्वयं द्वारा निर्धारित लिंग का अधिकार दिया गया था। जिसमें राज्यों को उनकी लिंग पहचान को कानूनी मान्यता देने का निर्देश भी शामिल था।

समुदाय के सदस्यों ने यह भी आरोप लगाया है कि नए विधेयक को पेश करने से पहले उनसे कोई परामर्श नहीं किया गया। चिकित्सा बोर्ड की सिफारिश को शामिल करना ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की गरिमा पर हमला माना गया है। विधेयक में उन लोगों के लिए निवारण तंत्र का भी कोई उल्लेख नहीं है, जिनके पहचान प्रमाण पत्र के लिए आवेदन अस्वीकृत कर दिए गए हैं।

अमरेन्द्र यादव
अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...
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