Friday, March 20, 2026
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दृश्यम: विश्व सिनेमा में साल 2025 की चुनिंदा 10 श्रेष्ठ फिल्में

2025 में बनी जिन फिल्मों पर आदित्य ने यहां लिखा है, ये चुनिंदा फ़िल्में उस दृश्यात्मक शोर से अलग खड़ी हैं जो बाज़ार, सत्ता और प्रॉपगैंडा की मिलीभगत से पैदा होता है। यहाँ सिनेमा मनोरंजन से आगे जाकर प्रतिरोध, स्मृति, नैतिक द्वंद्व और मानवीय असहजताओं की भाषा बनता है। इन फिल्मों में कहीं तानाशाही के विरुद्ध खड़ा अकेला मनुष्य है, कहीं पूँजीवाद की निर्मम मशीनरी में पिसती ज़िंदगियाँ, कहीं स्त्री-अनुभवों की सूक्ष्म लेकिन निर्णायक आवाज़ें, और कहीं इतिहास, तकनीक व हिंसा के बीच फँसा आधुनिक अस्तित्व। यह सूची ‘श्रेष्ठ’ होने के दावे से ज़्यादा उस सिनेमा की ओर संकेत करती है जो सवाल करता है, बेचैन करता है और दर्शक को सुरक्षित सहमति के दायरे से बाहर खींच ले जाता है। 2025 की ये फ़िल्में हमें याद दिलाती हैं कि सिनेमा अब भी सत्ता का आईना नहीं, उसका प्रतिपक्ष हो सकता है।

सिनेमा एक रोचक कला-माध्यम है। पिछली एक शताब्दी से सिनेमा कला की दुनिया में शीर्षस्थ है। अपनी व्यापक पहुँच, भिन्न कलाओं को एक साथ लेकर आने की क्षमता, दृश्य विधा को अभिव्यक्ति की नई ऊँचाईयाँ देने के साथ-साथ सिनेमा अब एक बहुत बड़ा उद्योग भी है। बहुत-सी फ़ासीवादी और उपनिवेशवादी शक्तियाँ सिनेमा का उपयोग अपने अनुकूल प्रॉपगैंडा फैलाने में बहुत ही तेजी से कर रही हैं। ऐसे में सिनेमा से जुड़े हुए कलाकारों और सिनेप्रेमियों के सामने एक बड़ी चुनौती पेश आती है। ना सिर्फ़ इस प्रॉपगैंडा आधारित सिनेमा का बहिष्कार आवश्यक है बल्कि उसका प्रतिरोध और उसके मंसूबों का पर्दाफाश भी जरूरी कार्यभार है। हर साल दुनिया में हज़ारों फ़िल्में बनाई जाती हैं। हर साल वर्षांत पर बरस की श्रेष्ठ फ़िल्मों की सूचियाँ बनती हैं और पुरस्कारों की अग्रिम पंक्तियों पर सुगूबुगाहट फुसफुसाहट होने लगती है। लेकिन ऐसी किसी सूची को तैयार करना सही मायनों में एक चुनौतीपूर्ण काम है। आप इन हज़ारों फ़िल्मों में से कैसे कुछ फ़िल्में चुन सकते हैं? फिर भी तमाम फ़िल्म-उत्सवों, मीडिया बज्ज और प्लेटफॉर्म्स से गुज़रते हमारे सामने कुछ चुनिंदा फ़िल्मों की सूचियाँ उपलब्ध हो ही जाती हैं। इसी क्रम में साल २०२५ की कुछ चुनिंदा उल्लेखनीय फ़िल्मों की एक सूची यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। इस सूची में शामिल हैं कुछ जाने-पहचाने नाम और कुछ नए नाम। इस सूची में दो फ़िल्में तो ऐसी हैं जो महिला फिल्मकारों की पहली फ़ीचर फ़िल्म हैं। ये विविध रंग की फ़िल्में हैं और सिनेमा की व्यापकता को रेखांकित करती हैं।

इट वाज जस्ट एन एक्सीडेंट (It was just an Accident)

जाफ़र पनाही हमारे समय के फिल्मकारों में एक जीवित किंवदंती बन चुके हैं। 2010 में पहली बार गिरफ़्तार होने के बाद लंबे समय तक उन पर एक फिल्मकार के रूप में प्रतिबंध था, जिसपर कुछ छूट उन्हें हाल ही में मिली थी। प्रतिबंध के बीच उन्होंने कई फ़िल्में बनाईं जो मेटाफ़िक्शन थीं। एक लंबे अरसे बाद पनाही को एक समुचित फ़ीचर फ़िल्म बनाने का मौक़ा मिला। अपनी इस फ़िल्म के साथ कान फ़िल्म समारोह में जब पनाही भाग लेने फ्रांस आए थे, तब से वे ईरान नहीं लौटे हैं। यह फ़िल्म है इसी क़ैद और प्रताड़ना की कहानी। इसमें कोई संदेह नहीं कि पनाही प्रतिरोध के सिनेमा का पर्यायवाची बन चुके हैं।

ईरानी धर्मतंत्र अपने ख़िलाफ़ उठने बाली हर आवाज़ को नेस्तनाबूद करने और प्रतिरोध के सभी स्वरों को हर संभव प्रताड़ित करने के लिए कुख्यात है। महसा अमीनी की हत्या के बाद स्त्री-चेतना से उद्वेलित आंदोलन की यादें अभी हमारी स्मृति में बहुत पुरानी नहीं पड़ी हैं। इस फ़िल्म की पृष्ठभूमि यही प्रताड़नाएं हैं। जिसे चित्रित करने के लिए पनाही लौटे हैं अपने पसंदीदा जॉनर ‘रोड मूवी’ की ओर। यह फ़िल्म एक नैतिक विरोधाभास की फ़िल्म है। प्रतिशोध या दयालुता? अगर शोषित को अवसर मिले तो क्या वह शोषक को उन्हीं विधियों से प्रताड़ित कर सकता है जिससे उसे प्रताड़ित किया गया था? इसी सवाल का उत्तर ढूंढने के क्रम में प्रताड़ना के उपजे ट्रॉमा, सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार, तानाशाही और उसकी क्रूर प्रवृत्तियों का रहस्योद्घाटन करते हुए यह एक बहुत ही मानवीय फ़िल्म बन पड़ती है। फ़िल्म ना सिर्फ़ अपने चरित्रों के अतीत का पुनर्निरीक्षण करती है बल्कि आज में उसको खंगालती भी है – उनके ट्रॉमा को चुनौती देती है। आपने इतनी यातनाएँ जो सही हैं कहीं उसने आपको भी यांत्रिक और क्रूर तो नहीं बना दिया? आपको क्रूरता का अवसर देती है -आपके हाथ में अस्त्र देकर आपकी नैतिक परीक्षा लेती है। वैसे यह नैतिकता का थोड़ा ‘चुका’ हुआ मापदंड है। नैतिकता को सफेद स्याह में नहीं देखा जा सकता। मुझे नहीं लगता पनाही यहाँ अहिंसा का संदेश देना चाहते हैं बल्कि उसके सामने दूसरा सवाल है। क्या आप विपत्ति के सम्मुख अपना ‘स्व’ बचाकर रख पाते हैं? यह ‘स्व’ कोई नैतिक ‘स्व’ नहीं है बल्कि आपके बहुत निजी अस्तित्व से जुड़ा है। उसका रास्ता शोषक से भिन्न है वरना शोषक बनने के अनगिनत मौके उसके पास उपलब्ध रहते हैं। शोषक का चरित्र कुछ ऐसा है कि वह किन्हीं भी परिस्थिति में अपनी ताक़त को अक्षुण्ण बनाये रखना चाहता है। अगर किन्हीं वजहों से उसकी वल्नरेबिलिटी दिखाई दे जाये तो वह उसे भी ढँकने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार होगा।

फ़िल्म अपने उरूज पर एक रेगिस्तान में पहुँच जाती है। इस निर्जन रेगिस्तान में एक क़ब्र खुदी हुई है और क़ब्र के एक सिरे पर एक छोटा-सा पर्णविहीन पौधा है। जिसे देखकर सैमुअल बेकेट के मशहूर नाटक ‘वेटिंग फॉर गोडो’ की याद आती है। अधिनायकवाद के इस मरुस्थल में इस पेड़ से पीठ सटाकर बैठा हुए हैं तानाशाही के सताए हुए लोग और उन्हें इंतज़ार है एक जवाब का – उनके वैन में जो आदमी बंद है क्या वह वही व्यक्ति हैं जिसने वर्षों पहले उन्हें जेल में प्रताड़ित किया था? इस सवाल का जवाब भी गोडो की तरह है जो कभी आने का नाम नहीं लेता। इस प्रक्रिया में सभी प्रताड़ित आपसी संबंधों, अपने अतीत और अपनी मनुष्यता की पड़ताल में भिन्न मनोस्थितियों से गुजरते हुए रेगिस्तान से लेकर शहर तक अपना वैन लेकर घूमते रहते हैं।

फ़िल्म पैरानॉइया की गति से चलती है। कथावस्तु का रहस्य और रोमांच अंत तक बना रहता है बल्कि आख़िरी दृश्य तो दर्शक के सामने नए प्रश्न छोड़ जाती है। फ़िल्म हमें जिस यात्रा पर ले जाती है उसकी शुरुआत एक दुर्घटना से होती है लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सब कुछ सच सिर्फ़ एक दुर्घटना भर थी?

सेंटीमेंटल वैल्यू (Sentimental Value)

जिस चीज ने इस फ़िल्म की ओर सबसे पहले मेरा ध्यान आकर्षित किया, वह था इसका शीर्षक। एक नीरस नाम। सिनेमा जिस भव्यता या ड्रामा का प्रतीक है, ठीक उसके उलट – जैसे कोई दार्शनिक निबंध – किसी कौतुक या सिनेमाई जादू के वादों के ठीक विपरीत। इसका यह अर्थ भी नहीं कि फ़िल्म एक उबाऊ, उपदेशपरक या जटिल निबंध की भाषा में रची हुई है। यह एक रमणीय फ़िल्म है। व्यावसायिक सिनेमा के एक प्रतिपक्ष की तरह।

यह फ़िल्म बेशक इंगमार बर्गमैन की परंपरा की फ़िल्म है। मैं आम तौर पर इस तरह के उपमानों का समर्थक नहीं हूँ लेकिन इस फ़िल्म में कुछ तो ऐसा जादू है कि इसे देखते हुए बर्गमैन को याद किए बिना नहीं रह सकते। इसे देखते हुए एक बार आप भूल जाते हैं कि आप जोकिम ट्रायर की फ़िल्म देख रहे हैं। अब जाने यह फ़िल्म की तारीफ़ है या नहीं। यह फ़िल्म यादों की दुनिया में ले जाने वाली एक पारिवारिक गाथा है। एक परिवार जिसकी आज की कहानी में कई पीढ़ियों की यातनाओं और ट्रॉमा का ऐसा घालमेल है जो परिजनों के आपसी संबंधों को धूमिल करता है, उनके बीच गलतफहमी और पीढ़ियों के अंतराल को पोषित करता है।

अपने मूल में यह फ़िल्म एक विधुर पिता की अपने दो बेटियों से, ख़ासकर बड़ी बेटी से जटिल संबंधों की कथा है। फ़िल्म एक कविता की तरह शुरू होती है।पेड़ों और फूलों के बीच एक कत्थई रंग का घर। इस सुंदर घर की कहानी शुरू होती है नोरा के घर पर लिखे निबंध से। नोरा (बड़ी बेटी) अपने निबंध में लिखती है ‘घर का पेट गुडगुड़ाता है’। घर में एक कांच का टुकड़ा गिरता है तो नोरा सोचती है ‘क्या घर को भी चोट पहुँचती है?’ ‘घर दरारों से डावाँडोल है।’ इस घर में कई पुश्तों के जीवन का इतिहास है। इस घर में नोरा के माँ-बाप के झगड़े हैं। खामोशियाँ हैं, उदासी है। यह बहनापे की फ़िल्म भी है। सार्त्र ने एक जगह लिखा है ‘नियमतः अच्छे पिता जैसी कोई चीज नहीं होती, इसमें समस्या पुरुष के साथ नहीं बल्कि पिता नामक रिश्ते में छिपी है – यह एक अभिशप्त रिश्ता है।’ यह फ़िल्म इस अभिशप्त रिश्ते के रिडेम्पशन की गाथा है, भले ही रिडेम्पशन की यह यात्रा ऊबड़-खाबड़ क्यों ना हो। यह फ़िल्म कलाकारों के जटिल मनोभावों और रिश्तों की भी पड़ताल करती है – उनके ऊँचे आदर्श कितनी बार उनके व्यक्तिगत संबंधों को विकृत कर देते हैं।

यह फ़िल्म स्थापत्य की काव्य-गाथा भी है – एक घर जिसमें कितनी ही त्रासदियाँ और स्मृतियाँ अपनी कहानियाँ फुसफुसाती रहती हैं।

द मास्टरमाइंड (The Mastermind)

केली रिकार्ट ने अपनी फ़िल्मों से अमेरिकन सिनेमा में स्वतंत्र सिनेमा को नए अर्थ प्रदान किए हैं। इस क्रम में उनकी नई फ़िल्म ‘द मास्टरमाइंड’ एक शानदार प्रस्तुति है। यह एक फ़िल्म है कि धीमे जैज़ पर थिरकती एक दृश्य-कविता! वे एक मिनिमलिस्ट फिल्मकार हैं। अपनी थीम में तो यह एक डकैती की फ़िल्म है लेकिन यह डकैती की उन पारंपरिक फ़िल्मों जैसी फ़िल्म नहीं है, जिन्हें देखने के हम आदी हैं। सतह पर यह फ़िल्म एक असफल कला विद्यार्थी के ख़ुद को कुछ साबित करने की एक हताश यात्रा हो सकती है लेकिन केली की नज़र कहीं और है।

फ़िल्म एक कला-संग्रहालय में धीमी और लयात्मक धुन के साथ शुरू होती है। संग्रहालय में घूमते बच्चे गोदार की फ़िल्मों के चरित्रों की तरह एकालाप करते दिखाई देते हैं। इस फ़िल्म का बैकग्राउंड संगीत और सिनेमेटोग्राफी, दोनों ही ख़ास हैं। दृश्यों में सत्तर के दशक का भाव लाने के लिए इस्तेमाल किया हुआ कलर पैलेट बहुत मनभावन है।

फ़िल्म की शुरुआती दृश्यों में ही हमें वियतनाम युद्ध के संदर्भ अप्रत्यक्ष रूप से दिखाई देते हैं। एक स्थानीय कला-संग्रहालय में डकैती की योजना बनाने वाला जेबी अपने आप को एक महत्वपूर्ण व्यक्ति समझता है भले ही परिवार में उसकी हैसियत एक ‘लूजर’ जैसी है। जेबी, दास्तोएवस्की के राष्कलनिकोव की याद दिलाता है अलबत्ता उसमें राष्कलनिकोव जैसी मेधा नहीं है। पुनश्च मैं ख़ुद ऐसे उपमानों का समर्थक नहीं लेकिन यह फ़िल्म आपको रॉबर्ट ब्रेसाँ की फ़िल्म ‘पिकपॉकेट’ की याद भी दिलाती है। यह अस्वाभाविक नहीं है कि जेबी, राष्कलनिकोव के व्यंग्य-चित्र जैसा बन जाता है।

कला-संग्रहालय में आर्थर डव की अमूर्त कलाकृतियों की चोरी करने के बाद जब जेबी का एक साथी पकड़ा जाता है तो वह पुलिस को कला-डकैती का ‘मास्टरमाइंड’ बताता है। यह अलग बात है कि ना सिर्फ़ यह मास्टरमाइंड बल्कि चोरी की हुई कलाकृतियाँ भी आसानी से वापस मिल जाती हैं। फिर जेबी के पास भगोड़ा बनने के अलावे और कोई चारा नहीं बचता।

केली ने बहुत ही कुशलता से एक असफल डकैत के ग़लत निर्णयों के चित्रण के बहाने सत्तर के दशक के अमेरिका का चित्रण किया है। यह असफल डकैत अमेरिका का उपमान है जिसके सभी निर्णय ग़लत है – ठीक वैसे ही जैसे वियतनाम युद्ध। आम जनता में असंतोष है। जगह-जगह प्रतिरोध और धरने प्रदर्शन जारी हैं और एक असफल डकैत इसी में दबोच लिया जाता है – उसे लगता है पुलिस से गलती हुई है मगर..

नो अदर चॉइस (No Other Choice)

विकल्पहीनता – आज पूंजीवाद ने हमें इसी स्थिति में ला खड़ा किया है। यह विकल्पहीनता आम मनुष्य से उसकी मानवीयता छीनने का काम सबसे पहले करती है। उसे पलायनवादी, व्यक्तिवादी, आत्म-केंद्रित क्रूर बनाती है। इस विकल्पहीनता से उपजने वाली हिंसा, संघर्ष और अमानवीयता पर फ़िल्म बनाने के लिए पार्क चान वुक से बेहतर दूसरा कोई फ़िल्मकार नहीं। पार्क हिंसा से मनुष्य के संबंधों की पड़ताल करने की पैनी समझ रखते हैं। हम एक बदलते हुए विश्व-क्रम का हिस्सा हैं। लेकिन यह बदलता हुआ विश्व-क्रम सिर्फ़ अमानवीय नहीं है बल्कि अति-अमानवीय है। मशीनें और ऑटोमेशन धीरे-धीरे हमारे जीवन का हिस्सा बनते जा रहे हैं लेकिन उनकी यह दखलंदाजी एक भयानक भविष्य के आहट की गूँज भी है। जब हमारी अर्थव्यवस्था मशीनों पर पूरी तरह से आश्रित हो जाएगी, दूसरे शब्दों में जब मशीन मानवीय श्रम को पूरी तरह से प्रतिस्थापित कर देगा तब मनुष्य का क्या होगा?

निराशा हिंसा को भी जन्म दे सकती है। संकट के समय में मनुष्य अपना पुनर्निर्माण तभी कर सकता है जब उसके पास उस पुनर्निर्माण के संसाधन मौजूद हों। जब संकट तंत्र जनित हो, जैसे इस मामले में बेरोजगारी – यह ना सिर्फ़ मनुष्य के आपसी रिश्ते को तबाह कर सकती है बल्कि उसके पूरे मनोविज्ञान को बर्बाद कर सकती है और उसे नरक के रास्ते में धकेल सकती है। पार्क की इस फ़िल्म में सबसे मज़ेदार बात यह है कि नरक के इस रास्ते पर चलकर मनुष्य पराजित ही हो, अपराधी घोषित ही हो, यह जरूरी नहीं। क्या मालूम नरक का यह रास्ता मनुष्य को सफलता के दरवाजे तक ले जाए? पूंजीवाद ने अमानवीयता को सफलता के नैसर्गिक गुण के रूप में स्थापित किया है और हम इसका रूप अपनी नौकरियों, अकादमियों, सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों से लेकर अपने परिवारों तक में देखते हैं। यह कहानी, जो दूर से देखने पर एक बेरोज़गार द्वारा अपराध का रास्ता अख़्तियार करने की कहानी लगती है, असल मायनों में हमारी रोज़मर्रा की हकीकत है। जीवन की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में हम जीतने के लिए किसी को भी ख़त्म कर देने से गुरेज नहीं करते।

इन अर्थों में पार्क की यह फ़िल्म ना सिर्फ़ आधुनिक सभ्यता (दूसरे शब्दों में अमेरिकी पूँजीवाद जो ना सिर्फ़ पूंजीवाद है बल्कि उपनिवेशवाद भी) के भविष्य के अंधेरों को पड़ताल करती है बल्कि उसने हमारी मौजूदा सभ्यता को किस अंधेरी दलदल में फँसा दिया है, उसका एक जीता-जागता उदाहरण है।

लेफ्ट-हैंडेड गर्ल (Left-Handed Girl)

एक शहर का बाज़ार है और रंग है और रोशनियाँ हैं। एक हरकारा है जो अपनी दुकान का प्रचार एक छोटी-सी बच्ची से करवाता है और उसे उपहार में अपनी दुकान से सामान देता है। ताइपेई के नाईट मार्केट के इस दृश्य से यह ख़ास फ़िल्म शुरू होती है। फिल्मकार शी-चिंग सु की यह पहली फ़िल्म है जो पूरी तरह से आईफ़ोन पर शूट हुआ है। शी-चिंग ऑस्कर पुरस्कार विजेता फिल्मकार सान बेकर के साथ लंबे समय से काम कर रही हैं। इस फ़िल्म में भी उन्हें बेकर का बाक़ायदा सहयोग मिला है।

यह फ़िल्म स्त्री किरदारों की फ़िल्म है। एक औरत अपनी दो बच्चियों के साथ ताइपेई लौटती है और आजीविका के लिए ताइपेई के नाईट मार्केट में नूडल स्टैंड खोल लेती है। लेकिन जीवन इतना सीधा-सरल नहीं है। उनके जीवन में आर्थिक संघर्ष लगातार बना हुआ है। बड़ी लड़की अपनी माँ से बहुत खुश नहीं रहती है और नौकरी के वैकल्पिक अवसरों की तलाश में रहती है। छोटी बच्ची ई-जिंग स्कूल में है जिसे अपनी स्कूटी पर बिठाकर उसकी बड़ी बहन ताइपेई की सड़कों सपाटें मारती है।

फ़िल्म अलग पीढ़ियों की स्त्रियों के संबंधों का मार्मिक चित्रण करती है। इन संबंधों में सब कुछ है। उनका अतीत, उनका आज, उनके आर्थिक संघर्ष और अंधविश्वास। एक अंधविश्वास यह है कि बायाँ हाथ शैतान का हाथ होता है और अपने महत्वपूर्ण कामों को करने के लिए इस हाथ का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

पितृसत्ता के पास स्त्री को नियंत्रित रखने के बहुत से साधन हैं। लेकिन यह फ़िल्म स्त्रियों को इस मजबूत सत्ता के तमाम झमेलों से लोहा लेती दिखाती है। तीन पीढ़ी की स्त्रियाँ अपने-अपने तरीके से इससे टकराती हैं और सफल होती हैं। यह फ़िल्म वैसे किसी बड़ी लड़ाई की फ़िल्म नहीं है लेकिन पितृसत्ता ने स्त्रियों के जीवन में इतनी गहरी पैठ बना ली है कि अपने जीवन की छोटी-छोटी चीजों को हासिल करने के लिए भी उन्हें संघर्ष करना पड़ता है।

विमर्श की इन भारी-भरकम शब्दालवालियों से ऐसा लग सकता है कि यह कोई भारी फ़िल्म है। लेकिन इस फ़िल्म की सबसे बड़ी ख़ासियत यही है कि इन भारी-भरकम बातों को कहने के लिए एक सहज, मज़ेदार, दिल छू लेने वाली कहानी का इस्तेमाल एक प्रभावशाली फ़िल्म बनाने में किया गया है।

सीरत (Sirât)

यह एक अनोखी फ़िल्म है। यह उन फ़िल्मों में से है जिसे बहुत मक़बूलियत भले न हासिल हो लेकिन धीरे-धीरे ये अपना दर्शक वर्ग तैयार कर लेती हैं। ओलिवर लाक्स की यह फ़िल्म कई जॉनर की फ़िल्म एक साथ है – यह देखने में कभी किसी विज्ञान फ़ंतासी जैसी लगती है तो कभी क़यामत के बाद के बंजर संसार में भटकते कुछ दोस्तों के दुस्साहस की कहानी लगती है, तो कभी किसी म्यूजिकल की तरह और कभी किसी खोए हुए आदमी की तलाश में जूझते एक बाप-बेटे की जिजीविषा से भरे नाटक की तरह।

इसमें कोई शक नहीं कि यह फ़िल्म जॉर्ज मिलर की अविस्मरणीय फ़िल्म शृंखला मैड मैक्स की याद दिलाती है। इसमें भी मैड मैक्स विश्व जैसा एक पागलपन दिखाई देता है – रेगिस्तान में एक दूसरे से रेस लगाते खटारा ट्रक और उनके पीछे धीरे-धीरे चलता हुआ एक एसयूवी।

अब जबकि इस फ़िल्म को देखे हुए कुछ समय हो चुका है- मैं ख़ुद को ख़ुद से एक सवाल करते हुए पाता हूँ। ये फ़िल्म किस चीज़ के बारे में है? असल में इसका कोई एक जवाब अगर संभव हुआ तो वह होगा – सनक और आस्था के बारे में। इस फ़िल्म के सभी किरदार किसी ना किसी सनक के मारे हैं। उस सनक को हासिल करने के लिए वे सीरत का रूख करते हैं – सीरत, यानी एक ऐसा रास्ता जो दुधारी तलवार है, क़ुरान में यह रास्ता स्वर्ग जाने के लिए पार करना पड़ता है। तो लाक्से के चरित्र असल में इसी सीरत से गुज़र रहे हैं। क्या वे स्वर्ग तक पहुँच सकेंगे? तो इसी की कहानी है यह। यह एक अपरंपरागत फ़िल्म है। यह आपको कोई कहानी नहीं देती बल्कि आपको एक यात्रा देती है और उस यात्रा की पीड़ायें आपको देती है।

लेकिन इतना ध्यान रहे ये क़यामत के बाद की फ़िल्म है। सहरा में भटकते स्वर्गारोहियों के यात्रा की दास्तान है।

सॉरी, बेबी (Sorry, Baby)

यौन हिंसा एक ऐसा विषय है जो अपने साथ कई तरह की सनसनी लेकर आती है। पीड़िता को ना सिर्फ़ हिंसा और उसकी जटिलताओं, से जूझना पड़ता है बल्कि भिन्न सामाजिक ईकाइयों से भी जूझना पड़ता है, उसे शायद ही किसी सामाजिक ईकाई से वैसा सहयोग मिलता है, जिसकी उसे ऐसी स्थिति में दरकार होती है। यौन हिंसा के घाव ऐसे होते हैं जो आजीवन नहीं मिटते। पीड़िताएं अपनी परिस्थितिकी से बेहतर सहयोग की अपेक्षा रखती हैं।

एवा विक्टर की पहली फ़ीचर फ़िल्म इसी जटिल भावबोध से मुखातिब है। विक्टर ने इस जटिल भावबोध को बहुत सहजता से फिल्माया है। ट्रॉमा और उसकी यादें कितनी भी पीड़ादायी क्यों ना हो (ध्यातव्य है कि यह ट्रॉमा ऐसा ट्रॉमा है जो जीवन की गति को धीमा कर देता है।) स्त्री के पास उससे नेविगेट करने के अलावे और रास्ता क्या है, ख़ासकर तब जब उसे सामाजिक और सांस्कृतिक सहयोग ना के बराबर मिलता है। इस क्रूर संसार में जब कोई नई बच्ची आती है तो इन अनुभवों से गुज़र चुकी स्त्रियों के पास उनके लिए ‘सॉरी’ महसूस होना लाज़िमी है।

इन जटिल भावबोधों को यह फ़िल्म बहुत नैसर्गिक तरीक़े से निभाती है। क्रूरताओं पर हँसने के मौके बनाती है। इस फ़िल्म के अंतर्वस्तु में एक गहरी उदासी है फिर भी फ़िल्म अपने दर्शकों को हँसने के मौके देती है। उसका एक कारण यह है एवा विक्टर एक कॉमेडियन भी हैं। ट्रॉमा को हॉलीवुड में जिस तरह से दिखाने का चलन है, यह फ़िल्म उसे भी चुनौती देती है। ट्रॉमा के बाद की यात्रा मुश्किल जरूर होती है लेकिन आम स्त्री के पास अपनी भी प्रविधियाँ हैं जो उन्हें किसी नायक या खलनायक की श्रेणी में नहीं डालतीं बल्कि उन्हें एक सामान्य जीवन और उसके ढर्रे की रूपरेखा बनाने में मदद करती हैं।

इस विषय को अपनी इस ख़ास सुघड़ता और नैसर्गिकता से प्रस्तुत करने के वजह से विक्टर की इस फ़िल्म का साल की श्रेष्ठतम फ़िल्मों की सूची में होना अपरिहार्य है।

ट्रेन ड्रीम्स (Train Dreams)

ट्रेन के सपने.. इस फ़िल्म को पाथेर पांचाली के विख्यात ट्रेन दृश्य से जोड़कर याद करें। नए समय के नयेपन को हर तरह से हासिल करने के लिए मनुष्य की जिज्ञासा और उसकी पूर्वकथा। यह फ़िल्म कुछ वैसी ही है। क्लिंट बेंटले की इस फ़िल्म का नाम जब पहली बार सुनते हैं तो यह सवाल मन में आता है – ये ट्रेन के कौन-से सपने हैं? हमने बीसवीं सदी का वह युग तो देखा नहीं जब जगह-जगह रेल की पटरियाँ बिछ रहीं थीं – एक नया संसार – उसके साथ एक नए किस्म का उपनिवेशवाद पूरी दुनिया में फ़ैल रहा था। जो कलाकृतियाँ अपने साथ एक रहस्य छोड़ जाती हैं वे अपनी ओर ख़ामख़ा की आकर्षित करती हैं। रहस्य एक ऐसी चीज है जो दर्शक को कल्पना का असीमित अवसर देती है।

ट्रेन ड्रीम्स की दुनिया में कुछ रहस्य जरूर हैं लेकिन बाकी सब ज्ञात है। एक अनाथ बच्चा प्रेम करता है, घर बसाता है, रोजगार करता है, पिता बनता है और इन सबके बीच उसका अतीत एक अदृश्य रील की तरह चलता रहता है। उसकी यादों में कुछ ऐसे अपराधबोध हैं जिसके लिए वह सीधे-सीधे तो दोषी भी नहीं है लेकिन उसका निर्मल मन उन्हें याद करता रहता है।

यह फ़िल्म बीसवीं सदी में नई तकनीकी बदलावों से दो-चार होती लेकिन भ्रमित दुनिया में एक सामान्य आदमी के जीवन के शोकगीत की तरह है। उसने माँ-पिता का सुख नहीं पाया लेकिन उसने मित्र पाये, उसने प्यार किया, उसने पितृ-सुख जाना और फिर सब कुछ एक-एक करके खोने का दुख भी जाना। इस फ़िल्म में बीसवीं शताब्दी है, प्रकृति है, उसका विनाश है, नया संसार है और पुराने के खोने का दुख भी है। जैसा कि कथालोचक श्रुति कुमुद ने लिखा है ‘यह प्रशांत लय में रची एक फ़िल्म है।’

फ़िल्म ख़त्म होने तक आपने मन में एक झनझनाहट छोड़ जाती है। आप किसी घाटी में ख़ुद को अनुगूँज के साथ पाते हैं।

सिनर्स (Sinners)

रेयान कूग्लर की फ़िल्म ‘सिनर्स’ अपनी कई कमजोरियों के बावजूद एक उल्लेखनीय फ़िल्म है। है तो यह एक वैंपायर फ़िल्म लेकिन इस फ़िल्म के वैंपायर हैं – श्वेत श्रेष्ठतावादी। डोनाल्ड ट्रम्प के दुबारा राष्ट्रपति बनते ही अमेरिका में कई प्रतिक्रियावादी बदलाव देखने को मिलने लगे थे। डोनाल्ड ट्रम्प ना सिर्फ एक भयानक पूँजीपति हैं बल्कि वे कु क्लैक्स क्लैन की पृष्ठभूमि से आते हैं। उनकी सारी नीतियों के केंद्र में यही दो चीजें हैं – पूँजीवादियों को संरक्षण और कु क्लक्स क्लैन का पुनर्स्थापन। अमेरिका में प्रतिक्रियावाद बढ़ा है और उदारवादी नीतियों पर नित नए हमले हो रहे हैं। कु क्लक्स के वापस आने का मतलब है – श्वेत श्रेष्ठवादी मनोवृत्तियों का पोषण और अश्वेत नागरिकों के अधिकारों का हनन और उनके शोषण के नए तौर-तरीके।

कूग्लर की पिछली फ़िल्में भी अश्वेत प्रतिनिधित्व के विषयों पर केंद्रित थीं। यद्दपि कि वे एक व्यवसायिक फिल्मकार हैं और उनकी फ़िल्म ब्लैक पैंथर काफ़ी सफल रही है – इस फ़िल्म में वे कुछ नया हासिल करते दिखाई देते हैं। ना सिर्फ़ शैली के स्तर पर बल्कि नैरेटिव के स्तर पर भी। यह एक वेल क्राफ्टेड फ़िल्म है और अपने उद्देश्यों को बड़ी कुशलता से हासिल करती है। यह फ़िल्म अश्वेत नागरिकों ने संगीत से अटूट प्रेम के बारे में भी है, यह फ़िल्म श्वेतों द्वारा अश्वेत संगीत को अपना बनाने के प्रयासों की भी फ़िल्म है। हर स्तर पर यह फ़िल्म श्वेत-अश्वेत के द्वंद्व को रेखांकित करती है।

श्वेत सत्ता किस तरह से समावेशी होने का नाटक करके भी अश्वेत जीवन को अस्थिर कर सकते हैं, उन्हें उनके श्रम से हासिल की हुई सपत्तियों और प्रतिभा से हासिल की हुई सुंदरताओं से बेदख़ल कर सकते हैं – यह फ़िल्म इसी बारे में हैं। इस बात को कहने का तरीक़ा मनोरंजक तो है मगर प्रभावी है। फ़िल्म का नैरेटिव ऐसा नहीं है जिसे आप एक बार देखकर भूल जायें। यह फ़िल्म आपकी यादों में बने रहने के लिए है। रेयान कूग्लर आज के हॉलीवुड में वह काम कर रहे हैं जिसे कभी स्पाइक ली किया करते थे।

वन बैटल आफ्टर अनादर (One Battle After Another)

पॉल थॉमस एंडरसन एक मंझे हुए और स्थापित फ़िल्मकार हैं। उन्होंने कुछ बहुत ही शानदार फ़िल्में बनाई हैं। इस साल की श्रेष्ठतम फ़िल्मों की अधिकतर सूचियों में पॉल की यह फ़िल्म सबसे ऊपर है। ऐसे में मेरे लिए इस फ़िल्म का चुनाव करना मजबूरी है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह कि ये फ़िल्म समकालीन अमेरिका का चित्रण करने का दावा जरुर करती है लेकिन इसके मूल में वाम-विरोधी विचार हैं। इस फ़िल्म को देखकर लगता है मानो वाम जनसंघर्ष सिर्फ़ एक पिकनिक है। विरोध-प्रदर्शन पिकनिक मनाने के बहाने। जान-संघर्षों की सतही समझ रखने वाले अधिकतर उदारवादी विचारकों के विचार कुछ ऐसे ही होते हैं। यह तो फ़िल्म के विचार की बात हुई। बाक़ी स्तरों पर फ़िल्म भी भुला देने लायक ही है। इसे सिनेमा हॉल में देखते हुए एक सनसनी जरूर महसूस हो सकती है – फ़िल्म आपके डोपामाइन स्तर को बढ़ा सकती है। बॉक्स ऑफिस पर मिली अपार सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण यह भी हो सकता है। हॉलीवुड के पास प्रॉपगैंडा फ़िल्मों को मनोरंजन की तरह पेश करने के क्षमता है।

फ़िल्म जनसंघर्ष और सेना के जिस भिड़ंत को आधार बनाती है उसे व्यक्तिगत प्रतिशोध का मामला बनाकर बहुत ही अविश्वसनीय तरीके से पेश करती है। क्या कोई विद्रोही संगठन इस तरह से अमेरिकी सत्ता की स्मृति से गायब हो सकता है कि अंत में वह सिर्फ़ एक अकेले मेजर के लिए व्यक्तिगत मिशन बनकर रह जाता है? वो भी एक अंडरग्राउंड सोसाइटी का सदस्य बनने के लिए?

फ़िल्म व्हाइट सुप्रीमेसी जैसे मसले को संबोधित तो करती है लेकिन उसमें कोई वास्तविकत चिंता नहीं दिखाई देती। इसे सिर्फ़ मसाले की तरह इस्तेमाल किया गया लगता है। कुल मिलाकर फ़िल्म में अगर कुछ यादगार है तो बेनीचियो डेल तोरो का अभिनय और उनका मेक्सिकन शरणार्थियों का अंडरग्राउंड नेटवर्क।

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