Friday, March 20, 2026
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दृश्यम: वैधव्य से मुक्ति की रंगमंचीय घोषणा

भारतीय समाज में वैधव्य केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक कुरीतियों और नैतिक पाखंड का जटिल तंत्र रहा है। सुधार आंदोलनों और विधवा-विवाह जैसी पहलों के बावजूद यह समस्या आज भी नए-नए रूपों में मौजूद है। इसी ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि में पदमा सचदेव का उपन्यास ‘अब न बनेगी देहरी’ स्त्री की स्वतंत्र चेतना और निर्णायक स्वाभिमान की अभिव्यक्ति के रूप में सामने लाता है। भारतेंदु नाट्य अकादेमी के रंगमंडल द्वारा प्रस्तुत यह नाटक परंपरा, धर्म और लोकआस्था के बीच फँसी एक स्त्री की मुक्ति-यात्रा को संवेदनशीलता और नाटकीय सौंदर्य के साथ मंच पर रखता है।यहाँ ‘देहरी’ केवल एक संरचना नहीं, बल्कि सदियों पुराने सामाजिक बंधन का प्रतीक बनकर उभरती है।

भारतीय समाज में वैधव्य एक सामाजिक कुरीति के रूप में कुख्यात रहा है। सदियों तक। फिर उन्नीसवी सदी के कई बड़े सामाजिक विचारक और धर्मगुरू इसके विरुद्ध मोर्चा खोले रहे। राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर से लेकर दयानंद सरस्वती जैसों के नाम इस सिलसिले मे लिए जा सकते हैं। सावित्री बाई फूले का नाम भी इस कड़ी में लिया जाएगा। ये सूची औऱ भी लंबी हो सकती है। ऐसे ही मनीषियों और समाज सुधारकों के कारण भारत और खासकर हिंदू समाज में विधवा विवाह का चलन भी शुरू हुआ। लेकिन साथ ये भी कहा जाएगा कि लगभग दो सौ वर्षों के इस अभियान के बावजूद विधवाओं की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई, हालांकि कम हुई। फिर भी आज विधवाओं के लिए भारतीय समाज में कई संकट हैं। इसीलिए लेखकों ने भी इस समस्या को लेकर बहुत कुछ लिखा। डोगरी-हिंदी की लेखिका (अब दिवंगत) पदमा सचदेव के उपन्यास `अब न बनेगी देहरी’ में भी ये मसला उभरता है। वे अपने निजी जीवन में भी स्वाधीन रहीं और परंपरा के कई दबावों से मुक्त भी।

यहां ये भी बता देना जरूरी है कि जम्मू के इलाके में और डोगरी भाषा में भी देहरी का एक खास आशय है। पदमा सचदेव जम्मू की थी और डोगरी की लेखिका भी, इसलिए अपने स्थानीय समाज की कुरीतियों से भली भांति परिचित थीं। वहां यानी जम्मू के इलाके में विधवाओं के नाम पर यानी मऱणोपरांत देहरी (समाधि जैसी संरचना) बनती थी। लेकिन मरना सामान्य नहीं होता था। असामान्य होता था। फिर मरी हुई विधवा की समाधि बनाई जाती थी। यहां ये भी बता देना जरूरी है कि जम्मू के इलाके में कुछ देहरियां लोक देवताओं के नाम पर भी बनती रही हैं। आज भी।। लेकिन ज्यादातर विधवाओं के नाम पर। कह सकते हैं कि ये सब मरी या मारी गई विधवा को देवी बनाने का उपक्रम था। विधवाओं के सामाजिक, वैयक्तिक और आर्थिक अधिकार छीने जाते थे और फिर उनकी समाधि बना दी जाती थी। शायद अपराध बोध के कारण भी।

ये भूमिका इसलिए कि लखनऊ के भारतेंदु नाट्य अकादेमी के रंग मंडल ने अब न बनेगी देहरी’ को बतौर नाटक खेला। लखनऊ के संत गाडगे सभागार में 25 औऱ 26 दिसंबर 2025 को इसे प्रदर्शति किया गया। एक शानदार नाट्य प्रस्तुति। निर्देशक थे बिपिन कुमार जो इन दिनों भारतेंदु नाट्य अकादेमी के भी निदेशक हैं। नाट्य रूपांतरण आसिफ अली का था। बतौर नाटकअब न बनेगी देहरी’ मूल उपन्यास के इर्दिगिर्द रहा लेकिन कुछ जगहों पर आजादी भी ली गई। कुछ नवीन संकल्पनाएं भी उसमें जोड़ी गईं।

इस नाटक (और उपन्यास) के केंद्र में है रेवती। शादी के कुछ दिनों के बाद ही वो विधवा हो जाती है। जैसा कि समाज में होता रहा है उसे परिवार में भी लांछना मिलती है और समाज में भी। `शादी के बाद घर में आते ही मेरे बेटे को खा गई’ – इस तरह की दंश भरी बातें रेवती को सुनने को मिलती हैं। हालात इतने खराब हो जाते हैं कि रेवती आत्महत्या करने को सोचती है और गांव से बाहर निकलकर एक जलाशय में छलांग भी लगा देती है। लेकिन जलाशय के पास वाले मंदिर के महंत गिरी बाबा के प्रयास से वो बच जाती है और फिर मंदिर के पास ही रहने लगती है। आगे चलकर महंत औऱ रेवती के बीच एक कोमल संबंध विकसित होता है। हालांकि इस संबंध को थोड़ा काव्यात्मक बनाया गया है लेकिन संबंध तो बनता है। अब क्या होगा? रेवती तो महंत से शादी के लिए तैयार हो जाती है। लेकिन महंत गिरी को लोकलाज का भय है। आखिर वो मंदिर का मुख्य पुजारी औऱ महंत है। मान्यता के मुताबिक वो सांसारिक जीवन नहीं जी सकता। कैसे स्वीकार करे रेवती को?

तब निर्णय रेवती करती है कि उसे किसी के सहारे की जरूरत नही। वो मंदिर के परिसर को छोड़ देती है और गिरी को भी। जो होगा अब देखा जाएगा। वो अकेले निकल पड़ती है। अनजाने पथ पर। जो हो सो हो। इसी निश्चय में बसा है ये संकल्प कि अब उसकी देहरी नहीं बनेगी। और ये भी किसी की देहरी नहीं बननी चाहिए। मूल उपन्यास भी और इस नाटक रेवती की, एक विधवा की स्वतंत्र चेतना की अभिव्यक्ति है। कठिन परिस्थितियों वाले जीवन को स्वीकार करने का बयान है।

और गिरी का क्या? वो क्या करेगा? क्या वो पहले की तरह रोजमर्रे का सामान्य जीवन जीता रहेगा या फिर कुछ और करेगा? नाटक में जो अंत दिखाया गया है वो उसमें कुछ संकेत है लेकिन निश्चयात्मक रूप से कुछ नहीं। संकेत में ये है कि वो एक गुफा में प्रवेश कर जाता है। क्या वो भी समाधि ले लेता है? कह नहीं सकते किंतु कह भी सकते हैं। दर्शक जो भी अर्थ निकालना चाहे निकाल सकता है। फिर भी दृश्य के रूप में जो संकेत है वो प्रभावशाली है। पूरी तरह से तो नहीं लेकिन अभिनव गुप्त के गुफा प्रवेश से प्रभावित लगता है। हालांकि अभिनव गुप्त के बारे में भी ये किंवदंती ही है मगर किंवदंतयों का भी अपना प्रभाव होता है। लोकस्मृतियां कई बार आगे की कलात्मक कृतियों में उभर कर आती हैं।

बिपिन कुमार ने कई रंग युक्तियों का प्रयोग किया है। पहला तो ये एक अभिनेता को भगवान शिव के वेश में रखा है। वो मंच पर हमेशा बना रहता है। पर हमेशा मूक। बिना कुछ बोले हुए। कभी महंत गिरी शिवरूपी अभिनेता को गोद में उठा कर इधर उधर घूमता है, कभी उसके साथ खेलता है तो कभी उसके साथ बैठकर विचार की मुद्रा में आ जाता है। एक बार तो ये दिखाया गया है कि गिरी जब अतिशय भक्ति में आकर उस शिवरूप के सामने बेहोश हो जाता है तो कुछ लोग ये कहते हैं कि उसे शिवदर्शन हो गया है। फिर कुछ लोग उसकी पूजा करने की कोशिश करने लगते हैं। ये लोक की धर्म आस्था का एक रूप है जिसे नाटक में भी लाया गया है।

नाटकों की परंपरा में विदूषकों को बड़ी भूमिका रही है। ये भारतीय नाटकों में भी रहा है और पश्चिमी नाटकों में भी। विदूषक नाटक में हास्य रस की सृष्टि करने में सहायक होते हैं। और कहानी को आगे बढाने में भी। बिपिन कुमार ने इस नाटक में सीधे सीधे तो कोई विदूषक नहीं रखा है लेकिन गिरी बाबा के चेले के रूप में संकट मोचन नाम का जो चरित्र रखा है उसकी वही भूमिका है। चूंकि वो एक धार्मिक मंहत का चेला है इसलिए सीधे सीधे विदूषक के रूप में नहीं आ सकता। लेकिन जो भूमिका वे निभाता है वो विदूषक की संकल्पना को करीब है। और इसके कारण इस नाटक में हास्य के तत्व शुरू से आखिर तक मौजूद रहते हैं।

नाटक में कुछ प्रमुख चरित्रों को अलग अलग दिन दो दो कलाकारों ने निभाया। शिव के चरित्र के रूप में क्रमश: चैतन्य महाप्रभु त्रिपाठी और धीरज कुमार ने औऱ रेवती की भूमिका में क्रमश: श्रुतिकीर्ति सिंह और तिलारूपा सापकोटा ने। संकट मोचन की भूमिका में राजश्री रॉय चौधरी और अर्घ्य सामंत ने। लेकिन गिरीबाबा की भूमिका में अकेले आशुतोष जायसवाल थे। गिरीबाबा और रेवती के अंतर्मनों के भीतर चलने वालो द्वंद्वों को दिखाने के लिए भी कुछ कलाकारों का इस्तेमाल किया गया। जाहिर है कि जब कोई लेखक किसी चरित्र को सृजन करता है तो सिर्फ शब्दों के माध्यम से उसकी मनोवैज्ञानिक उलझनों और टकरावों को दिखाता है। लेकिन मंच पर उसे दिखाने के लिए निर्देशक को नाटकीय युक्तियां सृजित करनी पड़ती हैं। बिपिन कुमार ने उसे बखूबी किया है। इस काऱण दर्शक किसी चरित्र या चरित्रों के भीतर चल रहे आंतरिक संघर्षों को तीव्रता से महसूस करता है।

गांववालों और चेलों के कारण नाटक में पात्रों की संख्या बड़ी है। कई जगहों पर नृत्य संयोजन का भी प्रयोग किया गया। इसके कारण प्रस्तुति में बहु स्तरीयता आई। नाटक की प्रकाश योजना (हिमांशु बी जोशी) भी ऐसी है जो चरित्रों और दृश्यों में गहराई पैदा करती है। विशाला आर महाले की मंच परिकल्पना, गगनदीप कौर की वेशभूषा परिकल्पना, शिल्पिका बारदोलोई के नृत्य संयोजन और भास्कर ज्योति कुंवर के संगीत ने प्रस्तुति के विभिन्न आयामों को गहराई प्रदान की। जब मंहत गिरी और रेवती आकाश में पूर्णिमा की चांद को देखते हैं या ये कहें कि इस दृश्य को जिस तरह परिकल्पित किया गया है उसमें एक विशिष्ट प्रकार की कमनीयता है। उसका एक मौन प्रभाव है।

यहां ये कहना भी जरूरी है कि एक जमान में भारतेंदु नाट्य अकादेमी एक अत्यंत प्रतिष्ठित नाट्य संस्थान था। इसके पहले निदेशक राज बिसारिया थे जो जिनके पास नाट्य कला का एक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य़ था। फिर सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ और बीएम शाह जैसे निर्देशकों के पास इसकी जिम्मेदारी रही। लेकिन उसके बाद इस संस्थान का पतन होने लगा। ये किरानियों और अत्यंत निचले स्तर के नौकरशाहों के चंगुल में फंस गया। इसका रंगमंडल भी लंबे समय तक भंग रहा। प्रशिक्षण की स्तरीयता में भी गिरावट आई। इसे लेकर कई विवाद भी उठते रहे। लेकिन लगता है कि अब ये सब अतीत की बातें हो गई हैं। अब यहां अच्छे नाटक हो रहे हैं और माहौल भी बदला है। बरसों के बाद यहां का रंगमंडल भी फिर से अस्तित्व में आ गया है।

रवीन्द्र त्रिपाठी
रवीन्द्र त्रिपाठी
रवीन्द्र त्रिपाठी (जन्म 15 फरवरी, 1959), मेदिनीनगर/डालटनगंज, झारखंड। प्रिंट, टेलीविजन और सोशल-मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार, नाटककार, साहित्य-फिल्म-कला-रंगमंच आलोचक, व्यंग्यकार, डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर, यू- ट्यूबर, अनुवादक, स्क्रिप्ट-लेखक और संपादक। महात्मा गांधी के जीवन पर `पहला सत्याग्रही’ और स्वामी विवेकानंद के जीवन पर `विवेकानंद इन शिकागो’ नाटक लिखे। `कथा शिवपालगंज की’ , `राग विराग’ और `अज्ञातवास’ (तीनों श्रीलाल शुक्ल के उपन्यासों के नाट्य रूपांतर)। सभी नाटक मंचित। साहित्य अकादेमी और साहित्य कला परिषद के लिए डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण, एबीपी न्यूज के व्यंग्य-शो `पोलखोल’ के स्क्रिप्ट लेखक (शुरू में उसके प्रॉड्यूसर भी)। प्रसन्ना की पुस्तक `इंडियन मेथड इन एक्टिंग’ का `अभिनय की भारतीय पद्धति’ नाम से हिन्दी अनुवाद। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका `रंग प्रसंग’ और केंद्रीय हिन्दी संस्थान की पत्रिका `मीडिया विमर्श’ के अतिथि संपादक रहे।
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