Friday, April 3, 2026
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दृश्यम: शिक्षा, स्मृति और संघर्ष की जिद का मानवीय आख्यान: ‘दि फर्स्ट ग्रेडर’  

सिनेमा हमें सिर्फ कोई कहानी नहीं सुनाता,  बल्कि वह हमें इतिहास, स्मृति और मनुष्य की जिजीविषा के गहरे तल तल भी ले जा सकता है। ‘दि फर्स्ट ग्रेडर’ भी एक ऐसी ही  फिल्म है, जो एक 84 वर्षीय बुजुर्ग किमानी मारुगे के माध्यम से शिक्षा के अधिकार, औपनिवेशिक इतिहास और मानवीय गरिमा के प्रश्न को बेहद संवेदनशीलता के साथ सामने लाती है। यह फिल्म सीखने की इच्छा काअदम्य चत्सव है। साथ हीं उन अनकहे इतिहासों की भी पड़ताल है, जिन्हें अक्सर सत्ता और समय दोनों ही हाशिये पर डाल देते हैं।

2003 में केन्याई रेडियो पर एक घोषणा हुई कि केन्या सरकार सबको मुफ्त शिक्षा देने जा रही है। इस घोषणा के बाद 84 साल के एक बुजुर्ग ‘किमानी मारुगे’ भी पढ़ाई शुरू करने की ठानते हैं और पहुँच जाते हैं गाँव के प्राइमरी स्कूल के गेट पर।

स्कूल के सभी स्टाफ उनसे बुरा व्यवहार करते हैं और इसे बूढ़े की सनक मानते हैं। लेकिन स्कूल की संवेदनशील अध्यापिका ‘जाने’ उनसे सहानुभूति से पेश आती है और उनसे कहती है कि यह बच्चों का स्कूल है। सरकार का यह कार्यक्रम बच्चों के लिए है।

अंततः उन्हें बुजुर्गों वाले स्कूल जाने को बाध्य कर दिया जाता है। वहाँ वे महसूस करते हैं कि यहाँ न ही पढ़ने वाले बुजुर्गों में कोई उत्साह या सीखने की उत्सुकता है और न ही पढ़ाने वालों में ही कोई उत्साह है।

कुछ दिन बाद बुजुर्गों वाले अपने स्कूल को छोड़कर मारुगे अपनी पैंट को नीचे से काटकर बच्चों की यूनिफॉर्म में, जूता-मोजा पहनकर फिर आ जाते हैं। अंततः ‘जाने’ अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करके उन्हें प्रवेश दे देती है।

मारुगे बहुत लगन से सीखते हैं। लेकिन स्कूल का स्टाफ और बच्चों के अभिभावक इससे खुश नहीं हैं। गाँव के लोगों और बच्चों के अभिभावकों को लगता है कि जाने और मारुगे सिर्फ प्रसिद्ध होने के लिए ऐसा कर रहे हैं। गाँव वाले स्कूल पर आकर विरोध भी दर्ज करते हैं।

इसी दौरान जाने को पता चलता है कि मारुगे अंग्रेज उपनिवेशवादियों के खिलाफ ‘माउ-माउ’ आंदोलन में शामिल थे और इस कारण अंग्रेजों ने उनकी पत्नी और बच्चे की हत्या कर दी थी और मारुगे को भी काफी यातनाएँ दी थीं। संदर्भ के लिए बताते चलें कि यह वही ‘माउ-माउ’ आंदोलन था, जिसमें मशहूर लेखक न्गुगी वा थ्योंगो के बड़े भाई भूमिगत कार्यकर्ता थे, जो बाद में शहीद हो गए। बचपन में न्गुगी वा थ्योंगो इसी आंदोलन के लिए अपने बड़े भाई के निर्देशन में कुरियर का काम भी करते थे।

हालाँकि फिल्म यहाँ अनजाने में एक राजनीतिक चूक कर जाती है। दरअसल ‘माउ-माउ’ आंदोलन अंग्रेजों का दिया हुआ नाम है और केन्या के सचेत राष्ट्रवादी लोग इस नामकरण को अपमानजनक मानते हैं। वे इसके बजाय इस आंदोलन को ‘केन्या लैंड एंड फ्रीडम मूवमेंट’ कहना पसंद करते हैं। पटकथा लेखिका ने थोड़ा और शोध किया होता तो उन्हें निश्चित ही पता चलता कि असली मारुगे ‘माउ-माउ’ नामकरण को पसंद नहीं करते थे।

दरअसल मारुगे के रूप में ओलिवर लिटोंडो ने जिस तरह से इस भूमिका को निभाया है, वह कमाल का है। प्राकृतिक रोशनी में क्लोज-अप शॉट में ओलिवर लिटोंडो चेहरे पर अतीत की यातना और भविष्य की उम्मीद का जो भाव लाते हैं, वह असाधारण है। ओलिवर लिटोंडो केन्या के मशहूर पत्रकार रह चुके हैं और उन्हें केन्या का इतिहास पता है। इसलिए उनके लिए मारुगे की भूमिका बहुत मुश्किल नहीं थी। उन्होंने इसे सहज ही महसूस करके जिया है।

बहरहाल, स्कूल में जब उनसे अपनी पेंसिल को शार्प करने को कहा जाता है, तो उन्हें याद आता है कि इसी नुकीली पेंसिल से अंग्रेजों ने उन्हें टॉर्चर करने के दौरान उनका एक कान का पर्दा फाड़ डाला था। जाने का उनके प्रति सम्मान और बढ़ जाता है और जाने उन्हें स्कूल के अलावा निजी रूप से भी पढ़ाने लगती है। फिल्म में बीच में ऐसा दृश्य भी आता है जिससे पता चलता है कि केन्या का समाज कबीलों में बँटा है और उनके बीच तीखा तनाव है। मारुगे जिस कबीले से संबंधित हैं, वह अंग्रेजों से लगातार लड़ता रहा था।

जबकि स्कूल के डायरेक्टर व अन्य लोग उस कबीले से हैं, जो अंग्रेजों से समझौता किए रहा और आज़ादी के बाद पूरा फायदा उसी को मिला। मारुगे नफ़रत से कहते हैं कि अंग्रेजों के साथ उनकी समझौता-परस्ती की कीमत हमारे कबीले ने चुकाई, अपनी जान देकर।

यहाँ आकर साफ होता है कि मारुगे को स्कूल में न लिए जाने के पीछे यह तनाव भी काम कर रहा था। फिल्म में मारुगे के बहाने केन्या के औपनिवेशिक अतीत और अंग्रेजों से उनके हथियारबंद संघर्ष और अंग्रेजों के बर्बर दमन पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। मारुगे बच्चों से भी काफी घुल-मिल जाते हैं और उन्हें केन्या की स्वतंत्रता की कहानियाँ सुनाते हैं। वे बच्चों को आज़ादी का मतलब समझाते हैं। ये दृश्य काफी प्रभावोत्पादक हैं।

बहरहाल, फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है और मारुगे के कारण जाने को स्कूल का सीनियर स्टाफ काफी परेशान करता है। जाने का पति भी उसे इन पचड़ों से दूर रहने की सलाह देता है।

अंततः स्कूल के अधिकारी जाने का दूर कहीं स्थानांतरण कर देते हैं। जाने इससे काफी परेशान है। जाने के स्थान पर जिसकी नियुक्ति हुई है, बच्चे उसका बहिष्कार कर देते हैं। उधर मारुगे अपनी एकमात्र बकरी बेचकर राजधानी नैरोबी के लिए चल देते हैं।

वहाँ वह रिसेप्शनिस्ट के विरोध के बावजूद सीधे शिक्षा मंत्री के केबिन में घुस जाते हैं। वहाँ कोई महत्वपूर्ण मीटिंग चल रही होती है। मारुगे बेहद नाटकीय तरीके से वहाँ सबके बीच अपनी शर्ट उतारते हैं और शासक वर्ग के उन प्रतिनिधियों को अपने शरीर पर अंग्रेजों द्वारा दिए गए यातना के चिन्ह दिखाते हैं। मारुगे उन्हें बताते हैं कि जनता के अकूत बलिदान के कारण ही आज वे लोग यहाँ हैं। उन्हें यह याद रखना चाहिए तथा जनता के हित में काम करना चाहिए।

फिल्म के अगले दृश्य में पता चलता है कि जाने का स्थानांतरण रुक गया है।

फिल्म का अंतिम दृश्य बहुत ही मार्मिक है। मारुगे एक पत्र लेकर जाने के पास आते हैं और कहते हैं कि यह पत्र बहुत समय से मेरे पास है और इसे पढ़ने के लिए ही उन्होंने स्कूल आना शुरू किया था। लेकिन यह पत्र बहुत कठिन है, मुझे पढ़ने में दिक्कत हो रही है, तुम पढ़कर सुना दो। जाने पत्र पढ़ती रहती है और मारुगे रोते रहते हैं। जाने की आवाज़ भी भर्रा जाती है।

दरअसल, पत्र केन्या के राष्ट्रपति का था। इसमें मारुगे की केन्या के स्वतंत्रता आंदोलन में निभाई भूमिका की तारीफ़ की गई थी और इसके लिए उन्हें क्षतिपूर्ति देने की घोषणा की गई थी।

यह पत्र एक तरह से आज़ादी के बाद के केन्या की विडंबनापूर्ण स्थिति की ओर इशारा करता है।

दरअसल तीसरी दुनिया के ज्यादातर देशों की यही विडंबना है कि जिन्होंने देश की आज़ादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वे आज़ादी मिलने के बाद किनारे लगा दिए गए और जो उपनिवेशवादियों के साथ समझौतों में रहे, वे ही आज़ादी के बाद नए शासक बन बैठे।

क्या अपने देश की भी यही स्थिति नहीं है?

यह फिल्म एक सच्ची घटना पर आधारित है। 2004 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी मारुगे को उनकी जुझारू इच्छाशक्ति के लिए सम्मानित किया था। 2009 में मारुगे की मृत्यु हुई। मारुगे के बारे में एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि उनका नाम गिनीज बुक में दर्ज है, सबसे अधिक उम्र में प्राइमरी स्कूल में प्रवेश लेने वाले व्यक्ति के रूप में।

हम लोग प्रायः नायक/नायिका के रूप में गोरे लोगों को परदे पर देखने के आदी रहे हैं। हिंदी फिल्मों में अक्सर यह होता है कि नायक गोरा और खलनायक काले रंग का होता है। यह हमारी औपनिवेशिक/सामंती मानसिकता को दर्शाता है। लेकिन इस फिल्म में सभी पात्र काले हैं।

सिनेमाटोग्राफर रॉब हार्डी सूर्य की रोशनी के साथ जिस तरह से क्लोज-अप, विशेषकर मारुगे का, का इस्तेमाल करते हैं, वह इस फिल्म को हॉलीवुड/बॉलीवुड की कृत्रिम सुंदरता के खिलाफ एक बेहद प्राकृतिक सौंदर्य की ताज़गी से भर देता है। जाने का बिना किसी मेकअप के प्राकृतिक प्रकाश में मारुगे के साथ फ्रेम साझा करना दर्शकों को मनुष्यता की सच्चाई की तरफ ले जाता है।

इस फिल्म की तैयारी के सिलसिले में रॉब हार्डी ने केन्या के लोगों के हावभाव और जीवन का काफी अध्ययन किया और अपने कैमरे में वही एंगल लिया, जो इस स्वाभाविक जेस्चर को पकड़ सके और फिल्म को किसी भी कृत्रिमता से बचा सके। यही कारण है कि इसमें बच्चे अभिनय करते प्रतीत नहीं होते और मारुगे के साथ बच्चों का रिश्ता बहुत ही सहज लगता है। बच्चों की आँखों में पल रहे सपनों और शरारतों को बहुत शानदार तरीके से रॉब हार्डी ने पकड़ा है।

इस फिल्म का निर्देशन जस्टिन चाडविक ने किया है। एलेक्स हेफेस का संगीत भी कुल मिलाकर ठीक है और फिल्म के मूड के साथ अपनी संगति बनाए रखता है।

दरअसल इस फिल्म के निर्माता सैम फ्युए ने मारुगे के बारे में सबसे पहले लॉस एंजेलिस टाइम्स के पहले पन्ने पर एक रिपोर्ट पढ़ी। इसके बाद उन्होंने दक्षिण अफ्रीका की मशहूर पटकथा लेखिका ऐन पीकॉक से इसे स्क्रीनप्ले में बदलने का आग्रह किया और ऐन पीकॉक ने महज़ एक न्यूज़ रिपोर्ट को शानदार पटकथा में बदल डाला। निश्चित ही इसके लिए उन्हें काफी शोध भी करना पड़ा होगा।

यह भी पढ़ें- दृश्यम- सीता बनवास- मिथक, मंच और समकालीनता

मनीष आजाद
मनीष आजाद
मनीष आजाद कवि, अनुवादक, लेखक व राजनीति कार्यकर्ता हैं।
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