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विरासतनामा: भाखड़ा बांध और बिलासपुर रियासत की भूली हुई कुर्बानी

भाखड़ा बांध निस्संदेह भारत की प्रगति का स्तंभ है, लेकिन विकास की किसी भी गाथा में उन लोगों की कुर्बानियों को नहीं भुलाया जा सकता जिन्होंने अपनी धरती, अपना इतिहास, अपनी यादें और अपना भविष्य देश के लिए न्यौछावर कर दिया।

भाखड़ा बांध देश के विकास की सबसे बड़ी परियोजनाओं में से एक माना जाता है। इसे “आधुनिक भारत के मंदिर” कहकर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्र को समर्पित किया था। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली, इन सभी इलाक़ों में हरियाली, पीने का पानी, औद्योगिक ऊर्जा और सिंचाई व्यवस्था के पीछे कहीं-न-कहीं भाखड़ा बांध की भूमिका खड़ी दिखाई देती है। लेकिन इसी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जो उतना उजला नहीं। एक ऐसा पहलू, जिसे इतिहास ने लगभग अनदेखा कर दिया। यह पहलू है बिलासपुर रियासत, उसके लोगों और विशेषकर राजा आनंद चंद की कुर्बानी का।

बांध की कल्पना: सूखे की पीड़ा और नदियों का समाधान

भाखड़ा बांध की योजना कोई आजादी बाद की अचानक उपजी सोच नहीं थी। इसकी नींव 1918 में संयुक्त पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर लुईस डान के समय रखी गई। बाद में 1938-39 के भीषण सूखे ने पंजाब के हिसार और रोहतक को झकझोर दिया। शक्ति सिंह चंदेल अपनी पुस्तक Bilaspur Through the Century में लिखते हैं कि उस साल हजारों लोग और पशु पानी की कमी से मर गए थे। इस त्रासदी के बाद भाखड़ा परियोजना पर गंभीरता से पुनर्विचार शुरू हुआ।

रोहतक के सर छोटू राम, जो उस समय पंजाब के रेवेन्यू मंत्री थे, ने इस योजना को फिर से आगे बढ़ाया। वे 1938 में कहलूर (बिलासपुर) रियासत में भाखड़ा क्षेत्र का दौरा करने आए, जहाँ उनकी मुलाकात इस रियासत के राजा आनंद चंद से हुई। पंजाब के चीफ इंजीनियर और फ़ाइनांस कमिश्नर भी बिलासपुर पहुंचे। 1944 में सर छोटू राम और राजा बिलासपुर के बीच समझौता प्रारूप तैयार हुआ, जिसे 8 जनवरी 1945 को अंतिम रूप दिया गया। यह समझौता इस बात को स्वीकार करता था कि बांध के कारण बिलासपुर की विशाल भूमि डूबेगी लेकिन इसके बदले बिजली उत्पादन पर रॉयल्टी और कुछ मुआवजा बिलासपुर राज्य को दिया जाएगा!

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। 1948 में बिलासपुर रियासत आधुनिक भारत का हिस्सा बन गई और इस समझौते का औपचारिक अनुबंध कभी हस्ताक्षरित नहीं हो पाया।

राजा आनंद चंद से किए सरकारी करार की वादाखिलाफी

भाखड़ा परियोजना को लेकर राजा आनंद चंद और पंजाब सरकार के इंजीनियर ए.एन. खोसला के बीच कई दौर की बातचीत हुई। राजा की सबसे बड़ी मांग यही थी कि बांध की ऊँचाई 1580 फीट रखी जाए ताकि झील का जलस्तर सांडू मैदान से 20 फीट नीचे रहे। ऐसा होता तो न शहर डूबता, न महल, न मंदिर, न वे मैदान जिनमें बिलासपुर की परंपराएं सांस लेती थीं।

आजादी के बाद यह सहमति टूट गई। नई योजना में बांध की ऊँचाई 100 फीट और बढ़ाकर 1680 फीट कर दी गई। नतीजतन, 18,067 एकड़ भूमि के बजाय 63,410 एकड़ भूमि डूब गई। लगभग 8,000 परिवार विस्थापित हुए। सदियों पुराना बिलासपुर शहर, उसका बाज़ार, मंदिर, राजमहल, घाटी और सुप्रसिद्ध सांडू मैदान, सब 9 अगस्त 1961 को पानी में समा गए।

आज उन्हीं स्थानों पर विश्व की सबसे बड़ी मानव निर्मित झीलों में से एक, गोविंद सागर झील लहरा रही है लेकिन उसकी सतह के नीचे बिलासपुर की सांस्कृतिक स्मृतियाँ हमेशा के लिए दफ्न हैं।

नए बिलासपुर के निर्माण का अधूरा मंसूबा

पुराने शहर के जलमग्न होने का मुद्दा राजा आनंद चंद ने भारत सरकार के सामने पूरी मजबूती से उठाया। इसके बाद भारत सरकार के चीफ आर्किटेक्ट जुगलेकर ने नए शहर का नक़्शा बनाया। 1956 में निर्माण शुरू हुआ और 1963 में नया बिलासपुर अस्तित्व में आया। प्रारंभ में यह शहर तीन सेक्टर, रौड़ा, डियारा और चंगर, के रूप में विकसित होना था लेकिन लोगों के अपने-अपने निर्माण कार्यों के कारण योजनागत स्वरूप बिगड़ गया।

राजा आनंद चंद ने विस्थापित परिवारों के पुनर्वास, सी-स्टेट का दर्जा दिलाने और जमीन उपलब्ध करवाने में अहम भूमिका निभाई। सरकार ने राजा को 300 एकड़ भूमि देने का वादा किया था, जो आज तक पूरा नहीं हुआ।

बिलासपुर के महल, बाग़, चश्मे, जल स्रोत, सार्वजनिक स्नानागार, सब झील की गाद में समा गए। बिलासपुर की पहचान रहा भंजवानी पुल भी गोविंद सागर का हिस्सा बन गया।

उत्तर भारत की सम्पन्नता का एक नया अध्याय शुरू हुआ लेकिन बिलासपुर की झोली में आया विस्थापन।

इतिहास की चुप्पी और बदलती कथाएँ

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि जिस शासक ने अपने राज्य के भूगोल, संस्कृति और सदियों पुरानी विरासत को देश निर्माण के लिए समर्पित कर दी, उसका नाम मुख्यधारा के इतिहास में सम्मानपूर्वक क्यों नहीं दर्ज है?

आज पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान जैसे क्षेत्र भाखड़ा बांध के लाभ से समृद्ध हैं, जबकि हिमाचल प्रदेश को अपने हिस्से की रॉयल्टी के लिए अब भी न्यायिक लड़ाई लड़नी पड़ रही है।

विडंबना यह भी है कि हमारे समाज में कई बार इतिहास को सरल बनाने की कोशिश में ऐसे एकतरफा आख्यान दोहराए जाते हैं, जो स्थानीय शासकों और उनके योगदान को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। लेकिन जब हम भाखड़ा परियोजना को देखते हैं, तो साफ़ समझ आता है कि क्षेत्रीय नेतृत्व, स्थानीय समुदायों और तत्कालीन बिलासपुर शासक की भूमिका देश के विकास में बेहद महत्वपूर्ण थी। राजा आनंद चंद का योगदान इसी उपेक्षित अध्याय का एक प्रमुख उदाहरण है।

अपनी जड़ों को जुड़ाव की जरूरत

भाखड़ा बांध निस्संदेह भारत की प्रगति का स्तंभ है, लेकिन विकास की किसी भी गाथा में उन लोगों की कुर्बानियों को नहीं भुलाया जा सकता जिन्होंने अपनी धरती, अपना इतिहास, अपनी यादें और अपना भविष्य देश के लिए न्यौछावर कर दिया।

राजा आनंद चंद और बिलासपुर के हजारों परिवारों की कुर्बानी कोई हाशिए का फुटनोट नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की असली नींव है। विकास के हर चमकते अध्याय के पीछे ऐसी अनगिनत कहानियाँ दबी बैठी हैं; सवाल सिर्फ इतना है कि क्या हम उन्हें सुनने और स्वीकार करने का साहस रखते हैं?

ऐश्वर्या ठाकुर
ऐश्वर्या ठाकुर
आर्किटेक्ट और लेखक; वास्तुकला, धरोहर और संस्कृति के विषय पर लिखना-बोलना।
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