Saturday, November 29, 2025
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थार की कहानियां: मांगणियार- मरुस्थल की संस्कृति के ध्वजवाहक

मांगणियारो का पूरा परिवार ही संगीत से जुड़ा होता है। पुरुष, महिला, बच्चे, बुजुर्ग सब। हर मांगणिहार परिवार का एक ‘जागीरदार परिवार’ से पीढ़ियों पुराना संबंध होता था। उन्हीं के घर जाकर अपने संगीत के बदले में ‘दान’ या ‘नजराना’ प्राप्त करते थे।

माता वाघेली राधका ,पिता राणो गहपुर
जिणघर जसवंत जिलमियो,सुख सा उगो सुर…

बिचल खान ये शुभराज कहने के बाद कोटड़ी में बैठ जाता है। जीसा उसकी ओर देखकर हल्का सा मुस्कुराकर कहते है “आओ रा”।

होली आने ही वाली है सो मौसम बड़ा सुहाना हो रखा है। सर्दी अभी ठीक से गयी भी नहीं है। कोटड़ी में चहल पहल लगी है। घर के लोग इधर उधर काम में लगे है, मेहमानों के आने में अभी देर है। होली के वक्त यहाँ ढूंढ उत्सव होता है। बेटा होने पर उसके ननिहाल वाले अपने भांजे के लिए कपड़े, गहने, खिलौने आदि लेकर आते है। अच्छा और बड़ा उत्सव होता है। बस इसी की तैयारी जारी है। बिचल खान पहले ही आ गया है और जीसा के साथ जोड़ी जमती भी खूब है सो बैठे हथाई कर रहे है।

जीसा बिचल के पिताजी लूणा जी जिन्होंने उपरोक्त शुभराज लिखा था को याद करते हुए कहते है ” कितने भले और काबिल इंसान थे। मुझसे बड़ा लगाव था। मैं घर में छोटा था फिर भी शुभराज मेरा ही लिखा। ऐसे लोग अब कहाँ बचे ? “

शुभराज में मांगणियार अपने संरक्षक जागीरदार परिवार की पीढ़ियों का यशोगान काव्यात्मक रूप में करते है।

आगे याददाश्त पर जोर देते हुए जीसा कहते है कि “तब साधन तो थे ही कहाँ। इतना अभाव और मुश्किलों भरा जीवन। पर ऐसे में भी अपने जीवन के दर्द को एकतरफ रख लूणा जी ने एक से बढ़कर एक गीत गाए और लोक संगीत को जीवित रखा।”

ये सब बातचीत सुन रहा एक गुजराती युवा जीसा से पूछता है “ये गीत गाने वाले और दोहे कहने वाले लोग जिन्हें आप याद कर रहे है, ये कौन है ? “

गुजरात में इस इलाके की खूब रिश्तेदारी है,सिंध की तरह ये भी नजदीक पड़ता है। रिश्तों और फासलों का कैसा अजीब जोड़ा है।

जीसा ने उस शहरी युवा से कहा ” ये मांगणियार है और पीढ़ियों से अपने साथ परिवार की तरह रहते आए है। ये ही वो लोग है जिन्होंने थार के लोक संगीत को देश और दुनिया में गुंजायमान कर दिया है। हमारी वेशभूषा और संस्कृति के सच्चे वाहक है। बच्चे के जन्म हो या बेटी की विदाई, विवाह का अवसर हो या पीहर की याद, प्रेम या जुदाई का भाव हो, श्रृंगार रस, वीर रस या फिर गहरे भक्ति के भाव और रीति रिवाज की बात हो। हर भाव और अवसर पर इन्होंने सैकड़ों गीत लिखे और गाए है। शास्त्रीय संगीत के तमाम नियमों से बंधे हुए और उतने ही लोकप्रिय संगीत की रचना करने वाली कौम है ये। थार के इस रेगिस्तान में इनके ये खनकते स्वर ही थे जिनसे जीवन में रौनक रहती थी।”

पुत्र के जन्म पर “हाले रे हिलरियो रो हालो सा…थे तो दूध पताशा जीमो जीमो सा…” या फिर बेटी की विदाई के वक्त गया जाना वाला ” डोरो “गीत जिसे सुनकर क्या औरतें क्या आदमी सभी की आँखें में आंसू होते थे। इस गीत का इतना प्रभाव था कि विवाह के कई कई वर्षों बाद भी पीहर की याद में महिलाओं की आँखें भर आती थी। “पधारो म्हारे देश” गीत तो राजस्थान का परिचय ही हो गया है। झेडर, अरणी, कांगसियो, राणलियों, बीटी,गोरबंध,रायचंद,चिरमी आदि सैकड़ों पुराने गीत है जो पुराने लोगों को मुख जुबानी याद है।”

ये लोग खमायचा,हारमोनियम,डफ, ढोलक, खड़ताल, मंजीरा, ढोल ,सारंगी और मोरचंग आदि वाद्ययंत्रों का प्रयोग करते हैं।

मांगणियारो का पूरा परिवार ही संगीत से जुड़ा होता है। पुरुष,महिला,बच्चे,बुजुर्ग सब। आदमी बाहर कोटड़ी में गीत गाते तो इनकी महिलाएं जनाना ड्योढ़ी में गाती। ढोलण जी या मांगणियारी आंगन के बीच मे ढोल लेकर गीत गाती और उसके चारों तरफ गोल घेरे में राजपूत महिलाएं घूमर करती। घूमर नृत्य पूरी तरह महिलाओं का निजी कार्यक्रम होता, जिसमें किसी पुरुष का प्रवेश नहीं होता था।

ऐसी रोचक पुरानी बातें हो रही होती है तो बरबस ही लोग पास आकर बैठना शुरू कर देते है। ऐसे ही जीसा की पुरानी बातें सुनने अब कोटडी में आठ दस और लोग एकत्रित हो गए थे। थार के गांवों में बड़ी फुरसत रहती है।आयोजन भी खूब बातें करने, मिलने और गहरा परिचय करने का माध्यम होते है। शहरों की तरह एक औपचारिकता और दौड़ भाग नहीं होती।

इस बीच बिचल खान बोल उठा ” ये तो इनका बड़प्पन है कि हमारे इतने बखान कर रहे है। वरना हकीकत यह है कि इन्होंने अपनी औलाद की तरह हमें पाला है। आज जैसी सुख सुविधा और साधन पहले नहीं होते थे। इतना पैसा भी नहीं था। अक्सर अकाल पड़ते थे और खाने के लिए भी संघर्ष रहता था। ऐसे कठिन समय में भी खुद पेट पर पत्थर रखकर हमे और हमारे परिवार को पीढ़ियों तक पाला है।”

हर मांगणिहार परिवार का एक “जागीरदार परिवार” से पीढ़ियों पुराना संबंध होता था। उन्हीं के घर जाकर अपने संगीत के बदले में “दान” या “नज़राना” प्राप्त करते थे।

इतने में एक जिज्ञासु युवा ने जीसा से सवाल किया कि “आप इनके नाम के पीछे खान लगा रहे हो, ये मुसलमान है क्या ?”

जीसा बोले ” ये पारंपरिक रूप से मुस्लिम हैं, लेकिन इनकी संस्कृति, संगीत और आस्था में हिंदू परंपराओं का गहरा प्रभाव है। हमारे परिवारों में जन्म से लेकर मृत्यु तक हर सुख दुःख में इनकी उपस्थिति अनिवार्य है। जितना हम हमारे परम्परा और रीति रिवाज के बारे में नहीं जानते होंगे उनसे ज्यादा इन्हें पता है,उल्टा कुछ पूछना है तो उनसे पूछते है। आजकल जहां बच्चों को अपनी तीसरी पीढ़ी का नाम नहीं पता वहीं ये हमारी पच्चास पीढ़ियों के नाम मुख जुबानी याद रखते है। यही तो इस रेगिस्तानी मिट्टी की खासियत है कि यहाँ सिर्फ कहने भर को धार्मिक सद्भाव नहीं है ,बल्कि ये हमारे जीवन का हिस्सा है। और हम आपस में इतने घुल मिल गए है कि अलग से कुछ अतिरिक्त प्रयास नहीं करने पड़ते एकता कायम करने के लिए। इनके नाम भी अक्सर हिंदुओं जैसे होते है, बस पीछे खान लगा देते है। इन्हीं की तरह ढोली होते है वो हिंदू होते है। बाकी लंगा और मांगणियार मुस्लिम है। इनके यहां भी कोई विवाह प्रसंग हो तो सब भाई मिलकर पूरा सहयोग करते है। बेटी का विवाह हो तो सब अपनी ही बेटी की तरह लाड कोड से विदा करते है। इनके यहां मृत्यु के बाद “धम्म” का आयोजन किया जाता है। काफी बड़ा और खर्चीला सामाजिक कार्यक्रम होता है। इसमें भी इनके जजमान ही सब व्यवस्था देखते है।”

जीसा का ये जवाब सुनकर उस युवा के चेहरे पर बड़ी उलझन के से भाव थे। वो सोचने लगा कि कहाँ तो देश दुनिया में धर्म के नाम पर झगड़े फसाद हो रहे है और एक ये लोग है जो बिना किसी प्रचार के इतनी सहजता से भाइयों की तरह रह रहे है।

बातों ही बातों में काफी वक्त निकल गया था। मेहमान आ गए थे। कोटड़ी अब खचाखच भरी हुई है। बिचल खान खमायचा (ऊँट की खाल और लकड़ी से बना तार वाद्य है) के साथ अपने चिर परिचित पारंपरिक सुर और लय में मेहमानों के स्वागत में “म्हारा मिठिया मेहमान घरे आव्या सा…” गा रहा है। घर के बड़े लोग मेहमानों पर पैसों की निछरावल करके बिचल को दे रहे है।

कोटडी में बड़े लोग बैठे होते है तो युवा उनके सम्मान में सामने बैठते नहीं। अतः कुछ लोग बाहर आपस में बात कर रहे थे “आज डिजिटल युग में मांगणियार टीवी और फिल्मों में भी गाने लगे है। विदेशों में भी जाकर कार्यक्रम करना आम हो गया है। राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार भी मिलने लगे है। फिर भी इनकी कला को जिस सरकारी संरक्षण की आवश्यकता वो अब भी नहीं मिल पाई है। आरक्षण का भी इन्हें कोई खास लाभ नहीं मिला। अतिरिक्त पिछड़ा वर्ग में ही डाल रखा जहां ये कहीं टिकते नहीं। कायदे से इन्हें विशेष आरक्षण दिया जाना चाहिए ताकि ये रोजी रोटी की चिंता से मुक्त होकर हमारी संस्कृति के सच्चे ध्वजवाहक बने रहे। फिर भी हमारी परंपरा और संस्कृति के सच्चे ब्रांड एंबेसेडर होने के नाते ये जहाँ मिले इनका सम्मान और सहयोग किया जाना चाहिए।”

महेंद्र सिंह तारातरा
महेंद्र सिंह तारातरा
सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र लेखक। भाषा, इतिहास और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन को लेकर सक्रिय।
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2 COMMENTS

  1. बहुत बहुत धन्यवाद सर श्री महेन्द्र सिंह जी तारातरा
    खम्माघणी हुक्म
    आपका आलेख बहुत ही अच्छा व मिरासी मांगनियार समुदाय के लिए हितकारी है। भगवान् आपको खुश सुखी व दीर्घायु रखे। माताजी मां नागणेच्या राय की आप सदैव कृपा दृष्टि बनी रहे।
    सादर
    आपका शुभचिंतक हाजी रहीम खान सीमा बाड़मेर

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