होलिका दहन का दूसरा दिन है। रंग, रियाण और ऊँटो की दौड़ का दिन। शाम होने को आई है, लोग पूरा दिन होली खेलकर और खा पीकर थोड़े थके से भी है, इसलिए जहाँ जगह मिली वहीं पसर कर बैठे हैं।
मठ के पास वाले मैदान में हर वर्ष की भांति इस बार भी ऊंटों की दौड़ होने वाली है। अवतार भी अपने दाता के साथ दौड़ देखने आया है। स्कूल की दीवार पर दादा पोता दोनों बैठे दौड़ शुरू होने का इंतजार कर रहे है। अवतार अपने दादाजी से पूछता है “दाता ये ऊँटो के गले में रंगबिरंगी क्या चीज डाल रखी है ?”
दाता बताते है ” बेटा, इस रेगिस्तानी इलाके में ऊँट ही अपने सुख दुःख का साथी है। इसलिए इसे जानवर न मानकर अपने परिवार के सदस्य की तरह ही सार संभाल की जाती है। जितना श्रृंगार महिला और पुरुष करते है उतना ही ऊंटों का भी किया जाता है। अपने यहां प्रकृति ने रंग कम ही दिए इसलिए इसकी पूर्ति हम अपने पहनावे से करते है। तूने देखा होगा कि महिलाएं कैसे चटक रंगों के कपड़े पहनती है, पुरुष भी रंगीन साफे बांधते है। इसी तरह ऊंट का भी श्रृंगार खूब चटक रंगों से किया जाता है। ये जो गले में बंधा है न इसे “गोरबंध” कहते है। ये ऊंट के गले के हार है। गोरबंध पर तो गीत भी गाए गए हैं जैसे
ओ… थारा समद स्यु कोड़ा मँगाया
तो गढ़ बीकानेर जाए पोया पोया राज
लड़ली पोया पोया राज
म्हारो गोरबंद नखरालो
आलिजा म्हारो गोरबंद नखरालो
“दाता दाता ये ऊंट के पीछे वाले पांव के ऊपर निशान कैसा है ?” थोड़ी सी चिंता करते हुए अवतार में पूछा। दाता बोले, “इसे दाग कहते है। ये एक तरह से ऊंट की पहचान है। अलग अलग गांवों के अलग अलग दाग होते हैं। जिससे कभी ऊंट खो जाए तो ढूंढने में आसानी रहे।”
“साथ ही सवार जिस पर बैठा है उसे पलाण कहते है। एक व्यक्ति और दो व्यक्तियों के बैठने के हिसाब से अलग अलग बनाया जाता है। लोहे, लकड़ी और चमड़े से बनता है। इसमें भी कारीगरी की पूरी परीक्षा होती है कि कौनसा कारीगर कितना सुंदर पलाण बनाता है।”
दादा पोते की वार्ता जारी है, इतने में दौड़ शुरू ही होने को है। एक पंक्ति में गबरू जवान अपने सबसे अच्छे दौड़ने वाले ऊंट लिए खड़े हैं। महंत जी और ठाकुर साहब के आते ही दौड़ शुरू हो जाएगी।
अवतार सवालों का पूरा घर है। उसके प्रश्नों का कोई अंत नहीं है। ये तो दाता ही है जो उसको झेल लेते है। आगे फिर कहता है ” दाता बाकी जगह तो घोड़े होते हैं अपने ऊंट क्यों ? “
“बेटा, सब इलाके के हिसाब से होता है न! मैदानों में घोड़े ठीक रहते है, पर इस धोरा धरती में ऊंट ही चल पाता है। इसीलिए इसे रेगिस्तान का जहाज भी कहते हैं। इसमें भी अलग अलग टोले के ऊंटों की अलग अलग खासियत है।
जैसे
बीकानेर टोले के ऊँट देखने में खूबसूरत, भार उठाने में मजबूत, परन्तु अत्यन्त गुस्सैल एवं मौका मिलने पर मालिक पर घात करने से भी नही चूकते। इसलिए इन्हें धणीमार ऊँट भी कहा जाता है।
जैसलमेर के नाचणा टोले का ऊँट हिम्मती और तेज चलने वाला होता है। फलौदी के गोमठ टोले के ऊँट नाचने-कूदने वाले, खूबसूरत, छोटे कद, मरदानगीयुक्त होते हैं। गोमठ के ऊँट खासकर सवारी के लिए खरीदे जाते हैं। सिंध के ऊँट के चौड़े पाँव, मजबूत भार उठाने में सबसे आगे, धीमे चलने वाले और ठीक-ठाक होते हैं।
जालोर के ऊँट ओछे मोल के एवे घाघस होते हैं तथा चलने में ढीठ होते हैं। मेवाड़ी टोला के ऊँट दिखने में गंदे, बदशक्ल, भार उठाने में कमजोर और मरियल होते हैं इसलिए उनके बारे में यह कहावत प्रचलित है कि आछो मेवाड़ी लायौ रे।
“वाह दाता इतने अलग अलग ऊंट होते है।”
“हाँ बेटा बोदलो, गाजी, बबाल व छापरी ये ऊँटों की मुख्य किस्में हैं।”
“और बेटा अपना तो बॉर्डर का इलाका है तो यहाँ तैनात सीमा सुरक्षा बल के जवान बॉर्डर की निगरानी भी ऊंटों से ही करते हैं। और तूने 26 जनवरी और 15 अगस्त की परेड देखी होगी न टीवी पर। उसमें भी तो पूरी एक टुकड़ी ऊंटों की होती है। कितनी शानदार लगती है, सजे धजे ऊँट और उनपर तावदार मूंछों वाले जवान।”
“इसके साथ ही इसका बड़ा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व भी रहा है। तूने ढोला मारु और मूमल महेंद्रा की कहानी सुनी होगी न! “
“हां दाता, सुनी तो है।”
“तो इन दोनों कहानियों में नायकों की सवारी ऊँट ही थे। यही लंबी टांगों वाले ऊँट थे जो रातों रात अमरकोट से लुद्रवा तक का सफर तय करते थे। अपने यहाँ के लोकगीतों में भी गाया जाता है कि
बाबलिया म्हाने उण घर दीजे
जिण घर सांडलिया,
अलगा ने नेड़ा करे
एड़ी लांबी तिरखणिया….
(पुत्री अपने पिता से कह रही है कि मेरा विवाह उस घर में करना जहाँ ऊँट ऊंटनी जरूर हो क्योंकि उनकी टांगें बहुत लंबी होती है जिससे में जल्दी पीहर आ सकूं।)
इतने में महंत जी आते है शंख बजाते हैं और ठाकुर साहब की बंदूक के हवाई फायर के साथ दौड़ शुरू हो जाती है। लोगों के होली की थकान उतर जाती है और चारों तरफ शोरगुल शुरू हो जाता है। युवा तो ऊँटो के साथ पैदल ही दौड़ते जाते हैं। अगले कुछ समय तक ऊँटो और उनके सवारो का दमखम, धूल का गुब्बार और लोगो का शोरगुल ही वातावरण में छाया रहता है। सब मंत्रमुग्ध से हो जाते है। तेजा रबारी का ऊँट रेस में सबसे आगे रहता है। उसे महंत जी और ठाकुर साहब द्वारा मालाणी का पट्टू ओढाया जाता है और नकद राशि पुरस्कार के रूप में दी जाती है। साथ ही उसके ऊँट के लिए एक सुंदर गोरबंध भी भेंट किया जाता है।
धीरे धीरे भीड़ घरों की ओर लौटने लगती है। दादा पोता भी घर की राह लेते हैं।
रास्ते में दाता अवतार से कहते है, “देखा कितना आनंद आया न! ये सिर्फ दौड़ते ही नहीं बल्कि ऊंटनी का दूध स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है, जिनके शुगर के बीमारी होती है वो इससे ठीक हो जाती है। रबारी तो रोज इसका दूध पीते है, तो देखा नहीं अस्सी साल की उम्र में भी कैसे चुस्त और तंदुरुस्त होते है। और इसकी ऊन से भी कालीन और कंबल बनाए जाते हैं। मतलब ये हर तरह से हमारा अपना है। इसके फायदे ही फायदे है।”
“फिर भी बेटा जैसे जैसे नई तकनीक आ रही है। ट्रैक्टर से खेती होने लगी है, आने जाने के खूब साधन हो गए है इसलिए अब अपने प्यारे ऊंटों की अब वो कदर नहीं रही। दिनों दिन इनकी संख्या घटती जा रही है। सरकार ‘उष्ट्र विकास योजना’ (2016) जैसी पहल से इनके संरक्षण का प्रयास कर रही है पर चुनौतियां बनी हुई है। सरकार के साथ ही आमजन को भी हमारी इस पहचान को लेकर गंभीर होने की जरूरत है, वरना एक दिन यह भी सिर्फ किस्से कहानियों में रह जाएगा।”

