Monday, April 6, 2026
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थार की कहानियां: ‘जीरो जीव रो बैरी है…’, जीरे की खेती और चुनौतियां

“जय माताजी री सा, क्या हाल चाल है ?”
कोटड़ी में प्रवेश करते हुए जबर सिंह ने कहा।

“जय माता जी री सा, पधारो पधारो!! सब खैरियत है सा।” खाट से खड़े होकर स्वागत करते हुए भगजी बा ने कहा।

“बा आज थोड़े मायूस से लगते हो, कोई परेशानी”

“नहीं परेशानी तो क्या ही है, पर ये जीरा जीव का बैरी हो गया है।”

“क्यों क्या हुआ ? मैं कुछ समझा नहीं। जीरा तो अच्छी कमाई देता है न !”

“अरे भाई ! वो गीत नहीं सुना तुमने कि “मत बाओ म्हारा परणया जीरो, के जीरो जीव रो बैरी है” (अर्थात पत्नी अपने पति से कह रही है कि जीरे की फसल मत उगाओ, यह जीव का बैरी है यानि बड़ा दुःख देने वाला है)

“हां, सुना तो है पर कभी अर्थ पर गौर नहीं किया।”

“अपने यहाँ के गीत संगीत और कहावतों में बड़ी गहराई है, कुछ भी ऐसे ही नहीं गाया या कहा गया है। जीरा अच्छी फसल है, अच्छी कमाई भी होती है। पर चैत मास के आसपास जब फसल पक कर तैयार हो जाती है उस वक्त मेह बरसता ही है, जिससे फसल को काफी नुकसान होता है। सब लोग खेतों में दिन रात जुटे पड़े हैं, मज़दूर भी लगाए हैं, पर पार नहीं पड़ती। इतने लंबे चौड़े खेत में तिरपाल भी तो कैसे बिछाया जाए। ईसबगोल तो ऐसा है कि बूंद पड़ी नहीं कि झड़ जाता है। और जीरा भी काला पड़ जाता है, फिर भाव नहीं मिलते। इसलिए इसे जीव का बैरी कहा गया है।

“क्या पता बा सा। हमारे हिस्से तो इतने खेत आए नहीं। छोटा सा टुकड़ा है, उसमें कभी बेरा (tubewell) करवाने की हिम्मत ही नहीं हुई। अपने तो देसावर चले गए मजदूरी करने। होली दिवाली आ जाते है।”

“ठीक ही कहते हो जबर सिंह। बाहर जाकर मजदूरी न करे तो भूखा मरना पड़े। पापी पेट है, सब करना ही पड़ता है। मुझे याद आता है कि सन् 80-81 की बात होगी, दाता पुलिस से सेवानिवृत्त होकर घर पधारे। कर्मयोगी तो थे ही सो आराम से रिटायर्ड लाइफ जीने का उनका कोई इरादा नहीं था। गांव आते ही बेरे खुदवाए। इससे पहले गांव में दो ही कुंए थे, एक गांव तलिए में और दूसरा पाडोलिया में। और ये भी ओपन वेल थे। ट्यूबवेल तो करवाए कौन? कहां से इतनी हिम्मत और पैसा लाए? तब रोकड़ा देखने को ही नहीं होता था। रिस्क कौन ले, पानी हो ,न हो। पानी निकल भी जाए तो खारा पानी आ जाए तो भी सब बर्बाद। कर्जा लेकर कोई बेरा करवाए यह भी समझदारी नहीं थी। सो दाता के गांव आने से पहले यहाँ कोई ट्यूबवेल खुदा ही नहीं। धारणा यही थी कि अपने यहाँ तो पानी है ही नहीं। साल भर में एक बार खेती होती बारिश के दिनों में, वो भी अनिश्चित। तीन चार सालों में एक अच्छा जमाना आता था।”

बात आगे बढ़ाते हुए भगजी बा ने कहा, “पर दाता ने हिम्मत की। आत्मविश्वास के धनी। खुद पर बहुत भरोसा है उन्हें। कोई मुहूर्त आदि औपचारिकता को भी ज्यादा तवज्जो नहीं देते थे। खुद ही ठप्पा लगाते कि यहाँ खोद दो। कहते भी है न कि माताजी भी उसी के साथ होते हैं जो हिम्मत करता है। तो ईश्वर की भी कृपा रही और मीठा पानी निकला। पानी का प्रेशर भी खूब था, भले 24 घंटे मोटर चलाओ। गांव और आसपास के इलाके में यह नई बात हो गई। लोग चलाकर देखने आते। पानी को चखते और वाह वाह करते। एक मेला सा लगा गया। उत्सव जैसा उत्साह फैल गया समूचे इलाके में।”

जबर सिंह को भी बातों में रस आने लगा। आगे चलकर भगजी बा से पूछा ” बा,पानी तो आ गया,फिर क्या हुआ ?”

बा बोले, “फिर क्या, यहाँ तो बाजरी, मूंग, मोठ के अलावा कुछ बोना आता नहीं था। सदियों से यही करते आ रहे थे। पर गुजरात के बनासकांठा में हमारे रिश्तेदारी है और वहाँ पर काफी पहले से ट्यूबवेल हो रखे है। साल में तीन तीन फसलें लेते हैं। पूरा ग्रीन बेल्ट है। तो उन्होंने कहा कि रेतीली जमीन के हिसाब से जीरा ठीक रहेगा।”

”अब जीरा कैसे लगाया जाए, किसी को कोई अनुभव नहीं। ऊंट और बैल के पीछे अबतक बाजरी के बीज ही डालते आए थे। फिर एक दो लोगों को उन्होंने गुजरात से भेजा और जीरा बोया गया। जीरा बाजरी की तरह जमीन में गहरा नहीं बोया जाता। इसे खेत में छिड़क देते हैं। पहली बार का मामला था सो बड़ी तकलीफें आई। लाइट कनेक्शन के लिए बिजली विभाग के चक्कर, फिर मोटर,फव्वारे, पाइप आदि सामान। मोटर 250-300 फीट गहरी उतारना, खराब हो जाए तो उसे निकालना, शुरू शुरू में यह सब बड़ा झमेला लगता था। पर दाता तो दाता ही ठहरे, कहाँ हारने या थकने वाले व्यक्ति थे।”

बा आगे बोले, ”थोड़ा देर से लगाने और अनुभवहीन होने के बावजूद भी पहली बार में 30 बोरी जीरा हुआ। रेतीली जमीन जीरे के बड़ी अनुकूल रहती है। फिर जमीन भी नई थी। तीन चार साल के बाद जमीन बदलनी पड़ती है वरना उसी जगह उत्पादन कम हो जाता है। फिर खाद पानी डालकर जमीन तैयार करो और यह सिलसिला चलता रहता है। इतना अच्छा उत्पादन देखकर और गांव वालों की भी उम्मीद जागी। एक एक करके और ट्यूबवेल होने लगे। सब दाता को अपने खेत में ले जाते और उनसे ही ठप्पा लगवाते। एक विश्वास सा हो गया कि दाता जहाँ कहेंगे वहाँ पानी आयेगा ही। जो पानी वाला इलाका है वहाँ तो कहीं भी खोद दिया जाए, पानी आ जाएगा। पर मरुस्थल में धरती के नीचे कुछ पानी के सोते बहते है, किस्मत से वहीं पर ट्यूबवेल कर दिया तब ही पानी मिलने के आसार है, अन्यथा पैसा गया गढ्ढे में।”

खैर धीरे धीरे बेरे होने लगे और देखते ही देखते यह क्षेत्र जीरा उत्पादन में अपनी पहचान बनाने लगा। 90 के दशक की आर्थिक क्रांति के बाद भारत ने अपने दरवाजे विश्व के लिए खोल दिए। इससे आयात निर्यात में काफी वृद्धि हुई। इसका फायदा अपने क्षेत्र को भी हुआ। जीरा बड़ी गुणकारी चीज है, सैकड़ों वर्षों से आयुर्वेद व मसालों में इसका उपयोग होता रहा है। विदेशों से खूब मांग आने लगी और अपने यहाँ का जीरा अरब देशी, अमेरिका, यूरोप, चीन आदि जाने लगा। मांग और उत्पादन का तो सीधा संबंध है, सो उत्पादन बढ़ने लगा।

जीरे की खेती पर बात जारी रखते हुए बा ने आगे कहा, ”आज स्थिति यह है कि बाड़मेर, जालोर, जैसलमेर और जोधपुर में करीब 5.5 लाख हेक्टेयर में जीरे की बुवाई होती है। भारत में जीरे का 99% उत्पादन राजस्थान और इससे लगते गुजरात से आता है। साथ ही भारत दुनिया का 70% जीरा पैदा करता है। राजस्थान अकेले लगभग 3 लाख टन प्रति वर्ष जीरा पैदा करता है। इन सब बड़े बड़े आंकड़ों के बाद भी हकीकत यह है कि जीरा एक जुए जैसा है। फसल बोरी में डालकर अपने गोदाम में जब तक रख नहीं ली, तब तक कोई भरोसा नहीं है। इतनी जोखम भरी खेती और कोई नहीं है। अब इस बार भी देख लो, इतना अच्छा जीरा हुआ था, पर कल रात आए तूफान ने सब साफ कर दिया। ईसबगोल तो पूरा ही खराब है, जीरे में भी नुकसान ही है।”

जबर सिंह ने कहा, “फिर आप लोग मजदूर लगाकर फटाफट फसल ले क्यों नहीं लेते?”

“अरे भाई, ये हमे भी समझ आता है। पहली बात तो इतने मजदूर कहां से लाए, सब अपने अपने खेतों में लगे है। फिर मध्यप्रदेश से बड़ी संख्या में मजदूर आते है, पर वो भी कम पड़ते है। उन्हें ले भी आए तो इनकी मजदूरी ज्यादा है, फिर पीछे कुछ खास बचत नहीं होती। खेती आसान नहीं है जबसा।”

“तो फसल खराबे पर सरकार कोई मुआवजा आदि नहीं देती ?”

“देखो अपने देश का जितना अच्छा संविधान और कानून है, उतना संसार में कहीं नहीं है। पर लागू इसका एक प्रतिशत भी नहीं होता। सब किताबी बातें है। जैसा बाकी व्यवस्थाओं का हाल है वैसा यहां भी है। कहने को सरकारें गिनाती ही है कि इतने सौ करोड़ का मुआवजा दिया, पर हकीकत कुछ और ही है। हमारे दुख का कोई साझेदार नहीं है। आपस में आस पड़ोस वाले मिलकर रो लेते हैं।”

(नोट- लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। इसमें कही गई बातें लेखक के व्यक्तिगत अनुभव, सोच, ज्ञान और दृष्टिकोण से प्रेरित हैं।)

महेंद्र सिंह तारातरा
महेंद्र सिंह तारातरा
सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र लेखक। भाषा, इतिहास और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन को लेकर सक्रिय।
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