इन दिनों एक अच्छी बात यह हुई है कि हिंदी साहित्य में मुस्लिम आवाज़ें बड़ी तादाद में सुनाई पड़ने लगी हैं। दो-तीन दशक पहले तक कहानी-उपन्यास में पांच मुस्लिम लेखक खोजने मुश्किल होते थे- असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, मंज़ूर एहतेशाम, बदीउज्जमां तक आते-आते सूची पूरी हो जाती थी। कविता में असद ज़ैदी के अलावा दूसरा नाम मिलता नहीं था।
लेकिन बीते कुछ वर्षों में हिंदी के क्षितिज पर कई मुस्लिम लेखक दिखाई पड़ने लगे हैं। शायद इसकी एक वजह यह हो कि मध्यवर्गीय मुस्लिम घरों में बच्चे उर्दू की जगह हिंदी-अंग्रेज़ी पढ़ने लगे हों और उनके लिए हिंदी में लिखना ज़्यादा सहज हुआ हो।
लेकिन लेखन में मैं यह हिंदू-मुसलमान क्यों खोज रहा हूं। क्योंकि समाज ने उनके ख़ाने बना दिए हैं। स्त्री, दलित या आदिवासी स्वरों की तरह मुस्लिम स्वर भी इन दिनों एक विशिष्ट स्वर है जिसके संकटों, जिसकी चिंताओं का सुराग ‘हिंदू’ लेखक पूरी तरह नहीं समझ सकते। यह अनायास नहीं है कि हिंदुस्तान के बंटवारे पर जो बेहतरीन साहित्य उर्दू में है, वह हिंदी में नहीं, क्योंकि हमारे चाहे-अनचाहे हिंदी लेखन हिंदू लेखन होता चला गया है।
यह प्रक्रिया इन वर्षों में कुछ टूट रही है, इसके प्रमाण के रूप में कई युवा आवाज़ें हमारे सामने हैं जिन्होंने बीते एक-दो दशकों में अपनी कहानियों से एक पहचान बनाई हैं। इन आवाज़ों में एक तसनीमा खान की भी है जिन्हें बीते दिनों उनके नए कहानी संग्रह ‘बवालिस्तान’ पर विजयमोहन सिंह स्मृति सम्मान देने की घोषणा हुई है।
इत्तिफ़ाक़ से इस घोषणा के वक़्त मैं इसी संग्रह की कहानियां पढ़ रहा था। पहले भी तसनीम ख़ान की कहानियां पढ़ता रहा हूं। क्या इन कहानियों में कोई हिंदू-मुसलमान खोजा जा सकता है? इतने सपाट और सतही ढंग से तो कतई नहीं। संभव है, इन कहानियों से लेखक का नाम हटा दिया जाए तो बताना मुश्किल हो कि ये किस तबके या मज़हब के लेखक की कहानियां हैं। इससे यह पता चलता है कि हिंदू-मुसलमान को हम जितना अलग करने की कोशिश करें, वे दरअसल पानी की तरह आपस में घुले-मिले हैं। इस पानी में ज़हर घुलेगा तो सबके लिए ख़तरनाक होगा।
लेकिन फिर मैं हिंदू-मुसलमान क्यों खोज रहा हूं? क्योंकि इन कहानियों के भीतर कुछ सूक्ष्मता से उतरें, उनके किरदारों की आंखों में झांकें, उनकी आवाज़ सुनें तो सहसा समझ में आएगा कि कुछ तकलीफ़ें ऐसी हैं जो उन्हीं के हिस्से कुछ गाढ़ी हैं, कुछ शिकायतें ऐसी हैं जिनकी हमें ख़बर नहीं, कुछ भिंची हुई रुलाइयां ऐसी हैं जो हमें उनके आंगन में जाकर ही सुनने को मिल सकती हैं।
ऐसा नहीं कि ये बड़ी जटिल कहानियां हैं। उल्टे इनमें एक सरलता और सादगी है। तसनीम बिना किसी तामझाम के कहानी शुरू करती हैं, ज़रूरत भर आड़ा-तिरछापन देती हैं, कुछ माहौल की खुशबू डालती हैं, कुछ स्थानीयता की रंगत- और एक मुकम्मिल बात कह कर कहानी पूरी कर डालती हैं।
असली चीज़ यही बात होती है। नफ़रत, अविश्वास और संदेह की मारी इस दुनिया में वे एक पुराना धागा खोज लाती हैं- दोस्ती का, भरोसे का। इस दुनिया में जीने लायक माहौल न बचा हो तो दूसरी दुनिया में ही सही। संग्रह की पहली कहानी ‘अब्दुल की मौत’ कुछ दिलचस्प ढंग से यह बात रख देती है।

दूसरी कहानी शायद पहली कहानी का विलोम है। वहां विश्वास का एक पुराना धागा टूट रहा है। किसी के भरोसे छोड़ा गया एक घर औने-पौने दामों पर बेचने की मजबूरी है। बेदखली और विस्थापन की स्मृति में गोते खाती यह एक लंबी कहानी है। कहानी का बुज़ुर्ग नायक बचपन में अपनी मां के साथ पाकिस्तान जाने को मजबूर हुआ था। लेकिन वहां किसी भी सूरत में रह नहीं सका। बरसों बाद लौट आया। लौट आना हालांकि आसान नहीं था। बेहद दुश्वार और महीनों चले सफ़र के बाद वह लौटा। बस अपनों के आसरे लौटा और अपनों ने उसे थामा भी। यहां आकर नए सिरे से उसने अपनी जगह बनाई। अपना घऱ भी बनाया। लेकिन जिस दोस्त के भरोसे वह घर छोड़ा था, वही उसके अकेले पड़ने, अल्पसंख्यक होने का फ़ायदा उठाने की कोशिश में है। ‘पैरों में फिर पीर उठी है’ अचानक एक बड़ी त्रासदी की कहानी बन जाती है।
इन कहानियों को पढ़ते हुए यह खयाल भी आता है कि जिस रिश्ते को हम राजनीतिक चश्मे से देखने के आदी हो गए हैं, उसकी सामाजिक आपसदारी असल में भारतीय समाज में इस क़दर नाभिनालबद्ध है कि उसे अलग करना मुश्किल है। परिवार मिलते हैं, जुड़ते हैं, झगड़ते हैं, अलग होते हैं और फिर साथ रहने की मजबूरी में बंध जाते हैं। ‘राज़ीनामा’ और ‘भाई साब’ इस साझा रिश्ते के दो अलग-अलग पहलुओं को खोलती कहानियां हैं। ‘भाई साब’ के हिंदू पेंटर का मुस्लिम भाई साहब से ऐसा नाता है कि उनके बिना उसका कोई काम चलता ही नहीं। वही पति-पत्नी के झगड़े सुलझाते हैं, वही शादी-ब्याह की तारीख़ों पर भी आख़िरी मुहर लगाते हैं। अब एक तरफ़ मोहर्रम है और दूसरी तरफ़ शादी है- इसमें भी भाई साहब को कोई हर्ज नहीं दीखता। लेकिन उसी रात वे चल बसते हैं, ताउम्र उनको बड़ा भाई मानने वाला पेंटर शादी की वजह से निकल नहीं पाता। मगर रातरानी का एक पौधा है जो वह उनकी स्मृति में उनकी क़ब्र पर लगा आता है।
कहना नहीं है कि ये कहानियां बीते दो-तीन दशकों में नए बनते या देखे जाते भारत की सामाजिक टूटन के बीच से निकली हैं। ऐसा नहीं कि ये इकहरी कहानियां हैं। इनमें कई और खुशबुएं शामिल हैं, कुछ और अस्मिताएं भी। स्त्रीत्व के संकट और सवाल कुछ कहानियों में मिलते हैं। कई कहानियां राजस्थान की ख़ुशबू से भरी हैं। बल्कि ज़्यादातर कहानियों में राजस्थान का यह रंग पहचाना जा सकता है। इस लिहाज से ये गंगा-जमनी तहज़ीब की नहीं, उस राजस्थानी रंग की कहानियां हैं जिसे सदियों की रेत ने मिलकर आकार दिया है। बल्कि नए सिरे से इनके बारे में सोचने पर खयाल आता है कि ज़्यादातर कहानियों की पृष्ठभूमि राजस्थानी धरती, घोर और बोली-बानी से बनती है।
हालांकि तसनीम इस जाने-पहचाने संसार के बाहर भी क़दम रखती हैं और इशारों-इशारों में उन दुखती रगों पर उंगली रख जाती हैं जिन्हें कोई देखता नहीं। ‘नफ़ा-नुक़सान’ में कोविड के समय हुई बंदी से परेशान एक शख़्स अपने दोस्त से पूछता है- तुम लोग लगातार जो क़र्फ़्यू झेलते हो, उसके बीच कैसे रहते हो? वह ऐसे क़र्फ़्यू जैसे हालात में सहजता से जीने का तरीक़ा जानना चाहता है। कथाकार नहीं बताती कि वह किस इलाक़े की बात कर रही है। वह दोस्त के किरदार की पहचान भी नहीं कराती। लेकिन पाठक को यह समझने में देर नहीं लगती कि बात कश्मीर की हो रही है। फिर कश्मीर में जोर-जबरदस्ती और दमन की जो भयावह दास्तान है, वह भी चुपचाप कहानी में चली आती है।
अचानक हम पाते हैं कि तसनीम की सीधी-सादी लगती कहानियों में कई छुपे हुए इशारे भी हैं जो लेखिका ने सोच-समझ कर डाले हैं। ‘बवालिस्तान’ कहानी टीवी चैनलों में चलते तमाशे का मज़ाक बनाती और वास्तविक पत्रकारिता की ज़रूरत को रेखांकित करती कहानी है। कहानी में ‘कुछ’ खो गया है जिसकी वजह से सब परेशान हैं। इशारा टीआरपी सिस्टम के गुम हो जाने की ओर है।
कहानियां और भी हैं। स्त्रियों के दर्द और उनकी छटपटाहट की कहानियां, घर से दूर रहने की कसक की कहानियां, प्रेम की कामना और उसके अधूरेपन की कहानियां, भूख और ग़रीबी की बिल्कुल दिल तोड़ देने वाली कहानियां और मुस्लिम परिवेश की वे कहानियां जिनसे अमूमन हम कटे रह जाते हैं।
लेकिन- और इसे एक बड़ा लेकिन मानना चाहिए- तसनीम के कथा-लेखन में कहीं-कहीं समस्याएं भी दिखती हैं- कहीं हड़बड़ी, कहीं बेवजह विस्तार, कहीं ग़ैरज़रूरी ब्योरे, कहीं भाषा की भी दिक्कतें, कहीं-कहीं सरलीकरण भी। इन दिक्कतों से कहानियां पठनीय तो बन जाती हैं, मगर ज्यादातर वे देर तक स्मृति में टिकी नहीं रह पातीं। शिल्प का वह सधाव नहीं दीखता जो इन कहानियों को एक अविस्मरणीय रचना में बदल डाले। ऐसा नहीं कि शिल्प को लेकर तसनीम सजग नहीं हैं। उनकी कहानियों की शुरुआत बताती है कि उन्हें यह समझ है, कई कहानियों के साथ उनका ‘ट्रीटमेंट’ बताता है कि वे इसके प्रति सजग हैं, लेकिन फिर भी कुछ चूकता सा लगता है। यह सच है कि बहुत ज़्यादा शिल्प रचना को कृत्रिम बना डालता है, लेकिन शिल्प का इतना भर खयाल रखना ज़रूरी है कि वह कथ्य की तीव्रता का- उसकी संवेदना का- करीने से वहन कर सके। बेशक, कहीं-कहीं कथ्य भी अपने विस्तार की मांग करता है जिसकी कमी खलती है।
दूसरी बात यह कि स्थानीय बोली-बानी का इस्तेमाल इन कहानियों को निश्चय ही एक अलग सी सुगंध देता है, लेकिन कभी-कभी वह बाधा भी बनने लगता है। दरअसल जिसे स्थानीयता कहते हैं, उसकी हिंदी में छौंक इस कुशलता से आनी चाहिए कि वह कथा-प्रवाह में बाधक न बने और पूरी खुशबू भी दे। यहां भी कुछ कसर दिखती है।
हालांकि इन सीमाओं के बावजूद इन कहानियों का- इस संग्रह का- अपना मोल है। ध्यान से पढ़ें तो इनमें हमारा बदल रहा समय ठीक से पहचाना जा सकता है, हमारा बिखरता हुआ समाज दिखाई देता है। सांप्रदायिकता की वह चुभन महसूस की जा सकती है जो पिछले कुछ वर्षों में और तीखी हुई है जिसे सत्ता का समर्थन एक उद्यंड क़िस्म का दुस्साहस देता रहा है। इस लिहाज से इस संग्रह का स्वागत किया जाना चाहिए। तसनीम लगातार लिख रही हैं और खूब लिख रही हैं। उनके लेखन को पहचान भी मिल रही है जो बहुत अच्छी बात है। बीते दिनों उनका उपन्यास ‘हमनवाई न थी’ भी पर्याप्त चर्चित हुआ। अब इस संग्रह ने उनकी पहचान कुछ और पुख़्ता कर दी है।
पुस्तकः बवालिस्तान
लेखिकाः तसनीम ख़ान
प्रकाशकः युवान बुक्स, 230 पृष्ठ
मूल्यः 249 रुपए

