Friday, March 20, 2026
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दृश्यम: ये आधुनिक बुंदेली लोक है

भारंगम 2026 में दिल्ली में हुई कुछ लोक भाषा आधारित प्रस्तुतियों पर यहां बात कर रहे हैं वरिष्ठ रंग-आलोचक रवींद्र त्रिपाठी। दो बुंदेली नाटकों ‘स्वांग जस की तस’ और ‘नाम में का रखवो है’ के बहाने यहां यह दर्शाया गया हैं कि लोकनाट्य शैलियाँ केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि आज की राजनीति, सत्ता-चेतना, स्त्री अधिकार, किसान जीवन और सामाजिक विडंबनाओं पर तीखा, हास्यपूर्ण और वैचारिक हस्तक्षेप करने की सक्षम सांस्कृतिक भाषा हैं। उनका यह लेख लोक और आधुनिकता के कृत्रिम विभाजन को तोड़ते हुए बुंदेली रंगपरंपरा की जीवंत समकालीन उपस्थिति को रेखांकित करता है, संक्षेप में कहें तो अपनी संपूर्णता में यह गहन विवेचना लोक, रंगमंच और समाज के बदलते संबंधों को समझने की एक महत्वपूर्ण दृष्टि प्रस्तुत करता है।

लोक के बारे में आम धारणा है कि वो आधुनिक से अलग होता है। और आधुनिक के बारे में भी यही प्रचलित धारणा है कि वो लोक से पृथक होता है। लेकिन दोनों धारणाएं एकांगी और अधूरी है। लोक कलाओं, लोक संगीत, लोक साहित्य और लोक नाटकों में आधुनिक और समकालीन प्रसंगों से जोड़ने की अद्भुत क्षमता होती है। ये महज संयोग नहीं कि फिल्म और रंगमंच से जुड़े कई रचनाशील लोग या शख्सियतें लोक में व्याप्त कथाओं और शैलियों को लेकर आधुनिक प्रयोग करते हैं और उननें सफल भी होते हैं। इसके ताजा उदाहरण है इस बार भारंगम (भारत रंग महोत्सव) में खेले गए दो नाटक। दोनों बुंदेली के नाटक हैं। पहला नाटक था ‘स्वांग जस की तस’ और दूसरा था ‘नाम में का रखवो है’। दूसरा नाटक शेक्सपीयर की उस पक्ति की याद दिलाता है- नाम में क्या रखा है।

‘स्वांग जस की तस’ का निर्देशन किया है युवा रंगकर्मी अक्षय सिंह ठाकुर ने। नाट्यालेख भी उनका ही है। पर मूल लोक कथा विजय दान देथा द्वारा लिखित है। देथा ने राजस्थानी लोककथाओं का पुनर्लेखन किया है। वैसे तो उनके द्वारा संकलित कथाए सदियों पुरानी हैं लेकिन जिस तरह से उन्होंने उनका पुनर्लेखन किया उससे कथाओं में एक खास तरह की गहराई आ गई। इसी कारण कुछ फिल्मकारों ने भी उन पर फिल्में भी बनाईं और कुछ नाटककारों ने उन नाटक लिखे। मिसाल के लिए हबीब तनवीर का नाटक चरणदास चोर’ देथा द्वारा पुनर्लिखित कहानी पर ही है। अक्षय ने भी देथा की ही कहानी ठाकुर का रूठना’ पर स्वांग जस का जस’ तैयार किया है।

इसमें एक दूसरी लोक परंपरा भी है। और वो है स्वांग की। स्वांग बुंदेलखंड में प्रचलित लोक नाट्य शैली है। वैसे इसी शैली का दूसरा, कुछ लोगों के मुताबिक आरंभिक, रूप पंजाब- हरियाणा में भी मिलता है और उसे सांग कहा जाता है। दोनों की शैली में फर्क भाषा का है। बुंदेलखंडी स्वांग की भाषा बुंदेली होती है और सांग की हरियाणवी। अक्षय वैसे जबलपुर के रहनेवाले हैं और उनके कलाकार भी वहीं के हैं। जबलपुर की भाषा खड़ी बोली है लेकिन बुंदेली का प्रभाव वहां रहा है। जैसे पटना मगध का इलाका है लेकिन वहां का लोक रंगमंच भोजपुरी के अधिक करीब है। हालांकि मगही रंगमंच भी अब धीरे धीरे आकार ले रहा है लेकिन फिलहाल तो भोजपुरी के सामने दबा दबा- सा है।

बहरहाल, अक्षय सिंह ठाकुर के निर्देशन में एक राजस्थानी कहानी बुंदेलखंडी शैली में ढल गई। इसे हाईब्रिडिटी यानी संकरता भी कह सकते हैं लेकिन नाटक देखने से लगता नहीं है कि किसी तरह का मिश्रण है। ये खांटी बुंदेलखंडी स्वांग लगता है। बुंदेली ठसक, वहां का पहनावा, वहां का हास्य और वहां व्यंग्य इसमें लबालब हैं।

नाटक की कहानी एक गांव के ठाकुर के इर्द गिर्द घूमती है। ठाकुर को कई तरह के उलजलूल खयाल आते रहते हैं। चूंकि वो अपने को गांव का मालिक समझता है इसलिए उसे लगता है कि वो जो कहे वही पूरा गांव करे। किसी और की मर्जी गांव में नहीं चलेगी। एक दिन वो अपने गांववालों को आदेश देता है कि सारे कुओं को बालू से पाट दिया जाए ताकि उनका पानी नीचे से ऊपर चला आए। गांववालों द्वारा आपत्ति किए जाने पर वो कहता है कि उन लोगों ने वो कहानी नहीं सूनी जिसमें एक कौवा एक आधी भरी सुराही से अपने पीने के लिए पानी का इंतजाम करने के लिए उसमे कंकड़ डालता जाता है। और फिर जब कंकड़ डालते डालते पानी सतह पर आ जाता है वो कौवा उसे पी लेता है। ठाकुर का कहना है कुओं में पानी को ऊपर लाने का यही तरीका है कि उनको बालू से भर दिया जाए। इससे खेत पटाने मे आसानी होगी। गांव वाले इस बात को नहीं मानते, ठाकुर की मां भी इसे बेवकूफी मानती है। इस पर ठाकुर नाराज होकर गांव से चला जाता है। कई दिनों फिर बहुत मान मनौवल करके उसे फिर गांव लाया जाता हैष मगर फिर वही टेक- कुओं को बालू से भरवा दो।

मूल कहानी तो इतनी ही है लेकिन निर्देशक ने इसे जिस तरह पेश किया है उसमें आज की भारतीय राजनीति के कई पहलू इसमें आ गए गए हैं। देखते हुए बराबर लगता रहता है कि मौजूद भारतीय राजनीति के प्रसंगों खुलासे हो रहे हैं। नाटक का लहजा बुंदेलखडी रहता है लेकिन इसमें मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश और पूरे देश की राजनीति के कई सारे वर्तमान वाकये समाहित हो गए हैं। और सिर्फ देश की नहीं विदेशी वाकये भी। जैसे हाल में जिस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनजुएला के राष्ट्रपति को बलात गिरफ्तार कर लिया- वो मामला भी इसमें आया है। लेकिन ये सब होता है हंसते हंसाते। किसी प्रवचन की मुद्रा में नही। इस नाटक को देखते हुए दर्शक नोटबंदी पर हंसता है, दिल्ली और देश में बढ़ती प्रदूषण की समस्या से रूबरू होता है, कुछ समय पहले हए कुंभ मेले की बदइंतजामी को याद करता है, चुनाव के समय मतदाताओं के लुभाने के लिए सरकार द्वारा बैंक खाते में पैसे दिए जाने के वायदे जैसी चीजें मन ही मन दर्ज करता है। नाटक के संवाद इतने चुटीले और मारक हैं कि साफ साफ लगता है कि आज देश की राजनीति में जो हो रहा है उस पर चाबुक चलाया जा रहा है।

पर ये नाटक सिर्फ इस अर्थ में राजनीतिक नहीं है। वो एक बड़े परिप्रेक्ष्य को भी सामने लाता है। और वो है सर्वसत्तावाद जिसे अंग्रेजी में टोटलीटेरियन कहा जाता है। आधुनिक समय में ही पूरी दनिया में सर्वसत्तावादी राजनीति का उदय हुआ है। इसके तहत सत्ता में बैठे नेता को लगता है कि जो वो सोचता है वही सही है। जनता या लोग क्या सोचते हैं इसका कोई खास मतलब नहीं है। सर्वसत्तावदी नेता के लिए आम लोगों की आकांक्षा से कोई सरोकार नहीं। वो अपने परिवार की भी नहीं सनता। स्वांग जस की तस’ का ठाकुर अपनी मां और पत्नी की भी बात नहीं मानता। उसको लगता है कि वही और सिर्फ वही लोगों की भलाई कर सकता है।

अब आते हैं लोककला बनाम और आधुनिकता के मसले पर। सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में अब लोक परंपराओं को नए तरीके से समझने और व्याख्यायित करने की कोशिशें हो रही है। कई सिद्धांतकार ये प्रतिपादित कर रहे हैं कि जिसे शास्त्र बनाम लोक में बांटा जाता है वो बनावटी विभाजन है। बेशक शास्त्र अलग चीज है और लोक अलग। लेकिन दोनों के एक दूसरे के प्रतिद्वंदी नहीं बल्कि कई मामलों में पूरक है। कई बार शास्त्र लोक से बहुत कुछ लेता है और अपने को समृद्ध करता है। ये बात नाटकों में भी लागू होती है। और नाटकों में अभिनय पर भी। लोकनाटकों में मंच पर गाते गाते और नाचते नाचते हुए भी वही बात अभिनेता प्रेषित करता है जोमेथड एक्टिंग’ में प्रशिक्षित अभिनेता। हालांकि मेथड एक्टिंग’ में प्रशिक्षत कलाकार की अपनी अहमियत है लेकिन लोक कलाकार की भी अपनी पद्धति होती है। क्या उसका भी शास्त्र निर्मित होना चाहिए?

इस नाटक में अम्मा की भूमिका निभानेवाले अभिषेक गौतम को लीजिए। नाम से ही जाहिर है एक पुरुष कलाकार ने एक महिला कलाकार की भूमिका निभाई है। पर नाटक देखते हए कही लगता नहीं है कि एक .युवा पुरूष वृद्ध महिला का किरदार निभा रहा है। टेढ़ी और झुकी हुई कमर और हाथ में छड़ी लिए और अपनी कमर मचकाते हुए जब भी ये अभिनेता मंच पर आता है तो हंसी के फव्वारे छूटने लगते है। इस किरदार में गांव की वो औरत दिखती है जो बहू पर अधिकार जमाती है औऱ घर के भीतर अपनी चलाना चाहती है। फिर नमन मिश्रा ने ठाकुर का जो रोल निभाया है वो वैसे तो मजाकिया लगता है लेकिन थोड़ी देर में पता चल जाता है कि उसका पूरा मनोविज्ञान एक सर्वसत्तावादी राजनेता का है। ठाकुर के भीतर निहित ये दोनों ही चीजें नमन मिश्रा ने दिखाई हैं।

तीसरे खास अभिनेता है अनुदीप सिंह ठाकुर। अनुदीप ने दो भूमिकाएं निभाई हैं। पहली है चुप्पा की जो किसी अस्वस्थता की वजह से न ठीक से चल पाता और न बोल पाता है। वो जो कहना चाहता है उसे कोई नहीं समझता पर सब अपने अपने तरीके से उसका मतलब निकालते हैं। वो अपने संकेतों से महत्तम प्रभाव छोडता है। अनुदीप ने दूसरी भूमिका एक ऐसे चौधरी की निभाई है जिसे लोग गांव में ओझा या तांत्रिक कहते हैं। वो लोगों को बेवकूफ बनाता है लेकिन गांव वालों के काम भी आता है। चुप्पा और चौधरी दो अलग अलग किस्म के किरदार हैं और दोनो को अनुदीप ने इस तरह साधा है दर्शक अगर सजग न हो तो उसे लगेगा ही नही एक ही अभिनेता दो रूपो में है। वैसे ये निर्दशकीय कौशल भी है।

भाषाओं और बोलियों में भी स्वाद होते हैं। हिंदी इस मामले में बेहद भाग्यशाली है कि उसके अंदर कई तरह के स्वाद है। भोजपुरी, मैथिली, छत्तीसगढ़ी, बुंदेली, बघेली, हरियाणवी आदि।स्वांग जस का तस’ में बुंदेली का स्वाद है। वैसे बवकारंत ने बहुत पहले बुंदेली में नाटक किए थे। फिर जबलपुर वासी अरुण पांडे, अलख नंदन, आशीष पाठक और सौरभ नायर ने भी बुंदेली में बहुत अच्छे नाट्य प्रयोग किए। और अब ताजा नाम है अक्षय सिंह ठाकुर का। संयोग से कारंत को छोड़ दें तो बाकी सभी जबलपुरिए हैं। हालांकि अरुण पांडे मूलत: जबलपुर के नहीं, वाराणसी के थे लेकिन मिजाज से जबलपुरिया हो गए थे। जैसे कहानीकार ज्ञानरंजन इलाहाबाद के बाद जबलपुरिया बन गए थे। एक तरह से जबलपुर श्रेष्ठ रंगमंच के अलावा बेहतरीन हिंदी- बुंदेली रंगमंच का केंद्रविंदु बन गया है। समकालीन और युवां हिंदी रंगमंच का उत्कृष्ट अभी पटना, लखनऊ या भोपाल से नहीं बल्कि जबलपुर से आ रहा है। स्वांग जस का तस’ उसी कड़ी में है। नाटक की वेशभूषा और संगीत भी बहुत प्रभावशाली है।

जो दूसरा जबर्दस्त बुंदेली नाटक इस बार के भारंगम में हुआ वो थानाम में का रखवो’ है। निर्देशन सौरभ नायर का था। जैसा कि पहले बताया गया सौरभ भी मूलतं: जबलपुर के हैं और वहां अरुण पांडे के निर्देशन में रंगमंच की शुरुआत की। नाम में का रखवो’ है एक काल्पनिक गांव के इर्द गिर्द घटित होता है। इस गांव का कोई नाम नहीं है लेकिन आसपास के लोग इसेवो’ गांव कहते हैं। इस गांव की कुछ लड़कियां ये तय करती हैं कि वे अपने पंसद के लड़के से शादी करेंगी। पर इसमें एक पेचीदगी है कि जो लड़की सबसे विश्वसनीय काल्पनिक कहानी सुनाएगी उसकी पसंद को वरीयता दी जाएगी। इसी बीच एक सरकारी कर्मचारी उस गांव में आता है जो सरकार की तरफ से ये सुनिश्चित करने आया है कि इस गांव का कोई नाम हो क्योंकि इसके बिना आज के जमाने में कोई सुविधा नहीं मिलती। वो लड़कियों से पूछता है इसका गांव का क्या नाम रखा जाए। इसी बीच गांव की एक शादीशुदा एक महिला आती है जिसपर सब मिलकर जिम्म्दारी डाल देती है वही नाम रखेगी। वो महिला हैरान होती है और कहती है कि आज तक तो उसने और उसके घर की महिलाओं ने कोई फैसला तो किया ही नहीं फिर वो कैसे गांव के नाम का निर्णय करे। बोलते बोलते उस महिला के मुंह से निकलता है भक्सोडू- के’। यही इस गांव का नाम पड़ जाता है। सरकारी फाइल में। आप सोचेंगे ये क्या नाम है-भक्सोडू के’। पर नाम में क्या रखा है?

ये नाटक भारतीय पारंपरिक समाज में स्त्रियों के अधिकार, नारीवाद, लोकतंत्र, चुनाव किसानों की स्थिति, भारतीय खेती की समस्या, प्रेम जैसे कई मुद्दों को समेटता है। लेकिन सभी मुद्दों को स्त्री अधिकार के नजरिए से ही देखा गया है। जैसे खेती या किसानी को लीजिए। क्या किसान का मतलब पुरुष किसान ही है? क्या औरत किसान नहीं होती? हमारे यहां किसान का की छवि बना दी गई है जिसमें फटी गंजी पहने और कंधे पर कुल्हाड़ी लिया पुरुष शख्स ही किसान है? औऱ कोई औऱत किसान होने का दावा करे तो? क्या बैंक उस औरत को किसान के नाम पर कर्ज देंगे, क्या कृषि विभाग उस महिला किसान को मान्यता देगा? क्या किसानी में भी जेडर जस्टिस की जरूरत है? नाटक ये प्रश्न भी उठाता है।

नाटक में व्यंग के लहजे में दिखाया गया है कि जिन नौकरशाहों को खेती के बारे में बुनियादी बातें नहीं मालूम होती, ये जानकारी नहीं होती कि अरहर की दाल का फसल तैयार होने में कितना वक्त लगता है और मूंग की दाल का फसल होने में कितना, वही खेती के बारे में सरकारी नीतियां तय करते हैं और किसानों को सहूलियतें प्रदान करने में निर्णय करते हैं। भारतीय खेती की आज जो दुर्दशा है उसके पीछे एक बड़ा कारण नौकरशाही भी है।

इसी कड़ी में स्त्रियों से संबंधित और भी मसले इस नाटक में उभरते हैं। लेकिन सभी हंसी मजाक में। दर्शक हंसते हुए ये महसूस करता है कि मर्दवाद युद्ध और हथियार प्रेमी होता है और नृत्य या संगीत को न सिर्फ हेय दृष्टि से देखता है बल्कि उनको औरतपना वाला काम समझता है। यानी इनको स्त्रियोचित मानता है। एक स्टीरियोटाइप बना हआ है कि पुरुषों का काम युद्ध में लड़ना है और स्त्रियां तो वीर हो नहीं सकती है। पर ये तो कोई सच्चाई है नहीं सिर्फ स्त्रियों को लेकर बनाई गई धारणा है जो अवास्तविक है। एक दृश्य में एक राजपरिवार के घर के भीतर पति- पत्नी के बीच शारीरिक जोर आजमाइश होती है और पति हार जाता है। जिस तरह से ये मंच पर होता है उसमें एक मजाकियापन है। मगर निर्देसक ये भी चाहता है कि लोग अपने दृष्टिकोण बदलें। इस दृश्य को देखकर दर्शक हंसते हैं पर उनके भीतर कुछ स्टीरियोटाइप भी टूटते हैं।

नाम में का रखवो है’ में पहेली और बुझौवल का भी प्रयोग हुआ है। शादी के लिए किस लड़की या महिला की कहानी सुनाने की बारी कम आय़ेगी ये तय करने के लिए सबको एक पहेली हल करनी पड़ती है। जो पहेली का सही उत्तर देगी वही पहले काल्पनिक मगर विश्वसनीय लगने वाली कहानी सुनाएगी। ये भी परंपरा से लिया गया है। पारंपरिक भारतीय समाज में रात में (और दिन में भी) पहेली बूझने -बुझाने की परंपरा रही है। इसी से प्रभावित होकर अमीर खुसरो ने भी पहेलियां लिखीं। इस नाटक में भी कई बार पहेलियां बुझाई गईं हैं। यहां दो पहेलियां दी जा रही हैं-

इधर उधर उड़ जावे, कदे हाथ न आवे

बंद करी जब पोटली दोनों फिसल फिसल भग जावे

घूम के आवे नदी पहाड़, घोड़ा, गय्या, भेड़, सियार

बांधवे जब चली तू इको, हाथ न आवे जे होसियार

जीने पकड़ लिया इको, ते होगा इंसान चतुर

खुदई बनावे दुनिया अपनी , सीख लिया जिसने ये गुण

इस पहेली का उत्तर है- मन

दूसरी पहेली है-

बैठा अंदर पालथी मारे, बहुत उछाले बहुत गिरावे

पता नहीं कब करवट बदले, कब दे मार छलांग

हरा भरा सब बंजर कर दे, मान सम्मान छूमंतर कर दे

रंक बना दे राजा को, बिना कोई तीर कमान

उछले जब जब रोक जरा सा फेर प्य्रार से हाथ

जावेगा चूर चूर खुद, कर लो बैठ के बात

इस पहेली का उत्तर है- अभिमान।

इस तरह के कुछ और लोक प्रचलित प्रयोग इस नाटक में इस्तेमाल किए गए हैं। जैसे मुखौटे। जब महिला किसान से नौकरशाह सवाल पूछते हैं तो वे मुखौटे लगाए हुए हैं। हालांकि ये शायद इसलिए भी किया गया है जो मंडली में शामिल महिला कलाकोरों से ही नौकरशाहों की भूमिका कराई जाए। पर इसके माध्यम से ये भी दिखा दिया गया है कि नौकरशाह बिना चेहरे के होते हैं जो भी किसी अफसर के पद पर बैठता है वो एक खास साचें में ढल जाता है और अपने मन से नियमों की व्याख्या करता है।

अभिनय के बारे में अलग से कहने की जरूरत नहीं कि सभी अपने अपने रोल में जबर्दस्त थे। इसमें शामिल चार अभिनेत्रियां थीं- टीना भाटिया, सारिका सिंह, केतकी थट्टे, और निकेता सर्राफ। चार पुरुष अभिनेता थे- ऋग्वेद सिंह, निखिल यादव, दीपेंद्र वर्मा और सौरभ नायर। यानी सौरभ निर्देशक के साथ इसमे एक अभिनता भी थे। नाट्यालेख में भी उनका योगदान था निकेता सर्राफ के साथ।

नाम में का रखवो है’ मनोरंजक और हास्यपूर्ण होने के साथ साथ दर्शकों को वैचारिक प्रक्रिया से जोड़नेवाला नाटक भी है। बार बार हंसते हुए दर्शक ये भी महसूस करता है हमारी कई रीतिरिवाज वाहियात है, समानता के सिद्धांत के विपरीत है,स्त्री- दमन से औजार हैं और उन सबको बदलने की जरूरत है। लेकिन यहां ये भी जोड़ना होगा कि इसके लिए समाज में भी वातावरण तैयार हो रहा है। औद्योगीकरण, शहरीकरण और शिक्षा के प्रसार के कारण महिलाएं समाज के कई क्षेत्रों में आगे आ रही है। अब तो ग्राम पंचायतों में भी महिलाओं के लिए सीटें आऱक्षित हो गई है। इसलिए समाज में संवैधानिक अधिकारों के कारण ग्रामीण महिलाओं में फैसला लेने की ताकत गई है। वे ले भी रही हैं इसलिए इस नाटक में पंचायत औऱ चुनाव की बात करना कोई लेखकीय या निर्देशकीय कपोलकल्पना नहीं है वो एक वास्तविक सामाजिक प्रकिया की देन बी है। बस रंगमंच पर उस प्रक्रिया भी अभिव्यक्ति हो रही है।

कला का ये भी एक काम है कि नई सामाजिक प्रक्रियाओं को पहचाने और उनको अपने यहां दर्ज करे। `नाम में का रखवो है’ ये करता है। बुंदेली के ये दोनो प्रयोग हिंदी की उन बोलियों के लिए एक मानक भी हैं जिनमें नाटक किए जा रहे हैं लेकिन जो अपनी चमक बरकरार नहीं रख पा रहे हैं। जैसे भोजपुरी में नाटक हो रहे हैं लेकिन वे बड़ा पैमाना नहीं बना पा रहे हैं जिसे कभी भिखारी ठाकुर ने बनाया था। छत्तीसगढ़ी के साथ भी यही स्थिति है जहां हबीब तनवीर ने कभी एक बुलंदी हासिल की थी। हालांकि ये जरूरी नहीं कि हर भाषा या बोली में एक ही ऊंचाई हमेशा बरकरार रहे। ऐसा भी होता है कि कुछ जगहों पर या कुछ भाषाओं या बोलियों में अलग अलग वक्त पर नई सर्जनात्मकताएं प्रकट होती हैं। पर उसका असर कई जगहों पर पड़ता है।

रवीन्द्र त्रिपाठी
रवीन्द्र त्रिपाठी
रवीन्द्र त्रिपाठी (जन्म 15 फरवरी, 1959), मेदिनीनगर/डालटनगंज, झारखंड। प्रिंट, टेलीविजन और सोशल-मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार, नाटककार, साहित्य-फिल्म-कला-रंगमंच आलोचक, व्यंग्यकार, डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर, यू- ट्यूबर, अनुवादक, स्क्रिप्ट-लेखक और संपादक। महात्मा गांधी के जीवन पर `पहला सत्याग्रही’ और स्वामी विवेकानंद के जीवन पर `विवेकानंद इन शिकागो’ नाटक लिखे। `कथा शिवपालगंज की’ , `राग विराग’ और `अज्ञातवास’ (तीनों श्रीलाल शुक्ल के उपन्यासों के नाट्य रूपांतर)। सभी नाटक मंचित। साहित्य अकादेमी और साहित्य कला परिषद के लिए डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण, एबीपी न्यूज के व्यंग्य-शो `पोलखोल’ के स्क्रिप्ट लेखक (शुरू में उसके प्रॉड्यूसर भी)। प्रसन्ना की पुस्तक `इंडियन मेथड इन एक्टिंग’ का `अभिनय की भारतीय पद्धति’ नाम से हिन्दी अनुवाद। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका `रंग प्रसंग’ और केंद्रीय हिन्दी संस्थान की पत्रिका `मीडिया विमर्श’ के अतिथि संपादक रहे।
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