नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा से संबंधित मुद्दों का स्वतः संज्ञान लिया है। इस मामले की सुनवाई 29 दिसंबर को होगी।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस एजी मसीह की पीठ करेगी।
मध्य प्रदेश से लेकर गुजरात तक फैली हैं अरावली की पहाड़ियां
अरावली पहाड़ियां देश के चार राज्यों/केंद्रशासित प्रदेश में फैली हुई हैं। इनमें मध्य प्रदेश, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली शामिल हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने खनन विनियमन के उद्देश्य से अरावली पहाड़ियों के अंतर्गत भू-आकृतियों को वर्गीकृत करने के लिए ऊंचाई से संबंधित परिभाषा को मंजूरी दी थी।
मई 2024 में, अरावली में अवैध खनन से संबंधित एक मामले में अदालत ने यह पाया था कि राज्यों ने “अरावली पहाड़ियों/पहाड़ी श्रृंखलाओं” के लिए अलग-अलग परिभाषाएं अपनाई हैं और मुद्दों की जांच के लिए एक समिति का गठन किया था।
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इस समिति ने इसी साल अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी रिपोर्ट पेश की। इसमें अरावली पहाड़ियों की सुरक्षा और संरक्षण को लेकर कई उपाय सुझाए गए। इसमें कहा गया कि अरावली जिले में कोई भी भू-आकृति जिसकी स्थानीय भू-आकृति से ऊंचाई 100 मीटर या उससे अधिक हो उसे अरावली पहाड़ियां कहा जाएगा।
इसमें आगे कहा गया कि अरावली श्रृंखला को “दो या दो से अधिक अरावली पहाड़ियों के रूप में परिभाषित किया है जो एक दूसरे से 500 मीटर की निकटता के भीतर स्थित हैं जिसे दोनों ओर सबसे निचली समोच्च रेखा की सीमा पर सबसे बाहरी बिंदु से मापा जाता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने 100 मीटर परिभाषा को दी थी मान्यता
गौरतलब है कि अदालत में समिति द्वारा दी गई 100 मीटर की परिभाषा को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था। इसको लेकर हरियाणा, राजस्थान, नई दिल्ली में पर्यावरणविदों और कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन शुरू किए।
पर्यावरणविदों और कार्यकर्ताओं को चिंता है कि इससे पर्यावरण को भारी नुकसान होगा और पारिस्थितिकी को भी खतरा होगा। अरावली पर्वत श्रृंखला को लेकर हो रहे प्रदर्शनों के बीच केंद्र सरकार ने राज्यों को नए खनन पट्टों पर पूरी तरह प्रतिबंध का ऐलान किया है।
केंद्र सरकार ने 24 दिसंबर को इस पर रोक का ऐलान किया। पर्यावरण मंत्रालय ने इसको लेकर एक बयान जारी किया। इस आदेश के मुताबिक, पर्यावरण एवं पर्यावरण संरक्षण मंत्रालय (MoEF&CC) ने भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) को निर्देश दिया है कि वह पूरे अरावली क्षेत्र में उन अतिरिक्त क्षेत्रों/क्षेत्रों की पहचान करे, जहां केंद्र द्वारा पहले से ही खनन प्रतिबंधित क्षेत्रों के अतिरिक्त खनन निषिद्ध किया जाना चाहिए। यह पहचान पारिस्थितिक, भूवैज्ञानिक और भूदृश्य स्तर के विचारों पर आधारित होनी चाहिए।

