नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 12 दिसंबर को केरल हाई कोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी जिसमें एर्नाकुलम जिले की मुनंबम जमीन को वक्फ संपत्ति नहीं बताया गया था। अदालत ने सुनवाई करते हुए मामले की अगली सुनवाई तक भूमि की वर्तमान स्थिति को बनाए रखने का आदेश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्जवल भुइयां की पीठ कर रही थी। मामले की अगली सुनवाई 27 जनवरी 2026 को तय की गई है।
मुनंबम भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
अदालत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय की घोषणा पर रोक जारी रहेगी। वहीं, पूर्व न्यायाधीश सीएन रामचंद्रन नायर की अध्यक्षता वाला आयोग जांच जारी रख सकता है।
पीठ ने निर्देश दिया कि “छह सप्ताह में जवाब देने योग्य नोटिस जारी करें। सुनवाई की तारीख 27 जनवरी तय की जाए। इस बीच, विवादित आदेश में यह घोषणा कि विचाराधीन संपत्ति वक्फ का विषय नहीं है, स्थगित रहेगी और अगली सुनवाई की तारीख तक यथास्थिति बनी रहेगी। यह स्पष्ट किया जाता है कि हमने जांच पर रोक नहीं लगाई है।”
इस मामले में हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ केरल वक्फ संरक्षण वेधी द्वारा याचिका दायर की गई थी। इस पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने रोक का आदेश दिया।
गौरतलब है कि हाई कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा भूमि से बेदखल किए जा रहे 600 से अधिक परिवारों के अधिकारों की जांच के लिए गठित जांच आयोग को बरकरार रखा था। यह मामला एर्नाकुलम जिले के मुनंबम में लगभग 135 एकड़ भूमि से संबंधित है जिसे मूल रूप से 1950 में सिद्दीक सैत ने फारूक कॉलेज को दान में दिया था। हालांकि उस समय भूमि पर स्थानीय परिवार रह रहे थे लेकिन कॉलेज ने बाद में इसका कुछ हिस्सा निवासियों को बेच दिया।
केरल वक्फ बोर्ड ने 2019 में भूमि को वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत किया। बोर्ड के इस कदम से पहले की बिक्री अमान्य हो गई। इससे निवासियों ने व्यापक विरोध प्रदर्शन किया, जिन्हें बेदखली का डर था। यह मामला शुरुआत में कोझिकोड वक्फ न्यायाधिकरण के समक्ष उठाया गया जहां बोर्ड के निर्णय को चुनौती दी गई।
मामले में तनाव बढ़ने पर केरल सरकार ने नवंबर 2024 में जस्टिस रामचंद्रन नायर की अध्यक्षता में एक जांच आयोग का गठन किया। इसके बाद केरल वक्फ संरक्षण वेधी के सदस्यों ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर तर्क दिया कि राज्य को वक्फ अधिनियम के अंतर्गत आने वाले मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।
केरल हाई कोर्ट ने क्या कहा था?
हाई कोर्ट में हुई सुनवाई में एक एकल न्यायाधीश ने इस दृष्टिकोण से सहमति जताते हुए आयोग को रद्द कर दिया और फैसला सुनाया कि सरकार का हस्तक्षेप उसकी शक्तियों से परे था। हालांकि, अक्टूबर 2025 में एक खंडपीठ ने इस फैसले को पलट दिया और राज्य के आदेश को बरकरार रखते हुए यह टिप्पणी की कि केरल वक्फ बोर्ड द्वारा 2019 में भूमि का वक्फ के रूप में पंजीकरण “कानून की दृष्टि से गलत” था।
डिवीजन बेंच ने यह भी कहा कि भूमि को वक्फ के रूप में अधिसूचित करना बोर्ड द्वारा “भूमि हड़पने की रणनीति” के समान है और यह भी कहा कि 1950 का विलेख एक उपहार विलेख था, न कि वक्फ विलेख।
केरल वक्फ संरक्षण वेधी ने इस याचिका के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय का रुख करते हुए तर्क दिया कि उच्च न्यायालय ने संपत्ति के वक्फ होने या न होने के संबंध में निर्णय देकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है – यह मुद्दा वक्फ न्यायाधिकरण के समक्ष लंबित है। इसने यह भी तर्क दिया कि उच्च न्यायालय के फैसले ने कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने को प्रभावी रूप से वैध ठहराया है, क्योंकि इसने राज्य को वैधानिक निर्णय के अधीन मामले में हस्तक्षेप करने की अनुमति दी है।
मामले में संक्षिप्त दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को नोटिस जारी किया और कहा कि भूमि विवाद के संबंध में अगली सुनवाई 27 जनवरी 2026 तक यथास्थिति रखी जाए।

