Friday, March 20, 2026
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‘इस बीमारी का अंत होना चाहिए’, सुनवाई समाप्त होने के बाद भी फैसले में देरी करने वाले हाई कोर्ट के जजों को सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उन जजों को फटकार लगाई है जो सुनवाई समाप्त होने के बाद फैसले में देरी करते हैं। इस मामले में याचिकाकर्ता की तरफ से दलील वरिष्ठ अधिकवक्ता मुकुल रोहतगी ने दी।

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, (3 फरवरी) को देश के हाई कोर्ट को कड़ा संदेश देते हुए फटकार लगाई है। अदालत ने कहा कि जजों को फैसला सुरक्षित रखने और फिर उन्हें महीनों तक सुनाने या सार्वजनिक न करने की प्रथा को समाप्त करना होगा।

सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत , जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपिन एम पंचोली की पीठ ने कहा कि न्याय की कीमत पर इस तरह की देरी को जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान क्या टिप्पणी की?

सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि “हमारे पास मोटे तौर पर दो प्रकार के न्यायाधीश हैं। एक तो मेहनती न्यायाधीश हैं जो सबकी सुनवाई करते हैं और 10-15 मामलों को भी अपने पास सुरक्षित रखते हैं। कुछ न्यायाधीश ऐसे भी हैं जो सुनवाई के बाद फैसला नहीं सुनाते। हम किसी एक व्यक्ति पर आरोप नहीं लगा रहे हैं। यह न्यायपालिका के सामने एक चुनौती है और यह एक स्पष्ट समस्या है जिसे समाप्त करना आवश्यक है। न्याय के उपभोक्ताओं के हित में इसे और अधिक फैलने नहीं दिया जा सकता। ”

गौरतलब है कि अदालत हाई कोर्ट के फैसले को अपलोड करने में देरी की शिकायत वाली एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में कहा गया था कि झारखंड उच्च न्यायालय ने दिसंबर 2025 में फैसला सुनाया था लेकिन फैसला अभी तक उसकी वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया गया है और न ही याचिकाकर्ता के वकील को जारी किया गया है।

इस मामले में याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए वकील मुकुल रोहतगी ने दलील दी। उन्होंने कहा “कोई न कोई संदेश तो जाना ही चाहिए। यह कानून की गरिमा के साथ खिलवाड़ है।”

सुनवाई कर रही पीठ ने इस बात से सहमति जताई और जजों द्वारा मामलों को आगे के निर्देशों के लिए लंबित रखने की एक और प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा “एक और चलन है… जिसमें बहस होती है। फिर आगे के निर्देशों के लिए इसे स्थगित कर दिया जाता है। फिर एक समारोह होता है जिसमें पक्षकार उपस्थित होते हैं। फिर कुछ बहस होती है और फिर ‘अगली तारीख के लिए स्थगित’ कर दिया जाता है।”

अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने क्या दलील दी?

वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने टिप्पणी की कि ऐसी प्रथाएं न्यायिक प्रणाली के लिए कलंक हैं। अधिवक्ता ने दलील दी कि “जब आप फैसले नहीं सुना सकते तो मामलों को स्थगित क्यों करते हैं? स्पष्टीकरण आदि के लिए सुनवाई स्थगित करने की यह प्रवृत्ति बंद होनी चाहिए। उच्च न्यायालयों को इस संबंध में कोई निर्देश देना होगा।”

उन्होंने आगे कहा कि उनके मुवक्किल को लगता है कि हाई कोर्ट का फैसला उनके द्वारा पहले सुप्रीम कोर्ट का रुख करने की प्रतिक्रिया थी। उन्होंने कहा, “मेरे मुवक्किल ने अदालत का रुख किया था और फिर उनकी याचिका खारिज कर दी गई। उन्होंने मुझे बताया कि शायद ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वह सुप्रीम कोर्ट गए और उन्होंने (उच्च न्यायालय के) जज को नाराज कर दिया।”

सीजेआई सूर्यकांत कांत ने कहा कि मुकदमे के पक्षधर के मन में स्वाभाविक रूप से कई आशंकाएं होंगी। उन्होंने आगे कहा कि इस सप्ताहांत हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों के साथ देरी के मुद्दे पर चर्चा की जाएगी।

मंगलवार को हुई सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाई कोर्ट को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि आवेदन में उल्लिखित निर्णय इस सप्ताह उपलब्ध कराया जाए।

इससे पहले नवंबर 2025 में अदालत ने उच्च न्यायालयों को अपने निर्णयों की समय-सीमा पर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया था। इसमें मामलों को निर्णय के लिए सुरक्षित रखने की तारीखें, निर्णय सुनाए जाने की तारीखें और उन्हें संबंधित वेबसाइटों पर अपलोड करने की तारीखें शामिल थीं।

अमरेन्द्र यादव
अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...
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