नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार, 8 जनवरी को जस्टिस यशवंत वर्मा की एक याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा उनके खिलाफ महाभियोग के लिए न्यायाधीश (जांच) अधिनियम के तहत तीन सदस्यीय समिति गठित करने के फैसले को रद्द करने की मांग की थी। यह मामला बीते साल उनके घर में आग लगने के दौरान पाए गए कैश से जुड़ा है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की पीठ ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान क्या कहा?
पीठ ने सुनवाई के दौरान जस्टिस वर्मा के वकील के उस अनुरोध को खारिज कर दिया है जिसमें उन्हें तीन सदस्यीय समिति के समक्ष पेशी को बढ़ाने की मांग की गई थी। जांच समिति ने उनका (जस्टिस वर्मा का) जवाब नवंबर तक मांगा था। लिखित जवाब की समय सीमा इस वर्ष 12 जनवरी तक बढ़ाई गई थी। उन्हें 24 जनवरी को समिति के समक्ष पेश होने के लिए कहा गया था।
जस्टिस वर्मा की तरफ से अदालत में वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल ने दलील दी। उन्होंने कहा “समिति के समक्ष पेश होने की तारीख नजदीक आ रही है… क्या इसे बढ़ाया जा सकता है… मुझे पहले एक बार तारीख बढ़ाई गई थी?”
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अदालत ने उनका अनुरोध खारिज करते हुए कहा कि “आप पेश हों। सोमवार तक लिखित दलीलें दाखिल करें। फैसला सुरक्षित रखा गया है।”
क्या है पूरा मामला?
गौरतलब है कि जस्टिस वर्मा के घर में मार्च 2025 में आग बुझाते समय कर्मियों को भारी मात्रा में कैश मिला था। इस घटना ने जज के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले को उजागर किया था और न्यायपालिका को भी सवालों के दायरे में ला दिया था।
जस्टिस वर्मा ने आरोपों से इंकार कर दिया था लेकिन उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट से उनके मूल इलाहाबाद हाई कोर्ट में तबादला कर दिया गया था। इसके साथ ही आगे की कार्रवाई तक उनसे न्यायिक कार्य छीन लिया गया था।
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भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ आंतरिक जांच शुरू की थी और बाद में उन्हें इस्तीफा देने या महाभियोग की कार्यवाही का सामना करने के लिए कहा। जस्टिस वर्मा ने पद छोड़ने से इंकार कर दिया था।
बीते साल अगस्त में लोकसभा अध्यक्ष ने जस्टिस वर्मा को हाई कोर्ट से हटाने की प्रक्रिया शुरू की। उन्होंने जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था।
इसके बाद जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में इन कार्यवाहियों के विरुद्ध याचिका दायर की थी। जस्टिस वर्मा ने प्रक्रियात्मक आधार पर लोकसभा अध्यक्ष के फैसले को चुनौती दी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हालांकि उनके महाभियोग के नोटिस लोकसभा और राज्यसभा दोनों में दिए गए थे, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने राज्यसभा अध्यक्ष द्वारा प्रस्ताव स्वीकार किए जाने की प्रतीक्षा किए बिना ही एकतरफा रूप से जांच समिति का गठन कर दिया।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रियात्मक खामियों को लेकर लोकसभा और राज्यसभा को नोटिस जारी किया था।

