नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 25 नवंबर को पुलिस स्टेशनों में सीसीटीवी कैमरे न लगाने को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों को फटकार लगाई है। अदालत ने साल 2020 के कैमरा अनिवार्य करने के फैसले का पालन न करने के लिए फटकार लगाई है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि हिरासत में मौतें ‘व्यवस्था पर एक धब्बा’ हैं और केंद्र सरकार सर्वोच्च न्यायालय को इतने हल्के में ले रही है कि उसके पहले के आदेशों के मुताबिक अनुपालन हलफनामा भी दायर नहीं किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को लगाई फटकार
सुप्रीम कोर्ट इस वर्ष की शुरुआत में स्वतः संज्ञान लिए गए एक मामले में सुनवाई कर रही थी। अदालत ने एक समाचार पत्र की रिपोर्ट के आधार पर मामला संज्ञान में लिया था। इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि राजस्थान में आठ महीनों में हिरासत में 11 मौतें हुईं।
2020 में अदालत ने परमवीर सिंह बनाम दलजीत सिंह मामले में निर्देश दिया था कि देश के सभी पुलिस स्टेशनों में नाइट विजन वाले कैमरे लगाए जाएं। जस्टिस मेहता ने सुनवाई की शुरुआत में पिछले निर्देश का हवाला देते हुए कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अनुपालन हलफनामा दाखिल करना होगा।
उन्होंने कहा कि राज्य जवाब देने में विफल रहे हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने इस मामले में न्यायमित्र की भूमिका में अदालत की मदद की। उन्होंने बताया कि केवल 11 राज्यों ने ही अनुपालन किया है। जस्टिस मेहता ने तब मध्य प्रदेश की प्रशंसा की जिसने आदेश का अनुपालन किया। जस्टिस मेहता ने कहा “मध्य प्रदेश का काम उल्लेखनीय है।” इस पर दवे ने सहमति जताई।
उन्होंने कहा “हां, मध्य प्रदेश एक आदर्श राज्य है।” पीठ ने तब अन्य राज्यों की चुप्पी की ओर सवाल उठाया।
जस्टिस मेहता ने केरल को लेकर आश्चर्य जताया कि राज्य ने अपनी रिपोर्ट नहीं दी है। उन्होंने कहा “केरल क्यों पीछे हट रहा है? यह तो उन्नत राज्य है।”
इस दौरान दवे ने भी बताया कि केंद्र सरकार ने भी अनुपालन दाखिल नहीं किया है। जस्टिस नाथ ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि केंद्र सरकार न्यायालय के आदेश को हल्के में नहीं ले सकता।
उन्होंने कहा “केंद्र सरकार अदालत को हल्के में रही है, क्यों?”
तुषार मेहता ने क्या दलील दी?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार की तरफ से दलील दी, उन्होंने कहा कि वह आवश्यक शपथपत्र दाखिल करेगी। उन्होंने दावा किया कि उन्हें लंबित निर्देश की जानकारी नहीं थी।
लेकिन जस्टिस ने स्पष्ट किया कि न्यायालय कागजी कार्रवाई से ज्यादा कुछ चाहता है। उन्होंने कहा “हलफनामा नहीं, अनुपालन। राजस्थान में 8 महीने में 11 मौतें हुईं। देश इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। यह व्यवस्था पर कलंक है।”
सुनवाई के दौरान पीठ ने जेल सुधारों पर भी चर्चा की। जस्टिस मेहता ने कहा कि खुली जेलें भीड़भाड़ कम करने और पुनर्वास में सहायक हो सकती हैं।
उन्होंने कहा “खुली जेलें भीड़भाड़ की समस्या का समाधान करेंगी।” इस पर जस्टिस नाथ ने कहा कि ऐसे उपायों से राज्य का वित्तीय बोझ भी कम होगा।
सॉलिसिटर जनरल ने यह सुनिश्चित करने के लिए तीन सप्ताह का समय मांगा कि सभी राज्य और केंद्रशासित प्रदेश अपने हलफनामे दाखिल करें।
पीठ ने इसके बाद राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 3 हफ्तों का समय दिया। गौरतलब है कि अब तक सिर्फ 11 राज्यों ने ही अनुपालन हलफनामे दाखिल किए हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 16 दिसंबर को होगी।

