नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (19 जनवरी) को एक फैसले में कहा कि पुलिस अधिकारी केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों द्वारा किए गए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दंडनीय अपराधों से संबंधित मामलों की जांच करने और आरोप पत्र दाखिल करने के लिए सक्षम हैं।
अदालत ने इस दौरान स्पष्ट किया कि राज्य पुलिस द्वारा केंद्रीय सरकारी कर्मचारी के खिलाफ मामला दर्ज करने से पहले सीबीआई की पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है और सीबीआई की मंजूरी के अभाव में राज्य की जांच एजेंसियों द्वारा दायर आरोपपत्र को अमान्य नहीं ठहराया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले को रखा बरकरार
जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने राजस्थान उच्च न्यायालय के उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें केंद्रीय सरकारी कर्मचारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था। पीठ ने कहा कि भले ही आरोपी केंद्रीय सरकार का कर्मचारी है फिर भी राजस्थान राज्य के भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो (एसीबी) को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (पीसी एक्ट) के प्रावधानों के तहत आपराधिक मामला दर्ज करने का अधिकार क्षेत्र है।
राजस्थान हाई कोर्ट ने अपीलकर्ता-केंद्रीय सरकारी कर्मचारी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि केवल दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम के तहत स्थापित केंद्रीय जांच ब्यूरो ही केंद्रीय सरकारी कर्मचारी से जुड़े मामलों में पंजीकरण जांच और आरोप पत्र दाखिल कर सकता है।
अपने मत के समर्थन में अदालत ने एसी शर्मा बनाम दिल्ली प्रशासन, (1973) 1 एससीसी 726 मामले का हवाला दिया। इस मामले में दिल्ली राज्य प्रशासन ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947 के तहत मामला दर्ज किया था। इसके परिणामस्वरूप आरोपी को दोषी ठहराया गया था और बाद में उच्च न्यायालय ने भी इस फैसले को बरकरार रखा था।
आरोपी ने उच्चतम न्यायालय में दायर की याचिका
इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर यह तर्क दिया कि दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम (संशोधित) के तहत निर्धारित विशेष शक्तियों और प्रक्रियाओं के मद्देनजर, केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों द्वारा किए गए रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार से संबंधित अपराधों की जांच केवल विशेष पुलिस स्थापना द्वारा ही की जा सकती है। चूंकि वह केंद्रीय लोक निर्माण विभाग का कर्मचारी था और जांच डीएसपीई द्वारा नहीं की गई थी। इसलिए उसने तर्क दिया कि पूरा मुकदमा ही अमान्य हो गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि सुनवाई के दौरान अभियुक्तों के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि डीएसपीई अधिनियम की योजना न तो स्पष्ट रूप से और न ही आवश्यक निहितार्थ से नियमित पुलिस अधिकारियों को किसी अन्य सक्षम कानून के तहत अपराधों की जांच करने के उनके अधिकार क्षेत्र, शक्ति और क्षमता से वंचित करती है। आगे यह भी कहा गया कि डीएसपीई अधिनियम केवल अनुमति देने वाला या अधिकार प्रदान करने वाला प्रतीत होता है। इसका उद्देश्य केवल दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान को भी धारा 3 में निर्दिष्ट अपराधों की जांच करने में सक्षम बनाना है, बिना किसी अन्य कानून को बाधित किए जो पुलिस अधिकारियों को अपराधों की जांच करने का अधिकार देता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान आंध्र प्रदेश, केरल, मध्य प्रदेश हाई कोर्टों के इसी तरह के अन्य मामलों का हवाला दिया। इन निर्णयों में कहा गया कि किसी राज्य में तैनात केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों द्वारा किए गए रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के अपराधों की जांच नियमित राज्य पुलिस या विशेष पुलिस प्रतिष्ठान द्वारा की जा सकती है और राज्य एजेंसी द्वारा बिछाए गए जाल और की गई जांच को अधिकार क्षेत्र के अभाव के आधार पर अवैध नहीं ठहराया जा सकता है।

