नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (2 फरवरी) को पुणे के बहुचर्चित पोर्श कार दुर्घटना मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने मुख्य आरोपी आदित्य अविनाश सूद को दो अन्य को नियमित जमानत दे दी है।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जवल भुइयां की पीठ ने यह आदेश पारित किया।
2024 में पुणे में हुआ था यह हादसा
इस मामले में कुल 10 आरोपियों में से आदित्य सूद एक अहम नाम था। इसके साथ ही कोर्ट ने आशीष मित्तल और अमर गायकवाड़ को भी जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।
यह हादसा 19 मई 2024 की रात को पुणे के कल्याणी नगर इलाके में हुआ था। बताया गया कि एक नाबालिग नशे की हालत में पोर्श कार चला रहा था जिसमें अन्य नाबालिग भी थे। इसी दौरान कार ने दो आईटी प्रोफेशनल्स को टक्कर मार दी जिससे दोनों की मौके पर ही मौत हो गई। इस घटना ने पूरे शहर और बाद में पूरे देश में सनसनी मचा दी थी।
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पिछले साल 19 अगस्त को 52 वर्षीय आदित्य अविनाश सूद और 37 वर्षीय आशीष सतीश मित्तल को गिरफ्तार किया गया था। उन पर आरोप था कि दुर्घटना के समय कार में मौजूद नाबालिगों के ब्लड सैंपल की अदला-बदली करने की कोशिश की गई थी ताकि पुलिस जांच को गुमराह किया जा सके। इस वजह से मामला और ज्यादा संवेदनशील बन गया था।
तीनों आरोपियों पर क्या था आरोप?
नाबालिग बच्चे के पिता आदित्य सूद पर आरोप है कि उसने अपने बेटे के ब्लड सैंपल की जगह अपना ब्लड सैंपल दिया था।
नाबालिग के पिता के एक दोस्त आशीष मित्तल पर आरोप है कि उसने नाबालिग के रक्त के नमूने के साथ अपना रक्त का नमूना बदल लिया था।
वहीं, अमर गायकवाड़ पर आरोप है कि उसने कथित तौर पर लेन-देन में मदद की और अस्पताल के कर्मचारियों को 3 लाख रुपये की रिश्वत दी।
अदालत में आदित्य सूद की ओर से वरिष्ठ एडवोकेट प्रशांत पाटिल और एडवोकेट आबिद मुलानी पेश हुए। जमानत की पुष्टि करते हुए एडवोकेट प्रशांत पाटिल ने बताया कि अदालत ने कुछ शर्तें भी रखी हैं। उन्होंने कहा कि उनके क्लाइंट पूरी तरह से जांच एजेंसी का सहयोग करेंगे और किसी भी तरह के गैरकानूनी कदम नहीं उठाएंगे।
इस मामले ने देशभर में काफी ध्यान खींचा। खासकर ब्लड सैंपल बदलने और जांच में गड़बड़ी करने के प्रयासों को लेकर पुलिस और प्रशासन की भी आलोचना हुई थी।
वहीं, सोमवार को सुनवाई करते हुए कोर्ट ने आरोपी आदित्य अविनाश सूद, आशीष मित्तल और अमर गायकवाड़ को नियमित जमानत दे दी। हालांकि अभी मामले में जांच जारी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जांच पूरी होने तक उन्हें सभी कानूनी नियमों का पालन करना होगा।
पीठ ने इस मामले में आरोपियों को राहत प्रदान करते हुए कहा कि यह निर्णय ‘स्वतंत्रता बनाम कारावास’ के सिद्धांत और इस तथ्य पर आधारित है कि मामले में अभी 150 से अधिक गवाहों से पूछताछ बाकी है। इस दौरान जस्टिस नागरत्ना ने माता-पिता के गैर-जिम्मेदारी के चिंताजनक स्वरूप की कड़ी आलोचना की।
(समाचार एजेंसी आईएएनएस से इनपुट के साथ)

