नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (9 फरवरी) को पश्चिम बंगाल विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के संबंध में निर्देश दिया है। अदालत ने निर्देश दिया कि राज्य सुनिश्चित करे कि उसके द्वारा चुनाव आयोग को 8,000 से अधिक अधिकारी मंगलवार (10 फरवरी) शाम तक जिला निर्वाचन अधिकारियों को रिपोर्ट करें। सुप्रीम कोर्ट में आज हुई सुनवाई में राज्य में एसआईआर प्रक्रिया को एक हफ्ते तक बढ़ाने का भी निर्देश दिया गया है।
सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि वे एसआईआर को सुचारू रूप से जारी रखने के लिए निर्देश जारी करेंगे और इसके लिए किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आने देंगे।
SIR के संचालन में नहीं आने देंगे बाधाः सुप्रीम कोर्ट
सीजेआई कांत ने कहा “हम एसआईआर के संचालन में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आने देंगे। यह सभी राज्यों को स्पष्ट होना चाहिए।”
चुनाव आयोग द्वारा यह निवेदन करने के बाद अदालत ने टिप्पणी की कि राज्य द्वारा चुनाव निकाय को उचित सहयोग नहीं दिया जा रहा है। अदालत ने चुनाव आयोग के उन आरोपों की ओर भी ध्यान दिलाया कि एसआईआर हिंसा, धमकी और निरंतर राजनैतिक हस्तक्षेप से प्रभावित था।
पीठ ने दोहराया कि पुलिस को कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए निर्देश जारी किए गए थे और पश्चिम बंगाल के डीजीपी को राज्य के विरुद्ध आरोपों पर व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता सरकार की ओर से दलील दे रहे थे। उन्होंने पहले दलील दी थी कि यह संदेश जाना चाहिए कि संविधान सभी पर लागू होता है। चुनाव आयोग ने यह भी कहा कि इसने कुछ अधिकारियों के निलंबन की सिफारिश की थी लेकिन राज्य सरकार द्वारा कुछ नहीं किया गया।
चुनाव आयोग निर्णय लेने को है स्वतंत्र
इसके बाद अदालत ने राज्य से कार्रवाई करने को कहा। अदालत ने कहा “कृपया इसका संज्ञान लें। जब निलंबन की सिफारिश की गई है तो मुझे लगता है राज्य को पता है कि क्या करना है। हम आदेश देते हैं कि चुनाव आयोग उन अधिकारियों को बदलने के लिए स्वतंत्र होगा जो अपना काम ठीक से नहीं निभा रहे हैं।”
इस बीच अदालत ने निर्देश दिए कि यदि राज्य सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए अधिकारी योग्य पाए जाते हैं तो चुनाव आयोग उन्हें नियुक्त करने के लिए स्वतंत्र होगा। अदालत ने आगे कहा कि “उनके बायोडाटा की संक्षिप्त जांच के बाद इन राज्य सरकारी अधिकारियों को सूक्ष्म पर्यवेक्षक के रूप में कार्य करने के लिए एक या दो दिन का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया जा सकता है।”
एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण में, अदालत ने कहा कि सूक्ष्म पर्यवेक्षकों या राज्य सरकारी अधिकारियों को सौंपी गई जिम्मेदारी केवल मतदाता पंजीकरण अधिकारियों की सहायता करना होगी। वहीं, आज सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने पश्चिम बंगाल में लोगों को बड़े पैमाने पर नोटिस जारी किए जाने की ओर ध्यान दिलाया।
अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग ने उन लोगों को नोटिस भेजे हैं जिनके 5-6 बच्चे हैं। जस्टिस ने कहा कि ऐसे मामलों में चुनाव आयोग द्वारा नोटिस जारी करना उचित हो सकता है, लेकिन चुनाव निकाय ने मध्य नाम में मामूली विसंगति के लिए भी नोटिस जारी किए हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने चुनाव आयोग को नाम के मिलान में विसंगतियों के आधार पर मतदाताओं को नोटिस भेजते समय सावधानी बरतने के लिए कहा।
बिहार चुनाव से पहले SIR प्रक्रिया शुरू
गौरतलब है कि बीते साल बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने एसआईआर (SIR) प्रक्रिया शुरू की गई थी। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और नेशनल फेडरेशन फॉर इंडियन विमेन (NFIW) सहित कई याचिकाओं में इस प्रक्रिया की वैधता को चुनौती दी गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस पर कोई रोक न लगाए जाने के कारण चुनाव आयोग ने एसआईआर की कार्यवाही जारी रखी।
बाद में चुनाव आयोग ने एसआईआर को पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु सहित अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक विस्तारित कर दिया। इसके चलते कई याचिकाएं दायर की गईं जिनमें इसे चुनौती दी गई। कोर्ट ने 29 जनवरी को इन पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
इसके बाद बनर्जी ने राज्य में चुनाव आयोग द्वारा विशेष मतदाता सूची (एसआईआर) आयोजित करने के निर्णय को चुनौती देते हुए अदालत में याचिका दायर की और पिछले वर्ष तैयार की गई मतदाता सूची के आधार पर चुनाव कराने का निर्देश देने की मांग की। उन्होंने मतदाताओं विशेष रूप से “तार्किक विसंगति” श्रेणी के मतदाताओं को मतदाता सूची से हटाने पर तत्काल रोक लगाने का भी अनुरोध किया।
अपना पक्ष रखने के लिए 4 फरवरी को बनर्जी स्वयं सुप्रीम कोर्ट में उपस्थित हुईं और एसआईआर में उठाए गए विभिन्न मुद्दों को उजागर किया। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने इस वर्ष के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले राज्य को निशाना बनाया है।

