नई दिल्लीः इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने लोकसभा स्पीकर के उस निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है जिसमें उनके खिलाफ न्यायमूर्ति (जांच) अधिनियम के तहत तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था। जस्टिस वर्मा ने इसे रद्द करने की मांग की।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने मंगलवार, 16 दिसंबर को लोकसभा स्पीकर के साथ-साथ राज्यसभा और लोकसभा के सचिवालयों को नोटिस जारी किया है।
जस्टिस यशवंत वर्मा ने दी चुनौती
जस्टिस वर्मा ने लोकसभा स्पीकर के फैसले को प्रक्रियात्मक आधार पर चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका में जस्टिस वर्मा ने तर्क दिया कि उनके खिलाफ लोकसभा और राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने राज्यसभा अध्यक्ष द्वारा प्रस्ताव को स्वीकार किए जाने और संबंधित अधिनियम में निर्धारित प्रावधान के मुताबिक अध्यक्ष के साथ संयुक्त परामर्श किए बिना ही एकतरफा रूप से समिति का गठन कर दिया है।
याचिका में कहा गया “माननीय अध्यक्ष ने 21.07.2025 को लोकसभा में पेश किए गए प्रस्ताव को स्वीकार करने के बाद 12.08.2025 को एकतरफा रूप से समिति का गठन करके न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3 (2) के प्रावधान का स्पष्ट रूप से उल्लंघन किया है क्योंकि उसी दिन राज्यसभा में एक अलग प्रस्ताव पास किया गया था जिसे स्वीकार नहीं किया गया था।”
आज की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट इस तर्क से सहमत दिखाई दिया। अदालत ने पूछा कि संसद में कानूनी विशेषज्ञों ने इसे कैसे होने दिया?
जस्टिस दत्ता ने पूछा “इतने सारे सांसद और कानून विशेषज्ञ मौजूद थे लेकिन किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिलाया?” अगस्त में लोकसभा अध्यक्ष ने जस्टिस वर्मा को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से हटाने की प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू कर दी थी।
अध्यक्ष ने दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश के आवास से नकदी बरामदगी की जांच के लिए एक समिति का गठन किया था। इससे पहले उच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीशों की आंतरिक जांच में न्यायाधीश को दोषी पाया गया था और उन्हें पद से हटाने की सिफारिश की गई थी। इसके बाद केंद्र सरकार ने संसद में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया जो वर्तमान में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में तैनात हैं।
146 सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित प्रस्ताव को अध्यक्ष ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ने घटना की जांच के लिए निम्नलिखित तीन सदस्यों की एक समिति का गठन किया। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार, मद्रास हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस मनींद्र मोहन श्रीवास्तव और वरिष्ठ अधिवक्ता बी वासुदेव आचार्य शामिल हैं।
पैनल ने मांगा लिखित जवाब
पिछले महीने पैनल ने जस्टिस वर्मा से उनके खिलाफ लगे आरोपों पर लिखित जवाब मांगा था। इस पत्र के जवाब में न्यायाधीश ने जुलाई में दोनों सदनों के समक्ष प्रस्तुत प्रस्तावों और उनके परिणामस्वरूप पारित आदेशों की प्रमाणित प्रतियां मांगीं।
हालांकि जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि उन्हें लोकसभा और राज्यसभा को भेजे गए पत्रों का अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है। उन्होंने पैनल को पत्र लिखकर लोकसभा अध्यक्ष के कार्यों को चुनौती देने के अपने इरादे से अवगत कराया था।
परिणामस्वरूप उन्हें लिखित जवाब देने की समय सीमा 12 जनवरी, 2026 तक बढ़ा दी गई है। उन्हें 24 जनवरी को समिति के समक्ष उपस्थित होने के लिए कहा गया है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट जनवरी के पहले सप्ताह में न्यायमूर्ति वर्मा की याचिका पर सुनवाई करेगा। गौरतलब है कि उन्होंने समिति द्वारा जारी नोटिस को भी चुनौती दी है।
14 मार्च की शाम को न्यायमूर्ति वर्मा के घर में लगी आग के दौरान दमकलकर्मियों ने कथित तौर पर बेहिसाब नकदी बरामद की थी।
जस्टिस वर्मा और उनकी पत्नी उस समय दिल्ली में नहीं थे और मध्य प्रदेश की यात्रा पर थे। आग लगने के समय घर पर केवल उनकी बेटी और वृद्ध माता ही मौजूद थीं। बाद में एक वीडियो सामने आया जिसमें नकदी के बंडल आग में जलते हुए दिखाई दे रहे थे।
इस घटना के कारण जस्टिस वर्मा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे जिन्हें उन्होंने नकारते हुए कहा कि यह उन्हें फंसाने की साजिश प्रतीत होती है। भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना (जो अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं) ने आरोपों की आंतरिक जांच शुरू की और जांच के लिए 22 मार्च को तीन सदस्यीय समिति का गठन किया।

