नई दिल्लीः NCERT की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े आपत्तिजनक उल्लेखों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। गुरुवार (26 फरवरी) को सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने इसे न्यायपालिका को बदनाम करने की सोची-समझी साजिश करार दिया और बाजार से किताब को वापस लेने का निर्देश दिया। वहीं शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी मामले में प्रतिक्रिया दी है। इस मामले में अगली सुनवाई 11 मार्च को होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच की बात कही है और इससे एक दिन पहले ही किताब के खास चैप्टर पर आपत्ति जताई थी। कोर्ट ने कहा था कि अदालत को बदनाम नहीं करने दिया जाएगा। हालांकि कोर्ट की आपत्ति के बाद एनसीईआरटी ने किताब फिर लिखने का फैसला किया है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट में एनसीईआरटी की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस सुओ मोटो केस में हम माफी मांगते हैं। इस पर सीजेआई ने कहा कि मीडिया में हमारे दोस्तों ने यह नोटिस भेजा और इसमें माफी का एक शब्द नहीं है।
उन्होंने कहा, ‘यह हमारी संस्थागत जिम्मेदारी है कि हम यह पता लगाएं कि यह किताब में प्रकाशित हुआ था या नहीं। रजिस्ट्रार जनरल को भेजे गए संदेश में संबंधित विभाग इसका बचाव कर रहा था। यह एक गहरी साजिश थी।
सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को बताया कि चैप्टर तैयार करने वाले दो लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। वे कभी यूजीसी या किसी मंत्रालय के साथ काम नहीं कर सकेंगे।
इसके बाद सीजेआई ने कहा, ‘यह तो बहुत आसान होगा और वो बच निकलेंगे। उन्होंने गोली चलाई और न्यायपालिका का खून बह रहा है।’ तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि 32 कॉपी जो बाजार में गई थीं, उन्हें वापस ले लिया गया है और पूरी पुस्तक की समीक्षा की जाएगी।
इस पर सीजेआई ने टिप्पणी की कि केवल दो लोगों पर कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। यह बहुत आसान होगा और वे बच निकलेंगे। यह पूरी न्यायपालिका को बदनाम करने की चाल है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या पुस्तक की कॉपियां अभी बाजार या ऑनलाइन उपलब्ध हैं। उसे भी जल्द वापस लिया जाए।
कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने उठाया मुद्दा
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ के सामने सीनियर वकील कपिल सिब्बल और डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने यह मुद्दा उठाया। सिब्बल ने कहा कि कक्षा 8 के बच्चों को जुडिशरी में करप्शन के बारे में पढ़ाया जाना चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि संस्था के सदस्य होने के नाते वे इससे परेशान हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन और स्वायत्तता सुनिश्चित की है। ऐसे में किसी एक संवैधानिक संस्था की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाली सामग्री बेहद गंभीर है।
उन्होंने कहा कि यदि इस तरह की बातें युवाओं और अभिभावकों के मन में बैठ गईं तो न्यायिक संस्थाओं पर से भरोसा कम हो सकता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले में गहन जांच की जाएगी और यह पता लगाया जाएगा कि इस सामग्री के प्रकाशन के पीछे कौन जिम्मेदार है। वहीं, सॉलिसिटर जनरल ने आश्वासन दिया कि विवादित अध्याय हटाया जाएगा और संशोधित संस्करण दोबारा प्रकाशित किया जाएगा। अदालत ने दोहराया कि न्यायपालिका की साख से समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
धर्मेंद्र प्रधान ने व्यक्त की चिंता
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने एनसीईआरटी की उस पुस्तक को लेकर खेद व्यक्त किया है, जिसमें न्यायपालिका को लेकर विवादित बातें लिखी गई थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस पुस्तक के उस अध्याय को लिखने वाले व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने इस संबंध में स्थित जांच की भी बात कही है।
धर्मेंद्र प्रधान ने कहा, “हम न्यायपालिका का अत्यंत आदरपूर्वक सम्मान करते हैं। न्यायपालिका ने जो कहा है, उसका हम पूरा पालन करेंगे। जो भी हुआ, मैं उसके लिए अत्यंत दुखी हूं और मैं उसके लिए खेद प्रकट करता हूं।”
केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने कहा कि जब यह विषय उनके सामने आया तो उन्होंने तुरंत ही एनसीईआरटी को निर्देश देकर सारी किताबों को विड्रॉ करवाया।
गौरतलब है कि इस मामले में बुधवार (25 फरवरी) को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताते हुए स्वतः संज्ञान लिया था। सीजेआई कांत ने कहा था कि ‘बार और बेंच सभी चिंतित हैं। सभी हाई कोर्ट के जज चिंतित हैं। मैं इस मामले को स्वतः संज्ञान में लूंगा। मैं किसी को भी इस संस्था को बदनाम करने की अनुमति नहीं दूंगा। कानून अपना काम करेगा।’
वहीं, जस्टिस जॉयमाला बागची ने इसे संविधान की मूल संरचना पर हमला बताया। उन्होंने कहा कि ‘यह पुस्तक संविधान की मूल संरचना के ही विरुद्ध प्रतीत होती है।’
(समाचार एजेंसी आईएएनएस से इनपुट्स के साथ)

