Friday, March 20, 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने टेरर फंडिंग केस में अलगाववादी नेता शब्बीर अहमद शाह को दी जमानत, 2019 में हुई थी गिरफ्तारी

शब्बीर शाह को एनआईए ने जून 2019 में गिरफ्तार किया था और 4 अक्टूबर 2019 को दाखिल दूसरी पूरक चार्जशीट में उन्हें आरोपी बनाया गया था। जांच एजेंसी का आरोप है कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई।

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीरी अलगाववादी नेता शब्बीर अहमद शाह को टेरर फंडिंग मामले में जमानत दे दी है। शाह जून 2019 से राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की हिरासत में थे और करीब छह साल बाद उन्हें राहत मिली है। अदालत ने ट्रायल में हो रही देरी और उनकी लंबी हिरासत को देखते हुए यह फैसला सुनाया।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस (शाह की ओर से) और वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा (एनआईए की ओर से) की दलीलें सुनने के बाद जमानत मंजूर की। हालांकि अदालत ने कुछ शर्तें भी लगाई हैं, जिनके तहत शाह जमानत पर रहते हुए किसी भी गैरकानूनी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे और ट्रायल में पूरा सहयोग करेंगे।

2019 में हुई थी गिरफ्तारी

शब्बीर शाह को एनआईए ने जून 2019 में गिरफ्तार किया था और 4 अक्टूबर 2019 को दाखिल दूसरी पूरक चार्जशीट में उन्हें आरोपी बनाया गया था। जांच एजेंसी का आरोप है कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई।

एनआईए के अनुसार, शाह पर हवालाकांड के जरिए धन प्राप्त करने, एलओसी व्यापार के माध्यम से फंड जुटाने और आतंकियों के परिवारों को श्रद्धांजलि देने जैसे आरोप हैं। एजेंसी का कहना है कि इन पैसों का इस्तेमाल घाटी में विध्वंसक और उग्र गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए किया गया।

इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने जुलाई 2023 में विशेष एनआईए अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा था, जिसमें शाह की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

अपनी याचिका में शाह की ओर से कहा गया कि उनकी उम्र अब 74 साल है और वे छह साल से अधिक समय से जेल में बंद हैं। मामले में अभियोजन पक्ष को करीब 400 गवाह पेश करने हैं, लेकिन अब तक केवल 15 गवाहों की ही गवाही हो पाई है, जिससे यह स्पष्ट है कि ट्रायल जल्दी पूरा होना संभव नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एनआईए से 1990 के दशक की पुरानी स्पीच और अन्य पुराने सबूतों के आधार पर लगाए गए आरोपों को लेकर कई सवाल भी किए। फरवरी 2026 में अदालत ने एजेंसी से कहा था कि वह पुराने बयानों के बजाय अधिक ठोस और समकालीन सबूत पेश करे।

आखिर में अदालत ने पाया कि ट्रायल में हो रही देरी का संतोषजनक कारण नहीं बताया गया है और लंबे समय से हिरासत में रखे जाने को देखते हुए शाह को जमानत दी जा सकती है। वहीं, एनआईए ने अदालत में तर्क दिया कि शाह समेत कई आरोपियों ने मिलकर कश्मीर घाटी में अशांति फैलाने और भारत सरकार के खिलाफ गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए फंड जुटाने की साजिश रची थी।

अनिल शर्मा
अनिल शर्माhttp://bolebharat.in
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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