Friday, March 20, 2026
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कथा प्रांतर-6: स्त्री-संवेदना और पुरुष-दृष्टि के अंतराल की कथा

साहित्य की तमाम विधाओं के बीच कहानी की लोकप्रियता इस बात से समझी जा सकती है कि प्रति वर्ष अनुमानतः पाँच सौ से ज्यादा नई हिंदी कहानियां पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती हैं। नई कहानी के दौर में पहली बार कहानियों के विधिवत मूल्यांकन का जो सिलसिला शुरू हुआ था, आज वह एक सुदीर्घ परंपरा के रूप में विकसित हो चुका है। ‘कथा प्रांतर’ चुनिंदा कहानियों के मूल्यांकन की एक शृंखला है, जिसकी हर कड़ी में कहानीकार आलोचक राकेश बिहारी किसी समकालीन कहानी की विवेचना करते हैं। इस शृंखला की छठी कड़ी में प्रस्तुत है, वनमाली कथा (नवंबर- दिसंबर 2025) में प्रकाशित चन्दन पाण्डेय की कहानी ‘शुभ विवाह’ पर केंद्रित यह आलेख।

कहानी केवल घटनाओं का क्रमिक विकास या कथ्य का विस्तार भर नहीं होती। यह अपने अंतिम स्वरूप में एक सुव्यवस्थित अर्थ-संरचना की तरह पाठकों तक पहुँचती है। इस संरचना में कथानक, चरित्र, समय-स्थान, भाषा-शैली और दृष्टिकोण जैसे अवयव परस्पर आंतरिकता के साथ गहरे जुड़े होते हैं। कई बार इस संरचना को एक स्वतःस्फूर्त रचनात्मक प्रस्फुटन मान लिया जाता है। लेकिन एक रचनात्मक गढ़ंत के रूप में यह कभी स्वतःस्फूर्त नहीं होती और हमेशा ही एक विशिष्ट और सुनियोजित लेखकीय निर्मिति की तरह उपस्थित होती है। यही कारण है कि किसी कहानी में घटनाओं के बीच का तनाव और अंतराल कथा-योजना का अटूट हिस्सा होते हैं। उसी तरह समय और स्थान, दृश्य और घटनाओं की पृष्ठभूमि से ज्यादा अनुभव की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान तथा चरित्र सामाजिक-मानसिक अवस्थाओं के वाहक की तरह कहानी में दाखिल होते हैं। ‘वाचक’, कथा के इन सभी अवयवों को एक समेकित अर्थपूर्ण इकाई में बदलनेवाली एजेंसी होता है, जिसके माध्यम से कहानी में स्थित संसार अपने वैभव की संपूर्णता में पाठक के सामने उपस्थित होता है। ‘वाचक’ कथा-संरचना का बाहरी सूत्रधार नहीं, बल्कि उसका आंतरिक नियामक है। वह यह तय करता है कि कथा का अनुभव किस कोण से प्रकट होगा, किस गति से आगे बढ़ेगा और किन सीमाओं में बँधा रहेगा। इसीलिए एक ही कथा को यदि अलग-अलग तरह के वाचक प्रस्तुत करें तो उनकी रचनात्मक नियति अलग अलग तरह की होती है।

प्रथम पुरुष वाचक का आत्मीय, सीमित और अक्सर आत्मसंघर्ष से भरा हुआ दृष्टिकोण यदि किसी कहानी को आत्मकथात्मक आंतरिक आख्यान की तरह पेश करेगा तो उसी कथा को किसी सर्वज्ञ तृतीय पुरुष वाचक की दृष्टि तटस्थ विश्लेषक की तरह एक अलग अर्थ दे सकती है। इसलिए ‘वाचक’ को समझे बिना कथा के सूक्ष्म संकेतों, विडंबनाओं और अंतर्विरोधों तक पहुँचना संभव नहीं होता। वाचक की सामाजिक, लैंगिक और वैचारिक पृष्ठभूमि पात्रों की भाषा, मौन, चयन और व्याख्या सबको प्रभावित करती है। इसे हम कथा की अर्थ-समृद्धि और अर्थ-अंतराल का मूल स्रोत भी कह सकते हैं। इस दृष्टि से कहानी लिखते समय लेखक की जिम्मेदारी केवल कथ्य प्रस्तुत करने की नहीं होती, बल्कि एक ऐसी वाचकीय संरचना रचने की होती है जो कथा की आंतरिक ज़रूरतों के अनुकूल हो। लेखक को यह सजगता भी रखनी होती है कि वाचक और लेखक की आवाज़ एक न हो जाए, कि वाचक उपदेशक, उद्घोषक या अवरोधक में न बदल जाए। इसके लिए जरूरी है कि वाचक को बाहर से आरोपित करने के बजाय कथा की संरचना के भीतर स्वाभाविक रूप से विकसित होने दिया जाए।

इसी तरह पाठक और आलोचक के लिए भी किसी कहानी का पाठ या अर्थ-ग्रहण केवल सहमति या असहमति प्रकट करने का अभ्यास नहीं है। किसी कहानी का पाठ संरचनात्मक समझदारी से भरा कार्य है, जो कहानी में निहित अर्थ-संरचना को उद्घाटित करता है। इसके लिए कहानी का मूल्यांकन करते हुए वाचक की विश्वसनीयता, उसकी सीमाएँ, उसका मौन और उसकी वैचारिक स्थिति को भी समझना जरूरी होता है। इस संरचनात्मक सजगता के बिना किया गया पाठ कई बार पाठकों-आलोचकों के बीच एक खास तरह का विभ्रम या पाठ-संकट पैदा कर सकता है। ऐसी स्थितियों में पाठ के नैतिक और वैचारिक फ़ैसलों में बदल जाने की संभावना बढ़ जाती है। परिणामतः पाठ की कलात्मक जटिलता कहीं पीछे छूट जाती है और लोग कहानियों को ‘अच्छी-बुरी’ या ‘इस खेमे की-उस खेमे की’ बायनरी में देखने लग जाते है।

इस ध्रुवीकरण का सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि आलोच्य रचना के साथ पाठक या आलोचक के संवाद की सारी संभावनाएं ठहर सी जाती हैं। तब कहानी न तो समझने की वस्तु रह जाती है, न प्रश्न खड़ा करने की। या तो उसे बचाया जाता है या खारिज किया जाता है। इस क्रम में कुछ लोग स्वयं को तटस्थ घोषित कर लेते हैं, लेकिन यह तटस्थता भी अक्सर आलोचनात्मक निर्णय नहीं होकर, लोभ-लाभ से संचालित दूरी की तरह ही उपस्थित होती है। इस पूरी प्रक्रिया में रचना का सम्यक पाठ, जो रचना और उसकी संरचना के बीच के जटिल संबंध को उजागर कर सकता है, लगभग असंभव हो जाता है। इसलिए पक्ष-विपक्ष की बाइनरी से बाहर आकर एक ऐसी पाठ-संस्कृति के निर्माण की जरूरत है, जो किसी कहानी की व्याख्या को सिर्फ अच्छी-बुरी तक सीमित नहीं रखे, बल्कि इन प्रश्नों पर भी विचार करे कि वह किस दृष्टि से रची गई है, उस दृष्टि की सीमाएँ क्या हैं और वह किन सामाजिक-वैचारिक तनावों को उजागर कर रही है।

पिछले कुछ वर्षों में चर्चित हुई कहानियों पर पाठकों–समीक्षकों की राय पढ़ते हुए ऊपर वर्णित पाठ-संस्कृति के अभाव और पाठकीय ध्रुवीकरण, दोनों को ही महसूस किया जा सकता है। फिलहाल बात वनमाली कथा (नवंबर–दिसंबर 2025) में प्रकाशित चन्दन पाण्डेय की कहानी ‘शुभ विवाह’ पर, जिसे लगातार पाठकों की अनुशंसाएँ मिल रही हैं।

चन्दन पाण्डेय (बाएं)

कुछ अपवादों को छोड़ दें तो नई कहानी आंदोलन के बाद पुरुष कथाकारों द्वारा लिखी गई हिन्दी कहानियों के एक बड़े हिस्से पर स्त्री संवेदना की अनदेखी के आरोप लगते रहे हैं। मोटे तौर पर मैं स्वयं को भी इन आरोपों से सहमत ही पाता हूँ। लेकिन नई सदी में कथाकारों की जिस पीढ़ी ने अपनी पहचान बनाई है, उसमें स्त्री-संवेदी कथाकारों की एक अच्छी-खासी मौजूदगी दिखाई देती है। इस कड़ी में अनायास जिन कथाकारों के नाम स्मृतिपटल पर कौंधते हैं, उनमें प्रेम रंजन अनिमेष, तरुण भटनागर, शिवेन्द्र, राकेश दूबे और आशुतोष आदि प्रमुख हैं, जिनकी कई कहानियाँ स्त्री जीवन के यथार्थ और उससे जुड़े मुद्दों को समकालीन संदर्भों के धरातल पर पूरी विश्वसनीयता और संवेदनशीलता के साथ उठाती हैं। स्त्री संवेदना को पहचानने और स्त्री-पीड़ा के पीढ़ीगत संवहन का मार्मिक संज्ञान लेने के कारण शुभ विवाह को पुरुष कहानीकारों द्वारा लिखी गई स्त्री-संवेदी कहानियों की शृंखला की अद्यतन कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए।
यह कहानी एक ग्रामीण ब्राह्मण परिवार में बेटी के विवाह की तैयारियों के बीच उर्मिला बुआ के आगमन के दृश्य से आरंभ होती है। अपने प्रारम्भिक दृश्य से अंतिम दृश्य तक यह कहानी विवाह की तैयारी और उससे जुड़ी रस्मों व प्रसंगों- जैसे अष्टयाम, सत्यनारायण कथा, हल्दी, कन्यादान के लिए व्रत, वधू-निरीक्षण कार्यक्रम, मथढक्का आदि के सिलसिलेवार और सघन ब्योरों के माध्यम से अपना रूपाकार ग्रहण करती है। विवाह की तैयारी और इन रस्मों की क्रमिक और विश्वसनीय प्रस्तुति के बीच उर्मिला बुआ की उपस्थिति, उनकी स्मृति, उनका मौन, उनका बेगानापन और उनके द्वारा गाए जानेवाले गीतों की निरंतर मौजूदगी कहानी के ढांचे में रक्त और श्वास के प्रवाह की तरह बनी रहती है और कहानी की अर्थ-रचना को संभव करती है।

भारतीय समाज में स्त्रियाँ सामान्यतः स्थायी विस्थापन का शिकार होती हैं। चन्दन पाण्डेय की कहानी, शुभ विवाह के नाम पर जारी उस सामाजिक व्यवस्था पर एक करुण तंज की तरह गिरती है, जो स्त्री-जीवन के सबसे बड़े और लगभग स्थाई विस्थापन को उत्सव के रूप में वैध ठहराती रही है। ग्रामीण विवाह-संस्कृति के यथार्थवादी चित्रण के बहाने यह कहानी स्त्री-जीवन को नियंत्रित करने वाली पितृसत्तात्मक संरचनाओं की जिस तरह पड़ताल करती है, वह अनुभवजन्य मौन और भीतर तक उतर जाने वाली स्त्री-संवेदना से जुड़े बिना संभव नहीं। इस क्रम में यह कहानी लोक-स्मृति के एक ऐसे दस्तावेज़ की तरह सामने आती है, जहाँ उत्सव और शोक एक ही आँगन में साथ-साथ बैठे दिखाई देते हैं।

उर्मिला बुआ इस कथा का केंद्र हैं। वे न तो विद्रोही स्त्री हैं और न आधुनिक मुक्ति-चेतना की उद्घोषिका, बल्कि उस पीढ़ी की प्रतिनिधि हैं, जिसने चुप रहकर सब सहा, समझा और संजोया। मायके में उनका बेगानापन, पुराने घर का ध्वस्त हो जाना, बचपन की स्मृतियों का ससुराल की रसोई से गड्ड-मड्ड हो जाना, ये सभी स्त्री के उस अस्तित्वगत संकट की ओर संकेत करते हैं, जहाँ उसका कोई भी घर पूर्णतः उसका नहीं रह पाता। इस तरह कहानी में वर्णित उर्मिला बुआ का दुःख व्यक्तिगत नहीं रह जाता, बल्कि महालक्ष्मी की विदाई में पुनः सक्रिय होकर पीढ़ियों के दुःख की निरंतरता की तरह उपस्थित हो उठता है।

‘शुभ विवाह’ दरअसल मौन-विरोध की एक घोर यथार्थवादी कहानी है, जो स्त्री को न देवी बनाती है, न विद्रोही नायिका, बल्कि उसे उसी रूप में सामने लाती है, जिसमें वह सामाजिक सत्य के सबसे अधिक निकट होती है। कहानी यह भी स्पष्ट करती है कि जब तक शुभ विवाह की आड़ में छिपे स्त्री-दुःख के नैरंतर्य को सुना नहीं जाएगा, तब तक स्त्री मुक्ति का सपना साकार साकार नहीं होगा। यह आश्वस्तिदायक है कि यह कहानी स्त्री-दुःख के उस नैरंतर्य को सुनती है। पर इसकी सीमा यह है कि उसे सिर्फ सुनकर रह जाती है, स्त्री मुक्ति की दिशा में कोई ठोस सकारात्मक पहल या इशारा नहीं करती।

कहानी के अंत में, जब उर्मिला बुआ के स्वर में गूँजते विदाई गीत के मुखड़े की दो पंक्तियों की आवृत्ति सबको रुला रही होती है, यथा नाम तथा गुण को साकर करते हुए महालक्ष्मी के श्वसुर विवेकी पांडे का विवेक क्षण भर को जागता तो है, लेकिन कुछ ही पल के भीतर समाज और कुटुंब के सहयोग और आग्रह के बीच वे अपने भावजगत को संभाल लेते हैं। स्त्री का दुःख यहाँ कथात्मक क्लाइमेक्स बन जाता है, पुरुष पात्र भी भावुक हो जाते हैं, पाठक की करुणा भी जागती है, लेकिन व्यवस्था यथावत रहती है, उसके आगे कोई गंभीर असुविधाजनक स्थिति या प्रश्न नहीं खड़ा होता है। स्त्री दुख पात्र और पाठक की संवेदना का स्पर्श तो करे लेकिन व्यवस्था परिवर्तन के कारण की तरह उठकर नहीं खड़ा हो, ऐसी ही रचनात्मक नियतियों को प्रसिद्ध नारीवादी चिंतक केट मिलेट ‘ट्रैजिक एस्थेटिक्स’ कहती हैं। स्थाई विस्थापन के स्त्री-दुख को पहचानने वाली एक कहानी, जो इक्कीसवीं सदी के एक चौथाई के लगभग बीत जाने के बाद लिखी गई है, समग्रता में त्रासदी के करुण सौन्दर्य की कहानी बनकर ही क्यों रह जाती है, यह एक विचारणीय प्रश्न है। अबतक इस कहानी पर जो बात मैंने की है, उसे इसके अर्थ-ग्रहण की तरह ही देखा जाना चाहिए। लेकिन आलोचना का काम यहीं तक सीमित नहीं होता है। उसे इस अर्थ-रचना की प्रक्रिया और इसकी सीमाओं का भी विश्लेषण करना चाहिए। ‘सहमति-असहमति’ या ‘अच्छी-बुरी’ की बायनरी में फँसकर यह नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह जरूरी है कि रचना के साथ उसकी संरचना के माध्यम से एक सार्थक संवाद किया जाए।

प्रथम पाठ में शायद यह बारीकी नहीं उजागर हो, पर कहानी के सूक्ष्म पाठ के दौरान यह स्पष्ट होता है कि कहानी का वाचक यहाँ कहानी के पात्रों से ज्यादा प्रभावी है। अतः उसकी प्रकृति को समझना इस कहानी की रचनात्मक नियति, जिसे मैं ‘स्त्री-संवेदना’ और ‘पुरुष-दृष्टि’ के बीच की फांक, कहना पसंद करूंगा, को समझने की बुनियादी शर्त होनी चाहिए। तो आइए, अब इस वाचक की प्रकृति, विशिष्टता और सीमाओं को समझने की कोशिश करते हैं।

शुभ विवाह का वाचक इस कहानी का केवल कथनकर्ता नहीं है, बल्कि वही वह माध्यम है जिसके ज़रिये पाठक विवाह-स्थल, पात्रों, रस्मों और कहानी के भावनात्मक वातावरण तक पहुँचता है। कथा की पूरी संरचना, उसका नैतिक तनाव और उसकी वैचारिक सीमा काफी हद तक यहाँ वाचक ही तय करता है। सर्वज्ञ होने का दावा करता हुआ यह तृतीय पुरुष वाचक न केवल घटनाओं का विवरण देता है, बल्कि पात्रों के मनोभावों, स्मृतियों और संभावित विचारों तक भी पहुँच रखता है। वह यह बताता है कि उर्मिला बुआ क्या सोच सकती थीं, स्त्रियाँ क्यों रो रही थीं, विवेकी पांडे किस मानसिक स्थिति में थे और लोकगीत के शब्द किन ऐतिहासिक-सामाजिक अर्थों से भरे हैं। इस प्रकार वाचक यहाँ स्वयं को अनुभवों का व्याख्याकार और अर्थों का निर्णायक भी बना लेता है। यह भी गौर किया जाना चाहिए कि वाचक की यह सर्वज्ञता पूर्ण या तटस्थ नहीं है। यह स्पष्ट रूप से पुरुष-केंद्रित और पितृसत्तात्मक सामाजिक अनुभव से निर्मित है। वह स्त्री-दुर्दशा को पहचानता है, उसे नाम भी देता है, परंतु उसी क्षण यह भी मान लेता है कि स्त्रियाँ स्वयं उस दुर्दशा को पूरी तरह समझने में असमर्थ हैं। ‘कोई इनसे पूछता कि विवाह ने इनके जीवन की क्या गत बनायी तब वे अपनी स्थिति शायद ही बता सकती थीं’ जैसे वाक्य यह संकेत देते हैं कि वाचक स्वयं को स्त्री-अनुभव का अधिक प्रामाणिक व्याख्याकार मानता है। यह विशिष्टताबोध इस वाचक की सबसे बड़ी स्वभावगत विशेषता है, जो अंततः कहानी की वैचारिक सीमा के रूप में सामने आता है।

वाचक की संवेदनशीलता वास्तविक है, बनावटी नहीं। वह विवाह को केवल एक मंगल आयोजन के रूप में नहीं देखता, बल्कि उसके भीतर छिपी हिंसा, दहेज का व्यापार, बाल-विवाह के संकेत और स्त्रियों की सामूहिक पीड़ा को पहचानता है। उर्मिला बुआ के गीत, स्त्रियों का सामूहिक रुदन, महालक्ष्मी की चुप्पी…इन सबको वह सहानुभूति के साथ प्रस्तुत करता है। लेकिन यही संवेदनशीलता तब उसकी सीमा बन जाती है, जब उसे अपने ज्ञान के दावे में बदल कर लगभग अन्तिम निष्कर्ष की तरह साथ लिए चलता है। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण तब मिलता है, जब वाचक कहता है-

“बुआ ने पहले भी यह गीत गाया होगा। कितने विवाह उन्होंने संपन्न होते हुए देखे होंगे। उससे भी पहले से बेटियाँ विदा होती रही हैं, यह अटूट नियम इतना कठोर था कि एक जगह से उखडकर दूसरी जगह आरोपित होने के यम सरीखे नियम से निजात कम से कम इस सभ्यता में असंभव था।”

स्पष्ट है कि वाचक पहले ही मान बैठा है कि बदलाव की कोई संभावना है ही नहीं। यही कारण है कि कहानी भावनात्मक रूप से गहन होने के बावजूद वैचारिक रूप से यथास्थिति के पक्ष में झुक जाती है।

वाचक का स्वभावतः नियंत्रक होना उसकी दूसरी विशेषता है, जो स्त्री-स्वर को सीधे सामने नहीं आने देता। महालक्ष्मी और उर्मिला बुआ दोनों कहानी में उपस्थित हैं, लेकिन वे अपने अनुभवों को स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्त नहीं करतीं। उनका दुख, उनका मौन, उनका अनुभव…सब कुछ वाचक की भाषा में और उसके फ़िल्टर से छनकर पाठकों तक पहुंचते हैं। वाचक की यह विशेषता स्त्री-अनुभव को विषय तो बनाती है, लेकिन उसे ‘स्वर’ नहीं बनने देती। परिणामतः वाचक स्त्री-मन को ठहरकर खोलता कम है, उसे ‘समझा हुआ’ मानकर आगे बढ़ जाता है।

महालक्ष्मी, जिसकी शादी हो रही है, की कहानी में न्यूनतम स्थिति को भी वाचक की इस प्रकृति से जोड़कर देखा जाना चाहिए। कहानी उर्मिला बुआ द्वारा महालक्ष्मी की शादी और विदाई के बहाने उसके भविष्य में अपने अतीत को रूपांतरित होते देखने की कथा है। लेकिन इस पूरी कहानी में महालक्ष्मी की उपस्थिति ही सबसे कम है। महालक्ष्मी को तो जैसे वाचक दृश्य में आने ही नहीं देता। इस स्थिति को शुभ विवाह की कथा संरचना में कैसे देखा जाए, यह भी एक जरूरी प्रश्न है। इस संदर्भ में यह कहानी, उपस्थिति की नहीं, अनुपस्थिति की संरचना पर टिकी है। हल्दी की रस्म का प्रसंग कहानी में विस्तार से वर्णित है। इस दृश्य में आधुनिकता और परंपरा के द्वन्द्व के उद्घाटन की दृष्टि से यह कहानी का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन विडंबना यह है कि विस्तार से वर्णित इस दृश्य से वह महालक्ष्मी ही गायब है जिसकी हल्दी का रस्म कहानी में घटित हो रहा है।

जयमाला का प्रसंग एक बार पुनः महालक्ष्मी को दृश्य में ला सकता था, लेकिन वाचक महज दो-एक शब्दों में जयमाल की रस्म की सूचना भर देता है, इसे दृश्य में बदलने ही नहीं देता। महालक्ष्मी का बार-बार कथा-दृश्य से गायब रहना, उस सामाजिक यथार्थ का रूपक है, जहाँ स्त्री की ज़िंदगी के सबसे निर्णायक क्षण सबसे अधिक उसकी अनुपस्थिति में तय होते हैं। कथा-संरचना यहाँ समाज की संरचना का अनुगमन करती दिखती है। महालक्ष्मी को off-stage character की तरह देखें तो उसकी अनुपस्थिति उसकी निर्णयहीन सामाजिक स्थिति के प्रभावी रूपांतरण की तरह भी प्रकट होती है।
यदि महालक्ष्मी दृश्य में आती तो उसके मनोभावों को अर्थ और आवाज देने की संभावना पैदा होती और यदि ऐसा हो जाता तो कथा का नैतिक संतुलन बदल जाता, प्रश्न उठते और व्यवस्था के आगे असुविधाजनक स्थितियाँ पैदा होतीं। तो क्या वाचक का उसे दृश्य में न लाना, व्यवस्था को असुविधा से बचाने की संरचनात्मक युक्ति नहीं है? इस बात को समझने के लिए कहानी के उस प्रसंग पर गौर किया जाना चाहिए, जब उर्मिला बुआ दुल्हन बनी महालक्ष्मी के कमरे में जाती हैं। यह दृश्य निकटता का दृश्य है, संवाद का नहीं। उल्लेखनीय है कि इस दृश्य में महालक्ष्मी और उर्मिला बुआ पहली बार आमने-सामने हैं, दोनों एक-दूसरे को देख रही हैं, छू रही हैं, लेकिन बोल नहीं पा रही हैं। कथा-संरचना की दृष्टि से यह दृश्य संभावित संवाद का शिखर है। लेकिन वाचक उसे स्पर्श और मौन में बदल देता है। यह कोई साधारण भावुक क्षण नहीं, बल्कि कहानी के उन सर्वाधिक भावप्रवण और अंतरंग दृश्यों में से है, जहां कहानी में आंतरिक फोकलाइजेशन अपने उरूज पर है। यद्यपि इस बात के तमाम प्रमाण इस दृश्य में मौजूद हैं कि वाचक ने संवाद की संभावनाओं को यहाँ सायास सीमित किया है। लेकिन यहाँ महालक्ष्मी का देखना, पुकारना, और बुआ को रुकने के लिए कहना उसे पुरुषवादी नहीं कहे जाने की छूट देता है। लेकिन यह दृश्य जिस तरह स्त्री-अनुभव को महसूस करने के बावजूद उसे भाषा नहीं देता, इसे पुरुष दृष्टि की स्वाभाविक सीमा भी बना देता है। इस दृश्य में महालक्ष्मी का उर्मिला बुआ को बार-बार पुकारना, अपने पास बैठने को कहना दरअसल संवाद की माँग है। लेकिन उर्मिला बुआ का जवाब है- ‘अपरूप सुन्दरी’, ‘खूब खुश रहो’। जाहिर है उर्मिला बुआ की तारीफ और आशीर्वाद से महालक्ष्मी के संवाद की माँग की रणनीतिक अनदेखी होती है।

नववधू बनी महालक्ष्मी की आँखों में कई सारे भाव हैं। उसे वाचक पहले आश्वस्ति फिर बेचैनी का भाव बताता है। स्त्री अनुभव को भाव की परिधि में सीमित करना भी पुरुष दृष्टि की सीमा ही है जो उसे विचार या अर्थ में नहीं बदलने देती। यानी जब वास्तविक संवाद की संभावना आती है, वाचक उसे आशीर्वाद, तारीफ, स्पर्श और मौन में बदल देता है। यह संयोग नहीं, संरचनात्मक रोक है। एक पुरुष वाचक के लिए यह रोक लगाना इस लिए जरूरी है कि अगर संवाद होता तो महालक्ष्मी के भाव को विचार और अर्थ मिल सकते थे, जिससे पूरी कथा का नैतिक संतुलन प्रभावित हो सकता था, विवाह की वैधता को चुनौती मिल सकती थी। इसलिए वाचक संवाद की जगह स्पर्श को, प्रश्न की जगह आशीर्वाद को और डर की जगह आश्वस्ति के अभिनय को रख देता है। यह पुरुष दृष्टि की सबसे सूक्ष्म सीमा है।

बहुत संभव है कि कुछ पाठक-आलोचक बुआ-भतीजी के बीच स्थित इस मौन को स्त्री-दुख की अभिव्यंजना की तरह देखें। लेकिन ऐसा कहते हुए इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि स्त्री का मौन तभी उसकी अभिव्यंजना हो सकती है, यदि यह उसका चयन हो। लेकिन विवशता या मजबूरी में धारण किया गया मौन, जो किसी वाचक के निर्देशों से संचालित होता है, को संवाद में अवरोध की तरह देखा जाना चाहिए, न कि अभिव्यक्ति के उपकरण की तरह। बुआ-भतीजी के बीच मौजूद इस मौन को वाचक उनकी विवशता की तरह दिखाता है, लेकिन उसे भाषिक सत्ता नहीं देता। चूंकि वाचक का नियंत्रणवादी स्वभाव यहाँ महालक्ष्मी की संवेदना को चेतना में बदलने की संभावना से दूर कर देता है, इसीलिए यह मौन करुण, हृदय विदारक और ‘सुंदर’ तो हो उठता है, पर राजनीतिक नहीं हो पाता। इस दृश्य में महालक्ष्मी और उर्मिला बुआ दोनों हीं मौन हैं। लेकिन इन दोनों के मौन एक जैसे नहीं हैं। महालक्ष्मी का मौन जहाँ वाचक द्वारा आरोपित है, वहीं उर्मिला बुआ का मौन पितृसत्ता से अनुकूलित और आत्मनियंत्रित है। वे उसी सामाजिक संरचना की उपज हैं और बोलकर समाज और परिवार के नैतिक संतुलन को बिगाड़ना नहीं चाहतीं। यही कारण है कि कहानी का यह मौन भाषा नहीं, भाषा के अभाव की तरह प्रकट होता है। यह पुरुष दृष्टि की ही सीमा है कि वह मौन को संवेदनात्मक रूप से तो प्रभावी बनाती है, लेकिन उसे राजनैतिक रूप से निष्क्रिय रखती है। इसके विपरीत, जिन दृश्यों में वाचक स्वयं को निर्णायक और स्त्री अनुभवों के व्याख्याकार की भूमिका में जाने से रोक लेता है, वे दृश्य अपनी वैचारिक अर्थ रचना के कारण अत्यन्त प्रभावी और अर्थपूर्ण हो उठे हैं। एक उदाहरण देखा जाना चाहिए-

“यह छत के एक कोने में खड़ा महिलाओं का समूह था। वहाँ से वे द्वारागमन और द्वारपूजा देख रही थीं। वहाँ महिलायें बिना किसी माईक के द्वारपूजा के मंगल गीत गा रही थीं। बुआ निर्लिप्त भाव से उन गीतों के बोल दुहरा भर रही थीं। हजारों की उपस्थिति के बीच इन महिलाओं की उपस्थिति इतने अँधेरे में थी कि कोई ध्यान से न देखे अगर तो इनके होने से अनजान रह सकता था।”

यहाँ छत का कोना केवल भौतिक विवरण नहीं है, बल्कि सामाजिक सत्ता से निर्वासन का संकेत है। यह वही पितृसत्तात्मक व्यवस्था है जहाँ, पुरुष घटना के भीतर होते हैं और स्त्रियाँ घटना को देखती हैं। यहाँ अँधेरा केवल प्रकाश का अभाव नहीं, बल्कि सामाजिक मान्यता का अभाव है। निर्लिप्त भाव से बुआ का गीतों के बोल को दुहराना दुःख का संस्कार बन स्त्री-स्मृति का स्वचालित हो जाना है। स्त्रियों की अदृश्य उपस्थिति और उनकी ऐतिहासिक थकावट से उपजी निर्लिप्तता जिस संजीदगी के साथ यहाँ पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बेनकाब करती हैँ, वह इसे एक सशक्त डायग्नोस्टिक दृश्य में बदल देता है। लेकिन जैसे ही वाचक माध्यम से आगे व्याख्याकार की भूमिका में आता है, वह अलग अलग तरह के अवरोध पैदा करता है। हल्दी के गीत और उसकी व्याख्या को इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

‘कोइरिन कोइरिन तुहू मोर रानी हो,
कहिया के हरदी ऊपर कईलु आज हो,
हमरा कवन बाबा जरिये के राजा हो.
घोड़ा चढिS बेसहें हरदिया के गाँठ हो,
हमरा कवन बेटी अति सुकुमार हो,
सहलो न जाला हरदिया के झाग हो,’

गौरतलब है कि हल्दी का यह गीत महज एक संस्कार गीत नहीं है। इसमें समाज की जातीय संरचना और बाल विवाह की त्रासदी दोनों के मर्मांतक चलचित्र मौजूद हैं। सामाजिक संरचना के साथ इस गीत की संरचना की जुगलबंदी को समझने के लिए इस गीत में संदर्भित तीनों स्त्रियों को समझा जाना चाहिए- एक वह, जिसने हल्दी लाई, दूसरी वह, जो उससे हल्दी की गुणवत्ता की तारीफ कर रही है और तीसरी वह, जिसे यह हल्दी चढ़नी है। इस गीत की व्याख्या करते हुए वाचक कहता है-

‘वह गीत सामंती अवशेष वाले समाज के चंद खुशनुमा पहलुओं पर था, जिसमें दुल्हन की माँ हल्दी की गुणवत्ता की प्रशंसा उस स्त्री से कर रही है जो हल्दी की गांठें लेकर आई हैं।’

वाचक का व्याख्याकार रूप कैसे इस गीत के समुचित सम्प्रेषण में अवरोधक की तरह उपस्थित होता है, इसको समझने के लिए ‘कोइरिन कोइरिन तुहू मोर रानी हो’ में अंतर्निहित जातीय संरचना और उसकी राजनीति को समझा जाना चाहिए। यहाँ ‘कोइरिन’, किसी स्त्री के लिए लोक-संवेदनात्मक संबोधन भर नहीं, बल्कि एक जाति-सूचक, पेशा-सूचक और श्रेणी-सूचक शब्द है, जिसमें खेती, उत्पादन और उसके असंगठित व्यापार में लगे सामाजिक समूह की पहचान संबोधित है। इस संबोधन में प्रेम और अधीनता, सौंदर्य और श्रम तथा स्त्रीत्व और जातिगत श्रेणीबद्धता सब एक साथ उपस्थित हैं। ऐसे में दूसरी स्त्री, जो सवर्ण भी है, द्वारा उसे ‘रानी’ कहा जाना किसी सामाजिक बराबरी की रचना नहीं, उसकी वास्तविक सामाजिक स्थिति को एक क्षणिक आलंकारिक ऊँचाई से ढंकने की कोशिश है। दरअसल यहाँ ‘कोइरिन’ को ‘रानी’ कहने की जरूरत ही इसीलिए है, क्योंकि वह वास्तव में रानी नहीं है। यह पंक्ति जाति-संरचना को तोड़ती नहीं, उसे भावनात्मक भाषा से वैध बनाती है।

अब गीत के दूसरे हिस्से को देखें, जिसमें दुल्हन बनने वाली बेटी की कायिक कोमलता का वर्णन है। वह इतनी कोमल है कि हल्दी का झाग भी नहीं सहन कर सकती। हल्दी के झाग के आघात बन जाने में बड़ी सूक्ष्मता से लड़की के बालिकावधू होने के संकेत विन्यस्त हैं। गीत में स्थित इस सामाजिक संरचना को समझने के बाद जब हम वाचक की व्याख्या को देखते हैं, तो उसमें दो स्पष्ट चूकें नजर आती हैं- ‘कोइरिन’ को उसकी जातीय पहचान से अलग कर सिर्फ स्त्री में सीमित कर देना और इस गीत को ‘सामंती अवशेष वाले समाज के चंद खुशनुमा पहलुओं’ से जोड़ना। ये दोनों चूकें वाचक की राजनैतिक समझदारी पर प्रश्नचिह्न लगा देती हैं। यदि वाचक ने इस गीत की व्याख्या न की होती तो इस गीत की जनपदीयता दूसरे अंचल के पाठकों के लिये गीत के अर्थ-सम्प्रेषण में बाधा उत्पन्न करती। लेकिन वाचक की वर्तमान व्याख्या ने इस गीत में मौजूद सामाजिक-संरचना की दुरभिसंधियों के सम्प्रेषण को अवरुद्ध कर दिया है। सवाल यह भी उठता है कि यह अवशेष सामंती अवशेष वाले समाज में किसके लिए खुशनुमा है? कहने की जरूरत नहीं की ‘कोइरिन’ और बेटी दोनों के लिए ही यह अनुभव खुशनुमा नहीं हो सकता। हाँ, सामंती पितृसत्तात्मक व्यवस्था जरूर इससे खुश हो सकती है। जाहिर है अब तक पुरुष के रूप में चिह्नित वाचक, इस दृश्य तक आते-आते सवर्ण पुरुष की पहचान अख्तियार कर लेता है। और तब ‘कोइरिन’ को सिर्फ ‘स्त्री’ में सीमित कर देना अर्थ निर्धारण की चूक से कहीं ज्यादा सामंती पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना को नहीं प्रकट होने देने की वैचारिक सीमाबद्धता के रूप में उजागर हो उठता है।

हल्दी गीत के दूसरे हिस्से ‘हमरा कवन बेटी अति सुकुमार हो, सहलो न जाला हरदिया के झाग हो’ पर विचार करते हुए यह प्रश्न सहज ही सामने आ खड़ा होता है कि क्या महालक्ष्मी की शादी इस परिवार में ‘बाल विवाह’ की पुनरावृत्ति है? उर्मिला बुआ की उम्र का स्पष्ट उल्लेख करके कहानी यह तो बताय देती है कि उनका बाल विवाह हुआ था। लेकिन महालक्ष्मी के संदर्भ में ऐसा कोई स्पष्ट उल्लेख कहानी में नहीं मिलता। लेकिन दो ऐसे सूक्ष्म संकेत कहानी में मौजूद हैं जो इस बात की तरफ ठोस इशारा करते हैं। पहला संकेत, हल्दी गीत का यह हिस्सा है और दूसरा संकेत है, विवाह मंडप में बैठी महालक्ष्मी के लिए प्रयुक्त विशेषण त्रयी- ‘नववधु – दुल्हन- बालिका’। एक अर्थ-सजग वाचक जो ‘युवती’ शब्द और उसके प्रयोग से भली भांति परिचित है, वह ‘बालिका’ शब्द का प्रयोग बिना प्रयोजन के तो नहीं कर सकता। उर्मिला बुआ अपने अतीत को इसी ‘नववधु–दुल्हन-बालिका’ के भविष्य में तो देखती हैं। तो क्या महालक्ष्मी की अनुपस्थिति की तार्किकता के तार उसके इस अबोधपन से भी जुड़े हैं? पाठक चाहे तो बाल विवाह की संभावना को सुनिश्चित करने के लिए इस तरफ भी जा सकता है। लेकिन अर्थ संधान की राह में इस मोड़ तक आते-आते उसे यह याद आना स्वाभाविक है, कि पैतीस वर्ष पहले जब उर्मिला बुआ की शादी हुई थी, वे मिडल स्कूल में पढ़ती थीं और सर्वानन्द भैया के साथ ही स्कूल जाया करती थीं। पैंतीस साल बाद उसी परिवार की अगली पीढ़ी की लड़की को कम से कम कॉलेज की दहलीज तक तो पहुंचना ही चाहिए। और यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह प्रश्न खड़ा हो जाएगा कि पैंतीस वर्षों के बीत जाने के बाद इस परिवार में स्त्री शिक्षा के विकास की गति ऋणात्मक कैसे हो गई? मतलब यह कि महालक्ष्मी की शादी को बाल विवाह मानते ही, व्यवस्था को असहज और असुविधाजनक स्थिति में डालने वाले कई और प्रश्न खड़े हो जाएंगे।

वाचक इन असहज करने वाली स्थितियों को भली भांति समझता है इसलिए कहानी के शुरू में ही सर्वानन्द पांडे को अपनी जुड़वा बहन उर्मिला के प्रति न सिर्फ अव्यावहारिक होने की हद तक तटस्थ और भावहीन दिखाता है, बल्कि उसके जीवन से जुड़े जरूरी सवालों पर विचार भी नहीं करने देता-

“इससे आगे वे सोचते तब शायद अन्यान्य कठिन प्रश्न उनके समक्ष उमगते मसलन ब्याह के पैंतीस वर्ष बाद बहन की हैसियत उसके घर में क्या और कैसी है या यही कि बहन का घर वह हो भी सका यह नहीं। उन्होंने इन ख्यालों को रफा दफा किया और शादी की तैयारियों में खुद को मशगूल कर लिया।”

चूंकि कहानी का बड़ा हिस्सा बाहरी घटनाओं, प्रसंगों और वातावरण से निर्मित हुआ है, उर्मिला बुआ के अनुभवों को छोड़, कहानी प्रायः ‘एक्सटर्नल फोकलाइजेशन’ पर केंद्रित होकर, संवाद से ज्यादा वर्णनों पर भरोसा करती है। कहानी इस बात का पर्याप्त ध्यान रखती है कि कौन से अनुभव व्यक्तिगत हैं और कौन से सामाजिक। इस क्रम में कहानी के कई दृश्य यथा- अष्टयाम, कन्यादान के लिए व्रत, वधू निरीक्षण कार्यक्रम आदि जानकारी के शिल्प में सामने आते हैं। वर्णन की इस प्रविधि को अपनाते हुए वाचक स्वयं सूचनादाता की तरह उपस्थित होता है। वर्णन की इस प्रविधि की यह खासियत है कि कहानी इन रस्मों को किसी खास परिवार की घटना की तरह नहीं दिखाती, बल्कि इसे एक सामाजिक व्यवहार और संरचना की तरह स्थापित करती है। लेकिन सूचनात्मक वर्णन की इस प्रविधि की एक बड़ी सीमा यह है कि रस्मों-रिवाजों की संरचनात्मक आंतरिकता में छुपी हिंसा के अनुभव दर्ज होने से रह जाते हैं। उदाहरण के तौर पर ‘वधू निरीक्षण कार्यक्रम’ को देख सकते हैं, जो जानकारी की तरह दर्ज होने के कारण अनुभव के बजाय प्रक्रिया में सीमित हो जाता है। इस तरह पाठक यह तो जान जाता है कि यह रस्म, जिसमें दूल्हे का बड़ा भाई नववधू को गहने इत्यादि सौंपने के मार्फ़त स्पर्श करता है, किस तरह घटित होता है। लेकिन इस दौरान वधू ने जिस भय या संकोच का अनुभव किया वह दर्ज होने से रह जाता है।

स्त्री के अनुभव की जगह व्यवस्था संबंधी जानकारी को सामने रखने में पुरुष दृष्टि के सूक्ष्म प्रभाव को समझा जा सकता है। यह शैली यह आभास देती है कि वाचक केवल बता रहा है, कोई पक्ष नहीं ले रहा। लेकिन ‘ऐसा होता है’ के सूचना शिल्प वाली यह वाचकीय तटस्थता परंपरा के अवांछित हिस्सों को चुनौती देने या उसकी आलोचना करने के बजाय उसे एक सूक्ष्म वैधता प्रदान कर देती है।

इस कहानी की संवेदनात्मक और अनुभवात्मक दुनिया को सिरजने में भय, शोर, मौन और लय की केंद्रीय भूमिका है। प्रकटतः कहानी सर्वानन्द पांडे के इस भय से जरूर शुरू होती है कि मौसम और समधी विवेकी पांडे महालक्ष्मी की विवाह के सकुशल सम्पन्न होने में कोई बाधा नहीं उत्पन्न करें। लेकिन जैसे-जैसे आप कहानी के भीतर उतरते हैं, उर्मिला बुआ का प्रकट और महालक्ष्मी का अप्रकट भय पाठक के साथ चलने लगता है। यह कहानी की एक बड़ी उपलब्धि है। कहानी में शोर का अनुभव बाहरी और सामाजिक वातावरण से आया है। अष्टयाम और लाउडस्पीकर के शोर के बीच बारात, द्वारपूजा और घर की हलचल, इन अर्थों में महत्त्वपूर्ण हैं कि ये सारे शोर स्त्री पात्रों के आंतरिक अनुभवों के विपरीत खड़े होते हैं। शोर यहाँ केवल दृश्य का हिस्सा नहीं, बल्कि कहानी के संरचनात्मक द्वैत का जरूरी पाठ है, जो अंदर के मौन के साथ टकराकर कहानी को एक नई अर्थ-छवि प्रदान करता है। मौन की पर्याप्त चर्चा ऊपर हो चुकी है। कहानी की सांसारिक और भावनात्मक संरचना को संवेदनात्मक सघनता प्रदान करने में यहाँ लय की बहुत बड़ी भूमिका है। लय संवेदना को जितना सघन बनाती है, उतना ही तरल भी करती है। लेकिन चेतना को उद्वेलित करने के लिए लय को शब्द और उसके अर्थ का साथ मिलना बहुत जरूरी है। लेकिन यह कहानी लय और शब्द का संतुलन ठीक से नहीं बना पाती।

लय करुणा उत्पन्न करती है, जबकि शब्द उस करुणा को वैचारिक दिशा प्रदान करते हैं। यह अकारण नहीं है कि कहानी के अंतिम दृश्य में लय सर्वाधिक प्रभावी भूमिका में है। इस दृश्य में बुआ की रागिनी और स्वर लहरियों का बहुत सघन उल्लेख हुआ है। संकेत आवाज का भी है। लेकिन शब्द मुखड़े की पुनरावृत्ति से आगे नहीं बढ़ते-

“देखो दुःख की घड़ी आ रही है
आज बेटी विदा हो रही है…”

विदाई का दृश्य स्वाभाविक रूप से हर प्रत्यक्षदर्शी के भीतर पत्थर को मोम बनाने का सामर्थ्य रखनेवाली करुणा पैदा करता है। जाहिर है मंडप और पूरे वातावरण में बुआ की इस मर्मांतक लय का असर है। लेकिन आरंभ से ही आशंका के केंद्र में रहे विवेकी पांडे पर इसका असर कुछ अलग ही तरह का पड़ता है-

“चारो भाईयों ने फिर पूछा- महाराज कोई दिक्कत? विवेकी पांडे ने इस बार गाली अपने पास रख ली और इतना भर कहा, ‘कौन गा रहा है भाई?’ अपने मन में फिर से वही बात कही, ‘समझने वाले की मौत है। ’ यह कहते हुए वे आँगन से बाहर आ गए थे।”

यह दृश्य ‘शुभ विवाह’ की वैचारिक और नैतिक संरचना का उत्कर्ष है। कहानी के इस दृश्य में विवेकी पांडे के व्यवहार और उसकी बुदबुदाहट के क्या अर्थ हैं? उसके कथन ‘समझने वाले की मौत है’ का क्या निहितार्थ है? यहाँ विवेकी पांडे का व्यवहार और उनकी यह बुदबुदाहट आकस्मिक प्रतिक्रिया या व्यक्तिगत झुँझलाहट भर नहीं रह जाती, बल्कि पूरी कथा के भीतर से किसी जटिल सूत्र की तरह प्रकट होती है। विवेकी पांडे को अब तक कथा में विवाह व्यवस्था के सहभागी लाभार्थी पुरुष के रूप में स्थापित किया गया है। लेकिन बुआ के गीत के आते ही उनकी स्थिति बदलती है। ध्यान देने योग्य बात है कि वे नशे में हैं, लेकिन क्रोधित नहीं होते, आदेश नहीं देते, साफ़-साफ़ विरोध भी नहीं करते, बल्कि बुदबुदाते हैं। बुदबुदाहट, स्वीकार और अस्वीकार की अभिसंधि पर खड़ा भाषा का वह रूप है, जो न पूरी तरह सार्वजनिक होता है, न पूरी तरह निजी ही। विवेकी पांडे का बुदबुदाना बताता है कि गीत ने उनके भीतर कोई नैतिक दरार पैदा कर दी है।
विवेकी पांडे की बुदबुदाहट के साथ बाहर आया वाक्य ‘समझने वाले की मौत है’ किसी पात्र को संबोधित नहीं है, बल्कि व्यवस्था पर टिप्पणी है। यहाँ ‘समझने वाला’ वह व्यक्ति है, जो विवाह को ‘शुभ’ कहे जाने के पीछे की हिंसा और मंशा को समझता है, जो स्त्री की विदाई को उत्सव नहीं, विस्थापन मानता है। ऐसे व्यक्ति के लिए इस समाज में कोई जगह नहीं है। यहाँ ‘मौत’ का अभिप्राय शारीरिक मृत्यु नहीं, सामाजिक निष्कासन, नैतिक अकेलापन और सत्ता-संरचना में अनुपयोगी हो जाने से है। अलग-अलग व्यक्ति समूहों के लिए इसके अलग-अलग मायने हो सकते हैं। यह एक वाक्य उर्मिला बुआ सहित उनके साथ गीत के स्वर पूरती स्त्रियों के लिए चेतावनी, पुरुष के लिए स्वीकारोक्ति और पाठकों के लिए चुनौती की तरह उपस्थित होता है। विवेकी पांडे को छोड़कर लगभग सारे पुरुष यहाँ व्यवस्था और सम्मान को बचाने की हड़बड़ी में हैं। इसी सम्मान की रक्षा के लिए विवेकी पांडे को आग्रह पूर्वक मंडप पर ले जाया जाता है। वे अपना भावजगत संभालकर रस्मों का निर्वाह करते हैं।

उर्मिला बुआ के गाए विदाई गीत को सुनकर विवेकी पांडे का भावनात्मक रूप से कुछ पल के लिए विचलित होना और फिर समाज के सहयोग से अपने भावजगत को संभाल लेना कुछ देर पहले सिर उठाए नैतिक-सामाजिक समस्या का एक निजी समाधान है, कारण कि स्त्रियों की समवेत लय से जागृत विवेकी पांडे का आत्मबोध किसी सामाजिक प्रश्न में नहीं बदलता, बल्कि उनके व्यक्तिगत ‘भावजगत’ की समस्या बनकर रह जाता है। परिणामतः अत्यल्पकालिक भावनात्मक विचलन के बाद कहानी में व्यवस्था पुनः बहाल हो जाती है।

यहाँ तक आते-आते बतौर पाठक हम यह विश्वास कर लेना चाहते हैं कि अपराध-बोध और असहजता से भरे हुए विवेकी पांडे भविष्य में वही व्यक्ति नहीं रहेंगे, जो पहले थे। लेकिन यह कहानी का हासिल नहीं, पाठक की अपेक्षा है। पाठक की यह अपेक्षा पूरी हो इसके लिए स्त्रियों के अनुभव को भाषा और अभिव्यक्ति की सत्ता मिलना बहुत जरूरी है और ऐसा संभव होने के लिए पुरुषों के विशिष्टताबोध का टूटना बहुत जरूरी है। इस कहानी में वाचक की प्रभावी भूमिका के रूप में पुरुष का यह विशिष्टताबोध तीन स्तरों पर काम करता है। नैतिक स्तर पर वह स्वयं को संवेदनशील-विवेकशील प्रकट करता है। बौद्धिक स्तर पर स्त्री अनुभव के अर्थ-निर्माण का अधिकार अपने पास रखता है और संरचनात्मक स्तर पर स्त्री-अनुभव को भाषिक अभिव्यक्ति देने के बजाय भाव और संवेदना में सीमित कर देता है। यही कारण है कि कहानी में स्त्री गाती है, वाचक (पुरुष) उसे समझने का दावा करता है। स्त्री रोती है, पुरुष सूत्र वाक्य गढ़ता है।

चुप्पी दिखाना और चुप्पी टूटने की संभावना को मूर्त करना संरचना की दो अलग-अलग प्रविधियाँ हैं। यह कहानी पहले विकल्प को चुनती है। संरचना के इस प्रारूप में निश्चय ही वाचक स्त्री के प्रति संवेदनशील है। वह स्त्री मुक्ति का विरोधी भी नहीं। लेकिन उसकी दिक्कत यह है कि कि वह स्त्री-मुक्ति के बंद दरवाजे की चाभी अपने हाथ में रखता है। विशिष्टताबोध से युक्त ऐसे स्त्री-संवेदी पुरुष स्त्री संवेदना को आवाज की वैधता देने के बजाय खुद ही उनकी तरफ से बोलने लगते हैं। नतीजतन कहानी जिस सामाजिक व्यवस्था और संरचना की आलोचना करना चाहती है, जाने-अनजाने उसी संरचना के पुनरुत्पादन कर जाती है।

जिस प्रकार स्त्रियों का पितृसत्ता से अनुकूलन उनकी मुक्ति के मार्ग में बाधा की तरह खड़ा होता है, उसी तरह सर्वज्ञता की दावा करनेवाला स्त्री-संवेदी पुरुष अंततः स्त्री मुक्ति का स्थगनकर्ता ही साबित होता है। हिन्दी कहानी की परंपरा में ऐसे पुरुष वाचक की आमद नई नहीं है। हिन्दी कहानी की परंपरा की इस धारा पर बात करते हुए आज यह भी समझे जाने की जरूरत है कि स्त्री-अनुभव और जीवन भावना और संवेदना से बहुत आगे प्रतिनिधित्व की राजनीति का प्रश्न है। तो क्या कहानी की इन संरचनात्मक विशिष्टताओं और सीमाओं के बीच ‘शुभ विवाह’ को स्त्री अनुभव से ज्यादा पुरुष के विशिष्टताबोध के प्रदर्शन से उत्पन्न विडंबना को रेखांकित करनेवाली कहानी की तरह देखा जाना चाहिए? कहानी में इस के तमाम संकेत उपलब्ध हैं। क्या ही अच्छा होता कि इन्हें संकेतित करती यह कहानी कहीं वाचक की सर्वज्ञता के दावे को भी चुनौती देती!

शुभ विवाह कहानी का यह सुदीर्घ पाठ स्त्री संवेदना, पुरुष दृष्टि की सीमा और स्त्रीवादी दृष्टि की जरूरतों की संयुक्त धरातल पर तैयार हुआ है। यह आश्वस्तिदायक है कि हिन्दी कहानी इस दिशा में कई फ़र्लांग आगे का सफर तय कर चुकी है। विवाह उत्सव के प्रारूप में लिखी गई कई कहानियाँ इस पाठ के दौरान मेरी स्मृति में लगातार बनी रहीं, जिनमें प्रेमरंजन अनिमेष की ‘सात सहेलियाँ खड़ी-खड़ी’, प्रत्यक्षा की ‘विवाह’, जो उनके संग्रह में बाद में ‘ललमुनिया हरमुनिया’ नाम से संकलित है, और कविता की ‘अलबेला रघुबर’ प्रमुख हैं। ये तीनों कहानियाँ क्रमशः इस विषय के तीन अन्य आयामों पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के अनुकूलन, आधुनिकता और परंपरा के बीच स्त्री मन के द्वन्द्व और स्त्रीवादी दृष्टि से निर्मित समाज की परिकल्पना, को जिस प्रगाढ़ आंतरिकता के साथ अभिव्यक्त करती हैं, उसकी निरन्तरता में ‘शुभ विवाह’ को पढ़ा जाना इसकी सामर्थ्य और सीमा को अर्थ-संरचना के एक नए धरातल पर स्थापित कर सकता है। पहले से ही अतिदीर्घ हो चुका यह आलेख फिलहाल उस दिशा में आगे जाने की अनुमति नहीं देता। उन पर फिर कभी।

राकेश बिहारी
राकेश बिहारी
जन्म : 11 अक्टूबर 1973, शिवहर (बिहार)। कहानी तथा कथालोचना दोनों विधाओं में समान रूप से सक्रिय। प्रकाशन- वह सपने बेचता था, गौरतलब कहानियाँ (कहानी-संग्रह) केंद्र में कहानी, भूमंडलोत्तर कहानी (कथालोचना)। सम्पादन- स्वप्न में वसंत (स्त्री यौनिकता की कहानियों का संचयन),‘खिला है ज्यों बिजली का फूल’ (एनटीपीसी के जीवन-मूल्यों से अनुप्राणित कहानियों का संचयन), ‘पहली कहानी : पीढ़ियां साथ-साथ’ (‘निकट’ पत्रिका का विशेषांक) ‘समय, समाज और भूमंडलोत्तर कहानी’ (‘संवेद’ पत्रिका का विशेषांक)’, बिहार और झारखंड मूल की स्त्री कथाकारों पर केन्द्रित 'अर्य संदेश' का विशेषांक, ‘अकार- 41’ (2014 की महत्वपूर्ण पुस्तकों पर केन्द्रित), दो खंडों में प्रकाशित ‘रचना समय’ के कहानी विशेषांक, ' चेतना का देश-राग' और 'आहटें आसपास' ('पुस्तकनामा' की साहित्य वार्षिकी)। सम्मान- ‘स्पंदन’ आलोचना सम्मान, वनमाली कथा आलोचना सम्मान तथा सूरज प्रकाश मारवाह साहित्य सम्मान से सम्मानित। ईमेल – brakesh1110@gmail.com
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7 COMMENTS

  1. यह आलेख समकालीन कहानी–आलोचना में एक सटीक और सार्थक हस्तक्षेप की तरह सामने आता है। राकेश बिहारी यहाँ चन्दन पाण्डेय की कहानी ‘शुभ विवाह’ का केवल पाठ विश्लेषित नहीं करते, बल्कि कहानी की वाचिक संरचना, उसकी नैतिक-वैचारिक सीमाओं और स्त्री-संवेदना बनाम पुरुष-दृष्टि के जटिल अंतर्संबंधों को सूक्ष्मता से खोलते हैं। यह टिप्पणी कहानी को ‘अच्छी-बुरी’ की सरल द्वंद्वात्मकता से बाहर निकालकर यह दिखाती है कि संवेदनशीलता अपने आप में मुक्ति का पर्याय नहीं होती, यदि वह स्त्री-अनुभव को स्वर और भाषा की सत्ता नहीं सौंपती। विशेष रूप से वाचक की सर्वज्ञता, उसका विशिष्टताबोध और स्त्री-अनुभव पर नियंत्रण—इन बिंदुओं पर किया गया विश्लेषण हिन्दी कथा-आलोचना को नई वैचारिक तीक्ष्णता देता है। यह आलेख पाठक को कहानी के भीतर छिपी करुणा से आगे, उसकी संरचनात्मक राजनीति पर सोचने को बाध्य करता है—और इसी में इसकी आलोचनात्मक सार्थकता निहित है।
    आलोचकीय विवेक और बौद्धिक ईमानदारी के सन्दर्भ में राकेश बिहारी एक प्रतिष्ठित उदाहरण हैं।

  2. राकेश बिहारी की यह समीक्षा ‘शुभ विवाह’ को एक संवेदनशील पाठक-आलोचक की गहन संलग्नता के साथ पढ़े जाने का सशक्त उदाहरण है, जिसकी सबसे बड़ी विशेषता कथा-संरचना, विशेषतः वाचक, फोकलाइज़ेशन, मौन, अनुपस्थिति और लय जैसे सूक्ष्म शिल्पगत तत्वों पर उसका विस्तारपूर्ण और वैचारिक रूप से सजग ध्यान है; स्त्री-संवेदना और पुरुष-दृष्टि के अंतर्विरोध को वह केवल कथ्य के स्तर पर नहीं, बल्कि संरचनात्मक और भाषिक रणनीतियों के स्तर पर उजागर करती है, जिससे यह पाठ साधारण समीक्षा न रहकर एक गंभीर आलोचनात्मक हस्तक्षेप बन जाता है। साथ ही, लोकगीतों, जाति-संरचना, पितृसत्ता और ‘ट्रैजिक एस्थेटिक्स’ जैसे सैद्धांतिक संदर्भों का संयमित प्रयोग इसकी बौद्धिक विश्वसनीयता को सुदृढ़ करता है। किंतु इसकी सीमा यह है कि समीक्षा कई स्थलों पर पाठ से आगे बढ़कर आशय-निर्णय की भूमिका में पहुँच जाती है, जहाँ वाचक की नियति और लेखक की मंशा के बीच का अंतर अपेक्षाकृत धुंधला हो जाता है और कुछ निष्कर्ष अत्यधिक आग्रहपूर्ण प्रतीत होते हैं। इसके अलावा, विस्तार और पुनरावृत्ति के कारण यह पाठ कभी-कभी अपनी आलोचनात्मक तीव्रता खो देता है और वैकल्पिक पाठ-संभावनाओं—जैसे मौन की बहुस्तरीय अर्थवत्ता या करुणा की राजनीतिक संभावनाओं—के लिए अपेक्षित खुलापन सीमित रह जाता है। इसके बावजूद, यह समीक्षा हिन्दी कहानी-आलोचना में संरचनात्मक सजगता, स्त्रीवादी प्रश्नाकुलता और वैचारिक ईमानदारी का एक महत्त्वपूर्ण और विचारोत्तेजक उदाहरण है, जो सहमति-असहमति से परे रचना के साथ संवाद की संस्कृति को आगे बढ़ाती है।

  3. नमस्ते राकेश जी,
    बहुत समय बाद आपकी कहानी पर लिखा गया विवेचन पढ़ने का अवसर मिला। कहानी के मंतव्य को किस दृष्टि और किस दिशा से पाठक को समझना चाहिए—इस संदर्भ में आपकी व्याख्या से बहुत कुछ सीखने को मिला। कहना अनुचित न होगा कि कहानी स्वयं अत्यंत मार्मिक और समय-सापेक्ष है, और उस पर आपके द्वारा उठाए गए बिंदु साहित्य को विवेक के साथ समझने की दृष्टि प्रदान करते हैं।
    आपको और कथाकार—दोनों को हार्दिक बधाई एवं अनेक शुभकामनाएँ।

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