बाड़मेर में थार महोत्सव शुरू हो गया है। जनता आदर्श स्टेडियम में विभिन्न प्रकार की सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं का आनंद लेने के लिए जुट गई है।
इसी भीड़ में पैविलियन की अंतिम सीढ़ी पर बैठे दो दोस्त आपसे में बातें कर रहे हैं।
सुरेश : अब ये सब दाढ़ी मूंछ वाले स्टेज पर आए है, यह कौनसी प्रतियोगिता है ?
मदन: इसका नाम “थार श्री” प्रतियोगिता है। इनमें जो सबसे ज्यादा सुंदर दिखेगा उसका चयन होगा। जैसे मिस्टर इंडिया मिस इंडिया होते है न! वैसे ही।
सुरेश: इसमें चयन का आधार क्या रहता है ?
मदन: कद काठी अच्छी हो, मूंछ दाढ़ी जचती हो, पारंपरिक वेशभूषा हो और आत्मविश्वास से स्टेज पर जो चल सके। हर वर्ष नया थार श्री चुना जाता है इसी प्रकार “थार सुंदरी” प्रतियोगिता भी होती है। उसमें भी पारंपरिक पोशाक और गहनों से सजी बालिकाएं भाग लेती है।
सुरेश : ऐसा महोत्सव पड़ोस में जैसलमेर में भी होता है न!
मदन : हाँ, वहाँ तो बहुत पहले शुरू हो गया था। उसका नाम “मरु महोत्सव” है। इसका प्रचार प्रसार भी गजब का रहता है साथ ही जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग भी मुस्तैद होकर लगते है। इसमें राजस्थान या देश भर से ही नहीं बल्कि दुनिया भर से पर्यटक आते है। मरु महोत्सव की ब्रांडिंग जोरदार है।
सुरेश: फिर अपने यहाँ यह फीका फीका सा क्यों लगता है ?
मदन : प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की इच्छाशक्ति की कमी और रुचि नहीं होना। पश्चिमी राजस्थान की लोक कला, संस्कृति, परंपरा, लोक संगीत, लोक जीवन, जीवन- शैली और इतिहास से दुनिया को रू-ब-रू कराने के उद्देश्य से वर्ष 1986 में ज़िला प्रशासन ने थार महोत्सव की शुरुआत की थी। तत्कालीन जिला कलेक्टर ने एक नई पहल करते हुए इसे शुरू किया था। वर्ष 1986 से 2012 तक लगातार इसका आयोजन किया गया था। इसके बाद अगले दस साल कभी आयोजन हुआ कभी नहीं हुआ। कभी औपचारिकता निभा दी गई। तबसे यही हाल है। स्थानीय लोगो की भी रुचि नहीं रही फिर पर्यटक तो क्यों ही आएं ?
सुरेश : एक बात तो बताओ, इसका नाम थार महोत्सव कैसे पड़ा ? प्राचीन समय से यह इलाका तो मालाणी नहीं कहा जाता है ?
मदन : तुम ठीक कह रहे हो। मारवाड़ में राठौड़ राजवंश के संस्थापक राव सिहाजी 13वीं शताब्दी में राजस्थान आए थे। उन्होंने खेड़ (बाड़मेर) को अपनी शक्ति का केंद्र बनाया।
रावल मल्लीनाथ जी, राव सिहाजी की 9वीं पीढ़ी के शासक हुए। रावल मल्लीनाथ जी मात्र शासक ही नहीं थे, बल्कि वे मारवाड़ की उस गौरवशाली परंपरा के पुरोधा थे जहाँ शक्ति और भक्ति का अद्भुत संगम होता था। तिलवाड़ा की पावन धरा पर उनकी भक्ति की खुशबू आज भी पशु मेले और भजनों के रूप में जीवित है। इन्हीं रावल मल्लीनाथ जी नाम पर वर्तमान के बाड़मेर और बालोतरा जिले के समूचे क्षेत्र को “मालाणी” कहा जाता है। जबकि थार तो एक विशाल भूभाग में फैले रेगिस्तान का नाम है जो कि पाकिस्तान के सिंध, गुजरात के कच्छ, राजस्थान के बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर, फलोदी, बीकानेर और गंगानगर व पाकिस्तानी पंजाब के कुछ हिस्से तक फैला है। इसलिए बाड़मेर को थार कहना किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं है। तब के प्रशासन ने ऐतिहासिक स्त्रोतों पर ज्यादा गौर न करके महोत्सव का नाम थार महोत्सव रख दिया। तबसे यही चला आ रहा है। जबकि ऐतिहासिक और भौगोलिक दृष्टि से यह गलत है।
मालाणी नस्ल के घोड़े विश्व प्रसिद्ध है वो इसी क्षेत्र के है। रावल मल्लीनाथ जी को घोड़ों का देवता भी कहा जाता है। कोई घोड़ा बीमार पड़ जाए तो उनके थान पर हाजरी लगाने पर ठीक हो जाता है।
लगभग 750 मिलियन वर्ष पूर्व का भारत का सबसे बड़ा और विश्व का तीसरा सबसे बड़ा आग्नेय चट्टान समूह मालानी चट्टानें (Malani Igneous Suite) कहा जाता है। इससे भी सिद्ध होता है कि इस क्षेत्र का नाम प्राचीन काल से मालाणी ही रहा है। यह 51,000 वर्ग किमी से अधिक क्षेत्र में फैला है, जिसमें मुख्य रूप से गुलाबी/भूरे ग्रेनाइट, रायोलाइट, और ज्वालामुखीय चट्टानें शामिल हैं।
वर्तमान में बाड़मेर (Barmer) नाम इसके संस्थापक शासक बाहड़राव परमार (जूना बाड़मेर) के नाम पर पड़ा है, जिसे पहले बाहड़मेर कहा जाता था। फिर भी, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से मालानी आज भी इस क्षेत्र की पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इसी प्रकार मारवाड़/मरूधर/मरूधरा पूरे जोधपुर क्षेत्र के लिए व बाड़मेर के लिए मालाणी और जैसलमेर के लिए माड़ प्रदेश ये शब्द सदियों से चलन में रहे है। आई बात समझ में ?
सुरेश : सब समझ में आ गया दोस्त। फिर लोग थार थार इतना क्यों करते है ?
मदन : इसका कारण है जानकारी का अभाव और इतिहास के प्रति अरुचि का भाव। लोगों में अपने अतीत के प्रति जिज्ञासा का भाव कम होता जा रहा है। जब गहराई में जाकर अध्ययन नहीं करेंगे तो कैसे कोई बात समझ में आएगी। दूसरा कारण राजनीति भी है। आजकल लोग सेवा की बजाय जाति,धर्म और क्षेत्र की आड़ लेकर चुनाव जीतना चाहते है। इन्हीं संवेदनशील मुद्दों में जनता को भटकाकर रखा जाता है ताकि वो विकास संबंधी कोई सवाल ही न कर पाए। यह हमारे देश के लिए अच्छी बात नहीं है दोस्त !
सुरेश : ठीक कहते हो मित्र। इतिहास तो हम सबकी साझा विरासत है, हमे उसे सहेज कर रखना चाहिए। इतिहास को बदलने की बजाय कुछ बदलना है तो हमारे वर्तमान को बदलना चाहिए जिससे हमारा आने वाला कल और बेहतर हो। नेताओं के पास आज कोई विज़न नहीं है, जनता को देने के लिए उनके पास कुछ है नहीं इसलिए कभी इतिहास की बंदरबांट करते है कभी बदलते हैं और जनता को गुमराह करते है।
मदन : मैं क्या सोचता हूँ, पता है ? पहला काम तो यह किया जाए कि इस थार महोत्सव का नाम बदलकर “मालाणी महोत्सव” किया जाए। फिर इसका दायरा बढ़ाकर बाड़मेर और बालोतरा दोनों जिलों को इसमें शामिल किया जाए।
बालोतरा ज़िले में तिलवाड़ा पशु मेला,नाकोड़ा का धार्मिक पर्यटन, पचपदरा के नमक के पिरामिड, सिवाना का किला, हल्देश्वर की पहाड़ियाँ। बाड़मेर के महाबार और रोहिड़ी के मखमली धोरे, मुनाबाव का बॉर्डर, किराडू और देवका के मंदिर, जूना का किला, कनाना गैर नृत्य, हस्तशिल्प आदि अनेक संभावनाएं है जिसके माध्यम से पर्यटकों को आकर्षित किया जा सकता है। गुजरात के सभी पर्यटक बाड़मेर होकर ही जैसलमेर जाते है। उन्हें एक दिन के लिए यहाँ रोका जा सकता है अगर प्रशासन गंभीरता से इस पर विचार करे। इससे रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे और मालाणी की पहचान विश्व स्तर पर हो जाएगी। अभी तेल के कुओं और ऑयल रिफाइनरी के कारण मालाणी देश में अपना विशेष महत्व रखता है, अगर पर्यटन भी इसमें जुड़ जाए तो यह सोने पर सुहागा सिद्ध होगा।
सुरेश : सही बात है। पर सिर्फ बातें करने से क्या होगा। हम चलते है, लोगो से मिलकर चर्चा करते है और सब मिलकर जिला कलेक्टर और अपने जनप्रतिनिधियो से मिलकर उनसे अपने विचार साझा करते हैं। क्या पता उनका सोया हुआ राम जाग जाए।
(नोट- लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। इसमें कही गई बातें लेखक के व्यक्तिगत अनुभव, सोच, ज्ञान और दृष्टिकोण से प्रेरित हैं।)

