Friday, March 20, 2026
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थार की कहानियां: शक्ति और भक्ति की अद्भुत मिसाल- संत जनरल हणुत सिंह

जनरल हणुत सिंह 31 जुलाई 1991 को रिटायर हो गए। उसके बाद उन्होंने देहरादून में बालाशिवयोगी आश्रम को अपना ठिकाना बना लिया और पूरी तरह संन्यासी के रूप में शेष जीवन बिताया। इसलिए लोग इन्हें ‘संत जरनल’ भी कहते थे।

अप्रैल 2015 की बात है। अखबारों में खबर आई कि जनरल हणुत सिंह का देहांत हो गया है। मैंने भी इससे पहले आपका कोई खास जिक्र नहीं सुना था। अखबार में खबर को काफी कवरेज दिया था। फिर सोशल मीडिया में बड़े बड़े लोग श्रद्धांजलि देने लगे।

आश्चर्य मिश्रित शर्म सी महसूस हुई कि इतने महान व्यक्ति अपने जिले के ही थे और हम उन्हें जानते तक नहीं। बड़ी ग्लानि हुई। यह भाव हृदय में कहीं गहरा बैठ गया और कुछ अंतराल बाद जब जसोल जाना हुआ। हाँ हणुत सिंह जी बाड़मेर के जसोल गांव के ही थे। जसोल पहुंचने पर चिर परिचित मंगल सिंह जी के यहाँ गया। चाय पानी की औपचारिकता के बाद मैंने जनरल साहब का जिक्र किया। मंगल सिंह जी करीब 75 वर्ष के हैं और जनरल हणुत सिंह जी के जीवन की सभी घटनाओं से अच्छे से वाकिफ है।

जनरल हणुत का प्रारंभिक जीवन

मैंने पूछा कि ‘जनरल साब इतने बड़े व्यक्ति थे कभी सुना ही नहीं। ऐसा कैसे हुआ? कभी टीवी,अखबार या सोशल मीडिया पर देखा सुना नहीं।’

मंगल सिंह जी थोड़ा उदासी से बोले कि ‘यही तो आप वाली पीढ़ी की दिक्कत है। इतिहास से जरा भी राब्ता नहीं है। खैर, क्या किया जा सकता है।’

संकोच के साथ मैंने बात आगे बढ़ाई ‘जनरल साहब से पहले भी इनके परिवार में कोई सेना में थे?’

वो फरमाए कि ‘हाँ, इनके पिताजी अर्जुन सिंह भी सेना में कर्नल थे। इन्हीं के घर 6 जुलाई 1933 को इस महान व्यक्ति का जन्म हुआ था, जिसने सारे मारवाड़ का नाम रोशन किया। पढ़ाई मेयो कॉलेज अजमेर और देहरादून में हुई। फिर 1952 में सेना में भर्ती हुए। आप NDA के पहले ही बैच के कैडेट थे। इन्होंने पूना हॉर्स रेजिमेंट ज्वाइन की।’

बैटल ऑफ बसंतर

मंगल सिंह थोड़ा संयत हुए तो मैंने आगे पूछा कि ‘बैटल ऑफ बसंतर वाला किस्सा सुनाइए ना!’ चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लाते हुए बोले ‘जनरल साहब बैटल ऑफ बसंतर के हीरो थे। बात भारत पाक के 1971 के युद्ध की है। इसी युद्ध में ढाका में 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया था और पाकिस्तान से टूटकर नया देश बांग्लादेश बना था। तो इस युद्ध में जब पाकिस्तान को लगा कि वो पूर्वी मोर्चे पर कमजोर पड़ रहा है तो उसने भारतीय सेना का ध्यान हटाने के लिए पश्चिम से हमला शुरू किया। बसंतर नदी जम्मू और कश्मीर के सांबा जिले में बहने वाली एक मौसमी नदी है, जो रावी नदी की सहायक भी है। शाकरगढ के पास इसी नदी क्षेत्र में युद्ध लड़ा गया था। सामरिक दृष्टि से ये बहुत महत्वपूर्ण इलाका था। कारण कि यहाँ से गुजरने वाली सड़क ही जम्मू कश्मीर को शेष भारत से जोड़ती थी। पाकिस्तान यहाँ कब्जा करके जम्मू कश्मीर को शेष भारत से अलग करना चाहता था। तो यहाँ पाक सेना का सामना करने भेजा गया 17 पूना हॉर्स रेजिमेंट को। और इसको कमांड कर रहे थे उस वक्त के लेफ्टिनेंट कर्नल हणुत सिंह। और यहाँ जो टैंक बैटल हुई उसे आज भी दुनिया याद करती है।’

आगे कहते है ‘पाकिस्तानी फौज ने इस इलाके में लैंड माइन्स बिछाई हुई थी। माइंस को हटाने की जिम्मेदारी इंजीनियर कोर की थी, पर इसमें खूब समय लग रहा था। 15 दिसंबर की रात में कमांडिंग ऑफिसर हणुत सिंह ने तय किया कि अगर माइंस हटाने का इंतजार किया तो बहुत देर हो जाएगी। उन्होंने अपने अपने माताहत मेजर अजय सिंह को आगे बढ़ने का आदेश दिया।’ अजय सिंह ने सवाल किया, ‘सर अभी माइंस फील्ड क्लियर नहीं हुआ है, हम आगे नहीं बढ़ सकते।’

हणुत सिंह ने जवाब दिया, ‘अगर हमने अभी रास्ता पार नहीं किया तो इतिहास पूना हॉर्स को कभी माफ नहीं करेगा।’

हणुत सिंह जी बताते गए कि इतने डिग्री इतने एंगल पर टैंक को आगे बढ़ाते जाओ। और चमत्कारिक रूप से बारूद से भरे उस मैदान में बिना किसी क्षति के भारतीय टैंक आगे बढ़ते गए। आगे आगे टैंक चले और उन्हीं निशानों पर पीछे पीछे पैदल सेना ने भी नदी पार की। जनरल साहब के पास एक छोटी टैंक रेजिमेंट थी जबकि सामने पूरी टैंक ब्रिगेड थी। पर उनका साहस, नेतृत्व क्षमता और आत्मविश्वास इतना प्रबल था कि 17 पूना हॉर्स ने गदर मचा दिया। सामने मंडरा रही मौत से बेपरवाह वो अपनी रेजिमेंट का हौसला बढ़ाते। उन्होंने साफ कह दिया था कि हम एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे।

और भारतीय टैंक आगे बढ़ते गए और उन्होंने पाकिस्तान के अत्याधुनिक 48 पैटन टैंक तबाह कर दिए। यह भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी टैंक बैटल मानी जाती है। अद्भुत नेतृत्व क्षमता और जान हथेली पर रखकर लड़ने के फलस्वरूप आपको महावीर चक्र से नवाजा गया। जनरल साहब के नेतृत्व में ही लड़े युवा अफसर सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। मेजर अमरजीत सिंह बाल को भी महावीर चक्र मिला।

साथ ही रेजिमेंट ने चार वीर चक्र भी अर्जित किए। भारतीय सेना के इतिहास में एक ही लड़ाई में किसी यूनिट द्वारा जीते गए सबसे अधिक सर्वोच्च पुरस्कारों में से एक माना जाता है। साथ ही हणुत सिंह के अद्भुत पराक्रम से प्रभावित हो पाकिस्तान ने भी उन्हें ‘फख्र-ए-हिन्द’ की उपाधि दी।”

मंगल सिंह से यह सब सुनते हुए अधिकांश समय मैं अचरज से ही भरा रहा। फिर खुद को सामान्य करते हुए उनसे पूछा कि ‘यूं तो सेना में ग़ज़ब का अनुशासन होता ही है परन्तु यहाँ तो साक्षात मौत सामने खड़ी थी। मैदान में बारूद बिछा हुआ है, थोड़ी से चूक से धमाका हो सकता था। और पार भी टैंक को करना है, पैदल हो तो फिर भी गुंजाइश रहे। जनरल साहब पर उनके सैनिकों ने इतना भरोसा कैसा किया?’

मंगल सिंह जी सगर्व बोले कि ‘उनका व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि अपनी रेजिमेंट में ही नहीं पूरी सेना में उनका रुतबा और सम्मान सबसे अलग था। बहुत आध्यात्मिक व्यक्ति थे। शांतिकाल में घंटों पूजा करते थे। यहां कि एक बार उनके कमांडिंग अफसर का फोन आया तो आपने कहलवा दिया, अभी नहीं आ सकते , पूजा में हैं। सिद्धांतों के खरे। जीवन भर अविवाहित रहे। अपने सैनिकों के लिए अपने से बड़े अधिकारियों से भी भिड़ जाते थे। इन्हीं कारणों से उनके मातहत अफसर और सैनिक उन्हें अपने अभिभावक के रूप में देखते थे। और सम्मान से सब उन्हें ‘ गुरुदेव ‘ कहते थे।’

टैंक बैटल के महारथी

‘साथ ही टैंक के बारे में उन्हें इतनी गहन समझ थी कि टैंकों की लड़ाई पर उनके लिखे दस्तावेज आज भी इंडियन मिलिट्री अकादमी में पढ़ाये जाते हैं। 12 में से 7 चैप्टर इन्हीं के पढ़ाए जाते हैं। कहते है अमेरिका में भी टैंक बैटल को लेकर पहला अध्याय जनरल हणुत का पढ़ाया जाता है।’

ऐसा ही एक वाकिया है जब आर्मी चीफ जनरल के सुंदरजी आर्मर्ड कोर की तैयारियों का जायजा ले रहे थे और हणुत सिंह जी प्रेजेंटेशन दे रहे थे। आपने कहा कि युद्ध के दौरान हम एक दिन में 20 किलोमीटर तक आगे बढ़ सकते हैं। इस पर आर्मी चीफ़ के ने कहा कि ऐसा नहीं है हमें 100 किलोमीटर तक आगे बढ़ना चाहिए। तब जनरल साहब ने हर चीज को बहुत ही गहराई और तकनीकी के आधार पर समझाया कि हम क्यों हम इतना नहीं बढ़ सकते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि हमें यह साजो सामान उपलब्ध करा दिए जाए तो हम 100 क्या 120 किलोमीटर तक भी आगे बढ़ सकते हैं।

सिक्किम में राज्यपाल से भिड़ गए

फिर मैंने ही आगे पूछा कि ‘साहब सिक्किम में भी रहे थे। वहाँ के बारे में भी कुछ बताइए।’

तो कहने लगे कि ‘शायद 1981 में साहब की पोस्टिंग सिक्किम हुई। सिक्किम नया नया राज्य बना था। काफी संवेदनशील इलाका था। इस वक्त इंदिरा गांधी के काफी करीबी तल्यारखान को यहाँ का राज्यपाल बनाया गया था। वो अक्सर यहाँ दौरा करते थे ताकि हालात पर नजर रखी जा सके। तल्यारखान नवाबी स्वभाव के आदमी थे सो उनकी कुछ मांगे रहती थी। मसलन जब भी वो सिक्किम में कहीं भी दौरे पर जाएं तो डिवीजन कमांडर या कम से कम ब्रिगेड कमांडर के ओहदे वाला अफसर उन्हें रिसीव करे। जनरल साहब को जब ये मालूम हुआ तो उन्होंने साफ मना कर दिया। कहा कि ये प्रशासन का काम है। राज्यपाल नाराज हुए, ऊपर शिकायतें भी की। पर जनरल साहब के स्वभाव से सभी परिचित थे सो शिकायत का कुछ खास असर हुआ नहीं।’

फौज फौजी से है सिर्फ अफसरों से नहीं

इसी प्रकार जब आप सिक्किम गए तब देखा सिपाहियों के रहने आदि के इंतजामात ठीक से नहीं है। उच्च अधिकारियों को लिखा भी। पर जब कोई हल नहीं निकला तब खुद ही जुट गए।

अपनी यूनिट के साथ उन्होंने जंगल से लकड़ियां काटकर उनसे शौचालय और बैरक तैयार किए, और बिजली के लिए जनरेटरों का इंतज़ाम करवाया। एक बात वो अक्सर कहा करते थे, ‘एक सैनिक अपने अफसर के लिए जितनी कुर्बानी देता है, अफसर उसका एक हिस्सा भी नहीं देता।’ अपने सैनिकों के लिए उनके मन में बड़ा प्रेम और सम्मान था।

सेना प्रमुख बनने से चूके

आगे मंगल सिंह जी अपनी लय में ही बताते जा रहे थे कि ‘1983 में आप मेजर जनरल बने। फिर 1985 में लेफ्टिनेंट जनरल बने। वो सेना के चीफ़ बनने लायक मटेरियल थे पर अपने स्पष्टवादी और सिद्धांतवादी स्वभाव के कारण शायद नहीं बन पाए। साहब को ओवरटेक करके जब किसी और को सेना का प्रमुख बनाया गया तो आपने कहा था कि ‘अगर वो मुझे सेना प्रमुख नहीं बना चाहते है तो हानि उन्हीं की है।’ किसी प्रकार के पद से या धन से कोई मोह नहीं रखा। कर्तव्य समझकर अपना कर्म करते रहे।

ऑपरेशन ब्रासट्रैक्स का नेतृत्व

फिर 1986 में नौसेना, वायुसेना और आर्मी, तीनों के संयुक्त युद्धाभ्यास की एक योजना बनी। इसका नाम दिया गया ‘ऑपरेशन ब्रासट्रैक्स’। इसको लीड करने का जिम्मा हणुत सिंह जी को ही सौंपा गया। 29 अप्रैल के रोज जनरल हणुत ने फौज को राजस्थान की सीमा पर खड़ा कर दिया। कहते हैं इस युद्धाभ्यास में लगभग डेढ़ लाख सैनिक जमा हुए थे। ये देखकर पाकिस्तान में हड़कंप मच गया, खासकर इस बात से कि ट्रेनिंग को जनरल हणुत लीड कर रहे थे। ट्रेनिंग लम्बी चली तो मामला अंतरराष्ट्रीय हो गया। यहां तक कि नाटो ने भी इतने बड़े पैमाने पर ऐसा युद्धाभ्यास नहीं करवाया था। भारत की तरफ से इसे बार बार महज एक ट्रेनिंग एक्सरसाइज कहा गया लेकिन कई जानकार मानते हैं कि ये युद्ध की तैयारी थी। इस घटना के बारे में एक पूर्व आर्मी चीफ ने कहा था कि अगर जनरल हणुत को सरकार न रोकती तो वो हिंदुस्तान पाकिस्तान का नक्शा बदलकर रख देता।”

शेष जीवन संत के रूप में

31 जुलाई 1991 को आप रिटायर्ड हो गए उसके बाद में आपने देहरादून में बालाशिवयोगी आश्रम को अपना ठिकाना बना लिया और पूरी तरह संन्यासी के रूप में शेष जीवन बिताया। बालासती जी महाराज के भी आप अनन्य भक्त थे वह इन्हें अपना मानस पुत्र भी कहती थी। शेष जीवन उन्होंने एक संत के रूप में बिताया और इसलिए लोग “संत जरनल” भी कहते थे। 11 अप्रैल 2015 को समाधि की अवस्था में ही उन्होंने शरीर त्याग दिया।

आपकी मृत्यु के उपरांत जसोल में उनके निवास स्थान पर उनके सम्मान में 17 पूना हॉर्स रेजीमेंट ने टी–52 टैंक रखा है। साथ ही जालीपा कैंट में मुख्य रोड का नामकरण भी उनके नाम पर हुआ है और मुख्य द्वार के आगे उनकी मूर्ति भी लगाई गई है।

मंगल सिंह जी अपनी बात कहकर कुछ देर चुप हुए तो मैने कहा कि ‘हम जैसे लोग खूब घूमते फिरते है, सैकड़ों लोगों से मिलते है। पढ़ते भी रहते है। साथ ही इस जिले के भी है फिर भी जनरल हणुत सिंह जी के बारे में कितना कम जानते है। फिर सारे देश की तो क्या ही बात की जाए। ऐसी महान शख्सियतो के जीवन चरित को विद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। जिससे ऐसे विरले व्यक्ति के बारे में युवा पीढ़ी जान सके और उनसे प्रेरणा लेकर देश सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ सके।’

बॉलीवुड में हाल ही में एक फिल्म बनी है ‘इक्कीस’ जो कि बसंतर के युद्ध पर बनी है। ऐसी और अनेक फिल्में और डॉक्यूमेंट्री बनी चाहिए।

महेंद्र सिंह तारातरा
महेंद्र सिंह तारातरा
सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र लेखक। भाषा, इतिहास और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन को लेकर सक्रिय।
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