फणीश्वरनाथ रेणु हिंदी के लोकप्रिय कथाकार हैं जिनकी अनेक रचनाओं को लगातार पाठकों ने पढ़ा है। उनके उपन्यास ‘मैला आँचल’ और कहानी ‘तीसरी कसम, उर्फ मारे गए गुलफाम’ को उनकी सबसे लोकप्रिय कृतियां मान सकते हैं। इन दोनों पर फ़िल्में बनीं और आलोचना तथा अकादमिक जगत को भी इन दोनों कृतियों ने खूब उत्तेजित किया।
1958 में पटना से निकलने वाली लघु पत्रिका ‘अपरम्परा’ में इस कहानी का पहली बार प्रकाशन हुआ और 1959 में रेणु के कहानी संग्रह ‘ठुमरी’ में इसे संकलित किया गया। इसके बाद हिंदी की श्रेष्ठ या लोकप्रिय कहानियों के जितने भी संचयन अथवा संकलन तैयार हुए उनमें इस कहानी को अनिवार्यत: देखा जा सकता है। 1961 में इस कहानी पर कवि शैलेन्द्र ने फिल्म निर्माण प्रारम्भ किया, बासु भट्टाचार्य के निर्देशन में बनी यह फिल्म 1966 में प्रदर्शित हो सकी। व्यावसायिक रूप से यह फिल्म बहुत सफल नहीं रही लेकिन इसे 1967 में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
साहित्य और सिनेमा दोनों माध्यमों में इस कृति को एक प्रेम कथा के रूप में देखने-समझने का आग्रह रहा है। यह आग्रह निराधार नहीं है। चालीस पार का अविवाहित गाड़ीवान हिरामन अपनी बैलगाड़ी पर नौटंकी की नृत्यांगना हीराबाई को ले जा रहा है। दोनों एक दूसरे के व्यक्तित्व से प्रभावित हैं। हिरामन सहृदय स्त्री के इस प्रथम साहचर्य से चकित और मुग्ध है तो हीराबाई हिरामन के निष्कलुष मन और निष्कपट व्यवहार से प्रभावित। कहानी का अंत दुखद है। पाठकों को लगता है कि इन दोनों का आकर्षण इन्हें विवाह की परिणति तक ले जाएगा लेकिन हीराबाई दूसरी नाच कंपनी में शामिल होने मेले से लौट रही है और खिन्न -उदास मन हिरामन अपने घर।
कहानी में रेणु दोनों के परस्पर आकर्षण को बहुत ध्यान से दर्ज करते हैं, कहानी में आए वे वाक्य इस आकर्षण की गवाही दे रहे हैं, उनको सिलसिलेवार देखना रोचक है –
– पीठ में गुदगुदी लगने पर वह अंगोछे से पीठ झाड़ लेता है।
– औरत है या चंपा का फूल! जब से गाड़ी मह-मह महक रही है।
– हिरामन ने आंख की कनखियों से देखा, उसकी सवारी …मीता …हीराबाई की आंखें गुजुर-गुजुर उसको हेर रही हैं. हिरामन के मन में कोई अजानी रागिनी बज उठी। सारी देह सिरसिरा रही है।
– हीराबाई ने परख लिया, हिरामन सचमुच हीरा है।
– हीराबाई ने हिरामन के जैसा निश्छल आदमी बहुत कम देखा है।
– हिरामन ने हीराबाई के कान के फूल को ग़ौर से देखा। नाक की नकछवि के नग देख कर सिहर उठा -लहू की बूँद!
– हिरामन का मन पल-पल में बदल रहा है। मन में सतरंगा छाता धीरे-धीरे खिल रहा है, उसको लगता है. …उसकी गाड़ी पर देवकुल की औरत सवार है।
– हिरामन का मन आज हल्के सुर में बंधा है।
– हीराबाई दिल खोल कर हंसी। हंसते समय उसकी सारी देह दुलकती है।
– हीराबाई ने अपनी ओढ़नी ठीक कर ली। तब हिरामन को लगा कि… लगा कि…
– आज हिरामन पर मां सरोसती सहाय हैं, लगता है। हीराबाई बोली,‘वाह, कितना बढ़िया गाते हो तुम!’
– हिरामन का मुंह लाल हो गया। वह सिर नीचा कर के हंसने लगा।
– हीराबाई परदा हटाने लगी। हिरामन ने पहली बार आंखों से बात की हीराबाई से।
– हिरामन दुनिया-भर की निगाह से बचा कर रखना चाहता है हीराबाई को। उसने चारों ओर नज़र दौड़ा कर देख लिया-कहीं कोई गाड़ी या घोड़ा नहीं।
– पहाड़ी तोते को दूध-भात खाते देखा है?
– टप्पर के अंदर झांक कर इशारे से कहा दिन ढल गया!
– ऐसे कितने सपने देखे हैं उसने! वह अपनी दुलहिन को ले कर लौट रहा है। हर गांव के बच्चे तालियां बजा कर गा रहे हैं।
– हिरामन अब बेखटक हीराबाई की आंखों में आंखें डाल कर बात करता है।
– हीराबाई ने देखा, सचमुच नननपुर की सड़क बड़ी सूनी है। हिरामन उसकी आंखों की बोली समझता है।
– आज हिरामन अपने मन को खलास कर लेगा। वह हीराबाई की थमी हुई मुस्कुराहट को देखता रहा।
– हिरामन ने लक्ष्य किया, हीराबाई तकिए पर केहुनी गड़ा कर, गीत में मगन एकटक उसकी ओर देख रही है. …खोई हुई सूरत कैसी भोली लगती है!
– हीराबाई लंबी सांस लेती है। हिरामन के अंग-अंग में उमंग समा जाती है।
– हिरामन अचरज के मारे गूंगा हो गया. …इस्स! इतना तेज़ जेहन! हू-ब-हू महुआ घटवारिन!
– हीराबाई ने हिरामन का कंधा धर लिया एक हाथ से। बहुत देर तक हिरामन के कंधे पर उसकी उंगलियां पड़ी रहीं। हिरामन ने नज़र फिरा कर कंधे पर केंद्रित करने की कोशिश की, कई बार। गाड़ी चढ़ाई पर पहुंची तो हीरा की ढीली उंगलियां फिर तन गईं।
– अपने गांव के लालमोहर, धुन्नीराम और पलटदास वगैरह गाड़ीवानों के दल को देख कर हिरामन अचकचा गया।
– एलान के हर शब्द पर हिरामन पुलक उठता है। हीराबाई का नाम, नाम के साथ अदा-फिदा वगैरह सुन कर उसने लालमोहर की पीठ थपथपा दी,‘धन्न है, धन्न है! है या नहीं?’
– खेमे के परदे को हटा कर हीराबाई ने बुलाया,‘यहां आ जाओ, अंदर! …देखो, बहादुर! इसको पहचान लो। यह मेरा हिरामन है। समझे?’
– हिरामन के मन का पुरइन नगाड़े के ताल पर विकसित हो चुका है।
– हिरामन के कलेजे में जरा आंच लगी। …हिरिया! बड़ा लटपटिया आदमी मालूम पड़ता है।
– हिरामन को लगता था, हीराबाई शुरू से ही उसी की ओर टकटकी लगा कर देख रही है, गा रही है, नाच रही है।
– हीराबाई की पुकार कानों के पास मंडराने लगती – भैया…मीता …हिरामन …उस्ताद गुरु जी! हमेशा कोई-न-कोई बाजा उसके मन के कोने में बजता रहता, दिन-भर. कभी हारमोनियम, कभी नगाड़ा, कभी ढोलक और कभी हीराबाई की पैजनी।
– आज वह हीराबाई से मिल कर कहेगा, नौटंकी कंपनी में रहने से बहुत बदनाम करते हैं लोग। सरकस कंपनी में क्यों नहीं काम करती? सबके सामने नाचती है, हिरामन का कलेजा दप-दप जलता रहता है उस समय।
– हीराबाई ने हिरामन के कंधे पर हाथ रखा, …इस बार दाहिने कंधे पर।
– हीराबाई का हाथ रुक गया। उसने हिरामन के चेहरे को ग़ौर से देखा। फिर बोली,‘तुम्हारा जी बहुत छोटा हो गया है. क्यों मीता? महुआ घटवारिन को सौदागर ने ख़रीद जो लिया है गुरु जी!’गला भर आया हीराबाई का।
– हीराबाई ठीक सामनेवाली कोठरी में चढ़ी। इस्स! इतना टान! गाड़ी में बैठ कर भी हिरामन की ओर देख रही है, टुकुर-टुकुर। लालमोहर को देख कर जी जल उठता है, हमेशा पीछे-पीछे, हरदम हिस्सादारी सूझती है।
– हीराबाई हाथ की बैंगनी साफी से चेहरा पोंछती है। साफी हिला कर इशारा करती है …अब जाओ। आख़िरी डिब्बा गुज़रा, प्लैटफ़ॉर्म ख़ाली, सब ख़ाली …खोखले …मालगाड़ी के डिब्बे! दुनिया ही ख़ाली हो गई मानो!

कहानी में आए ये तमाम वाक्य न केवल दोनों के आकर्षण को दर्ज करते हैं बल्कि यहाँ परस्पर बढ़ते अनुराग को भी लक्षित किया जा सकता है। दोनों में परस्पर आकर्षण के इन वाक्यों के अतिरिक्त ऐसे प्रसंग हैं जब दोनों एक दूसरे के मन की बात समझ रहे हैं। दोनों एक दूसरे को आदर देना जरूरी समझ रहे हैं। लेकिन तब भी क्या नाटक कंपनियों में काम करने वाली मिस हीराबाई नहीं जानती कि हिरामन और उसका साथ नहीं हो सकता। उसने दुनिया देखी है और कहानी के अंत तक आते-आते वह अपनी कंपनी बदल चुकी है। वह गाड़ी से उतरते हुए हिरामन को इनाम-बख्शीश देना जरूरी समझती है और विदा होते समय चादर के लिए भी पैसा देना। चाह लगभग निरपेक्ष ही है। तो हीराबाई को हिरामन की तरह भावुक और भोला समझना शायद ठीक न हो। तब भी हम जानते हैं कि यह हीराबाई है जो हिरामन को कह रही है, -‘तुम्हारा जी बहुत छोटा हो गया है। क्यों मीता? महुआ घटवारिन को सौदागर ने ख़रीद जो लिया है गुरु जी!’ हम जानते हैं कि हीराबाई ने महुआ की कथा सुनाते हिरामन को आँसू बहाते देखा है। वह जान गई है कि हिरामन को अपनी महुआ की तलाश है। और कहानी के अंत में उसका यह स्वीकार कर लेना कि ‘महुआ घटवारिन को सौदागर ने ख़रीद जो लिया है गुरु जी!’ बता देता है कि हीराबाई के मन में भी हिरामन के प्रति अनुराग से कुछ अधिक है।
कहानी में महुआ घटवारिन की कथा केवल कहानी को आगे बढ़ाने के लिए ही नहीं है अपितु उसके गहरे अर्थ-संदर्भ हैं। हिरामन को इस बार लग रहा है कि हीराबाई महुआ है और उसके पीछे नदी में पुकार लगाता पीछा कर रहा व्यक्ति वही है। रेणु लिखते हैं, ‘उसको लगता है, वह खुद सौदागर का नौकर है। महुआ कोई बात नहीं सुनती। परतीत करती नहीं। उलट कर देखती भी नहीं। और वह थक गया है, तैरते-तैरते।’ महुआ की कहानी हिरामन के लिए नई नहीं है लेकिन उसे जो नया लग रहा है, वह है- ‘इस बार लगता है महुआ ने अपने को पकड़ा दिया। खुद ही पकड़ में आ गई है। उसने महुआ को छू लिया है, पा लिया है, उसकी थकन दूर हो गई है। पंद्रह-बीस साल तक उमड़ी हुई नदी की उलटी धारा में तैरते हुए उसके मन को किनारा मिल गया है। आनंद के आंसू कोई भी रोक नहीं मानते।’
हीराबाई अपनी स्थिति से भलीभांति वाकिफ है और बच्चों को ‘लाली लाली डोलिया में’….वाला गीत गाते देखकर सपना नहीं देखती, हिरामन भले देख ले। हिरामन अंत में उदास और खिन्न है, इतना खिन्न कि मेले की लदनी का लालच भी उसे नहीं रोक पाता और जगन्नाथ धाम के दर्शन की चाह फिर उसके मन में उठ आती है। क्या यह वैराग्य है?
कहानी वहां समाप्त होती है जहाँ हिरामन ‘मारे गये गुलफाम’ का मुखड़ा गाते हुए बैलगाड़ी से मेला छोड़कर घर लौट रहा है। यह गीत हिरामन ने हीराबाई के नाटक में सुना था। तो हीराबाई के प्यार में मारे गए हिरामन गुलफाम? कहानी में तीन बार यह उल्लेख आया है कि हीराबाई हिरामन को इनाम में पैसा देना चाहती है। पहली बार खाना खाने के लिए लेकिन वह लगभग डांटकर प्रतिरोध करता है, ,‘बेकार, मेला-बाजार में हुज्जत मत कीजिए। पैसा रखिए।’ दूसरी बार गाड़ी से उतारते हुए- ‘यह लो दच्छिना’, इस पर हिरामन का मित्र, लालमोहर कहता है- ‘इलाम-बकसीस दे रही है मालकिन, ले लो हिरामन!’ यहाँ रेणु कैसा तेजस्वी और आत्मसम्मान से भरे हिरामन का चित्र खींचते हैं, ‘हिरामन ने कट कर लालमोहर की ओर देखा…बोलने का ज़रा भी ढंग नहीं इस लालमोहरा को।’ लेकिन वह पैसा ले लेता है और फिर रेणु ने उसका निरपेक्ष भाव दर्ज किया है- ‘कंपनी की औरत कंपनी में जा रही है- हिरामन का क्या!’ तीसरी बार हीराबाई रेल में बैठ रही है और वह अमानत के तौर पर रखी हिरामन के रुपयों की थैली अपने कुर्ते से निकला कर उसे लौटाती है। फिर उसके कंधे पर हाथ रखकर अपनी थैली से पैसा देने लगती है- ‘एक गरम चादर खरीद लेना…’ देखिये रेणु कैसे हिरामन का गुस्सा लिख रहे हैं- ”हिरामन की बोली फूटी, इतनी देर के बाद- ‘इस्स! हरदम रुपैया-पैसा! रखिए रुपैया! क्या करेंगे चादर?’ और फिर ‘हीराबाई का हाथ रुक गया।’ अकारण नहीं कि स्वयं प्रकाश इस कहानी को ग्रामीण समाज की बाजार संस्कृति से टकराने वाली कहानी ठहराते हैं। इस कहानी का यह पाठ करने की पूरी गुंजाइश है कि बाज़ार ने प्रेम सम्बन्ध को विकसित होने से पहले ही लील लिया।
रेणु की कहानी कला की विशेषता है कि उनकी कहानियाँ किसी एक निश्चित अर्थ की मोहताज़ नहीं होतीं। ध्यान देना चाहिए कि प्रेमचंद की कहानी कला से आगे रेणु अपने परिवेश की ध्वनियों, गंधों और स्पर्शों को भी गद्य में अंकित कर देने का दुर्लभ हुनर जानते हैं। दृश्य तो हैं ही बिम्ब सरीखे। कहानी में अनेक वाक्य और प्रसंग इस आशय के देखे जा सकते हैं, जिनके अर्थ और संदर्भ इस कहानी को गहरा बनाते हैं –
– हिरामन गाड़ीवान की पीठ में गुदगुदी लगती है। (कोई स्त्री मुझे देख रही है, हिरामन का यह भाव कविता की परम्परा से जोड़ता है -तनक हरी चितवां म्हारी ओर। देखना ही तो चाहने की पहली सीढ़ी है। )
– औरत है या चंपा का फूल! जब से गाड़ी मह-मह महक रही है।
– बच्चों की बोली जैसी महीन, फेनूगिलासी बोली!
– वह जीभ को तालू से सटा कर टि-टि-टि-टि आवाज निकालता है। हिरामन की जीभ न जाने कब से सूख कर लकड़ी-जैसी हो गई थी!
– हिरामन के रोम-रोम बज उठे। मुंह से बोली नहीं निकली। (सूफी प्रेमाख्यानों में नायिका को देखकर नायक को सुधबुध खोते देखा है न। )
– उसकी सवारी मुस्कराती है. …मुस्कराहट में ख़ुशबू है। (दृष्टि से गुदगुदी होती है तब मुस्कुराने से सुगंध कैसे न आए। )
– किंतु आज के भोर के इस घने कुहासे में भी वह मगन है. नदी के किनारे धन-खेतों से फूले हुए धान के पौधों की पवनिया गंध आती है। पर्व-पावन के दिन गांव में ऐसी ही सुगंध फैली रहती है।
– उसकी गाड़ी में फिर चंपा का फूल खिला। उस फूल में एक परी बैठी है। जै भगवती।
– हिरामन ने आंख की कनखियों से देखा, उसकी सवारी …मीता …हीराबाई की आंखें गुजुर-गुजुर उसको हेर रही हैं।
– हिरामन के मन में कोई अजानी रागिनी बज उठी। सारी देह सिरसिरा रही है।
– हिरामन ने हीराबाई के कान के फूल को ग़ौर से देखा। नाक की नकछवि के नग देख कर सिहर उठा -लहू की बूँद!
– परदा डाल देने पर भी पीठ में गुदगुदी लगती है।
– हीराबाई ने टप्पर के परदे को तिरछे खोंस दिया। हीराबाई की दंतपंक्ति।
– हीराबाई दिल खोल कर हंसी-हंसते समय उसकी सारी देह दुलकती है।
– हिरामन का मन पल-पल में बदल रहा है। मन में सतरंगा छाता धीरे-धीरे खिल रहा है, उसको लगता है।
– हिरामन का मन आज हल्के सुर में बंधा है। उसको तरह-तरह के गीतों की याद आती है।
– गाड़ी की बल्ली पर उंगलियों से ताल दे कर गीत को काट दिया हिरामन ने।
– हिरामन का मुंह लाल हो गया। वह सिर नीचा कर के हंसने लगा।
– कजरी नदी की दुबली-पतली धारा तेगछिया के पास आ कर पूरब की ओर मुड़ गई है।
– हीराबाई घाट की ओर चली गई, गांव की बहू-बेटी की तरह सिर नीचा कर के धीरे-धीरे। कौन कहेगा कि कंपनी की औरत है! …औरत नहीं, लड़की। शायद कुमारी ही है।
– हीराबाई के तकिए पर हाथ रख दिया। फिर तकिए पर केहुनी डाल कर झुक गया, झुकता गया। ख़ुशबू उसकी देह में समा गई।
– हिरामन की देह की गुदगुदी मिट गई। हीराबाई ने कहा- ‘तुम भी पत्तल बिछाओ …क्यों? तुम नहीं खाओगे तो समेट कर रख लो अपनी झोली में। मैं भी नहीं खाऊंगी।’
– बच्चे कचर-पचर कर रहे हैं।
– इस्स! इतना सौक गांव का गीत सुनने का है आपको! तब लीक छोड़नी होगी।चालू रास्ते में कैसे गीत गा सकता है कोई!’
– आज हिरामन अपने मन को खलास कर लेगा। वह हीराबाई की थमी हुई मुस्कुराहट को देखता रहा।
– आसिन-कातिक का सूरज दो बांस दिन रहते ही कुम्हला जाता है।
– शहर से कुछ दूर हट कर मेले की रौशनी …टप्पर में लटके लालटेन की रौशनी में छाया नाचती है आसपास…. डबडबाई आंखों से, हर रौशनी सूरजमुखी फूल की तरह दिखाई पड़ती है।
– हिरामन की देह से अतर-गुलाब की ख़ुशबू निकलती है। हिरामन करमसांड़ है। उस बार महीनों तक उसकी देह से बघाइन गंध नहीं गई ।
– पलटदास के मन में जै-जैकार होने लगा.श। वह दास-वैस्नव है, कीर्तनिया है। थकी हुई सीता महारानी के चरण टीपने की इच्छा प्रकट की उसने, हाथ की उंगलियों के इशारे से, मानो हारमोनियम की पटरियों पर नचा रहा हो।
– पलटदास को लगा, ग़ुस्साई हुई कंपनी की औरत की आंखों से चिनगारी निकल रही है ‘छटक्-छटक्!’ वह भागा।
– खाते समय धुन्नीराम और लहसनवां ने पलटदास की टोकरी-भर निंदा की।
– …किर्र-र्र-र्र-र्र …कडड़ड़ड़डड़ड़र्र-ई-घन-घन-धड़ाम। हर आदमी का दिल नगाड़ा हो गया है। (ध्वनियों का ऐसा सार्थक प्रयोग कहानी में नया है जिसे रेणु मुहावरे में ढाल देते हैं। )
– नगाड़ा शुरू होते ही लोग पतिंगों की तरह टूटने लगते हैं। (कैसा अद्भुत दृश्य है। )
– घन-घन-घन-धड़ाम! परदा उठ गया- हे ऐ, हे-ए, हीराबाई शुरू में ही उतर गई स्टेज पर! कपड़घर खचमखच भर गया है। हिरामन का मुंह अचरज में खुल गया।
– हीराबाई की साड़ी धोने के बाद कठौते का पानी अत्तरगुलाब हो जाता है।
– गाड़ी ने सीटी दी। हिरामन को लगा, उसके अंदर से कोई आवाज़ निकल कर सीटी के साथ ऊपर की ओर चली गई-कू-ऊ-ऊ! इ-स्स! छी-ई-ई-छक्क! गाड़ी हिली।
– चिड़िया की देह की तरह गर्म है थैली। (स्त्री के स्पर्श का दुर्लभ क्षण थैली के मार्फ़त हिरामन को फिर मिलता है।)
कहानी का एक और पाठ है पात्रों का सामाजिक और मनोवैज्ञानिक व्यवहार समझना। रेणु अपने इस कला में अत्यंत कुशल हैं। वे पात्रों के आचरण, व्यक्तित्व और क्रियाओं को बहुत बारीकी से देखते-समझते हैं और उसे ठीक तरह से अंकित भी कर देते हैं। हिरामन और उसके साथी गाड़ीवानों का व्यवहार देखना बहुत रोचक है। जब हिरामन और उसके ये दोस्त हीराबाई से मिलने जाते हैं तब कचराही बोली यानी हिंदी जानने वाले लालमोहर को आगे किया जाता है। देखिए –
लालमोहर ने एक काले कोटवाले से कहा- ‘बाबू साहेब, जरा सुनिए तो!’
काले कोटवाले ने नाक-भौं चढ़ा कर कहा,‘क्या है? इधर क्यों?’
लालमोहर की कचराही बोली गड़बड़ा गई, तेवर देख कर बोला,‘गुलगुल ..नहीं-नहीं …बुल-बुल …नहीं …’
आखिर खुद हिरामन मामला संभालता है और तत्क्षण परदे में से खुद हीराबाई इन सबको देखकर बुला लेती है। अब दूसरा प्रसंग है जब ये चारों हीराबाई का नाटक देखने चलते हैं और महंगे वाले दर्जे में घुसने लगते हैं। वहां का दरबान इन्हें रोकता है तब –
‘अब लालमोहर की कचराही बोली सुने कोई! उसके तेवर देख कर दरबान घबरा गया- ‘मिलेगा कहां से? अपनी कंपनी से पूछ लीजिए जा कर। चार ही नहीं, देखिए एक और है।’ जेब से पांचवा पास निकाल कर दिखाया लालमोहर ने।’
इसी तरह कहानी में आए लालमोहर के नौकर लहसनवाँ को ध्यान से देखना चाहिए। वह भी चाहता है कि उसे हीराबाई के नाच की एक झलक मिले। हिरामन उदारता से उसका मन रखता है। फिर एक दृश्य है जब नाच देखते हुए एक दर्शक द्वारा हीराबाई को हिरिया और रंडी कह देने पर हिरामन और उसके साथी मारपीट करते हैं तब लहसनवाँ नाच से बाहर है। जब वह आता है तो उसका तेवर गज़ब का दर्शनीय है –
लहसनवां ने आते ही पूछा- ‘मालिक, कौन आदमी क्या बोल रहा था? बोलिए तो जरा। चेहरा दिखला दीजिए, उसकी एक झलक!’
लोगों ने लहसनवां की चौड़ी और सपाट छाती देखी। जाड़े के मौसम में भी खाली देह! …चेले-चाटी के साथ हैं ये लोग! लालमोहर ने लहसनवां को शांत किया।’
आगे रेणु लहसनवाँ के चरित्र का विकास बताते हैं। लिखते हैं, ‘लहसनवां को सबसे अच्छा जोकर का पार्ट लगा है …चिरैया तोंहके लेके ना जइवै नरहट के बजरिया! वह उस जोकर से दोस्ती लगाना चाहता है। नहीं लगावेगा दोस्ती, जोकर साहब?’ अगले पैरा में फिर लहसनवाँ आता है- ‘उसका नौकर लहसनवां उसके हाथ से निकल गया है, नौटंकी कंपनी में भर्ती हो गया है। जोकर से उसकी दोस्ती हो गई है। दिन-भर पानी भरता है, कपड़े धोता है। कहता है, गांव में क्या है जो जाएंगे! लालमोहर उदास रहता है।’ फिर अगले पैरा में लहसनवाँ ईर्ष्या का पात्र बन गया है- ‘लहसनवां मौज में है। दिन-भर हीराबाई को देखता होगा। कल कह रहा था, हिरामन मालिक, तुम्हारे अकबाल से खूब मौज में हूं। हीराबाई की साड़ी धोने के बाद कठौते का पानी अत्तरगुलाब हो जाता है। उसमें अपनी गमछी डुबा कर छोड़ देता हूं। लो, सूंघोगे? इस सहायक सरीखे अमहत्वपूर्ण दिखाई दे रहे पात्र के मार्फत बिहार की जाति संरचना और हाशिये के लोगों के जीवन की एक झलक देखी जा सकती है। उसका कहना कि ‘गांव में क्या है जो जाएंगे’ असल में आजादी के बाद भी बजबजा रहे ग्रामीण सामंतवाद का परिचायक है जहाँ अपने से ऊँची (भले ही पिछड़ी क्यों न हो) जातियों के लोगों को मालिक कहना लहसनवाँ जैसे लोगों की मजबूरी है और न जाने शोषण के कितने स्तर हैं। कहानी संकेत भर करती है लेकिन ये संकेत उपेक्षणीय नहीं हैं।
कहानी में पशुओं और मनुष्यों के आदिम रागपूर्ण संबंधों का भी सुन्दर चित्र आया है। गाड़ीवान हिरामन के बैल उसके साथी हैं। वह अपने बैलों से बात करता है। पूरी कहानी बैलों और हिरामन के बीच के रागपूर्ण संबंधों को दर्ज करती चलती है –
कहानी के शुरू में जब फ्लैशबैक में बाघों के लदनी का प्रसंग आया है तब हिरामन बैलों को समझा रहा है, ‘अरे पिजड़े में बंद बाघ का क्या डर?’
जब चोरी का माल पकड़ा गया है और हिरामन गाड़ी छोड़कर बैलों को लिए भागता है तब कहानी में एक वाक्य आया है, ‘रात भर भागते रहे तीनों जन।’ ध्यान दीजिये तीनों जन कहा। यानि कथाकार के लिए और हिरामन के लिए तीनों समान प्राणी हैं। कोई भेद नहीं।
हीराबाई के आने के बाद का एक दृश्य है- ‘हिरामन अपने बैलों से बात करने लगा ‘एक कोस जमीन! जरा दम बांध कर चलो। प्यास की बेला हो गई न! याद है, उस बार तेगछिया के पास सरकस कंपनी के जोकर और बंदर नचानेवाला साहब में झगड़ा हो गया था। जोकरवा ठीक बंदर की तरह दांत किटकिटा कर किकियाने लगा था, न जाने किस-किस देस-मुलुक के आदमी आते हैं!’
जब हीराबाई और हिरामन विश्राम के लिए रुके हैं- ‘उसके बैलों ने बारी-बारी से ‘हुंक-हुंक’ करके कुछ कहा। हिरामन ने जाते-जाते उलट कर कहा- ‘हां, हां, प्यास सभी को लगी है। लौट कर आता हूं तो घास दूंगा, बदमासी मत करो!’ बैलों ने कान हिलाए।’
अब हिरामन महुआ घटवारिन का गीत सुना रहा है- ”हिरामन ने अपनी कांपती हुई बोली को क़ाबू में ला कर बैलों को झिड़की दी- ‘इस गीत में न जाने क्या है कि सुनते ही दोनों थसथसा जाते हैं। लगता है, सौ मन बोझ लाद दिया किसी ने।’ .
आगे अब हीराबाई को लेकर जल्दी ठिकाने पर पहुँचने की दौड़ है। हिरामन अपने बैलों को समझा रहा है- ‘कदम खोल कर और कलेजा बांध कर चलो …ए …छि …छि! बढ़के भैयन! ले-ले-ले-ए हे -य!’ नननपुर तक वह अपने बैलों को ललकारता रहा। हर ललकार के पहले वह अपने बैलों को बीती हुई बातों की याद दिलाता।’
हीराबाई गाड़ी से उतरकर बैलों से विदा ले रही है, ‘अच्छा, मैं चली भैयन।’ और बैल क्या कहते हैं – ‘बैलों ने, भैयन शब्द पर कान हिलाए।’
कहानी का अंतिम दृश्य है। हीराबाई जा चुकी है। हिरामन घर लौट रहा है। देखिये, ‘हिरामन ने हठात अपने दोनों बैलों को झिड़की दी, दुआली से मारते हुए बोला- ‘रेलवे लाइन की ओर उलट-उलट कर क्या देखते हो?’ दोनों बैलों ने क़दम खोल कर चाल पकड़ी।’
वस्तुत: रेणु अपनी कहानियों में संवेदना के अनेक प्रसंगों को एक साथ छूते हैं। उनकी कहानी का कोई एक सपाट अर्थ नहीं हो सकता। रेणु जीवन के तमाम रंग, गंध, राग महसूस करते हैं और उन्हें कहानी में ले आने के लिए पूरा जोर लगाते हैं। उनके यहाँ कहानी रचने की यह प्रक्रिया इतनी सहज और दुलार भरी है कि कहीं कुछ अस्वाभाविक नहीं लगता। आमतौर पर कहा जाता है कि कहानी जीवन की एक फांक होती है पूरा जीवन नहीं। रेणु की कहानियाँ जीवन की एक फांक नहीं उससे कहीं अधिक है।
तीसरी कसम के अंत में आया एक वाक्य ‘मरे हुए मुहर्तों की गूंगी आवाजें मुखर होना चाहती है।’ बताता है कि जाति और वर्ग की ही नहीं तमाम गूंगी आवाज़ों को उनके यहाँ स्वर मिला है। अकारण नहीं कि साठ बरस पुरानी इस कहानी में आज भी हम अपना स्वर सुनने के लिए लालायित हैं।


बेहद उम्दा लेख ।
लेख में तीसरी कसम की भावात्मक गहराई और रेणु की कथा-संवेदना को अत्यंत सूक्ष्मता से उद्घाटन हुआ है। ‘गूंगी आवाज़ों’ के रूपक के माध्यम से जीवन के दबे हुए यथार्थ को स्वर देने की रेणु की शक्ति को बहुत ही प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया गया है। कालजयी कहानी ‘तीसरी कसम’ के नए पहलुओं से रूबरू कराने के लिए वरिष्ठ एवं बेहद प्रिय आलोचक आदरणीय पल्लव सर का हार्दिक आभार।